शनिवार, 9 जुलाई 2016

सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु , साधसँग जा का मिटै ,अभिमानु।

सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ,

साधसँग जा का मिटै ,अभिमानु। 

सब मनुष्यों से वह बड़ा मनुष्य है ,साध संगत (अच्छी सोहबत गुर्मुखों की ,गुरमुख ,गुरु की मानने वाले के संग ) के संग रहकर जिसका अभिमान मिट  गया है।

आपस कउ जो जाणै नीचा ,

सोऊ गनीये सभ ते ऊंचा। 

जो अपने आपको (खुद को )सबसे तुच्छ ,नीचे जाने ,बतलाये ,वह सबसे बड़ा गिना जाता है। 

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (11-07-2016) को "बच्चों का संसार निराला" (चर्चा अंक-2400) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

JEEWANTIPS ने कहा…

सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

Digamber Naswa ने कहा…

अभिमान अपने आप न मिटे तो समय मिटा देता है ... सार्थक बात ....