बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

श्रीमदभगवत गीता अध्याय चार :श्लोक (२६ ) श्रोत्रादीनीन्द्रियान्य अन्ये ,संयामाग्निषु जुह्वति , शब्दादीन विषयां अन्ये इंद्रियाग्निषु जुह्वति।

श्रीमदभगवत गीता अध्याय चार :श्लोक (२६ )


श्रोत्रादीनीन्द्रियान्य अन्ये ,संयामाग्निषु जुह्वति ,

शब्दादीन विषयां  अन्ये इंद्रियाग्निषु जुह्वति। 


श्रोत्रा -आदीनी -जैसे श्रवण क्रिया हो ;  इंद्रियानी -इन्द्रिय ,सेन्स ओर्गेन्स ; अन्ये -अन्य ;  संयम -शांत या नियंत्रित व्यवहार ; अग्निषु -यज्ञ अग्नि ;  जुह्वति -आहुति ; शब्दादीन -ध्वनि कम्पन ,आदि ; विषयान -इन्द्रिय सुख की वस्तुएं ;अन्ये -अन्य ; इन्द्रिय -सेंस  ऑर्गन से सम्बन्धी 


अन्य योगी लोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियों का संयम रुपी अग्नि में हवन करते हैं तथा कुछ लोग शब्दादि विषयों का इन्द्रिय रुपी अग्नि में हवन करते हैं। 

Others offer hearing and other senses in the sacrificial fire of restraint .Still others offer sound and other objects of the senses as sacrifice in the fire of the senses .

To explain it further -Some offer the organs of perception like the ear as oblation in the fire called restraint ,while others offer the sense objects like the sound as sacrifice in the fire called senses .

(योगाग्नि )अग्नि हव्य सामिग्री के स्वरूप को भस्म करके तब्दील कर देती है।बाहरी (वैदिक )कर्म काण्ड में  अग्नि हव्य सामिग्री को स्वाह कर डालती है। लेकिन आध्यात्मिक रूप में योगाग्नि प्रतीकात्मक होती है। यह अग्नि स्व :अनुशासन और संयम की है जो इन्द्रियों के भौतिक विषयों को भस्म कर देती है कामनाओं का अंत कर देती है। जिसमें वासनाएं  जलके स्वाह हो जाती हैं।

यहाँ आध्यात्मिक उत्कर्ष के दो विरोधी भाव वाले ध्रुव  हैं :

एक है इन्द्रियों का बलपूर्वक निग्रह जैसा हट योगी करते हैं। इसमें इन्द्रियों को निष्क्रिय कर दिया जाता है। इनके कार्य को निलंबित कर दिया जाता है। इनसे काम ही नहीं लिया जाता है। बस शरीर के आवश्यक नित्य कर्म शेष रह जाते  हैं जैसे शौच और मूत्र त्याग आदि। मन का निग्रह हैं यहाँ मन को हटा लिया जाता है बलपूर्वक इन्द्रियों और उनके विषयों से इच्छा शक्ति द्वारा। मन अंतर्मुखी हो रहता है। 

भक्ति योग दूसरा ध्रुव है :

इसमें मन प्रभु से लगा है उसके रूप का ,नाम का, धाम का, स्मरण करता है, ध्यान करता है. यहाँ हर अणु  में ब्रह्म है। इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से मुखातिब ही नहीं हैं वह तो परमात्मा को देख सुन याद कर रहीं हैं।उदात्त शिखर है भक्ति का ब्रह्म और उसकी सृष्टि में एक प्रभु को ही देखना। यहाँ कोई निग्रह नहीं है रूपान्तरण  है.

Shree Krishna says :raso 'ham apsu kaunteya "Arjun ,know me to be the taste in water ."Accordingly , bhakti yogis practice to be -hold God through all their senses ,in everything they see ,hear ,taste ,feel ,and smell.

भक्ति मार्ग सहज सरल है। यहाँ रस है आनंद है गिरने का ख़तरा नहीं है। 


अति सूधो स्नेह का मारग है यहान नेक सयानाप नाहिं 

हटयोग कष्ट साध्य है। 

If one is riding a bicycle and presses the brakes to stop the forward motion ,he will be in an unstable condition ,but if the cyclist simple turns the handle to the left or right ,the bicycle will easily stop its forward motion and still remain stably balanced .


भक्ति मार्ग में इन्द्रियों के विषय बदल जाते हैं भगवान् की  और जाता है यह रास्ता यहाँ बस दिशा परिवर्तन है। निग्रह नहीं हैं हट नहीं है ,भक्ति  योग है   । जीव का ब्रह से आत्मा  का परमात्मा से दिव्य मिलन है।  


ॐ शान्ति 


2 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04-10-2013) को " लोग जान जायेंगे (चर्चा -1388)
"
पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

आशा जोगळेकर ने कहा…

सुंदर गीता अध्ययन।
भक्ति का मार्ग ही हमें सरलता से इंद्रियों को संयमित करन सिखाता है । हम मानव है तो तरंगे तो मन में उठेंगी हीं पर तुरंत ही भगवान का नामस्मरण करके चित्त को तुरंत वहां स हटा लेना चाहिये उसका चिंतन बिलकुल ना हो।