रविवार, 2 अक्तूबर 2011

Particulate matter three times higher in Delhi air

Particulate matter three times higher in Delhi air
वायु प्रदूषण हमारे दिल को आहिस्ता आहिस्ता मार रहा है .हवा में मौजूद सूक्ष्म कण (माइक्रोपार्तिकिल्स ) आर्टरीज द्वारा लिपिड्स के अवशोषण को पंख लगा देतें हैं .लिपिड्स के तेज़ी से ज़मते जाने से धमनियां संकरी हो जातीं है रक्त प्रवाह कम होजाता है .हृदय को पूरा रक्त नहीं पहुंचता .कालान्तर में यही स्थिति हार्ट अटेक की वजह बन जाती है .
दिल्ली की हवा में ,यहाँ के आवासीय इलाकों में Respirable suspended particulate matter (RSPM or PM10) की मात्रा औसतन २०९ माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर है .हवा में तैरते सांस के साथ फेफड़ो में दाखिल होते इन ठोस कणों की यह मात्रा सुरक्षित स्तर से तीन गुना ज्यादा है ।
दिल्ली की ५५%आबादी उन सड़कों से आधाकिलोमीटर की दूरी पर ही रह रही हैं जहां वायु प्रदूषण का स्तर साल भर ज्यादा बना रहता है जो सांस और दिल सम्बन्धी परेशानियों की वजह बनता है ।
वायु में मौजूद कणीयप्रदूषक आर्थ्रोस्केलेरोसिस को बढा देते हैं .दिमाग और दिल की रक्त वाहिकाओं में चिकनाई ज़मना इसकी वजह बनती है .होते होते धमनियां बंद ही हो जातीं हैं ।
तम्बाकू के धुयें की ही तरह हमारी हवा में मौजूद कणीय प्रदूषक फेफड़ों के इन्फ्लेमेशन की वजह बनते हैं .परोक्ष रूप से यहीइन्फ्लेमेशन दिल की बीमारियों का सबब बनता है ।
बेशक जीवन शैली में आये बदलाव से पैदा हुआ असंतुलन डायबिटीज़ ,डिसलिपिडिमिया ,हाईब्लड प्रेशर ,ओबेसिटी ,बैठे बैठे ही सब काम करते रहना ,व्यायाम का जीवन शैली से नदारद होना ,तम्बाकू का बढ़ता सेवन ,और चलन बढ़ता हुआ मनो -सामाजिक तनाव भी हृद रोगों की तरफ आदमी को ले जा रहा है ।
लेकिन वायु प्रदूषण भी हर साल ८ लाख लोगों की असामयिक मृत्यु का कारण बन रहा है .विश्वस्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार वायु प्रदूषण मौत की १३ वीं बड़ी वजह बना हुआ है ।
अध्ययनों से इल्म हुआ है यदि हवा में पसरा तैरता कणीय प्रदूषक ७० माइक्रोग्राम /(मीटर )३से २० माइक्रोग्राम /(मीटर )३ पर आजाये तो इससे होने वाली असामयिक मौत की दर भी १५ %कम हो जाए .
हवा में तैरते कणीय प्रदूषकों से चंद हफ्ते क्या चंद घंटा ही असरग्रस्त होने पर दिल का दौरा पड़ सकता है .दिल की धौकनी अनियमित हो सकती है ,जिनके लिए दिल की बीमारियों का जोखिम ज्यादा बना रहता है उनकी ऐसे में मौत भी हो सकती है .माहिरों का यही कहना है .
Weaker Sex? Women are genetically टफ़र


