रविवार, 16 अक्तूबर 2011

'Vitamin E pills tied to prostate cancer'

'Vitamin E pills tied to prostate cancer'
खासा खतरनाक भी हो सकता है विटामिन ई की गोलियों का गैर -ज़रूरी अतिरिक्त सेवन ,बड़ी खुराकें .एक अध्ययन में उन तमाम लोगों पर नजर रखी गई जो पांच बरसों तक विटामिन ई की बड़ी खुराकें लेते रहे थे .पता चला इनके लिए प्रोस्टेट कैंसर के खतरे का वजन बढ़ गया है .यह जोखिम इनके गोलियां बंद करने के बाद भी बरकरार रहा .इसलिए ज़रूरी है लोग विटामिन ई एवं दूसरे विटामिन सम्पूरकों का सोच समझकर विवेकपूर्ण दोहन सेवन करें .
एक गलत फहमी लोगों को यह बनी रहती है कि इन विटामिन गोलियों का सेवन निरापद होता है .फायदा नहीं तो कोई नुकसान भी इनसे होना हवाना नहीं है .भाई साहब नितांत भ्रामक है यह धारणा .लोग सोचते हैं जैसे चिकिन सूप लेने में कोई हर्ज़ नहीं है वैसे ही विटामिनों का सेवन है .
क्लीव्लेंड क्लिनिक के साइंसदान डॉक्टर एरिक क्लेन इससे जरा भी इत्तेफाक नहीं रखते आपने ही यह अध्ययन संपन्न किया है .यदि आपके शरीर के लिए इसका स्तर सामान्य है फिर आपको इसकी जरा भी ज़रुरत नहीं है कि आप इसे गोलियों के रूप में लें .और अगर आप इसका ज़रुरत से ज्यादा सेवन कर रहें हैं तो इसके उलटे नतीजे ही निकलेंगे .नुकसानी उठानी पड़ सकती है आपको .
अपने अध्ययन में आपने कुछ लोगों को रेंडमली विटामिन के ४०० यूनिट का कैप्स्यूल रोजाना मुहैया करवाया तो कुछ को रेंडमली ही प्लेसिबो छद्म दवा , प्लेसिबो या डमी पिल्स ही दीं.पांच साल तक यही सिलसिला चलाया .पता चला विटामिन ई पिल्स लेने वालों के लिए प्रोस्टेट कैंसर के खतरे का वजन १७%बढ़ गया है .
गौर तलब यह भी है कि ओवर दी काउंटर बिना डॉक्टरी पर्ची के मिलने वाली इस गोली की यह मात्रा सिफारिश की गई स्वीकृत खुराख से बीस गुना ज्यादा है .स्वीकृत डोज़ मात्र २३ यूनिट है .
नतीजों का मतलब कुछ यूं निकला प्रति १००० गोली लेने वालों में प्रोस्टेट कैंसर के ११ मामले सामने आये बरक्स उनके जो डमी पिल्स ही ले रहे थे .
ram ram bhai

Meteorites led to life on earth ?
Meteorites led to life on earth ?

साइंसदानों की माने तो पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत अन्तरिक्ष से होने वाले उल्कापात से हुई थी .बेशक यह भी प्रामाणिक तौर पर माना जाता है कि पृथ्वी से भीमकाय छिपकिलियों का सफाया भी अब से कोई. साढ़े छ :करोड़ बरस पहले हुए उल्का वर्षण से ही हुआ था .

साइंसदानों की माने तो पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत अन्तरिक्ष से होने वाले उल्कापात से हुई थी .बेशक यह भी प्रामाणिक तौर पर माना जाता है कि पृथ्वी से भीमकाय छिपकिलियों का सफाया भी अब से कोई साढ़े छ :करोड़ बरस पहले हुए उल्का वर्षण से ही हुआ था .विज्ञानियों का ऐसा मानना है कि पृथ्वी के जन्म के शैशव काल में ही बड़ी बड़ी चट्टानें अधजली उल्काओं के रूप में पहुँच गईं थीं .इन्हीं विशालकाय चट्टानों ने पृथ्वी पर जीवन के अनुरूप परिश्तिथियाँ (माहौल )रची थीं .जीवन के लिए शुरूआती कच्चा माल ,आदिम जीवन स्वरूप इसी भारी उल्कापात ने मुहैया करवाया था .
"When people think of impact events and life ,probably 99%think of the extinction of dinosaurs .There are always destructive effects but afterwards particularly if you are a microbe ,these impacts can be beneficial ," Gordon Osinski at the university of western Ontario said .
यानी जब भी पृथ्वी पर हुए भीषण उल्कापात का ज़िक्र चलता है ९९%लोग डायनासोरों के विनाश की ही बात सोचते हैं .जीवन के उद्भव और विकास की नहीं .जबकि जीवन के बीज प्राकृत घटनाओं ने ही बोये हैं .विनाश के बाद फिर जीवन है .मृत्यु ही नए जीवन के लिए जीवन के नवीकरण के लिए वरदान है यह कोई नहीं सोचता .
ram ram bhai

