सोमवार, 18 जुलाई 2016

सर्व -धर्मां परित्यज्य मां एकं शरणम् व्रज। अहम् त्वां सर्व पापेभ्य : मोक्षयिष्यामि मा शुच :

सारा जीवन (ता -उम्र ,उम्र दराज होने के बाद भी )हम सम्बन्धों से आशा (अपेक्षा )किये रहते है। जो जैसा है उसे वैसा ही सहज स्वाभाविक रूप स्वीकार नहीं कर पाते। डिनायल मोड में जीवन व्यर्थ कर लेते है।

दूसरी गलती सैदव ही (24x7x365),पल प्रतिपल निर्णायक की भूमिका बनाए रहते हैं ,हरेक के बारे में अपना वर्डिक्ट (Judgemental )देते रहते हैं निरंतर अनथक।

We are hypocritical about our dear ones ,condemnatory about our contacts ,relatives and friends .

हमारे विषाद (अवसाद )की ये दो बड़ी वजहें हैं। आज पूरी दुनिया अवसाद (अनमने पन ,सेल्फ रिजेक्शन ,खुद को बे -मानी समझना ,यूज़लेस क्रीचर समझना )के लपेटे में हैं।

श्रीमद्भगवदगीता अवसाद से आनंद की ओर यात्रा है। पहले अध्याय का नाम ही है :श्री अर्जुन विषाद योग। लेकिन यह विषाद ,ये खिन्नता मामूली नहीं है ,ये अवसाद ही अंततया अर्जुन को श्रीकृष्ण से मिलाता है।

उसे खुद से अपने स्वरूप में ,परमात्मा के भिन्नांश से मिलवाता है। श्रीकृष्ण के विराट रूप का कृष्ण प्रदत्त दिव्यचक्षुओं से साक्षात्कार करवाता है। पूर्ण शरणागति को प्राप्त करता है अर्जुन।

भक्त को चाहिए ,हम गृहस्थियों (ग्राहस्थ्य )को चाहिए अर्जुन की तरह अपने मन को उस एक रूप पर केंद्रित करें जो अर्जुन के समक्ष था (वह कृष्ण जो दोनों हाथों से वंशी धारण किये हुए हैं ,सुन्दर मुखवाले तथा अपने बालों  में मोरपंख धारण किए हुए साँवले रूप में हैं।जिनका अर्चा विग्रह हर मंदिर में। 

सर्व -धर्मां परित्यज्य  मां एकं शरणम् व्रज।

अहम् त्वां सर्व पापेभ्य : मोक्षयिष्यामि मा शुच :

समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ। मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा। डरो मत।


1 टिप्पणी:

Digamber Naswa ने कहा…

जानते हुए भी इन सब बातों से पार कहाँ पा पाता हा इंसान ... शायद यही है मोह माया .. अपने आप से मोह ...