Weaker Sex? Women are genetically tougher



बेशक "वीकर सेक्स "कहा जाता रहा है परम्परा से औरतों को लेकिन रोगों और संक्रमणों से जूझने के मामले में औरतें मर्दों से ज्यादा सक्षम हैं .यही नतीजे निकाले गए हैं एक ताज़ा अध्ययन से ।
बेल्जियम की Ghent University , के रिसर्चरों ने पता लगाया है औरतों के पासआनुवंशिक तौर पर एक बेहतर सोफ्टवेयर ,अव्वल प्रोग्रेम रहता है जो उन्हें तरह तरह के संक्रमणों का मुकाबला करने में ज्यादा कारगर बनाए रहता है ।रोगों से जूझने निपटने का माद्दा भी इसी जीन प्रोग्रेमिंग की वजह से ज्यादा रहता है ।
बेहतर बेक अप व्यवस्था लिए रहतीं हैं महिलायें रोगों से मुकाबला करने के प्रति ज्यादा प्रति -रोधक ताकतभी बनाए रहतीं हैं ॥
डेली मेल ने प्रकाशित किया है इस अध्ययन को जिसके मुताबिक़ मर्द जब "मेन फ्ल्यू "की बात कर रहे होतें हैं तब सच बोल रहे होतें हैं .अतिश्योक्ति नहीं कहेंगें इसे ।
आखिरकार इस जैविक व्यवस्था में अंतर भी तो खासा है .औरत की बेहतर रोग -प्रतिरक्षण की वजह उसका एक्स एक्स शख्शियत होना है .एक्स पहले ही वाई से ज्यादा असरदार होता है और औरत उसी की एक और अतिरिक्त कोपी लिए इस दुनिया में आती है ।
A female is an XX individual while a Male is an XY।
सारा खेल तमाशा करतब इन गुणसूत्रों क्रोमोज़ोम्स का है ।
जैविक तौर पर Y-क्रोमोजोम एक्स से लघुतर होता है .कालानुक्रम में यह लगातार छीजता भी गया है .तब क्या एक दिन औरत स्ट्रोंगर सेक्स का दर्ज़ा पा जायेगी ?
ड्यू टू एक्स -chromosome Women have greater access to molecules called micro RNAs,which are encoded on the X-Chromosome.
ये लघुतर अणु ही राइबोन्यूक्लिक एसिड की स्ट्रेनें हैं जो रोग प्रति -रोधी क्षमता का बेहतर विनियमन करतीं हैं ।
यही वजह है स्तनपाइयों में मादा अकसर दीर्घ जीवी होती है .सदमा बर्दाश्त करने का माद्दा फिर चाहे वह सेप्सिस से रिसे या किसी अन्य दहशत पैदा करने वाले संक्रमण से महिलाओं में ज्यादा होता है .(प्रसव पीड़ा हो या प्रियजन का विछोह औरत अपने को संभाल लेती है ,मर्द रुल जाता है अकसर )।
जैविक तौर पर भी एक्स -क्रोमोजोम जेनेटिक कोड में तमाम micro आरएनएज का १०%लिए रहता है .

इनमे से ही कई इम्युनिटी और कैंसर की चाबी हैं .महत्वपूर्ण प्रकार्य हैं इनके ।
माइक्रोआरएनएज ही प्रोटीनों के विनियामक हैं रेग्युलेटर हैं .कोशिका की बढ़वार और कैंसर इम्यून रेस्पोंस के लिए उत्तरदाई हैं .(बे लगाम कोशिका बढ़वार ही तो है कैंसर जब कोशिकाएं मरना ही भूल जातीं हैं ।).
लेकिन इस सुपर इम्युनिटी की कीमत भी चुकानी पड़ती है औरत को .संक्रमण के प्रति -प्रतिरोध बढ़ने से इम्यून रेस्पोंस भी ज़बर्जस्त पैदा होती है ।
यही वजह है औरतों में ऑटोइम्यून डिजीज होने के प्रबल संभावना बनी रहती है .डायबितीज़ भी एक ऑटोइम्यून डिजीज है ।

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

तभी दिल्ली जाने पर बेचैनी होती है।

यादें ने कहा…

वीरू भाई,राम-राम !
हम तो बचपन से झेल रहें हैं दिल्ली को ...
और फिर सौगात में मिली 'दिल' की बीमारी को .
क्योंकि चचा "ग़ालिब" फरमा गए हैं .....
कौन जाये "दिल्ली" की गल्लियाँ छोड़ के ......
शुभकामनाएँ "दिल्ली" के दिल वालों को .....

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर लगा ! शानदार प्रस्तुती!
दुर्गा पूजा पर आपको ढेर सारी बधाइयाँ और शुभकामनायें !
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/