गुरुवार, 23 मई 2013

भक्ति मार्ग की बातें

भक्ति मार्ग की बातें 

(१ )आत्मा सो परमात्मा ,शिवोहम शिवोहम .

क्या है यथार्थ इस कथन का तर्क की कसौटी  पर?

एक तरफ कहतें हैं सबका मालिक  एक .परमात्मा एक ही है .दूसरी तरफ कहते हैं आत्मा सो परमात्मा .वह कण कण में है .फिर तो सात अरब परमात्मा हो जायेंगे क्योंकि विश्व की आबादी सात  अरब हो गई है आगे और भी परमात्मा पैदा होंगें .जबकि  परमात्मा तो अजन्मा है नाम रूप से न्यारा  है निराकार है .फिर कण कण में कैसे हो सकता है कण तो स्थूल है .न्यूटन ने तो पृथ्वी को ही एक कण की संज्ञा दे दी थी .

आत्मा सो परमात्मा नहीं हो सकता क्योंकि हम कहतें हैं परमात्मा सर्व आत्माओं का पारलौकिक पिता है .पुत्र पिता जैसा तो हो सकता है ,पिता नहीं हो सकता अपना .

आत्मा परमात्मा के गुणों से तो संपन्न हो सकती है ,सुख शान्ति आनंद प्रेम से युक्त हो सकती है इन गुणों का असीम सागर नहीं हो सकती .परमात्मा नहीं हो सकती .शिवत्व तो हो सकता है उसमें वह शिव नहीं बन सकती .परमात्मा की शक्ति असीम रहती है कभी कम नहीं होती .आत्मा कमज़ोर हो जाती है ,विकार ग्रस्त होकर .यहाँ तक के एक व्यक्ति आवेश में आकर दूसरे  का खून भी कर देता है .अब यदि आत्मा सो परमात्मा है तो यह किसका कर्म माना जाएगा उस व्यक्ति का या उसमें मौजूद परमात्मा का ?यदि परमात्मा उस व्यक्ति में भी है तो क्या वह निरपेक्ष भाव से ह्त्या होते देखता रहेगा इतना कमज़ोर है परमात्मा  ?

शिव परमात्मा तो जन्म मरण से न्यारा है .सुख दुःख से परे है .

आत्मा सुख दुःख अनुभूत करती है शरीर में आती है अनेक बार .परमात्मा का कोई शरीर नहीं है .एक कल्प (अनादि काल चक्र )में सिर्फ एक बार उसका साधारण मनुष्य तन में अवतरण है .पुरानी दुनिया को नया बनाने के लिए . 

यूं दोनों का स्वरूप एक है परमात्मा को ज्योतिर -लिंगम कहा गया है आत्मा भी दीपक की लौ स्वरूप है मस्तक में चमकता चमकीला सितारा है .लेकिन आत्मा सो परमात्मा कहना सर्वथा गलत है .



( २ )गीता का सार है जो भी घटता है अच्छा घटता है .एक्यूरेट ड्रामा अनुसार .अनहोनी जैसा कुछ होता नहीं है .

जो कल हुआ था वह भी अच्छा था ,जो अब हो रहा है वह भी अच्छा है जो कल होगा वह भी अच्छा होगा .इसीलिए तुलसी बाबा ने कहा -

तुलसी भरोसे राम के रह्यो खाट पे सोय,

अनहोनी होनी नहीं ,होनी होय ,सो होय .

भक्ति मार्गियों में से अनेक को यह अन -उपयुक्त लगता है अटपटा लगता है .

एक उद्धरण लेते हैं .एक रोट्रेक्ट क्लब के गवर्नर साहब थे .परम दयालु .परम उपकारी .सबकी मदद करने वाले .कभी किसी का अहित नहीं किया था आपने .एक संस्था से उन्हें पत्र मिला पता चला उन्हें किसी शहर में विशेष  सम्मान के लिए बुलाया गया है .हवाई जहाज़ के टिकट भी आने जाने के भेज दिए गए थे .

गवर्नर साहब नियत समय पर घर से निकले .घर से एयरपोर्ट के रास्ते में उनकी कार दुर्घटना ग्रस्त हो गई .ज़नाब की दोनों टांगें टूट गईं .एक बहन उन्हें देखने अस्पताल पहुंची ,कहा ईश्वर सब ठीक करेगा .गवर्नर साहब बोले भगवान का नाम न लेना मेरे सामने .मैंने आज तक किसी का दिल नहीं दुखाया है .सबकी सेवा ही की है .क्रोध में उनका चेहरा तमतमा  गया था .बहन ॐ शान्ति कहके लौटने लगीं ,पीछे पीछे गवर्नर साहब की पत्नी आईं  -हाथ जोड़ के कहने लगीं ,इनका मन ठीक नहीं हैं वैसे ये ऐसे नहीं हैं ,इस आकस्मिक दुःख ने इनकी यह स्थिति कर दी है इन्हें तो सम्मान लेने जाना था .कहने लगे जब फल प्राप्ति का वक्त आया तो यह अनर्थ घट गया अनहोनी ये मेरे साथ ही  क्यों हुई .

