रविवार, 18 मार्च 2012

विज्ञान कथाएं सामाजिक और वैज्ञानिक युक्तियों के कोष हैं :

विज्ञान कथाएं सामाजिक और वैज्ञानिक युक्तियों के कोष हैं :
भारतीय पौराणिक विज्ञान कथाएं सामाजिक और वैज्ञानिक युक्तियों के ऐसे कोष हैं जिनकी चाबी आज लापता हैं .ज़रुरत इन कोशों के अन्वेषण की है .अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए यहाँ हम एक उद्धरण देंगें ,एक दंत कथा का जिसका सम्बन्ध पार्वती से है ,शिव से है ,उनके पुत्र गणेश से है .
'गज ' से है जिसे करी (कर  से करी ,हस्त से हस्ती अर्थात हाथी बना है )भी कहा जाता है जिसकी सूंड ही उसका हस्त है वह हाथी है .तिब्बती भाषा में 'स ' का उच्चारण है होता  है ..वहां साथी को हाथी कहा जाता है .जानतें हैं क्यों -?
हाथी अकेला जीव है जिसके   चार   पैर   हैं .एक सूंड है जिससे  वह हाथ  का काम  लेता  है ,मुख  का भी ,नासिका  का भी .अपने शत्रु पर प्रहार करने के लिए वह उसे इसी सूंड में लपेट कर पटक देता है .फिर चाहे वह क्रूर महावत ही क्यों न हो .'हाथी मेरे साथी' आपको याद होगा एक फिल्म भी बनी थी जिसके नायक राजेश खन्ना साहब थे .असली हीरो सफ़ेद हाथी ही था   .
हाथी का मस्तक और मष्तिष्क दोनों ही विशाल होतें हैं .मस्तिष्क विकसित होता है इसीलिए हाथी मनुष्यों की तरह बुद्धिमान होता है .उसमें मनुष्यों की तरह बोध है लेकिन वह शांत  स्वभाव लिए है .मस्त चाल लिए है .बलिष्ठ है लेकिन सौम्य है .शुद्ध शाकाहारी है .इसीलिए चित्त भी उसका शांत  है .
आप कहेगे !भाई साहब कथा क्या है कथा तो बताओ ?
यही तो रोचक तत्व है कथा का ,रोचकता बनाये रखी जाए औत्सुक्य भी .कथा अंग -प्रत्यारोपण से ताल्लुक रखती है .
'एक मर्तबा पार्वती स्नान कर रही थीं .घर में अकेली थीं .शरीर से निकले उबटन (मैल )से उन्होंने एक मायावी बालक बना दिया .लेकिन उनके स्पर्श मात्र से वह मासूम सजीव हो गया .उसे द्वार पर बिठा दिया गया इन हिदायतों के साथ ,कोई अन्दर न आ पाए .
बलिष्ट से बलिष्ट व्यक्ति आये बालक ने अपने तेज़ से किसी को अन्दर न आने दिया .अन्दर उसकी मानसी माँ जो नहा रही थी .आने कैसे देता?
इसी क्रम में आखिर में शिव आये .बालक ने उन्हें भी रोका .शिव तो सुपात्र थे अन्दर जाने के अधिकारी भी थे .बालक ने अपनी मासूमियत में उन्हें भी रोका .
शिव ने बालक को लाख   समझाया   ,जब  समझाने  से भी नहीं माना  बालक तो शिव ने उसका सिर   धड  से अलग  करदिया  .
चीख पुकार सुनकर पार्वती ने विलाप करना शुरू कर दिया .हार कर शिव बाहर निकले इस संकल्प के साथ ,राह में जो भी पहला प्राणी मिलेगा उसका सिरोच्छेदन कर बालक को फिट कर दिया जाएगा .
इतेफाकन सामने से एक गज चला आरहा था .शिव ने उसीका सिरोच्छेदन कर बालक के धड से प्रत्यारोपित कर .करदिया .वह बालक गणेश कहलाया .विदेशियों के लिए वह 'एलिफेंट गोड' बन गया .
कथा का निष्कर्ष यह है :
      गज का मष्तिष्क मनुष्य से साम्य रखता है .टिशु मेचिंग का कोई झंझट न था .बालक की प्रति -रक्षा प्रणाली ने इसे अपना लिया .स्वीकार करलिया प्रत्यारोपित सिर को .
.  हमारा मानना है प्रत्येक पौराणिक कथा में जीवन के समाज के ,विज्ञान के कोष और युक्तियाँ छिपीं हैं .ज़रुरत  इन कोशों को ,वैज्ञानिक सूत्रों को, बूझने की है .
आज (मार्च १७,२०१२)अचानक विज्ञान कथा लेखन की ओर ध्यान तब गया जब आदतन  सुबह उठते ही सिरहाने रखा रेडिओ -ट्रांज़िस्टर आन किया .रेडिओ स्टेशन था ऍफ़ एम् गोल्ड १०६.४० मेगाहर्ट्ज़ .कार्यक्रम था फिर सुबह (आज सुबह समय था प्रात :७:३०).कार्यक्रम की रूपरेखा से स्पष्ट  हुआ आज सुबह कार्यक्रम में लिटरेरी कोर्नर के तहत चर्चा होगी 'भारत में विज्ञान कथा लेखन पर '.
सुखद आश्चर्य हुआ जब संचालिका ने बातचीत  की शुरुआत अपनेभाईसाहब अरविन्द मिश्र जी  के साथ बातचीत से की .
डॉ अरविन्द मिश्र ब्लॉग जगत के जाने माने हस्ताक्षर एक सशक्त चिठ्ठाकार है .आप उत्तर परदेश मत्स्य निगम के मुखिया हैं .आप अखिल  भारतीय  विज्ञान  कथा  लेखक संघ   के सचिव   हैं .
आपने भारत की पुराणिक कथाओं में ऐसी कल्पनाओं के मौजूद रहे आने का ज़िक्र किया जो लोक कल्याण कारी हैं . आज  हमारे पास ज़रूरी प्रोद्योगिकी भी है .पुष्पक विमान के होने का भी आपने ज़िक्र किया .कहा तो यह भी जाता है सबके अपने अपने पुष्पक थे निजी विमान थे .आज की तरह वह चंद अम्बानियों के पद प्रतिष्ठा प्रतीक नहीं थे .परिवहन के आम साधन थे .
डॉ साहब ने बतलाया हिंदी और हिंदी इतर भाषाओं में संविधान स्वीकृत अनेक भाषाओं में लिखा तो जा रहा है लेकिन हिंदी और उसकी सहोदर आंचलिक भाषाओं में परस्पर एक सेतु एक संवाद कायम नहीं हो सका है .इस तमाम विज्ञान कथा साहित्य का अंग्रेजी में भी अनुवाद हो आपकी यह मंशा थी .आपने बतलाया जिन प्रांतीय भाषाओं का थोड़ा बहुत साहित्य अंग्रेजी में अनूदित हुआ है उनकी आलमी स्तर पर भी चर्चा हुई ज़रूर है लेकिन वह नाकाफी है .  
विज्ञान कथाओं के अध्ययन से ताल्लुक रखने वाली संस्था 'इंडियन असोशियेशन ऑफ़ साइंस फिक्शन स्टडीज़ के अध्यक्ष श्री पी .पुरुषोत्तमन ने इस मौके पर कहा -वह कल्पना जो आगे चलके जीवन को सुन्दर बनाए विज्ञान कथाओं की नींव रखती है .आलमी स्तर पर मशहूर विज्ञान दंत कथाकार आइज़क आसिमोव साहब ने एक मर्तबा यही उदगार व्यक्त किये थे .
हम   भी यही कहतें   हैं पहले   विचार  आता  है क्रिया    उसकी अनुगामी   होती   है .फस्ट देयर इज थाट देन देयर इज एक्शन .
कार्यक्रम में इसी संस्था के महासचिव डॉ नरहरी महोदय ने भी अपने विचार  रखे .आपने विज्ञान कथाओं पर आधरित फिल्म कृष ,कोई मिल गया ,रोबोट आदि की चर्चा की .रोबोट में तो मशीन और मानव प्रेम के रोमांचकारी पलों को भी मुखरता मिली है .लेकिन अभी विज्ञान कथा लेखन हमारे यहाँ अपनी शैशव अवस्था में ही है इसके पल्लवन और पोषण और दोहन की ज़रुरत है .शुरुआत हो चुकी है .

