बुधवार, 24 अगस्त 2016

इहु तनु धरती बीजु करमा करो सलिल आपाउ सारिंगपाणी। मनु किरसाणु हरि रिदै जम्माइ लै इउ पावसि पदु निरबाणी।

इहु तनु धरती बीजु करमा करो सलिल आपाउ सारिंगपाणी। मनु किरसाणु हरि रिदै जम्माइ लै इउ  पावसि पदु निरबाणी।(१ ).

काहे गरबसि मूड़े माइआ। पित सुतो सगल कालत्र माता तेरे होहि न अंति सखाइआ। (रहाउ )

बिखै बिकार दुसट किरखा करे इन तजि आतमै होइ धिआई। जपु तपु संजमु होहि जब राखे कमलु बिगसै मधु आस्रमाई। (२ )


बीस सपताहरो बासरो संग्रहै तीनि खोड़ा नित कालु सारै। दस अठार मै अपरंपरो चीनै कहै नानकु इव एकु तारै।

विशेष :अब कृषि का दृष्टान्त  देकर गुरूजी जीवात्मा का पथ प्रदर्शन कर रहें हैं।

इस शरीर को धरती बनाओ ,शुभ कर्मों का बीज बोओ और प्रभु के नाम -स्मरण के जल से उसे सींचो।  मन को किसान बनाकर परमात्मा के साक्षात्कार की खेती कर लो ,इसी में मोक्ष का रहस्य है। (१ ).

ऐ मूर्ख ,माया का अहंकार क्यों करता है ; इस संसार में माता -पिता ,पुत्र -स्त्री कोई भी अंत समय तुम्हारा सहायी नहीं होगा। (रहाउ ).

विषय -विकारों के बेकार पौधों को (weeds ,खरपतवार ,जो खेती खराब करते हैं )को उखाड़ फेंकों और इनको हटाकर अंतर -मग्न हो जाओ। (जैसे किसान को खेती के लिए चौकन्ना रहना होता है ,वैसे )जप ,तप संयम द्वारा धरती (शरीर )को तैयार करो ,तब वहां कमल खिलेंगे (हृदय कमल )और मधु -रस टपकेगा (नाम का रस प्राप्त होगा )(२ ).

बीस और सात के निवास स्थान (अर्थात पांच महाभूत -आकाश ,वायु ,अग्नि ,जल ,धरती ,पांच तन्मात्राएँ अर्थात इन्द्रियों के विषय -स्पर्श ,रूप ,रस ,गंध ,श्रवण ,पांच कर्मेन्द्रिया -organs of action -हाथ ,पैर ,मुख ,जनेन्द्रिय ,तथा मलद्वार (गुदा ),पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (organs of knowledge )-मुख ,नेत्र ,कर्ण ,नासिका ,चमड़ी (त्वचा ),पांच प्राण -प्राण  ,अपान ,उदान ,समान ,वयान (व्यान ); एक मन तथा एक  बुद्धि -कुलमिलाकर २७ (सत्ताइस )-इनमें अपने आप को संयत करें तथा तीनों अवस्थाओं (बचपन ,जवानी ,बुढ़ापा )में (अवश्यम्भावी )मृत्यु को याद रखें।

दसों दिशाओं और सम्पूर्ण वनस्पति (अर्थात और किन्हीं टीकाकारों के मत में चारों वेद ,छ: शास्त्र (षड दर्शन )और अठारह पुराणों आदि सभी धर्म ग्रंथों )में परमात्मा के नाम (अस्तित्व )को खोजें तो हे नानक !इसी स्थिति में प्रभु उसको (संसार समुद्र )से पार कर देगा। (३ ).


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