शनिवार, 4 मई 2013

Raja Yoga in the Present Age


आज हमारे नगरों महानगरों में जितना भीड़ भड़क्का और शोर शराबा है ,डेसीबेल लेवल है ,दैनिक जीवन  में जितना तनाव है उसका पूरा पूरा  खामियाज़ा हमारे स्नायुविक तंत्र को उठाना पड़  रहा है .

हमारी हवा और पानी दोनों गंधाने लगें  है धरती के तमाम संसाधनों को भुगताके हजम करके हमने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि हमें एक पृथ्वी और चाहिए तब जाके प्राकृतिक तत्वों की तात्विकता लौटेगी .हम ठीक से सांस ले पाएंगे .

जीवन शैली और पैसा कमाने के रंग ढंग भी निराले हो गए हैं .प्रोद्योगिकी के उपादानों ने उपहारों ने हमें बेहद बे -सहारा कर दिया है .एनर्जी गजलर्स बन गए हैं हम लोग .हमारे बढ़ते कार्बन फुट प्रिंट से मौसम का मिजाज़ भी बदल रहा है .जलवायु भी .साइबोर्ग (आधा मानव ,आधा मशीन बनके रह गया है आदमी ).कोई पेस मेकर लगाए घूम रहा है कोई नकली टांग ,कोंटेक्ट लेंस और नकली घुटने .गेजेट्स से घिरा आदमी खुद यंत्र बनके रह गया है .उसके पास अपने लिए अपने विकास के लिए वक्त नहीं है .वह कैसा भाग दौड़ का जीवन जी रहा है यह देखने का वक्त नहीं है .इसीलिए चिंताओं के कैक्टस उसके चारों तरफ बड़े हो गए हैं .

स्ट्रेस के नीचे  दबा आदमी अपने सारे फैसले इसी दवाब ग्रस्त मन : स्थिति में ले रहा है .करनी ना -करनी का फर्क कम होता जा रहा है .यही नियति राष्ट्रों की भी है .

ऐसे में राज योग की प्रासंगिकता और भी बढ़  जाती है जिसका थोड़ा सा भी अभ्यास मन को बहुत सुकून दे सकता है .उसके अशांत चित्त को शांत और भाव शमन कर सकता है  .

आवेग  शून्य हो शांत चित्त से   वह बेहतर फैसले ले सकता है .विवेक पूर्ण ,संवेगों के असर से बचते हुए वह निष्पक्ष न्यायसंगत निर्णय कर सकता है .खुद के साथ औरों के साथ उसका मीठा  और सौहार्द्र पूर्ण शांत सम्बन्ध बन सकता है योगसाधन से .

समाज का और खुद का दोनों का भला करने के मार्ग पर वह दो कदम आगे बढ़ सकता है .नियम विहीना समाज ,नियम हीन नियम का पालन कर रहा है .समाज को इस स्थिति से भी राज योग ही उबार सकता है .अच्छे वायुमंडल से अच्छे स्पंदन से वाइब्रेशन से माहौल भी भला बनेगा .

आज समाज ज्यादा अस्पतालों ज्यादा डॉक्टरों .न्यायविदों ,पुलिसकर्मियों ,ला कालिजों ,महिला सुरक्षा की मांग  तो कर रहा है .एक ऐसे समाज के बारे में हम नहीं सोच पा रहे हैं जहां सब तंदरुस्त हों .कोई अल्प पोषित ,कुपोषित ,भूखा नंगा न हो .सब को स्वच्छ पानी मिले ,शौचालय मिलें ,आवास मिलें .आसमान के नीचे न सोना पड़े .वायु मंडल शुद्ध हो तो बात बने .इसीलिए सबसे ज्यादा ज़रूरी है भ्रष्ट मन का प्रदूषण निवारण .राजयोग मन को शुद्ध करता है .

राज योग ही एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकता है जहां समाज में परस्पर प्रेम और सर्व आत्माओं के प्रति सौहार्द्र हो .सिर्फ मेरा मेरा न हो ,तेरा तेरा भी हो .तेरा माने उसका ,परमात्मा का .तभी आपस के झगड़े ,मनमुटाव ,आनर किलिंग ,कन्या भ्रूण ह्त्या के दंश से समाज मुक्त होगा .औरत का सम्मान होगा ऐसे समाज में .कन्याएं बलात्कृत न होंगी .

