शनिवार, 13 अगस्त 2016

अमर भारती सलिला की 'गुरमुखी 'सुपावन धारा। पहन नागरी पट ,उसने अब भूतल -भ्रमण विचारा।


अमर भारती सलिला की 'गुरमुखी 'सुपावन धारा।

पहन नागरी पट ,उसने अब भूतल -भ्रमण विचारा।

अकाल पुरख के बचन सिउ परगट चलाइयो पंथ।

सभ सिक्खन को बचन है गुरु मानीओ ग्रन्थ।

गुरु खालसा जानीओ प्रगट गुरु की देह।

जो सिख मो मिलबो चहै खोज इनी मो लेह।

प्रत्येक क्षेत्र प्रत्येक संत की वाणी।

सम्पूर्ण विश्व में घर -घर है पहुँचानी।

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-08-2016) को "तिरंगे को सलामी" (चर्चा अंक-2435) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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आप सबको स्वतन्त्रता दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'