एक अभिनव अध्धय्यन से पता चला है कुछ एच आई वी -एड्स पाजिटिव लोगों में एक ख़ास मोलीक्युल "एल्फा -देफेंसिनस १-३ "का स्तर बढ़ने लगता है .ऐसे में इन्हें एंटी -रेट्रो -वायरल दवाओं की ज़रुरत नहीं पडती .लेकिन ये लोग बेहतर कंट्रोल बनाए रहतें हैं ,जिसका आधार यही मोलिक्युल बनता है .यह मर्ज़ के बढ़ने की रफ़्तार को एक दम से कम करदेता है ।
इस अध्धय्यन में स्पेन के साइंसदान शरीक रहें हैं ."प्रेन्सा लातीना रिपोर्ट "में इस अध्धय्यन का उल्लेख है .इस के मुताबिक़ तकरीबन ५ फीसद लोग ऐसे हैं जिन्हें इस मोलिक्युल के पनपते रहते एंटी -रेट्रो -वायरल दवाओं की दरकार नहीं रह जाती है .यही मोलिक्युल रोग के लक्षणों का विनियमन करता रहता है ,दीजीज़ को रेग्यु लेट करता रहता है ,प्रोग्रेसन को थामे रहता है .यह करामाती अनु कैसे यह काम अंजाम देदेता है इसे समझने बूझने की अभी बहुत ज़रुरत है .माहिरों का यही कहना है ।
सन्दर्भ सामिग्री :सम डोंट नी "ऐ आर वीज़ /एंटी -रेट्रो -वायरल ड्रग्स "तू बेतिल एड्स (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २७ ,२०१० )
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
काम के बोझ से दबी अमरीकी औरत इन दिनों ....
काम के अतिरिक्त दवाब से ताल मेल बिठाने की सनक में अमरीकी औरत गैर चिकित्सा कारणों से एंजा -इती बस्टर (एंटी -एंजा -इती ड्रग्स ),चित्त शामक ,ऊर्जा से भरे होने का एहसास कराने वाली उत्तेजक दवाओं का सहारा अपने दैनिक तकाजों को निपटाने के लिए ले रहीं हैं ।
नेशनल इन्स्तीत्युत ओंन ड्रग एब्यूज (एन आई डीऐ )द्वारा संपन्न एक सर्वेक्षण के अनुसार फिलवक्त तकरीबन ६ फीसद अमरीकी महिलायें (यानी कुल मिलाके तकरीबन ७५ लाख अमरीकी महिलायें )ऐसा सुपर्वोमेंन होने दिखने की विवशता में कर रहीं हैं ।
ये तमाम महिलायें नुस्खे पर लिखी दवाओं का ही स्तेमाल कर रहीं हैं .लेकिन धीरे धीरे इन्हें और ज्यादा दवा उतना ही उत्तेजन प्राप्त करने के लिए लेनी पड़ती है .शरीर आदी होने लगता है इन दवाओं का .यहाँ ख़तरा यह है इन दवाओं का सहारा दुसरे नुस्खों के साथ भी ये महिलायें ले रहीं हैं .मसलन आम कोल्ड और कफ की दवाएं (इनमे कई नर्वस सिस्टम सप्रेसर ड्रग भी शामिल हैं ).ऐसे में इनके परस्पर रियेक्सन से दिल की लौ (लय ) बिगड़नेइरेग्युलर हार्ट बीत से लेकर कार्डिएक अरेस्ट का जोखिम भी हो सकता है .रक्त चाप में अप्रत्याशित वृद्धि (हाई -पर्तेंशन )हो सकती है ।
एन आई डी ऐ के अनुसार जहां मर्द तमाम तरह की दवाओं का दुरूपयोग कर रहें हैं वहीँ महिलायें इन प्रिक्रिप्शन दवाओं का मनमाना स्तेमाल (ड्रग एब्यूज )करके जोखिम मोल ले रहीं हैं ।
एम् एस एन बी सी .कोम पर इस अध्धय्यन सर्वे का पूरा ब्योरा उपलब्द्ध है .लोसेंज़िलीज़ की मनोविज्ञानी तालिया वित्कोव्सकी के अनुसार महिलाए दवाओं में रिफ्युज़ ढूंढ रहीं हैं .यह एक एस्केपिस्ट रूट है .अपने स्वास्थ्य के साथअदबदा कर किया गया खिलवाड़ है ।
सन्दर्भ सामिग्री :सुपर्वोमेन्न सिंड्रोम फ्युएल्स पिल -पोप कल्चर (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २७ ,२०१० )
नेशनल इन्स्तीत्युत ओंन ड्रग एब्यूज (एन आई डीऐ )द्वारा संपन्न एक सर्वेक्षण के अनुसार फिलवक्त तकरीबन ६ फीसद अमरीकी महिलायें (यानी कुल मिलाके तकरीबन ७५ लाख अमरीकी महिलायें )ऐसा सुपर्वोमेंन होने दिखने की विवशता में कर रहीं हैं ।