हम सबको प्रेम करने लगेंगे .क़ानून की पालना भी .मन को बदल देता है राज योग .प्रकृति भी हमारे साथ सहयोग करने लगती है .

राजयोगी प्रसन्न बदन प्रसन्न चित्त ,तंदरुस्त और विकारों से मुक्त हो तन मन से पाकीज़ा हो जाता है .चुस्त फुर्तीला और असरदार भी हो जाता है ,दक्ष भी .तत्पर रहता है समझौतों  को ,एडजस्ट मेंट को .सबके साथ अडजस्ट करता है राज योगी .

व्यर्थ संकल्प गिर जाते हैं समाज में नया अपनापा पनपने लगता है ऐसी ही परवर्तन की ताकत राज  योग में है .राज योग से प्रलय नहीं परिवर्तन होगा .नव निर्माण का रास्ता प्रशस्त होगा .सतो प्रधान सृष्टि बनेगी .अभी तो सम्पूर्ण सृष्टि ही विकारग्रस्त है .

ॐ शान्ति .

Other names of Yoga 

ज्ञान योग :योगेश्वर शिव ही क्योंकि राज योग सिखाते हैं जिसकी नींव ज्ञान पर टिकी है ,ज्ञान स्वयं अपने आत्म स्वरूप होने का ,सृष्टि (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का ज्ञान ),स्वयं परमात्मा के अनादि स्वरूप का ज्ञान ,नैतिक नियम बंधन आदि इसी लिए राजयोग को ज्ञानयोग भी कहा गया है .

बुद्धि योग :इसे ही बुद्धि योग (और योगी को योग बुद्धि )कहा गया है क्योंकि इस योग में बुद्धि योग एक बाप (शिव ,हम सब आत्माओं का बाप )से ही लगाना है .भौतिक मुद्राओं का आग्रह  बिलकुल नहीं है .जैसे मर्ज़ी बैठो ,जिस मुद्रा में बैठो कुर्सी पर या ज़मीन पे आसन बिछाके सुविधानुसार इसीलिए इसे ज्ञान योग भी कहा जाता है .

कर्मयोग :कर्म योग भी यही है क्योंकि राजयोग अपने सामाजिक ,व्यावसायिक हितों से भागने की बात नहीं करता है .गृहस्थ जीवन को भी कर्मठ बनके संभालने  निभाने की बात करता है याद में (शिव की )रहते हुए कर्म करने की बात करता है इसीलिए इसे कर्मयोग भी कहा जाता है .साक्षी भाव से दृष्टा बन कर्म करो कर्मभोग का दंश कम होगा न दुःख में अधिक दुखी न सुख में अभिमानी भाव .निरअभिमानी बनाता है कर्मयोग .निस्पृह में .

अलबत्ता यह कर्मयोग विकारों से संन्यास की ,मोह माया से विमुख रहने ,बे -ईमान और भ्रष्ट न होने की बात करता है .देह का आर्केस्ट्रा जब ज़रूरी हो तभी बजाओ जब चाहो बंद कर लो एक स्विच की तरह .कच्छप की तरह कर्मेन्द्रियों को समेट लो .

इसीलिए इसे संन्यास योग या फिर परित्याग योग (the Yoga of renunciation )  भी कह दिया गया है .ट्रस्टी बनके कर्म करने की बात करता है राजयोग (संन्यास योग )मालिक बनके नहीं .हम तो निमित्त मात्र हैं करन करावन हार वह अप्रम दिव्यपरमात्मा है जिसकी कृपा दृष्टि मुझपे टिकी रहती है मुझे ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा देते हुए .मेरा कोई बाल बांका नहीं कर सकता .


जाकू राखे साइयां मार सके न कोय ,होनी तो होके  रहे,लाख करे किन कोय


संन्यास योगी की  शुभ भावना ,शुभकामना सभी (सर्व आत्माओं के लिए हैं )के लिए रहती  है .

वह मन बुद्धि से समर्पण कर देता है .(इसके लिए मन और मुख दोनों का मौन चाहिए ,किसी न बुरा बोलना है न किसी का बुरा सोचना है ).धर्माधिकारी शिव का ही आदेश चाहिए उसे .इसका फायदा यह होता है वह सब चिंताओं से विमुक्त हो जाता है .कोई भय नहीं कोई व्यर्थ सोच (संकल्प ,निगेटिव थाट )नहीं बचता है .

