बुधवार, 18 जून 2014

जीवाणु में जब कृत्रिम डीएनए मिल जाए

e-coli
ई. कोलाई जीवाणु का आनुवंशिक तरीके से संशोधित रूप है अर्ध कृत्रिम जीवाणु

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा 'अर्ध कृत्रिम' जीवाणु तैयार किया है, जिसकी आणविक सामग्री पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवन से एकदम भिन्न है। यह जीवाणु दरअसल ई. कोलाई बैक्टीरिया का आनुवंशिक तरीके से संशोधित रूप है। रिसर्चरों ने मूल जीवाणु में एक कृत्रिम डीएनए जोड़कर उसकी आनुवंशिक सामग्री का विस्तार कर दिया है। अर्ध कृत्रिम जीवाणु की कोशिकाएं सामान्य डीएनए की तरह बाहरी डीएनए को भी दोहरा सकती हैं अथवा उनकी कॉपी तैयार कर सकती हैं। इस तरह आनुवंशिक वर्णमाला के सामान्य 4 'अक्षरों' के स्थान पर नए डीएनए मॉलिक्यूल में 6 अक्षर हो गए हैँ। रिसर्चरों का खयाल है कि इस सफलता के बाद ऐसे जीवाणु तैयार किए जा सकेंगे जिनका उपयोग चिकित्सीय और औद्योगिक क्षेत्रों में हो सकता है।

कैलिफोर्निया में ला जोला स्थित स्क्रिप्स रिसर्चइंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने इस नए जीवाणु का निर्माण किया है। इंस्टिट्यूट के प्रमुख वैज्ञानिक फ्लॉयड रोमेसबर्ग का कहना है कि पृथ्वी पर जीवन की तमाम विविधताओं के बावजूद डीएनए की लिखावट अक्षरों के सिर्फ 2 जोड़ों से मिलकर बनी है। ये जोड़े हैं ए -टी और सी-जी। रोमेसबर्ग के अनुसार उनकी टीम द्वारा निर्मित जीवाणु में इन 2 कुदरती जोड़ों के अलावा एक्स और वाई का तीसरा जोड़ा भी है जो अप्राकृतिक है। इससे पता चलता है कि सूचनाओं को संग्रहीत करने के दूसरे उपाय भी संभव हैं। इस सफलता से वैज्ञानिकों को डीएनए वर्णमाला को विस्तृत करने का तरीका मिल गया है। रोमेसबर्ग और उनके सहयोगी नब्बे के दशक से यौगिकों के ऐसे जोड़ों की तलाश कर रहे थे जो डीएनए के नए यौगिकों के रूप में कार्य कर कर सकें।

युनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के मॉलिक्यूलर बायॉलजिस्ट रॉस थायर का कहना है कि यह एक जबरदस्त टेक्नॉलजी है। इस सफलता से न सिर्फ नए प्रोटीनों के निर्माण का रास्ता खुल गया है बल्कि रिसर्चरों को यह पता लगाने का अवसर भी मिल गया है कि पृथ्वी पर डीएनए का विकास कैसे हुआ और सारा जीवन सिर्फ 5 यौगिकों तक सीमित क्यों है। एक कृत्रिम महा-जीवाणु के निर्माण की संभावना से कुछ लोग चिंतित हो सकते हैं लेकिन कैलिफोर्निया स्थित स्टेन्फर्ड युनिवर्सिटी के वैज्ञानिक एरिक कूल का मानना है कि इस तरह के खतरे बहुत कम हैं। ऐसे जीवाणु प्रयोगशाला से बाहर जीवित नहीं रह सकते। ये जीवाणु खुद एक्स और वाई का निर्माण नहीं कर सकते। रिसर्चरों को खुद इन यौगिकों को कृत्रिम रूप से तैयार करके बैक्टीरिया को सुपुर्द करना पड़ता है।

पिछले कई दशकों से जीव वैज्ञानिक जीवन की आनुवंशिक वर्णमाला का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रयास में उन्होंने कुछ वैकल्पिक आनुवंशिक अक्षर विकसित भी किए हैं लेकिन अभी तक इन आनुवंशिक यौगिकों की प्रतिकृतियां सिर्फ परखनलियों में ही निर्मित हो पाई थीं। जीवित कोशिकाओं के अंदर इन यौगिकों की प्रतियां तैयार करने में सफलता नहीं मिल पाई थी। किसी जीवित बैक्टीरिया के अंदर वैकल्पिक डीएननए की प्रति तैयार करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण लक्ष्य था। रोमेसबर्ग और सहयोगियों ने इसका समाधान खोजा। रोमेसबर्ग अब अपनी विस्तृत आनुवंशिक वर्णमाला का उपयोग नए प्रोटीनों के निर्माण के लिए करना चाहते हैं।

स्क्रिप्स इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिक पीटर शुल्ट्ज और कुछ अन्य रिसर्चरों ने कुछ ऐसे बैक्टीरिया विकसित किए हैं जो सामान्य से अधिक प्रोटीन बनाने में सक्षम हैं लेकिन इन प्रयोगों में कृत्रिम प्रोटीनों को कूटबद्ध करने के लिए प्राकृतिक डीएनए का इस्तेमाल हुआ था। वैज्ञानिकों को यकीन है कि डीएनए की नई विस्तृत वर्णमाला से विविध किस्म के प्रोटीन प्राप्त किए जा सकते हैं। ऐसे प्रोटीनों की रासायनिक भूमिकाएं भी विविध होंगी जिनका उपयोग दवाओं के रूप में किया जा सकता है। इस तरह की दवाएं शरीर में ज्यादा समय तक सक्रिय रह सकती हैं। इन प्रोटीनों के आधार पर ऐसी चीजें भी बन सकती हैं जिनमें अपनी प्रतिकृतियां बनाने की क्षमता हो। कुछ विशेषज्ञों ने डीएनए के कुदरती स्वरूप को विस्तृत करने के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा है कि प्रकृति से इस तरह की छेड़छाड़ ठीक नहीं है। 


1 टिप्पणी:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी, धन्यबाद आपका।