बहन लौट आईं बाद इनके जितने भी लोग गवर्नर साहब को देखने आये और ईश्वर का नाम लिया ,इनका आवेश बढ़ता गया ,ईश्वर के प्रति .दस दिन गुज़रे वह बहन लौट के फिर आईं .देखा गवर्नर साहब शांत हैं ,प्रसन्न हैं ईश्वर के शुक्र गुज़ार हैं .बताने लगे बहन जी मुझे जिस प्लेन से जाना था वह दुर्घटना ग्रस्त हो गया सारे यात्री मारे गए .मेरी तो टांग ही टूटीं हैं .ठीक हो जायेंगी ,जान तो बच गई .जो हुआ अच्छा ही हुआ .बाकी लोगों की तो जान ही चली गई .

(३ )शिव और शंकर अलग अलग हैं 

शंकर परम योगी हैं .अपने शरीर का उन्हें कोई भान नहीं है .इसीलिए काया पर भभूत लगाया हुआ है .गले में सर्प की माला है .हाथ में डमरू है कैलाश परबत पर तपस्या रत हैं .आकारी देवता हैंशंकर  .शिव की स्तुति कर रहें हैं शंकर उनका आराध्य हैशिव  .पिता है शिव .

शंकर रचना है शिव रचता (रचना कार हैं ).शंकर प्रोडक्ट हैं शिव प्रोड्यूसर हैं .शिव के नै दुनिया के निर्माण कार्य में शंकर उनके सहयोगी बनते  हैं .पुरानी विकारग्रस्त दुनिया का विनाश करने में मदद करते हैं .

शंकर की तरह ब्रह्मा ,विष्णु ,श्री रामचन्द्र ,श्री कृष्ण ,श्री गणेश ,कार्तिकेय आदि भी आकारी देवता हैं .भगवान् भगवती स्वरूप  हैं .यदि ये सभी भगवानभगवती भगवान हो जायेंगे तो पूछा जाएगा इनका हेड कौन हैं .हेड तो एक ही है परमात्मा शिव .३ ३ करोड़ देवता भगवान नहीं हो सकते .भगवान् भगवती स्वरूपा ज़रूर हो सकते हैं .

(4 )जीव ही ब्रह्म है 

यथार्थ :पञ्च तत्वों से बनी साकारी दुनिया (मृत्यु लोक ,Corporeal world)से परे छटा महत्व तत्व है ब्रह्म .रहने की जगह है यह तो कुदरती आवास है यह तो आत्मा का परमात्मा  का  .आत्मा इस सृष्टि रुपी रंग मंच पर अपना एक्यूरेट पार्ट बजाने इसी ब्रह्मलोक से उतर कर काया (पञ्च भूतों से बने शरीर)में प्रवेश करती है .देवात्माएँ सतयुग से नीचे आतीं हैं इस ब्रह्म लोक से उतर .पूरे ८ ४ जन्म हैं सतयुगी आत्माओं के ,शुरू से आतीं हैं  येपरमधाम (मुक्ति धाम ब्रह्म लोक से ),त्रेता युगी भी देवात्माएँ हैं बस थोड़ा पवित्रता का स्तर कम हुआ है .सतयुगी आत्माओं का ही नौवां जन्म है यहाँ .उसके आगे दसवां ....फिर बारहवां .बाद इसके द्वापर शुरू हो जाता है .पांच हज़ार वर्ष के अनादि सृष्टि चक्र में प्रत्येक युग की अवधि बराबर बराबर है १ २ ५ ० वर्ष अलबत्ता पवित्रता का स्तर कमतर होता जाता है .सतयुग में डायमंड तो कलियुग में कोयला हो जाती है आत्मा .जबकि कोयला और डायमंड हैं एक ही तत्व कार्बन (graphite )के ही  अपरूप ,Allotropes हैं . सारे स्केंडल ,मेच फिक्सिंग ,तस्करी ,अंडर वर्ल्ड माफिया यहीं आते हैं .सारा खेला कर्मों का है .
धर्मात्माएं द्वापर से आती हैं और साधारण एवं पापात्माएं आती ही कलियुग में हैं .इससे पहले इनका कोई रोल नहीं है . 

अत :भ्रामक है यह कहना जीव ही ब्रह्म है .जीव रहने का कमरा है  ,आवास कैसे हो सकता हैजीव  .अलबत्ता जीव अपने नेचुरक हेबिटाट  में रह सकता है शीत निद्रा में अपना पार्ट आने तक सृष्टि रुपी मंच पर तब तक यह शीत निद्रा रहती है जब तक उसका कोई पार्ट नहीं होता . इसे ही इस अक्रिय अवस्था को मोक्ष (मुक्ति )मान लिया जाता है भक्ति मार्ग में जबकि मोक्ष ,जीवन मुक्ति तो गृहस्थ में रहते साक्षी भाव से मरजीवा बन जीते जी शरीर से मरना है आत्म स्वरूप में रहना है याद में परमात्मा के कर्म करते हुए .


2 टिप्‍पणियां:

Aziz Jaunpuri ने कहा…

र जी आत्मा और परमात्मा ,इहलौकिकऔर परलौकिक शक्तिओं से लेकर सुख दुःख से जुडी सुन्दर रचना

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...
आभार