रविवार, 11 मार्च 2012

व्यंग्य विडंबन :घर का जोगड़ा.

व्यंग्य विडंबन :घर का जोगड़ा.
                               -डॉ .नन्दलाल मेहता 'वागीश 'डी.लिट .पूर्व वरिष्ठ अध्येता (Senior Fellow),संस्कृति  मंत्रालय  ,भारत  सरकार  .
        बन्दा कमाल का है .किसी से कुछ भी कह सकता है ,कहीं भी कह सकता है .वह हर समय चाणक्य की भूमिका में रहता है ,पर ऐसा चाणक्य ,राजनीति की बिसात पर जिसका घोड़ा ढाई घर भी नहीं चल पाता .शायद वह खुद भी ऐसा ही चाहता है .चाल तो उसका घोड़ा चले और राजनितिक फायदा कोई और उठा ले जाए ,उसे यह मंज़ूर नहीं है .उसने अपने चन्द्रगुप्त को यह तो समझा दिया है कि  चुनौती देने की भाषा कैसी होनी चाहिए .पर वह यह नहीं समझा सका है कि यकायक चुनौती मिल  जाने पर  उससे कैसे निपटा जाए .ऐसे वक्त उसका चन्द्रगुप्त गड़बड़ा जाता है .चाणक्य हो जाने का यह मतलब तो नहीं कि सभी जिम्मेदारी उसी की है .फिर वह पहले से सभी प्रश्नों का अनुमान भी कैसे लगा सकता है ?इसलिए उसने अपने चन्द्रगुप्त को समझा दिया है कि ऐसे में सब अनिश्चित अंदाज़ में कहो .वक्तव्य की समझ न हो या  भाषा कौशल न हो ,तो भी चलेगा .ऐसे वक्त हेंकड़ी दिखाओ .आस्तीनें चढाओ .डेस्क पर मुक्का मारो .अनिश्चित प्रश्न दागो -तब  कहाँ थे ?इस वक्त कहाँ हैं ?आखिर उसने दिया क्या है ?अब मैं तो जाने वाला नहीं .इससे श्रोताओं पर रौब पड़ता है कि इसे हमारी कितनी चिंता है .कैसा दमदार 'ही मैन ' है .कागज़ तक फाड़  कर फैंक देता है .लोग प्रभावित हो उठते हैं .सचमुच नकली गुस्सा भी बड़े काम की चीज़ है .असली गुस्सा तो तब आये न ,जब आगे पीछे की कुछ समझ हो .पर अपने चाणक्य को उससे क्या लेना -देना ?यदि चन्द्रगुप्त ही बराबर का समझदार हो जाएगा तो चाणक्य की राजनीति का क्या होगा ?ऐसे में यदि उसने मंदमति चन्द्रगुप्त को चुन लिया है तो इसमें हैरत कैसी ?
   खैर ,अपने चाणक्य की कुछ मजबूरी है .अगर चन्द्रगुप्त ही मंद बुद्धि हो तो चाणक्य भी क्या कर सकता है ?अपनी और से तो उसने कोई कसर नहीं छोड़ी  .चुनावों में पराजित होकर भी सबकी ऐसी- तैसी कर रहा है .देखते नहीं राष्ट्रनीति ,राजनीति ,शिक्षा -नीति ,अर्थ- नीति निवेशनीति ,विदेशनीति और गृह - नीति -सभी पर और सब जगह वह वक्तव्य दे सकता है .ऐसे विषय पर भी जिसका उसे प्रारम्भिक ज्ञान भी नहीं होता .फतवे- नुमा आरोप लगा सकता है .दरअसल वह निडर है .जब से चैनल पर सुना है कि डर के आगे जीत है ,वह किसी से भी नहीं डरता .एक ख़ास मज़हब की बात अलग है .वहां तो उसकी पिंडलियाँ काँपती हैं .यह लोकतंत्र के अन्दर की बात है .इसे आप नहीं समझेंगे .
  वह लोकतंत्र ही क्या ,जहां मज़हबी वोट पर गिद्ध -दृष्टि न हो .सो ,वह गिद्ध दृष्टि की साधना में लीन है .मज़हब के वोट गिनता है .यूं वोट तो वह जाति के भी गिनता है .उसे बखूबी पता है कि जाति के अन्दर भी एक जाति है और उसके भीतर भी एक जाति है .अगर नहीं है तो वह कर भी  क्या सकता है ?अपनी और से तो उसने बांटने की मुहिम छेड़ रखी है .पर कुछ लोग हैं ,जो एकता की बात करतें हैं .ये साम्प्रदायिक हैं .एंटी -सेकुलर हैं .समाज नहीं बंटेगा तो एकता की बात कैसे होगी ?विकास कैसे होगा ?जाति के भीतर जातियां ही नहीं पनपेंगी तो सेकुलर वोट का क्या होगा ?तब वोटों की फसल कैसे पकेगी ?लोकतंत्र का क्या होगा ?पिछले दस सालों से वह इसी समझ को पैदा कर रहा है .पर इस सेकुलर चाणक्य को कौन समझाए कि घर का जोगड़ा बाहर भी जोगड़ा ही रहता है .जोगी बनने से तो रहा .
शब्दालोक .१२१८ ,सेकटर ४ ,अर्बन इस्टेट ,गुडगाँव (हरियाणा )
प्रस्तुति :वीरेंद्र शर्मा (वीरुभाई ).
४सी,अनुराधा ,नोफ़रा ,कोलाबा ,मुंबई -४००-००५ .
और अब आज के नीतिपरक दोहे :
शीलवंत सबसे बड़ा ,सब रतनन की खान,
तीन लोक की संपदा ,रही शील में आन .
धीरे -धीरे रे मना ,धीरे सब कुछ होय ,
माली सींचे सौ घडा ,ऋतु आये फल होय .
तो बरखुरदार(मंद मति राजकुमार ) सब कुछ वक्त आने पर होता है .उतावले पन से कुछ नहीं होता .माली के एक साथ सौ घडा पानी   वृक्ष को देने से फल नहीं आतें है फल तो ऋतु आने पर ही आतें हैं .कामयाबी का कोई छोटा रास्ता नहीं है .
और ये रहे आज के नुश्खे :
सेहत के नुश्खे :
स्वीट  कोर्न यानी मकई (मक्का ) ब्लड सुगर को स्तेब्लाईज़ करती है .इसमें मौजूद है बेशुमार फोलेट जो हमारे दिल  की भी हिफाज़त करता है .भुट्टे खाओ मौज मनाओ .फिर चाहे उबालके खाओ या भून के  कोयला आंच पर या फिर बारबीक्यू करके .बेबी  कोर्न दाल   सब्जी में खाओ सब्जी के साथ उबालके खाओ .माइक्रो वेव करके सलाद में खाओ .
Sweet corn stablises blood sugar and its rich folate content protects the heart .

