शनिवार, 16 जुलाई 2011

दमे के प्रबंधन में प्लेसिबो प्रभाव कितना असर -कारी ?

दमे के प्रबंधन में प्लेसिबो प्रभाव कितना असर -कारी ?
क्या दवा का प्लेसिबो प्रभाव दमे के असर को भी कम करता है ?दमे की मानक चिकित्सा की तरह प्रभावशाली हो सकता है (standard medical therapy)सा प्लेसिबो प्रभाव (sham treatments)?हारवर्ड स्कूल ऑफ़ मेडिसन के रिसर्चरों के मुताबिक़ ऐसा हो सकता है .अपने एक अध्ययन में इन रिसर्चरों ने दमे के ३९ मरीजों को अव्यवस्थित तरीके से चार तरीके के इलाज़ बारी बारी से सभी मरीजों को मुहैया करवाए .
इनमे शामिल थे -albuterol inhalers,(दमे के इलाज़ में प्रयुक्त मान्य और मानक सूँघनी). placebo inhalers यानी छद्म सूँघनी ,sham acupuncture यानी छद्मएहसास की आपको सुइयां चुभी गईं हैं करवाया गया बिना सुइयां चुभोये .,कुछ को कोई भी इलाज़ नहीं (न छद्म न असली मानक इलाज़ )मुहैया करवाया गया .
तीन से लेकर सात दिन के अंतर से सभी मरीजों को बुलाया गया कुल मिलाकर हरेक को एक दजन बार बुलाया गया इन इलाजों के लिए .
इलाज़ मुहैया करवाने के फ़ौरन बाद हर विज़िट में मरीजों के फेफड़ों के काम करने का वास्तु परक मुआयना किया गया ,मानितरण किया गया प्रकार्य का फेफड़ों के .अलावा इसके उनसे सीधे -सीधे पूछा भी गया की वह लक्षणों के बाबत कैसा महसूस करतें हैं .
अल्बुट्रोल सूँघनी के स्तेमाल के बाद मरीजों ने ५०%फायदा होना बतलाया और प्लेसिबो -सूँघनी और छद्म एक्यु -पंचर चिकित्सा के बाद क्रम से४५%तथा ४६%फायदा होने की बात सबने बतलाई .जिन्हें किसी भी किस्म का इलाज़ ही नहीं मुहैया करवाया गया २१%लक्षणों में सुधार की बात उन्होंने भी की .साँय-साँय की आवाज़ ,सांस लेने में खड़ खड़ ,व्हिज़िंग ,शेलो ब्रीथिंग जैसे लक्षणों में सभी को इस प्रकार राहत पहुंची थी .
कितना फायदाकिसको वास्तव में पहुंचा इसका वस्तु परक मूल्यांकन करने के लिए अब सभी का प्रति सेकिंड फेफड़ों का अधिकतम .आयतन सांस छोड़ते वक्त मापा गया ...................................................................
by measuring their maximumin F forced expiratory volume in one second (FEV1), patients who got the real albuterol inhalers showed a 20% increase EV1.
जिन्हें छद्म एक्यु -पंचर या फिर किसी भी किस्म का इलाज़ मुहैया नहीं करवाया गया था ७% सुधार उनमे भी वस्तु परक आकलन में देखें में आया .
"Since there was no difference between either of the placebo treatments and the placebo 'control' [no treatment], we can report that there was no objective placebo effect with regard to change in lung function," lead author Dr. Michael Wechsler, assistant professor of medicine at Harvard Medical School, said in a statement.
इसका मतलब यह नहीं है अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला जाए क़ि प्लेसिबो प्रभाव का कोई लाभ नहीं मिलता .प्लेसिबो प्रभाव बेहद असरकारी है .मरीजों द्वारा खुद का आकलन भी .और यह फायदा असली दवा लेने से कम नहीं रहता है .
निष्कर्ष यह भी निकल सकता है सेल्फ रिपोर्टिंग मरीज़ की उतनी भरोसे मंद नहीं निकलती है वस्तुपरक आकलन पर .
"It's clear that for the patient, the ritual of treatment can be very powerful," noted study author Ted Kaptchuk, director of the program in placebo studies at Beth Israel Deaconess Medical Center. "This study suggests that in addition to active therapies for fixing diseases, the idea of receiving care is a critical component of what patients value in health care. In a climate of patient dissatisfaction, this may be an important lesson."
आपको इलाज़ मयस्सर है और आपकी ठीक से देख भाल क़ि जा रही है इसका बड़ा महत्व है ,प्लेसिबो प्रभाव छोड़ता है चिकित्सक का आश्वाशन और संभाल ,मरीज़ से आत्मीयता और लगाव .
सन्दर्भ -सामिग्http://healthland.time.com/2011/07/14/study-in-asthma-patients-placebo-treatments-feel-just-as-good-as-the-drug/?hpt=he_क२
http://healthland.time.com/2011/07/14/study-in-asthma-patients-placebo-treatments-feel-just-as-good-as-the-drug/?hpt=he_c2

