शनिवार, 30 जुलाई 2011

कहाँ गया कलावती का "ग्रीन चूल्हा "?

कहाँ गया कलावती का "ग्रीन चूल्हा "?

कोई बीस बरस पहले गैर -परम्परा गत ऊर्जा मंत्रालय ने "धूम्र -रहित चूल्हा "की अवधारणा प्रस्तुत की थी .कहा गया था यह गाँव की कलावातियों को घरेलू पशुधन से निजात दिलाकर उनके सारे दुख -दर्द दूर कर देगा .जलावन लकड़ी ,कोयला और काओ -डंग(उपला ) ही गाँवों में रसोई का प्रधान ईंधन बना रहा है जिसने बांटी हैं दमा और लोवर एंड अपर रिस्पाय्रेत्री ट्रेक्ट इन्फेक्शन की सौगातें ।
विश्व -स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ भारत में हर बरस पाँच लाख कलावातियाँ भारतीय चूल्हे की भेंट चढ़ जाती हैं लेकिन इस मुद्दे को गत दो दशकों से ठंडे बसते में डाला हुआ है ।
उम्मीद की जा सकती है नव गठित "नव एवं पुनर -प्रयोज्य ऊर्जा मंत्रालय "इसकी सुध लेगा .कारबन -उत्सर्जन के २०२० तक के लक्ष्यों को पूरा करने के केन्द्र में "धूम्र -रहित "चूल्हे को रखा जाना चाहिए ,तभी कहा समझा जा सकेगा "कांग्रेस का हाथ वास्तव में आम आदमी के साथ है "फिल वक्त तो यह हाथ उसकी जेब में दिखलाई देता है ।
गाँव की रसोई नौनिहालों और महिलाओं के स्वास्थ्य को ही कमोबेश लीलती है ,बेवक्त बीनाई (आंख की रौशनी )ले उड़ता है गाँव का चूल्हा ।
वजह भारतीय चूल्हे से पैदा प्रदूषण का स्तर न्यूनतम सह्या स्तर से ३० गुना ज्यादा होना है .(स्रोत :विश्व -स्वास्थ्य संगठन ).कार्बन -डायऑक्साइड और मीथेन को कमतर करने का भरोसे मंद ज़रिया बन सकता है "ग्रीन चूल्हा "इसे ना सिर्फ़ स्थानीय स्तर पर तैयार किया जा सकता है ,इसे कायम रखने चालू रखने के लिए ज़रूरी इंतजामात भी स्थानीय स्तर पर किए जा सकतें हैं ।
सूट(अध् जला कार्बन ) और कार्बन -डायऑक्साइड इस दौर में विश्व -व्यापी तापन की एहम वजह बने हुए हैं सर्द -मौसम में शाम के झुर-मुठ में कलावातियाँ घास -फूस हरी टहनियों का स्तेमाल रोटी पकाने के लिए करती देखी जा सकती हैं ।
धान की लम्बी टहनियां भी दाने निकालने के बाद जल्दी से दूसरी फसल लेने के लिए बड़े पैमाने पर जला दी जातीं हैं कई दिनों तक सुलगती है यह आग .राईस हस्क से बाकायदा बिजली बनाई जा सकती है .बिहार के एक कम्युनिकेशन इंजीनीयर ने यह करके दिखाया है .ऐसी एक यूनिट मात्र १० लाख में खड़ी हो जाती है ।
ज़रूरत इस प्रोद्योगिकी को प्रोत्साहित करने की है .हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा ।
फारूख अब्दुल्ला साहिब से अनुरोध है जो नव एवं पुनर -प्रयोज्य ऊर्जा मंत्रालय की कमान संभाले हुए हैं एक बार फ़िर पूरे दम ख़म से बायो -मॉस-कुकिंग स्तोव्स को नवजीवन प्रदान कर ग्रामीण महिलाओं के हाथ मजबूत करें ।इनके मकानात में हवा की आवा- जाही के अनुरूप संशोधन करवाएं ।टेक्नोलोजी ट्रांसफ़रएंड फंडिंग के लिए विश्व -स्वास्थ्य संगठन की क्लीन डिवेलपमेंट मिकेनिज्म से सहयोग लिया जा सकता है ।जहाँ चाह वहाँ राह ।
ग्रीन -चूल्हे के अलावा सौर लाल टेन (सोलर लेंत्रें ),स्थानीय कचरे को ऊर्जा में बदलने की प्रोद्योगिकी को भारतीय गाँवों में विकसित किया जा सकता है ।

