रविवार, 31 जुलाई 2011

लघु कथा :नफासत .


लघु कथा -"नफासत "

मेरी नफासत क्या और कैसी है यह मुझे आज पता चला .हुआ यूँ मैं दिल्ली हाट और आई एन ऐ मार्किट को जोड़ने वाले पैदल पार पथ से गुजर रहा था .गुजरा कल भी था .रास्ता कल की तरह आज बे -साख्ता गंधाता नहीं घूर रहा था .गुजारा करने लायक था .बुहार दिया गया था .मैं अपनी छड़ी की टेक लिए अपनी ढाल उतर रहा था सबवे की सीढियां . आखिरी पैड़ी(सीढ़ी )से उतरते ही मैंने अनायास थूक दिया .हालाकि मन में कहीं थोड़ा बहुत संकोच भी था ."अरे मैंने तो थूक दिया "सोचते हुए मैं आगे बढ़ा ही था ."वही शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति जो पोलियो ग्रस्त है और एक वेंग मशीन लिए बैठा रहता है दिन भर यह उसका आशियाना है .,मुझे फटकार रहा था -यह थूकने की जगह है ?"बिल्कुल नहीं .भाई साहिब" गलती हो गई ,यहाँ नहीं थूकना चाहिए था ,मैं गलती तस्दीक कर ही रहा था ,उसने कहा कैसे ले देकर हम सफाई करतें हैं .मैंने कहा उस्ताद जी आपने पहचाना नहीं .मैं निकलते बड़ते आप को आदाब करता हूँ .आपकी वेइंगमशीन पर वजन भी करता हूँ ."ताबे दार हैं "-ज़वाब मिला .बड़ा ही खुद्दार है यह आदमी जो अपने पोलियो ग्रस्त मुड़े हुए हाथ से बामुश्किल पैसे गिन कर खीसे के हवाले करता है ।किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता यह वजन तौलने की मशीन ही उसकी आजीविका है .लेकिन आज तो इसने मुझे मेरी औकात ही बतला दी -
मुझे बहुत ज़ोर से एहसास हुआ -मेरी नफासत क्या है ?कैसी है ?कितने ज़हीन हैं हम लोग ?विकलांग यह नहीं मानसिक रूप से मैं हूँ .और हम लोग उस पर दया दृष्टि करते हुए निकल जातें हैं -बेचारा टोंटा है .

वजन भी कम हो सकता है स्तन पान करवाने से ...

६०० केलोरीज़ ले उड़ता माँ से नवजात एक बार में ही स्तन पान के ज़रिये ,इसलिये वजन कम करना है तो बच्चे को स्तनपान करवाइए तब तक जब तक दूध बनता है ।
दादी नानियाँ कहतीं थीं -शिशु को सलीके से आंचल में ढक ढांप छिपाकर स्तन पान करवाओ ताकि किसी की नजर ना लगे ।एक स्वस्थ माँ को एक घडा भर दूध उतरता है ।कालिदास ने नवप्रसूता को पीन्स्तनी कहा है ।
दीर्घावधि अध्धय्यनों से सिद्ध हुआ है -स्तनपान वजन कम करने का बेहतरीन साधन है महज मिथ नहीं है ।
स्तन पान के दौरान माँ की मेटाबोलिक रेट्स (रेट ऑफ़ बर्निंग केलोरीज़ )बढ़ जाती है ।
हर हफ्ता एक पोंड तक वजन कम हो जाता है स्तनपान करवाने वाली माँ का ।
नार्थ केरोलिना विश्व -विद्य्यालय,ग्रीन्सबोरो में पोषण विज्ञान की प्रोफेसर चेरय्ल लव लेडी उक्त तथ्य की पुष्टि करतीं हैं ।
मजेदार बात यह है ये औरतें ना तो किसी प्रकार की डा -इटिंग ही करतीं हैं उल्टे रोजमर्रा की खुराख से ५०० केलोरीज़ फालतू ही लेतीं हैं ताकि पर्याप्त मात्रा में दूध बनता रहे ।
अब सवाल पैदा होता है -क्या स्तनपान वेट लोस को पंख लगा देता है ,तेज़ी से घटता है वजन स्तनपान करवाने से ?
कोई सीधा सपाट ज़वाब नहीं है इस सवाल का .कई बातें हैं जो तय करतीं हैं वजन की घटबढ़ को ।
गतवर्ष ३६००० डेनमार्क की महिलाओं पर एक अध्धय्यन इसी बात की पड़ताल के लिए किया गया ।जिस महिला ने अधिक अवधि तक (०-२ वर्ष के दरमियान )उत्तर्प्रसव(पोस्ट पार्तम) और कम अन्तराल से हर रोज़ स्तन पान करवाया ६ महीने के बाद उनके वजन में ज्यादा कमी दर्ज की गई ।इस के अलावा इस बात को भी मद्दे नजर रखा गया ,क्या गर्भावस्था से पूर्व महिला का वजन आदर्श कद काठी के अनुरूप निर्धारित भार से अधिक था ,गर्भ धारण की तैयारी के दरमियान उसका वजन कितना था ?ये तमाम घटक मिलकर ही अन्तिम निष्कर्ष तक ले जातें हैं ,किसको कितना फायदा हुआ ,किसका कितना वजन कम हुआ ।
कोर्नेल में प्रोफेसर कथ्लीन रासमुस्सेन भी उक्त तथ्य की पुष्टि करतीं हैं ।

