शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

व्हाट इज हचिन्सन -गिल्फोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम ?

दुनिया भर में २००-२५० बच्चे इस सिंड्रोम से असरग्रस्त हैं .इस रोग में बालपन में ही चेहरे पर झुर्रियां और बुढापे में होने वाले रक्त वाहिकीय तथा जोड़ों के रोग आ धमकतें हैं .इस सिंड्रोम के जो एक प्रोग्रेसिव डिजीज है यानी उम्र के बढ़ने के साथ रोग बढ़ता जाता है इलाज़ या बढ़ने की रफ़्तार को कम करने के लिए कोई ऍफ़ डी ए मंजूर शुदा दवाएं फिलवक्त नहीं हैं .
इस रोग में बाल शिशु- काल में (०-२ वर्ष की उम्र )ही झड़ जातें हैं .जबकि अभी तो वह बोलना ही सीख रहे होते हैं .इनके दिमाग का विकास तो आम बच्चों की तरह ही होता है लेकिन शरीर बुढ़ाने लगता है ।
अभी शिशु घुटनों ही सरकना सीख रहा होता है चमड़ी में झुर्रियां पद जातीं हैं,खाललटकने लगती है .इनका बहुलांश उम्र से ताल्लुक रखने वाले रोगों यथा दिल की बीमारियों ,दिल तथा दिमाग के दौरों (हार्ट और ब्रेन अटेक )की चपेट में आके चल बसता है .हाई स्कूल तक भी नहीं पहुँच पाते ये अभागे ,.हत-भागे ।
कारण क्या है प्रोजेरिया का ?
एक केवल एक अक्षर (सिंगिल लेटर ) जीवन इकाइयों के खाके जीनोम से अपनी जगह से हटा रहता है और बस .किस्मत का लेखा बदल जाता है ।
इस सिंड्रोम में जो एक आनुवंशिक विकार है प्रोजेरिन (एक विषाक्त प्रोटीन )बालक एकत्र कर लेता है .तथा कोशायें (सेल्स )इस तोक्सिन से मुक्त नहीं हो पातीं हैं .इसकी निकासी में अ -समर्थ रहतीं हैं ।
बेशक कोशाओं के पास एक इन -बिल्ट मिकेनिज्म होती है ,एक तरीका होता है उप -उत्पादों के विसर्जन का ,आपसे आप कोशिकाएं कचरे को एकत्र करतीं हैं और फिर फैंक देतीं हैं ।
स्वस्थ व्यक्तियों की कोशाओं में भी प्रोजेरिन का अल्पांश उम्र के बढनें के साथ पाया जाता है .फर्क बस इतना है ,स्वस्थ कोशाएं इससे निजात पा लेतीं हैं . मोलिक्युल्स , अवांच्छितp सिस्टम फैंक देतीं हैं .
उम्मीद की किरण :रिसर्चर अब प्रोजेरिया मरीजों की कोशाओं पर "रेपा -माइसिन "की आजमाइशें कर रहें हैं .माइस की जीवन अवधि बढाने में इस दवा को कारगर पाया गया है .यह दवा एक इम्यूनो -सप्रेसर ड्रग है .प्रतारोपित अंग को स्वीकृति दिलवाने में इसका स्तेमाल होता आया है .प्रोजेरिया मरीजों से प्राप्त कोशायें माहिरों को बेहद बीमार दिखलाई दीं
हैं.इस दवा से उपचारित करने पर ये नोर्मल नजर आतीं हैं .यह दवा उस सेल्युलर सिस्टम (कोशिकीय तंत्र )को भी सक्रीय कर देती है जिसका काम शरीर से कचरे को बाहर करवाना है ।
दिक्कत यह है एक तरफ यह इम्यून सिस्टम का शमन करती है दूसरी तरफ कोलेस्ट्रोल के स्तर को ऊपर ले जाती है .ऐसे में संक्रमणों की पौ बारह हो जाती है जिन्हें मरीज़ से खुलकर खेलने का मौक़ा मिलता है ।
जो हो इसके क्लिनिकल परीक्षणों का इंतज़ार है .उम्मीद चुकी नहीं है बाकी है ।
आप जानतें हैं अल्ज़ाइमर्स और पार्किन्संस डिजीज में भी प्रोटीन बिल्ड अप होता है .अल्ज़ाइमर्स में बीटा एमिलोइड तथा टाऊ प्रोटीन टेंगिल्स तथा पार्किन्संस में अल्फा -साईं -न्युक्लीन ।
माहिरों के अनुसार बढती उम्र के साथ कोशाओं की अपशिष्ट पदार्थों को निकाल बाहर करने की कूवत का चुक जाना गंभीर किस्म की बीमारियों की वजह बनता है .कोशाओं के पास अपने स्वास्थ्य को बनाए रखने का एक यही तो ज़रिया होता है .उम्र के साथ ये क्षमता छीजती जाती है .इस सिंड्रोम में यही क्षमता शिशु काल में ही छीज जाती है ।
रेपा -माइसिन का संशोधित संस्करण रेड -००१ भी मरीजों पर आजमाया गया है .पता चला है इसके पार्श्व प्रभाव उतने नहीं हैं .कमतर हैं ।
दिक्कत यही है इस बिरले रोग के लिए न कोई कोशा और ऊतक

कोष है न रिसर्च एंड डिवलपमेंट के लिए पर्याप्त पैसा जबकि -
"प्रोजेरिया के मरीज़ कितने जीवंत और मह्त्वकंशी ,ज़िंदा दिल होतें हैं .उत्साह और अतिरिक्त उत्साह से भरे रहतें हैं इसकी झलक आप "पा "फिल्म में देख चुकें हैं ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-http://www.cnn.com/HEALTH/

8 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

महत्वपूर्ण जानकारीपरक , प्रेरक, शिक्षाप्रद एवं मार्मिक लेख

रविकर ने कहा…

महत्वपूर्ण जानकारी ||
बहुत अच्छा लगा ||

बधाई |

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhut shikshaprd blog... sabhi bhut mahtavpur jaankari samete hue post hai... thank u...

शालिनी कौशिक ने कहा…

informative post.aapke blog ko aaj shikha ji ne ye blog achchha laga par liya hai.aap bhi yadi vahan aana chahe to vahan ka url hai-
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रविकर ने कहा…

क्या फालोवर का आप्सन नहीं है इसमें |

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

नई बात हमसे साझा करने के लिए आभार

Vivek Jain ने कहा…

जानकारी से भरा आलेख,
आभार,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

G.N.SHAW ने कहा…

भाई साहब आप ने अच्छी जानकारी दी , किन्तु इस तरह के रोग से ग्रस्त बच्चा मैंने अब तक नहीं देखा है ! बहुत - बहुत धन्यबाद