तुलसी भरोसे राम के रह्यो खाट पे सोय,

अनहोनी होनी नहीं ,होनी होय सो होय .

इसीलिए इसी राजयोग को समत्व योग (Yoga of Equanimity )कह दिया गया है .समत्व योग की प्राप्ति व्यक्ति को स्थित प्रज्ञ बनाती है -a Yogi having equanimity .

भक्ति योग :क्योंकि यह परमात्मा से गहरे लगाव और उसके प्रति पूर्ण समर्पण पर आधारित है इसीलिए भक्ति योग भी कहलाया है .

यहाँ कोई जप और पूजन  (कर्म काण्ड )नहीं है .ईश्वर के प्रति असीम प्रेम और जानकारी पर आधारित है यह भक्ति योग .

'सहज राज योग 'भी कहलाता है राज योग क्योंकि यहाँ तन्मय होकर उसकी याद में खो जाना सहज है .यहाँ शरीर को उससे (परमात्मा )जुड़ने के लिए  कोई कष्ट नहीं देना पड़ता है इसीलिए यह 'सहज राजयोग' है .खाते पीते ,कर्म करते स्विच आन किया और पहुँच गए परलोक (परम धाम ,soul world ).योगी के स्वभाव (मिजाज़ )का हिस्सा बन जाता है सहज राज योग .




नटराज शिव सिखाते हैं राजयोग 

इन दिनों  एक फेशनेबुल शब्द बन चला है .योग (जिसे योगा कहने का रिवाज़ पड़  चला है).संस्कृत भाषा में इसका शाब्दिक अर्थ है जुड़ना ,संयुक्त होना .एक सम्बन्ध जोड़ना .एक सम्बन्ध का जुड़ना .इसकी अर्थछटा परमात्मा से मन और रूह से जुड़ना था ,आध्यात्मिक सम्बन्ध सूत्र में खुद को पिरोना था उस परमपिता परमात्मा के साथ .

आरोग्य लाभ के लिए एक आनुषांगिक चिकित्सा के रूप में भी योग दुनिया भर में स्वीकृत हो चला है .प्रबंधन संस्थानों में भी योग कक्षाएं लगने लगीं हैं स्ट्रेस के प्रबंधन के लिए .

योग का मतलब पूरी कायनात सर्वात्माओं के साथ तादात्म्य स्थापित करना ,तदानुभूति करना सर्व की .आत्मा का परमात्मा से मधुर मीठा सम्बन्ध बनाना इसका लक्ष्य रहा है .

इन दिनों इसकी अनेक शैली प्रचलित है .स्ट्रेचिंग और मुद्राओं समेत .सुनिश्चित आसनों के रूप  में।लेकिन यह योग का स्थूल रूप है जिसका लाभांश हमारी काया को ज़रूर मिलता है .मन और बुद्धि का भी परिष्करण हो यह ज़रूरी नहीं है .काया का टोनिक हो सकता है योग का यह मौद्रिक कायिक संस्करण  .

परम्परा और पुराण शिव को योगियों का राजा कहतें हैं .राजाओं का भी जो राजा है वह नटराज है .उनके द्वारा दिया योग ही राज योग है .लार्ड आफ योगीज हैं शिव .उनके द्वारा ही   ब्रह्मा मुख कमल से योग निसृत हुआ है .अंकुरित हुआ है .गीता ज्ञान भी शिव द्वारा प्रसूत योग है .गीता का प्रवचनकार शिव ही है .कृष्ण द्वापर में नहीं हो सकते वह तो परम योगी हैं सतो गुनी सोलह कला संपन्न .ब्रह्मा का ही विकास हैं कृष्ण .द्वापर में नहीं हैं कृष्ण .कृष्ण सतयुगी प्रिंस हैं.सबसे ज्यादा गीता उन्होंने ही सुनी हैं इसीलिए मुरलीधर हैं .ज्ञान की मुरली है गीता .

बेशक बहु चर्चित,बहु -श्रुत  पातंजलि का अष्ट योग रहा है जिसके अष्टांग यम (पापों से परहेजी ),नियम ,भौतिक मुद्राएं ,सांस(श्वांस ) पे नियंत्रण ,अपने आपको कच्छप की मानिंद समेट लेना ,ध्यान ,चिंतन और समाधि रहें हैं .