कुदरत का नायाब नज़ारा "विंटर लाइन "क्या है ?

सूरज जब शिवालिक की पहाडियों के पीछे रात्रि विश्राम के लिए चला जाता है तब दूनघाटी से कुदरत का एक बेहतरीन नज़ारा (मौसमी अचम्भा )मसूरी की शाम को सैलानियों के लिए अक्टूबर मध्य से दिसम्बर मध्य तक बेहद खूबसूरत बना देता है ।
शाम की यही रंगत स्वीटज़रलेंड से भी देखी जा सकती है .यहाँ भी पश्चिमी क्षितिज रंगों की नुमाइश से सराबोर हो उठता है -पीला ,गहरा लाल ,नारंगी ,चमकीला लाल गुलाबी जामुनी रंग एक साथ मुखरित होतें हैं।
उत्तरांचल की हिल क्वीन मसूरी का माल रोडपर गश्त करता सैलानी शाम होते ही कुदरत के इस अप्रतिम अनचीन्हें नजारे को देखने के लिए सड़कों के किनारे पडी बेंचों पर आ बैठता है ।
हवा की दो विभिन्न तापमान वाली परतों को एक काल्पनिक किरमिजी गहरे लाल रंग की रेखा यहाँ अलगाए रहती है ।अस्ताचल को जाता -
सूरज एक जाली (नकली )क्षितिज के पीछे छिप जाता है ,तब पैदा होती है एक भूरी चमकीली लाल गुलाबी जामुनी रंगों की पट्टी ।
साफ़ तौर पर एक श्याम पट्टी (ब्लेक लाइन ) तब वायुमंडल की भूरी गंदली परत को अस्ताचल को जाते सूरज की गोल्डन ब्राउन और गहरे लाल (क्रिमसन रेड )परत से अलग करती दिखलाई देने लगती है .यही है -विंटर लाइन ।
ऐसा लगता है प्रकृति के किसी दिव्य चितेरे ने कूची - ब्रश संभाल लिया है ।
कुछ विज्ञानी इसे प्रकाश के अपवर्तन (रिफ्रेक्सन )की घटना बतलातें हैं ,जब प्रकाश एक ख़ास कोण पर दो अलग अलग वर्त्नांक वाली परतों में प्रवेश करने पड़ मुड़ जाता है ,विचलित हो जाता है रिजु मार्ग से तब पर्बतीय क्षेत्रों से पश्चिमी क्षितिज की साफ़ घाटी की तरफ़ निहारने पर कुदरत का यह मौसमी नज़ारा दिखलाई देता है ।
अलबत्ता शाम के इस आश्चर्य लोक की सृष्टि स्नो -फाल के दौरान क्यों नहीं होती और केवल सर्दी के दो महीनों में ही क्यों होती है यह अभी अनुमेय ही है ।
संभवतय सर्दी के मौसम में पैदा होने वाला तापमान कंट्रास्ट अस्ताचल को जाते सूरज की अपवर्त्नीय रश्मियों (रिफ्रेक्तिंग रेज़ )के साथ किर्या -प्रतिक्रया (इन्तारेक्त )करता है ।
(दी क्लोजेस्ट मीटियोरोलोजिकल एक्सप्लेनेशन फॉर दिस इवनिंग वंडर विटनेस्ड फ्रॉम मसूरी एंड स्वित्ज़र्लेंद इज देट दी कंट्रास्ट इन दी टेम्प्रेचर ड्यूरिंग विंटर इनतेरेक्ट्स विद दी रिफ्रेक्तिंग रेज़ ऑफ़ दी सेटिंग सन मे बी दी रीज़न फॉर इट्स अक्रेंस ।)

और वक्ष के कुसुम कुञ्ज सुरभित विश्राम भवन ये,

जहां मृत्यु के पथिक ठाहर कर श्रान्ति दूर करतें हैं .