ये तमाम महिलायें नुस्खे पर लिखी दवाओं का ही स्तेमाल कर रहीं हैं .लेकिन धीरे धीरे इन्हें और ज्यादा दवा उतना ही उत्तेजन प्राप्त करने के लिए लेनी पड़ती है .शरीर आदी होने लगता है इन दवाओं का .यहाँ ख़तरा यह है इन दवाओं का सहारा दुसरे नुस्खों के साथ भी ये महिलायें ले रहीं हैं .मसलन आम कोल्ड और कफ की दवाएं (इनमे कई नर्वस सिस्टम सप्रेसर ड्रग भी शामिल हैं ).ऐसे में इनके परस्पर रियेक्सन से दिल की लौ (लय ) बिगड़नेइरेग्युलर हार्ट बीत से लेकर कार्डिएक अरेस्ट का जोखिम भी हो सकता है .रक्त चाप में अप्रत्याशित वृद्धि (हाई -पर्तेंशन )हो सकती है ।
एन आई डी ऐ के अनुसार जहां मर्द तमाम तरह की दवाओं का दुरूपयोग कर रहें हैं वहीँ महिलायें इन प्रिक्रिप्शन दवाओं का मनमाना स्तेमाल (ड्रग एब्यूज )करके जोखिम मोल ले रहीं हैं ।
एम् एस एन बी सी .कोम पर इस अध्धय्यन सर्वे का पूरा ब्योरा उपलब्द्ध है .लोसेंज़िलीज़ की मनोविज्ञानी तालिया वित्कोव्सकी के अनुसार महिलाए दवाओं में रिफ्युज़ ढूंढ रहीं हैं .यह एक एस्केपिस्ट रूट है .अपने स्वास्थ्य के साथअदबदा कर किया गया खिलवाड़ है ।
सन्दर्भ सामिग्री :सुपर्वोमेन्न सिंड्रोम फ्युएल्स पिल -पोप कल्चर (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २७ ,२०१० )
शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
जानिये ,क्यों रो रहा है आपका लाडला ?
अक्सर माँ -बाप या केयर टेकर आया या फिर धाय माँ के लिए यह जानना मुश्किल हो जाता है ,आपका लाडला क्यों रो रहा है .रुदन ही शिशु की एक मात्र भाषा होती है .भूख लगने पर भी शिशु जोर जोर से रोता है कोई तकलीफ होने पर भी बौलकरता है ।
क्या है बौल -एनेलाइज़र(रुदन -विश्लेषक )?कैसे काम करता है यह बौल -एनेलाइज़र ?कैसे पता लगाता है शिशु संवेगों का ?
यह एक सांखिकीय कंप्यूटर प्रोग्रेम हैं जिसे जापानी साइंस दानों ने तैयार किया है .इसमें एक इंजिनीयरिंग तकनीक "प्रोडक्ट दिज़ईनिंगका"का स्तेमाल किया गया है जिसकाविकास १९७० दशक में मित्सुओ नगशिमा ने डिपार्टमेंट ऑफ़ कंप्यूटर साइंस तथा सिस्टम इंजिनीयरिंग के तत्वावधान में किया था .यह मुरोरण इन्स्तित्युत ऑफ़ टेक्नोलोजी ,होक्कैदो में स्तिथ है .इसे कांसी इंजिनीयरिंग कहा गया था ।
दरअसल आवाज़ का एक पेट्रनहोता है जिसकी शिनाख्त के लिए रुदन की फ्री -क्वेंसीज़ का सांखिकीय विश्लेषण किया जाता है .यानी रुदन का अंदाज़ जुदा होता है .रुदन बच्चे के मनोभावों एवं संवेगों का विशिष्ठ आइना है ,हस्ताक्षर है उसके भाव जगत का .ऑडियो स्पेक्ट्रम (आवृत्ति गत श्रव्य फ्रीक्वेंसीज़ का विभाजन और पहचान ) के अनुरूप एक पावर फंक्शन होता है .यही रुदन के वर्गीकरण का आधार तैयार करता है .(साउंड पेट्रन रिकग्नीशन अप्रोच युसिज़ अ स्टेतिस्तिकल एनेलिसिस ऑफ़ दी फ्रीक्वेंसीज़ ऑफ़ क्राईज़ एंड दी पावर फंक्शन ऑफ़ दी ऑडियो स्पेक्ट्रम तू क्लासिफाई डिफरेंट टाइप्स ऑफ़ क्राईज़ /क्राइंग ।)
अब अलग अलग ऑडियो स्पेक्ट्रा का मिलान बच्चे के संवेगों से उनके माँ -बाप की मदद से किया जाता है .जो शिशु किसी कष्स्त साध्य जन्म जात रोग से ग्रस्त थे साइंसदानों ने उनकेरुदन की रिकोर्दिंग्स अलग से की थी ताकि एक आम और तकलीफ देह रुदन में भेद किया जा सके ।
इस प्रकार दर्द से रोते बच्चे के रुदन और आम बच्चे के रुदन में एक अंतर १०० फीसद कामयाबी के साथ किया जा सका .इस प्रकार ऑडियो स्पेक्ट्रा आधारित एक आधार बच्चे के रुदन और संवेगों का तैयार कर लिया गया है .उम्मीद की जा सकती है एक दिन यही एक इलेक्ट्रोनिक डिवाइस का आधार बनेगा .तब आप जान सकेंगें आपका लाडला आखिर क्यों रो रहा है .क्या उसे कोई तकलीफ है या फिर वह भूख से रो रहा है .?