औरत हो या मर्द जींस (जीवन खंड /जीवन इकाइयों )में छिपा है शोपिंग स्टाइल का राज़

अकसर शादी शुदा मर्द खासकर शोपिंग के लिए अपनी औरत के संग स्टोरों में घुसने से कतराता है ।वह ख़ुद जब भी किसी शोपिंग माल या स्टोर में प्रवेश करता है झट -पट वह आइटम खरीद कर बाहर आ जाता है जैसे गया ही ना हो ।और औरत ?चयन में खासा वक्त लगाती है ।इसकी वजह जीवन की मूल भूत इकाइयों (जींस )के अलावा प्रागेतिहासिक काल में छिपीं हैं ।जब औरत को ही हंटर गैदरार के रूप में भोजन जुटाना पड़ता था ।
तब औरत का काम छांट छांट कर कंद मूल (एडिबिल प्लांटस और फंगी आदि जुटाना होता था .ज़ाहिर है चयन में ढूंढ निकालने में वक्त लगता था .मर्द हिंसक पशुओं का शिकार करता था .यूँ जाता था और यूँ आता था .हालाकि ६४ फीसद केलोरीज़ उसे ही जुटानी पड़तीं थीं ।
मिशगन यूनिवर्सिटी के डेनियल कृगेर शोपिंग स्टाइल में अन्तर की यह बड़ी वजह बतलातें हैं ।
अब आप कल्पना कीजिये बास्किट भर के सामान आपको लाना है वह भी अलग अलग जगह से (बेशक उसी स्टोर्स से ),कितना वक्त लगेगा आपको /आपकी श्री -मतीजी को ?घूम गया ना आपका भेजा ?
जबकि मर्द के लियें यह लाजिम था "गोश्त जुटा कर वह झट -पट उलटे पाँव लौटे ।
आज भी मर्द के दिमाग में एक ख़ास आइटम ही होता है जब वह "ओल्ड नेवी "या' कोह्ल्स "या फ़िर बेस्ट बाई या फ़िर आईकिया में प्रवेश करता है ।
सन्दर्भ सामिग्री :-शोपिंग स्टाइल्स टाईद टू जींस .


ग्लोबल वार्मिंग की न्यूनतम निर्धारित सीमा का अतिक्रमण करने की कगार पर पहुँच सकतें हैं हम लोग .

हमने अकसर अपने आलेखों में दोहराया है -बड़ा ही नाज़ुक है पृथ्वी का हीटबजट जिसमे ४ सेल्सिअस की घटबढ़ एक छोर पर आइस एज(हिम युग ) , दूसरे पर जलप्रलय ला सकती है ।
क्रोसिंग दी थ्रेश -होल्ड :"जस्ट ४ सेल्सिअस होटर एंड ऐ लिविंग हेल काल्ड अर्थ ".शीर्षक है उस ख़बर का जिसमे हमारेद्वारा बारहा बतलाई गई उक्त बात की पुष्टि हुई है ।
पृथ्वी का तापमान ४ सेल्सिअस बढ़ जाने पर यह ग्रह नरक बन जाएगा .कोई एलियंस (परग्रह वासी ) भी इधर का रूख नहीं करेगा .हालाकि कोपेनहेगन में आयोजित७ -१८ दिसंबर जलवायु परिवर्तन बैठक को लेकर कई माहिर भी हतोत्साहित है ,वहाँ सिवाय लफ्फाजी के ,थूक बिलोने के कुछ होना हवाना नहीं हैं ।
माहिरों के अनुसार पूर्व ओद्योगिक युग की तुलना में तापमानों में ४ सेल्सिअस की वृद्धि होना कोई असंभव घटना नहीं होगी ,ऐसा होने का पूरा पूरा अंदेशा है ।
यदि सच मुच ऐसा हो गया तब क्या कुछ हो सकता है .जानना चाहतें हैं ,दिल थाम के कमर कसके बैठ जाइए .समुन्दरों में जल का स्तर ३.२५ फीट तक बढ़ गया है ,कई तटीय द्वीप डूब गएँ हैं ,जल समाधि ले चुके हैं (कोई मनु नहीं बचा है यह लिखने लिखाने को -हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर /बैठ शिला की शीतल छाँव /एक पुरूष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह /नीचे जल था ऊपर हिम था /एक तरल था एक सघन /एक तत्व की ही प्रधान- ता, कहो इसे जड़ या चेतन -कामायनी ,जयशंकर प्रसाद )
थाईलेंड ,बांग्ला देश ,वियेतनाम ,इतर डेल्टा -नेशंस के कई करोड़ लोग पर्यावरण रिफ्यूजी बन गए हैं ,बेघर हो गएँ हैं .सुरक्षित अपेक्षया समुद्र तल से ऊंचे स्थानों के लिए कूच हो रहा है .छीना झपटी है अफरा तफरी है ।
ध्रुवीय रीछ (पोलर बेयर) इतिहास शेष रह गए हैं .आलमी औसत तापमानों के बरक्स उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र के तापमानों में तीन गुना तक वृद्धि हो चुकी है ।
(ऑस्ट्रेलिया इज रूतिन्ली स्वेप्त बाई वाईट हाट फायर्स ऑफ़ दी काइंड देट क्लेम्ड १७० लाइव्स लास्ट फेब्रारी )।
हिमालयीय हिमनद सूख गए हैं .एशिया का वह शाश्वत जीवन निर्झर कहीं नहीं हैं ।
दक्षिणी एशियाई मानसून आवारा ,हो गया है ,कभी सूखा कभी अतिरिक्त मूसला- धार अति -वर्षंन ।
जीवन की सुरक्षा और गुणवता दोनों खटाई में पड़ गईं हैं .मौसम चक्र टूट गएँ हैं ।
अरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफ़ेसर कार्य रत पामेला म्सल्वी ऐसी ही तस्वीर प्रस्तुत करतें हैं .खालाजी का घर नहीं हैं ४ सेल्सिअस की वृद्धि आलमी तापमानों में ।
२०६० तक ऐसा हो सकता है यह कहना है ब्रितानी मौसम विभाग का जो जलवायु परिवर्तन से सम्बद्ध काम करने वाली एक एहम संस्था है ।
अभूतपूर्व परिदृश्य हमारे बच्चों को आज की युवा भीड़ को देखने को मिलेंगें .२०८० में तीन अरब लोग एक घूँट पानी के लिए छीना झपटी कर रहे होंगें .फसली उत्पाद गिर जायेंगें .कितने लोगों को भूखा सोना पडेगा इसका कोई निश्चय नहीं ।