RAM RAM BHAI !Children eat less if parents nag :
Children eat less if parents nag :
बच्चे भाजी तरकारी पौष्टिक आहार लेने में आनाकानी करतें ही हैं अपवाद स्वरूप ही कुछ बच्चे हरी सब्जी सलाद आदि खाते देखे जातें हैं ऐसे में ही माँ बाप के धैर्य की परीक्षा होती है .ऐसे में डाट डपट फटकार और किसी और के सामने इसका बखान करके बच्चे को ज़लील करने के उलटे नतीजे ही निकलते हैं .बच्चे और भी ज्यादा छिटकने लगते हैं पौष्टिक लेकिन कम स्वादु चीज़ों से . एक नवीन अध्ययन के अनुसार माँ -बाप की जोर आज़माइश के ज़बरिया बच्चे को उसकी नापसंद चीज़ों को डाट डपट के खिलाने के उलटे नतीजे ही नकलते हैं .बच्चे नापसंद चीज़ को खाएं और पूरा खाएं यह कतई ज़रूरी नहीं है .
अध्ययन से पता चला है खाने पीने के मामलों में दवाब डालने से बच्चों के पौष्टिक लेकिन गैर स्वादु भोजन ग्रहण करने की संभावना और कम हो जाती है .दवाब हटाइये यह सम्भावना बढ़ जायेगी .यही सार रूप सन्देश है इस अध्ययन का .बच्चे को मनाइए धमकाइए नहीं .
RAM RAM BHAI !
Housewives ?Modern women prefer to be called 'stay at home mums'
आज की औरत खुद को हाउस वाइफ कहलवाना पसंद नहीं करतीं हैं .उन्हें लगता है उनके के लिए प्रयुक्त यह पद संबोधन उनकी हेटी करता है .बेशक इस शब्द का अवमूल्यन भी बहुत हुआ है .नकारात्मक अर्थ छटा आदिनांक बनी रही है इस शब्द की जैसे बच्चों की परवरिश ,उनका होम वर्क करवाना कोई आया गया ,गया बीता दोयम दर्जे का काम रहा हो .और दफ्तारिया औरत कुछ बड़े झंडे गाडती हो .कमाऊ समझी जाती है वर्किंग वोमेन जैसे घरेलू , घरु औरत भाड़ झोंकती हो बेगार उठाती हो गैर कमाऊ गैर कमेरी हो .
इसीलिए अब अधुनातन घरेलू औरत परिवार के प्रति -समर्पित औरत खुद को 'स्टे एट होम मम/मम्स 'कहलवाना ही पसंद करतीं हैं .एक ब्रितानी अध्ययन के मुताबिक़ ब्रिटेन में रहने वाली दो तिहाई महिलायें 'हाउसवाइफ 'की नकारात्मक अर्थच्छ्ता (अर्थ -छटा )देख समझ रहीं हैं .उन्हें लगता है यह संबोधन उनकी अस्मिता उनके घर के प्रति समर्पण भाव को एक छोटा काम ,घोषित कर रहा है .नकार रहा है उनके योगदान को .
इनमे से एक तिहाई औरतें तो इस संबोधन ,इस लेबिल को अब अपना अपमान समझने लगीं हैं .
यह अध्ययन जो २००० औरतों के एक हालिया सर्वेक्षण पर आधारित है दर्शाता है कि किस प्रकार औरत का नज़रिया अपने और समाज में उसकी भूमिका के प्रति तबदील हुआ है .
'स्टे एट होम मम्स 'का ध्वनित अर्थ बच्चों की देखभाल से ,लगाया जा रहा है औरतें मानतीं हैं उनका पहला काम घर में रहकर बच्चों को संभालना ही है ,जहां तक घरेलू काम का सम्बन्ध है वह अब औरत मर्द दोनों सांझा करतें हैं .दोनों मिलकर ही करते हैं .मिलबैठकर ही उठाते हैं दोनों घरेलू कामों की जिम्मेवारी .डेली एक्सप्रेस ने यह अध्ययन प्रकाशित किया है .