 टोफू न सिर्फ प्रोटीन का भण्डार है आयरन (लौह तत्व ),सेलीनियम और केल्शियम से भी लबालब है .
Tofu(Bean curd):Tofu is a soft white substance that is made from SOYA and used in cooking ,often instead of meat.It is a soft food no particular flavour made from soya milk curd pressed into cake.(chinese doufu'fermented beans').

 
   

10 टिप्‍पणियां:

कुमार राधारमण ने कहा…

विपक्ष के एक बड़े नेता ने ठीक ही कहा था कि पैदल-यात्रा का और कोई परिणाम नहीं होगा-सिवाए इसके कि युवराज का स्वास्थ्य बेहतर हो जाएगा। मैं समझता हूं कि आज के स्वास्थ्य टिप्स उनकी अवसादमुक्ति में सहायक होंगे!

रविकर ने कहा…

गुरुवर गुरु-घंटाल है, केवल चाहे श्रेय ।
रहा सिखाता नाट्य खुद, कर्म नहीं यह गेय ।
कर्म नहीं यह गेय, सहायक फ़िल्मी लाता ।
सन्नी सा पी पेय, मोड़ पर गान सिखाता ।
हार नहीं बर्दाश्त, चुनों इक बढ़िया चेला ।
चन्द्रगुप्त चाणक्य, बूझ अखिलेशी खेला ।।

दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक
dineshkidillagi.blogspot.com

रविकर ने कहा…

गाफिल जी हैं व्यस्त, चलो चलें चर्चा करें,
शुरू रात की गश्त, हस्त लगें शम-दस्यु कुछ ।

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
सोमवारीय चर्चा-मंच पर है |

charchamanch.blogspot.com

रेखा ने कहा…

युवराज को इंतजार तो करना ही होगा ,साथ ही बहुत कुछ करके भी दिखाना होगा

expression ने कहा…

बेहतरीन पोस्ट...
कई जानकारियाँ समेटे...
शुक्रिया सर.

वाणी गीत ने कहा…

अब भी सबक सीखें युवराज और उनके सलाहकार तो जनता का भला हो जायेगा ...
उपयोगी टिप्स!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

जातियों प्याज की तरह हैं, परतें हीं परतें....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वोटों की संख्या ही लोकतन्त्र का एकमेव पैमाना है..

SM ने कहा…

victory comes after fear
good realistic article

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अपुन को तो मक्की ठीक है ... और हाँ आपकी पते की बात ... समय और मेहनत से ही कुछ होने वाला है ...
राम राम जी ...