मंगलवार, 27 सितंबर 2016

कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर , पाछै लागै हरि फिरै ,कहत कबीर कबीर।

कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर ,

पाछै  लागै हरि फिरै ,कहत कबीर कबीर। 

ऐसे लोग जिनका मन निर्मल हो गया है जो आठों पहर  घड़ी  पल छिन सिमरन में मगन हैं ,जिनके मुख का मन ,जिनके मुख का ध्यान वाहेगुरु की तरफ है ,ईश्वर उनकी परवाह हर घड़ी  करता है। 

इनका अंत :करण कामक्रोध ,मोह ,ममता से मुक्त रहता है ,धर्म अंदर की साधना है बाहरी कर्मकांड ,तन का पैरहन नहीं है ,इनके बाहर के भी सभी काम पूरे ही होते हैं अंदर के तो सब सधते ही हैं।क्योंकि इनका मन साधना से सिमरन से निर्मल हो गया है।  

प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ,

प्रभ के सिमरनि कबहु न झूरे। 

इन्हें कोई चिंता नहीं व्याप्ति। चिंता उन्हें व्यापती हैं जिनके  मुख का ध्यान ,जिनका मन संसार की ओर रहता है निशि बासर। 

कबीर तो अपनी मस्ती में हैं। 

आशाओं का दीप ले बैठे नदिया तीर ,

चितवन ते हर लेत हैं तेरी -मेरी पीर। 

1 टिप्पणी:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ऐसे निर्मल ह्रदय बचे ही कहाँ हैं ?