बकौल पातंजलि यह आठों योगांग आत्मा को स्थिर प्रज्ञ बना देंगे ,मुक्त करतें हैं आत्मा को .पातंजलि किसी ख़ास मुद्रा में बैठने का आग्रह नहीं करते हैं .श्वांस पे नियंत्रण भी वह सहज रूप करना बतलाते हैं आग्रह मूलक नहीं .कायिक कष्ट द्वारा नहीं .लेकिन पातंजलि कर्म भोग की चर्चा नहीं करते  .कर्मयोग से कर्म  भोग तो आत्मा को चुकतू  करना ही होगा .कैसे यही राज योग सिखलाता है .पातंजलि आत्मा पे चढ़े कर्म भोग को उतारना नहीं सिखाते हैं .

राजयोग पहले छ :अंगों

(१ ) यम

(२ )नियम

(३ )भौतिक मुद्राएं

  (४ )श्वांस नियंत्रण

 (५ )समेटना

(  ६ )ध्यान

पे तवज्जो देता है .आसन और प्राणायाम यहाँ गौड़ हो जाते हैं .

बस आत्मा अपने आपको  काया से अलग देख समझ ले शिव की याद में बैठ जाए आराम से ,और समाधिस्थ हो जाए इसी याद में तल्लीन हो रहे .मन इधर उधर न जाए .ऐसे में मुद्रा और श्वांस संयम खुद ब खुद चला आयेगा अनायास .

शिव हमें राज योग के तहत हमारे भूत ,.वर्तमान और भविष्य की भी खबर देते हैं .रचना और रचता का फर्क समझाते हैं .आत्मा कैसे अपने दिव्य गुणों का संवर्धन करे यही सिखाता है राज योग .

ग्यानाधारित है राज योग ."हमसो (फिर ).सोऽहं (सोहम )"हमसो ,हम तो ही सतो प्रधान सोलह कला संपन्न योगी थे .गुणों के छीजने के साथ साथ हम सीढ़ी उतरते गए सतो से रजो और अब तमोगुण प्रधान बन गए हैं .हर तरफ लंका और माया  रावण का ही राज्य है।एक नहीं है लंका। इस सर्वयापी लंका में सब बावन गज के हैं .असुर बन गए हैं .इसीलिए पाँचों तत्व (पृथ्वी ,जल ,वायु ,अग्नि ,आकाश )दुःख दे रहें हैं .मैं (शिव )मुक्ति दाता ,सुख करता हूँ .मेरे द्वारा प्रदत्त राजयोग पाँचों तत्वों को मन और बुद्धि को शुद्ध करता है .बस अपने को ज्योति बिदु रूप आत्मा समझ मुझे याद करते हुए ग्राहस्थ के सब कर्म मनोयोग से करो .यही राज योग है .

राज योग से सिर्फ इस को काम में लेने वाला ही लाभान्वित नहीं होता इसका असर पूरे वायुमंडल को शुद्ध करता है .खासकर तब जब यह सामूहिक रूप से किया जाए .यह हमारा स्वभाव संस्कार शुद्ध करता है मैल उतारता है आत्मा से .कर्म भोग को सहज रूप झेलना सिखाता है .दुःख में भी सुख की अनुभूति कराता है राज योग हम करता से साक्षी (दृष्टा ) बन जाते हैं .

ॐ शान्ति

(ज़ारी )


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नटराज शिव सिखाते हैं राजयोग


1 टिप्पणी:

Vikesh Badola ने कहा…

आवेग शून्य हो शांत चित्त से वह बेहतर फैसले ले सकता है ...........आप इन महत्‍वपूर्ण विचारों को उचित प्रकार से संकलित करें। बहुत बढ़िया। अच्‍छे से संकलित हो कर ऐसी पोस्‍ट आएं तो अत्‍यधिक आनन्‍द आए इन्‍हें पढ़ने में। एक का दूसरे में मिश्रण क्रम बिगाड़ रहा है। असहज अनुभव न करें। ये सब इसलिए कह रहा हूँ कि आप की योग सम्‍बन्धित उक्‍त बातें अमूल्‍य हैं।