दुनिया से कूच करते वक्त पर्यावरण को नुकसान क्यों ...

पारसी लोग शव को खुले में रख देतें हैं .एक तरफ़ इसे पक्षी जीमते है तो दूसरी तरफ़ पर्यावरण को कोई क्षति नहीं पहुँचती .जीवन भर हम अपना कार्बन फुटप्रिंट छोड़तें चलतें हैं ,चलते चलते इस नुकसानी से बच सकतें हैं .ह्यूमेन एल्केलाइन हाइड्रोलिसिस को साकार कर रहें हैं "मेथ्युज़ इंटरनेश्नल कोर्पोरेशन.' पिट्सबर्ग ,पेन्सिल्वेनिया आधारित यह निगम ताबूत ,भस्म -बक्शे ,इतर शव सम्बन्धी सामान तैयार करता है ।
सेंटपिट्सबर्ग ,फ्लोरिडा में यह निगम जनवरी २०१० से काम करने लगा है . ।
एल्केलाइन हाइड्रोलिसिस में शव को स्टेन लेस स्टील से बने एक कक्ष में को डुबो दिया जाता है बाकी काम ऊष्मा (हीट),दाब ,सोप और ब्लीच बनाने में प्रयुक्त पोतेसियम-हाइड्रोऑक्साइड पूरी कर देता है ।तमाम ऊतक इस घोल में विलीन हो जातें हैं (घुल जातें हैं ).दो घंटा बाद अवशेष के रूप में बच जातीं है ,अस्थियाँ और एक सिरपी-ब्राउन घोल ,जिसे फ्लश करके बहा दिया जाता है .अस्थियाँ सगे सम्बन्धियों को लौटा दी जातीं हैं ।
इस प्रकार परम्परागत शव दाह के बरक्स इस विधि में (एल्केलाइन हाइड्रोलिसिस में )कार्बन उत्सर्जन में ९० फीसद कमी की जा सकती है ।
आज आदमी कमोबेश "साईं -बोर्ग "बन चुका है जिसमे मशीनी अंग लगे रहतें हैं ,नकली घुटने नकली हिप ,सिल्वर टूथ फिलिंग्स तो अब आम हो ही चलें हैं .सिलिकान इम्प्लान्ट्स का भी चलन है ।नकली वक्ष ही अब यौन आकर्षण का केंद्र है .
एक स्टेनदर्ड क्रेमेशन से वायुमंडल में ४०० किलोग्रेम कारबनडाय -ऑक्साइड शामिल हो जाता है ,इस ग्रीन हाउस गैस के अलावा डाय -आक्सींस तथा मरकरी वेपर भी शव दाह ग्रह से उत्सर्जित होतें हैं ,कारण बनती है सिल्वर टूथ फिलिंग ।
एल्केलाइन हाइड्रोलिसिस शव को ठिकाने लगाने वाली एक रासायनिक प्रकिर्या है जिसे साइंसदान "बायो -क्रेमेशन "(जैव शव दाह )कह रहें हैं ।
जाते जाते अपना कार्बन फुट प्रिंट कम करने की प्रत्याशा में अब अधिकाधिक लोग इसके लिए तैयार हैं ।इस विधि मे चक्रित कबाड़ कार्बोर्ड से बनी शव पेटियां (ताबूत )काम में ली जायेंगी ।एक तिहाई अमरीकी और अपनी आबादी के आधे से ज्यादा कनाडा वासी इसके लिए तैयार हैं ।यह लोग एम्बाल्मिंग (शव संलेपन )के भी ख़िलाफ़ हैं ,जिसमे पर्यावरण -नाशी रसायनों का स्तेमाल शव को सुगन्धित कर संरक्षित करने के लियें किया जाता है ।आख़िर में यह तमाम रसायन भी हमारी मिटटी में रिस आतें हैं ।मिटटी से (काया से )मोह कैसा ?