संस्था मदर केयर की सलाहकार लिज़ डे ने यह अध्ययन संपन्न किया है .आप कहतीं हैं -अब समय बदल गया है अधुनातन महिला घर में अपने रोल को नए ढंग से वर्णित करने की तमन्ना रखती है क्योंकि उसका रोल भी खासा बदला है आधुनिक होता गया है उसी के अनुरूप उसका बखान भी तो होना चाहिए .उसी परम्परा बद्ध घिसे पिटे अंदाज़ में नहीं .अब घरेलू काम दोनों के बीच की हिस्सेदारी से ही चलता है किसी एक का जिम्मा भर नहीं रह गया है .औरत मर्द दोनों की बराबर की भागेदारी से ही सुचारू रूप चलता है .
अध्ययन में न सिर्फ औरतों की बदलती भूमिकाऔर रुझानों की पड़ताल की गई है उनके अपने बारे में दूसरों के नज़रिए और .बने बनाए विचारों को भी खंगाला गया है .कितनी ही औरतें आज यह मान रहीं हैं उन्हें लोग कमतर देख रहें हैं केवल इस बिना पर इस वजह से कि वह घर पर रहतीं हैं .उनकी कर्म भूमी सिर्फ घर है .
RAM RAM BHAI !
यौन संबंधों के प्रति किशोर वृन्द का नज़रिया .
यौन संबंधों से पैदा वार्ट्स एवं अन्य खतरों के प्रति किशोर वृन्द की खबरदारी नदारद रहती है अलबत्ता धार्मिक आश्थायें और परमेश्वर का खौफ ज़रूर कई किशोर -किशोरियों को कॉफ़ी अंशों में बचाए रहता है .ज़ाहिर है यौन संचारी रोगों के प्रति चेतना भी आई तो इसी आश्था और भगवान् भरोसे आयेगी .विज्ञान सम्मत दृष्टि और नज़रिए के तहत नहीं .
सेहत से ताल्लुक रखने वाले आंकड़े जुटाने के लिए नियत एक संस्था National Center for Health Statistics के अनुसार धर्म भीरुता और धर्म से पैदा नैतिकता के भय को ही किशोर -किशोरियों के एक बड़े तबके ने सेक्स से छिटके रहने की सबसे बड़ी वजह बतलाया है .यौन संचारी रोगों की दुश्चिंता सेहत के प्रति खबरदारी इस परहेजी की वजह के रूप में सामने नहीं आई है .१५-१९ साला थे ये किशोर वृन्द .
२००२ में इससे पहले इस बाबत एक रिपोर्ट आई थी जिसके बरक्स इस मर्तबा टीन एज सेक्स में थोड़ी सी कमी ज़रूर आई है लेकिन यह कमीबेशी उतनी भी नहीं है क्योंकि गत दो दशकों में घटाव का यह ट्रेंड लगातार देखने को मिला है .ये तमाम आंकड़े Centers for Disease Control and Prevention’s national survey.ने प्रस्तुत किये हैं .
पता चला किशोर अपने पहले यौन तर्जुबे में अब अधिकाधिक कंडोम तथा किशोरियां Depo-Provera,की सुइयां तथा गर्भ -निरोधी पेचिज़ अपनाने लगीं हैं .आइये कुछ नतीजों पर गौर किया जाए .
(१)२००९ में बर्थ रेट ३९.१ थी १५ -१९ साला किशोरियों के लिए .यानी प्रति -एक हज़ार में से इतनी किशोरियां बिन ब्याहे माँ बन गईं थीं .
(२)१९८८ में यही बर्थ रेट ५३ थी .लेकिन गत दो दशकों में टीन बर्थ रेट्स कम ज्यादा होती रही है .
अब ज़रा कनाडा ,जर्मनी और इटली से अमरीकी टीन बर्थ रेट्स की तुलना करें जहां ये क्रमश :१४ ,१० और ७ प्रति हजार हैं .
अमरीकी परि-दृश्य की और लौट ते हैं जहां १५-१९ साला किशोरियों में से कुल ४३%ने एक मर्तबा मैथुन (योनी सम्भोग )ज़रूर किया है .इस उम्र की कुल २२८४ किशोरियों से इस बाबत पूछताछ की गई थी जो इस आयु वर्ग के लिए सबसे बड़ा सर्वेक्षण कहा जा सकता है .
बेशक गत २० बरसों में यह प्रतिशत (%) ५१ %से गिरकर ४३%पर आगया था २००६-२०१० की अवधि तक .
लातिनी मूल और गोरी युवतियों के बरक्स ऐसे यौन तजुर्बे के मामलों में काली लडकियाँ (अफ़्रीकी अमरीकी ) आगे रही आईं हैं .यह एक इतिहासिक तथ्य है .