सहभावित कविता :वोट मिला भाई वोट मिला है .-डॉ .नन्द लाल मेहता वागीश ,सह- भाव :वीरेंद्र शर्मा .. वोट मिला भाई वोट मिला है ,

सहभावित कविता :वोट मिला भाई वोट मिला है .-डॉ .नन्द लाल मेहता वागीश ,सह- भाव :वीरेंद्र शर्मा ..
वोट मिला भाई वोट मिला है ,
पांच बरस का वोट मिला है .
फ़ोकट सदन नहीं पहुंचें हैं ,जनता ने चुनकर भेजा है ,
किसकी हिम्मत हमसे पूछे ,इतना किस्में कलेजा है .
उनके प्रश्न नहीं सुनने हैं ,हम विजयी वे हुए पराजित ,
मिडिया से नहीं बात करेंगे ,हाई कमान की नहीं इजाज़त ,
मन मानेगा वही करेंगे ,मोनी -सोनी संग रहेंगे ,
वोट नोट में फर्क है कितना ,जनता को तो नोट मिला है ,
वोट मिला भाई वोट मिला है .पांच बरस का वोट मिला है .

हम मंत्री हैं माननीय हैं ,ऐसा है सरकारी रूतबा ,
हमें लोक से अब क्या लेना ,तंत्र पे सीधे हमारा कब्ज़ा ,
अभी तो पांच साल हैं बाकी ,फिर क्यों शोर विरोधी करते ,
हिम्मत होती सदन पहुँचते ,तो शिकवे चर्चे कर सकते ,
पर्चा भरने की नहीं कूव्वत ,फिर क्यों व्यर्थ कहानी गढ़ते ,
वोटर ही तो लोकपाल है ,हममें क्या कोई खोट मिला है ,
वोट मिला भाई वोट मिला है ,पांच बरस का वोट मिला है .

भगवा भी क्या रंग है कोई ,वह तो पहले भगवा है ,
फीका पड़ा लाल रंग ऐसा ,उसका अब क्या रूतबा है .
मंहगाई या लूट भ्रष्टता ,यह तो सरकारी चारा है ,
खाना पड़ेगा हर हालत में ,इसमें क्या दोष हमारा ,
जनता ने जिसको ठुकराया ,वह विपक्ष बे -चारा है ,
हमको ज़िंदा रोबोट मिला है ,वोट मिला भाई वोट मिला है ,
पांच बरस का वोट मिला है

8 टिप्‍पणियां:

mahendra verma ने कहा…

रोचक जानकारी के साथ रोचक कविता भी पढ़ने को मिली।
आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।
अनेक विषयों और क्षेत्रों में आपका अध्किार है।

mahendra verma ने कहा…

अधिकार

सतीश सक्सेना ने कहा…

बढ़िया लेख ....

" आपको इलाज़ मयस्सर है और आपकी ठीक से देख भाल क़ि जा रही है इसका बड़ा महत्व है ,प्लेसिबो प्रभाव छोड़ता है चिकित्सक का आश्वाशन और संभाल ,मरीज़ से आत्मीयता और लगाव ..."

यह सच्चाई है कि आत्मीयता और स्नेह पूर्वक, सर पर रखा हाथ भी मरीज को बहुत राहत देने में समर्थ है ..विश्व के बहुत से सुदूर भागों में, जहाँ एलोपैथिक चिकित्सा संभव नहीं है बरसों मंत्र शक्ति ( प्लेसिबो और विश्वास ) से हज़ारों बरसों से सफल इलाज होता रहा है !

श्रद्धा और विश्वास पैदा करने पर मस्तिष्क शारीर को पूरी तौर पर स्वस्थ रखने कि शक्ति रखता है !बशर्ते हम खुले दिमाग से इस पर विचार तो करें .....


@ आपकी नयी रचना का इंतज़ार कब तक करें ....??

थोड़ी मोहलत और दो भाई :-)
एक तो भाई और वह भी वीरू :-(
डराते क्यों हो ??

शुभकामनायें आपको भाई !!

Kajal Kumar ने कहा…

दमा आज भयावह रूप लेता जा रहा है. शहरों में तो अधिकांश बच्चे आज इसकी चपेट में हैं.

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

दमा हर साल न जाने कितनों के प्राण लील लेता है| इस विषय पर आपने सार्थक प्रस्तुति दी है| यहाँ मथुरा में नेट बराबर साथ नहीं दे रहा, इस पोस्ट को दोबारा पढ़ना पडेगा|

सुधीर ने कहा…

उपयोगी जानकारी और उसपर रोचक कविता

Arvind Mishra ने कहा…

मैं स्वयं भुक्तभोगी हूँ -प्लेसेबो काम नहीं करता यह अपने अनुभव से कह रहा हूँ !

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

बहुत बढ़िया वीरू भाई ....
जीवनोपयोगी लेख के साथ-साथ झन्नाटेदार व्यंग्य कविता भी ....वाह क्या कहना !