8 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

किसे फ़िक्र है मौसम की,

भारत में ऐसे मुर्दाघर अभी बनने में वर्षों लगेंगे।

Kajal Kumar ने कहा…

1. सरकार का तो पता नहीं, पर गांव में हमारे घर, चूल्हे के ऊपर चिमनी लगी है. धुआं बाहर निकल जाता है.
2. पता नहीं कहां तक सही है पर कहते हैं कि शवदाह में जो अन्य सामग्री डाली जाती है वह हवा में घुलने वाले दुष्प्रभावों को समाप्त कर देती है. यही हवन सामग्री के बारे में कहा जाता है. किन्तु अभी इसपर शायद रिसर्च की ज़रूरत हो.

veerubhai ने कहा…

काजल कुमारजी हवन और शव दाह में फर्क है .एकाधिक बार हमने दोनों की साक्षी की है .हवन के साथ समवेत स्वर में एक बड़े हुजूम के साथ शंकराचार्य द्वारा संपन्न मन्त्र जाप के संग हवन में वायुमंडल की निश्चय ही शुद्धि होती है .जोर का धक्का ध्वनी तरंगे वायुमंडल को देकर वायु को ऊर्ध्वगामी बनातीं हैं ,लेकिन शव दाह के हम जब भी साक्षी बनें हैं ,निगम बोध घाट दिल्ली ,बुलंद शहर ,रोहतक और अपनी जन्मस्थली गुलावठी (बुलंदशहर ) में ,आँखों में एक अजीब सा भारी पन उतरा है .एक अजीब सा गश नशा काया पर छाया है .जो स्नान के बाद भी खासा देर तक काबिज़ रहता है .उस परिमंडल की वायु जहां मुर्दा फुंक रहा है हव्य -सामिग्री से थोड़ी कम ज़रूर गंधाएगी लेकिन हवा शुद्ध कैसे होगी ,मांस के जलने से .?केश के जलने से .
हाड जरे ज्यों लाकड़ी ,केश जरें ज्यों घास ,
सब जग जलता देख कर ,कबीरा भया उदास .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पेड़ों के साथ साथ ग्रीन चूल्हा भी काट डाला।

G.N.SHAW ने कहा…

भाई साहब बहुत ही नयी - नयी जानकारी मिली ! हम तो आगे है या पीछे ,शायद यह भी हाथ के कमाल हो ! बढ़िया लिखा है आपने ! बधाई

mahendra verma ने कहा…

पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित लेख ज्ञानवर्धक और उपयोगी हैं।
कलावतियों को धूम से निजात देने के लिए अभी भारत को 50 वर्ष और लगेंगे।

Arvind Mishra ने कहा…

आपकी विज्ञान पिनक मजेदार रहती है (पिनक अफीमची का नशा है )

निर्मला कपिला ने कहा…

आपने तो उन दिनो की याद दिला दी जब चुल्हे मेलकडियाँ उपले जला कर धूँयें के बहाने रोया भी करते थे। अब तो आँसू भी पलकों की चिमनियों मे रोक लेने पडते हैं। बाकी जानकारियाँ भी बहुत रोचक हैं-- खास कर शापिन्ग वाली। धन्यवाद।