7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आश्चर्य ही है, अंग प्रत्यारोपण में महारत।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

विज्ञान कथाएं भी अपने आप में चीज़ हैं.
यहां कथाकार तो कुछ भी कह निकलता है पर, वैज्ञानिक को इस कथा में विज्ञान घुसेड़ने में पसीने छूट जाते हैं ☺

रविकर ने कहा…

सौ प्रतिशत सहमत रहा,
कथा हकीकत पास |

मगर कुतर्की को कभी,
सत्य न आये रास ||

G.N.SHAW ने कहा…

भाई साहब -सुन्दर जानकारी , प्रथम पूजनीय की !

Arvind Mishra ने कहा…

आभार ,किन्तु कुछ तथ्यात्मक गलतियाँ भी हैं -जिन्हें कृपया सुधर लें ..मैं उत्तर प्रदेश मत्स्य निगम में नहीं हूँ....

अपरंच यह भी कि भारतीय पुराणों में नव विचारों की प्रचुरता तो है मगर प्रौद्योगिकी के अभाव में वे बस विचार मात्र ही रह गए ...

जैसे पुष्पक विमान का ही उदाहरन ले लीजिये ....

अयोध्या आगमन पर राम ने जब पुष्पक विमान से कहा कि अब तुम कुबेर के पास जाओ तो वह एक साथ दुखी और प्रसन्न दोनों हो गया -प्रसन्न इसलिए कि इतने लम्बे समय बाद अब वह अपने स्वामी कुबेर के पास जा रहा था और दुःख इस बात का कि राम से उसका वियोग हो रहा था -मतलब पुष्पक विमान एक इमोशनल विमान था -यह अद्भुत आयडिया है -आज इंटेलिजेंट और इमोशनल मशीनों का निर्माण होने लग गया है ...आपका रेफ्रीजेरेटर आपके मूड को भांप कर आपकी मनपसंद पेय हाज़िर कर सकता है ...ऐसे उपभोक्ता उत्पादों के निर्माण के दावे शुरू हो गए हैं ....क्योंकि आज हमारे पास प्रौद्योगिकी है ..इमोशनल पुष्पक विमान की सोच अप्रतिम है मगर तब प्रौद्योगिकी नहीं थी ...

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

बहुत बढ़िया जानकारी दी है आपने!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत बढ़िया जानकारी ... महाभारत काल में विज्ञान अपने चरम पर था ... ऐसा बस पढ़ा ही है ...