नारि का वक्ष प्रदेश वक्ष स्थल सदैव ही आदमी के आकर्षण और सम्मोहन का केन्द्र बिन्दु रहा है .पोषण का प्राथमिक स्रोत तो यह है ही .शिशु को अभी दान और रोग -प्रति -रक्षण भी देता ही है .संस्स्कृत साहित्य में बारहा -पीनास्तनी लफ्ज़ आया है .नारी जंघा की तुलना केले के चिकने मृसन तने से तथा वक्ष की घडे से की गई है .इधर विज्ञानी अपने तरीके से वक्ष की गोलाइयों और कर्विईअर्नेस को,कंटूर्स बनाए रखने के अभिनव तरीके इजाद करते रहें हैं ।पहले सिलिकोन जेल और अब ब्रेस्टटोकसास (बोटोक्स की सुइयां )।आधा घंटा चाहिए वक्ष स्थल की ढलाई के लिए बस ।लेंग्थी बूब जोब्स से मुक्ति ।अलबत्ता ५०० पांड्स चाहिए वक्ष -प्रदेश को दर्शनीय बनाए रखने के लिए ,कार्वीयर बनाए रखने के लिए ।तो ज़नाब सौन्दर्य भी अब पैसे का खेल है ।पैसा फेंक ,तमाशा देख ।(दी प्रोसीज़र ऑफर्ड बाई "कोस्मेटिक सर्जरी ग्रुप ट्रांसफोर्म क्लिनिक "स्टार्ट्स विद पेशेंट्स हेविंग एनेस्थेटिक क्रीम रब्ब्द इनटू दे -आर ब्रेस्ट्स।दे देन रिसीव १२ इंजेक्शंस ऑफ़ बोटोक्स इन दे -आर पेक्तोरेलिस माइनर चेस्ट मसल । )एक सौन्दर्य प्रशाधन शल्य संस्था "ट्रांसफोर्म क्लिनिक "ने यह तरीका ईजाद किया है जिसके तहत एक लोकल एनस- थे -टिक सुंयाँ लगाने से पहले ,वक्ष स्थल पर लगाया जाता है .इसके बाद एक पेशी "पेक्तोरेलिस माइनर चेस्ट मसल" में बोटोक्स की १२ सुइयां लगाई जाती है ।गोलाइयों और कार्विनेस को बनाए रखने के लिए हर ६ माह के बाद सुइयां बूस्टर डोज़ के बतौर लगाई जाती हैं ।कविवर दिनकर की उर्वशी सहज ही याद आ जाती है -और वक्ष के कुसुम कुञ्ज सुरभित विश्राम भवन यह /जहाँ मृत्यु के पथिक ठहर कर श्रान्ति दूर करतें हैं .और यह भी पंक्तियाँ उर्वशी से ही हैं -सत्य ही रहता नहीं यह ध्यान तुम ,कविता ,कुसुम या कामिनी हो .

13 टिप्‍पणियां:

Dr Varsha Singh ने कहा…

लघु कथा -"नफासत " ....मर्मस्पर्शी रचना ! हार्दिक शुभकामनायें !

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

विंटर लाईन के बारे में जाना, मुझे पहले कम ही पता था।

G.N.SHAW ने कहा…

bhaai sahab This post very useful for women. congratulation.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कितना कुछ जानने को मिल गया।

रेखा ने कहा…

लघु कथा -"नफासत "
यूँ लगा जैसे की आपबीती हो . हम सब अनजाने में इस प्रकार की गलतियाँ करते रहते है.

रेखा ने कहा…

http://www.youtube.com/watch?v=i76H-SvFfjY

यह विडियो देखिये . वैसा ही अनुभव होगा.

veerubhai ने कहा…

हाँ!रेखाजी हमसे ही हुई थी ,ये गलती .शर्मिंदगी भी इसलिए ज्यादा हुई थी हम अकसर उससे बतियाते थे .उसके हौसले के कायल थे .जिंदादिली के भी .

मनोज कुमार ने कहा…

प्रेरक लघुकथा।
विशिष्ट शैली में रोचक जानकारी।

Arvind Mishra ने कहा…

एक के साथ चार चार का बोनस हो गया है अब तो ....बढियां है !

Sunil Kumar ने कहा…

ek sath itna kuchh nafasat marmik rachna aur sab gyan vardhak abhar

kumar ने कहा…

सर आपके ब्लॉग पर आया हूँ आज.....
आपको पडा..."नफ़ासत" ....अच्छा लगा...
आगे भी आपके प्यार और आपकी दुआओं की जरुरत रहेगी मुझे...
सादर

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर, प्रेरक और मर्मस्पर्शी रचना! शानदार प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

संजय भास्कर ने कहा…

मर्मस्पर्शी रचना !