२००२ में सेक्स तजुर्बा लेने वाली ऐसी ही काली लड़कियों के जहां ५७%मामले दर्ज़ हुए थे वहीँ अब यह %घटकर ४६ फीसद पर आगया है .
और इसी के साथ यह नस्ली अंतर भी तकरीबन पट गया है .
१५ -१९ साला किशोरों में ४२%मामले इस उम्र में पहले यौन तजुर्बे के दर्ज़ हुएँ हैं .
इस एवज २३७८ ऐसे किशोरों से पूछताछ की गई थी जो अविवाहित रहे आये थे .
किशोरों के मामले में नस्ली अंतर ऐसे अनुभवों का आज भी बरकरार है .जहां कालों में यह %३८ था ,वहीँ स्पानिक और गैर स्पानी मूल के गौरों के लिए यह ३० और २५ %था .
जहां ४१%किशोरियों ने यह माना कि धार्मिक एवं नैतिक वजहों से वह यौन सम्बन्ध बनाने से बची रहीं ,वहीँ किशोरों के मामले में यह अपराध बोध भावना केवल ३१%में पाई गई .
दूसरा बड़ा कारण लड़कों के मामले में सही यौन साथी का न मिल पाना तथा यह डर रहा कि कहींउनसे यौन सम्बन्ध बनाने से कोई लडकी गर्भवती न हो जाए और वह मुसीबत में फंस जाएँ .
एक चौंकाने वाला तथ्य यह रौशनी में आया कि अमरीका में यौन संचारी रोगों के कुल मामलों में से आधे मामलों की चपेट में १५-२४ साला लोग आतें हैं .
इनमे से २५%किशोर वृन्द और अपेक्षाकृत युवा लोग ही होतें हैं जबकी आबादी में इनकी कुल हिस्सेदारी ५०%रहती है .ऐसा खौफ नाक मंज़र है सेक्स्युअली ट्रांसमितिद दिजीज़िज़ का .
chlamydia and gonorrhea.यौन रोगों की दर १५ -१९ साला किशोरियों मेंsarvaadhik मिली है .
एकल माँ बाप की संतानों में यौन तजुर्बों की कुल भागेदारी ५३-५४%पाई गई है .
जिनका लालन पालन दोनों माँ -बाप के हाथों हुआ उनके यौन अनुभव रत होने की संभावना कम रही .
इनमे ऐसा तजुर्बा लेने की संभावना कुल ३५ %कम रही .ज़ाहिर है परिवार की बुनावट भी अपना रंग दिखाती है .
१४ साल से कम उम्र की १८ %किशोरियां अपनी मर्जी के खिलाफ ही सम्भोग रत हुईं .उनकी मर्जी थी नहीं ऐसा हो लेकिन ऐसा हुआ था .
इसके बरक्स ३०% चाहती थीं कि ऐसा हो इच्छुक थीं वह यौनिक मैथुन की .शेष लड़कियों की प्रतिक्रिया मिली जुली थी .
७८%ने पहली मर्तबा में गर्भ निरोधी उपाय आजमाया था इन उपायों में कंडोम भी थे हारमोन युक्त गर्भ -निरोधी तथा आपातकालीन गोलियां भी थीं ,पेचिज़ भी थे .
कंडोम की हिस्सेदारी ६८%तथा गोलियों की १६%रही .
लड़कों के मामले में ८५ %ने पहली मर्तबा के तजुर्बे में भी गर्भ निरोधी उपाय आजमाया .कंडोम सबसे ज्यादा लोकप्रिय साधन रहा ..
८६ %युवतियों ने माना हालिया भी ऐसे अनुभव में उन्होंने गर्भ निरोधी उपाय स्तेमाल किया था .
लोकप्रियता के shikhar पर कंडोम ही रहा .पिल्स और हारमोन युक्तियाँ इसके बाद आईं .
९३ %पुरुषों ने आखिरी बार भी गर्भ निरोधी उपाय अपनाने के बारे में बतलाया .ज़ाहिर है गर्भ -निरोधी उपाय दिनानुदिन अपनाए गएँ हैं .
टीन age sex एक hakeekat है .fact है fantasy नहीं .

3 टिप्‍पणियां:

Maheshwari kaneri ने कहा…

अच्छी जानकारी सार्थक लेख...आभार

यादें....ashok saluja . ने कहा…

वीरुभाई राम-राम !
विटामिन-इ पर लाभदायक जानकारी .भ्रम तो टुटा आभार |

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जो प्रकृति दे बस वही खा लेते हैं हम।