अब अलग अलग ऑडियो स्पेक्ट्रा का मिलान शिशु संवेगों से किया गया .ज़ाहिर है इसमें माँ -बाप का सहयोग भी लिया गया ।
परीक्षणों के दौरान साइंसदानों ने उन बच्चों के रुदन की अलग से रिकोर्डिंग तैयार की जो किसी कष्ट साध्य जन्म जात रोग से ग्रस्त थे .ताकि इस विशिष्ठ रुदन तथा अन्यकिस्म की क्राइंग में साफ़ अंतर किया जा सके ।
इस प्रकार से पेनफुल और सामान्य क्राइंग में १०० फीसद कामयाबी के साथ अंतर किया जा सका ।
इस प्रकार शिशु रुदन
क्या है बौल -एनेलाइज़र(रुदन -विश्लेषक )?कैसे काम करता है यह बौल -एनेलाइज़र ?कैसे पता लगाता है शिशु संवेगों का ?
यह एक सांखिकीय कंप्यूटर प्रोग्रेम हैं जिसे जापानी साइंस दानों ने तैयार किया है .इसमें एक इंजिनीयरिंग तकनीक "प्रोडक्ट दिज़ईनिंगका"का स्तेमाल किया गया है जिसकाविकास १९७० दशक में मित्सुओ नगशिमा ने डिपार्टमेंट ऑफ़ कंप्यूटर साइंस तथा सिस्टम इंजिनीयरिंग के तत्वावधान में किया था .यह मुरोरण इन्स्तित्युत ऑफ़ टेक्नोलोजी ,होक्कैदो में स्तिथ है .इसे कांसी इंजिनीयरिंग कहा गया था ।
दरअसल आवाज़ का एक पेट्रनहोता है जिसकी शिनाख्त के लिए रुदन की फ्री -क्वेंसीज़ का सांखिकीय विश्लेषण किया जाता है .यानी रुदन का अंदाज़ जुदा होता है .रुदन बच्चे के मनोभावों एवं संवेगों का विशिष्ठ आइना है ,हस्ताक्षर है उसके भाव जगत का .ऑडियो स्पेक्ट्रम (आवृत्ति गत श्रव्य फ्रीक्वेंसीज़ का विभाजन और पहचान ) के अनुरूप एक पावर फंक्शन होता है .यही रुदन के वर्गीकरण का आधार तैयार करता है .(साउंड पेट्रन रिकग्नीशन अप्रोच युसिज़ अ स्टेतिस्तिकल एनेलिसिस ऑफ़ दी फ्रीक्वेंसीज़ ऑफ़ क्राईज़ एंड दी पावर फंक्शन ऑफ़ दी ऑडियो स्पेक्ट्रम तू क्लासिफाई डिफरेंट टाइप्स ऑफ़ क्राईज़ /क्राइंग ।)
अब अलग अलग ऑडियो स्पेक्ट्रा का मिलान बच्चे के संवेगों से उनके माँ -बाप की मदद से किया जाता है .जो शिशु किसी कष्स्त साध्य जन्म जात रोग से ग्रस्त थे साइंसदानों ने उनकेरुदन की रिकोर्दिंग्स अलग से की थी ताकि एक आम और तकलीफ देह रुदन में भेद किया जा सके ।
इस प्रकार दर्द से रोते बच्चे के रुदन और आम बच्चे के रुदन में एक अंतर १०० फीसद कामयाबी के साथ किया जा सका .इस प्रकार ऑडियो स्पेक्ट्रा आधारित एक आधार बच्चे के रुदन और संवेगों का तैयार कर लिया गया है .उम्मीद की जा सकती है एक दिन यही एक इलेक्ट्रोनिक डिवाइस का आधार बनेगा .तब आप जान सकेंगें आपका लाडला आखिर क्यों रो रहा है .क्या उसे कोई तकलीफ है या फिर वह भूख से रो रहा है .?
अब अलग अलग ऑडियो स्पेक्ट्रा का मिलान शिशु संवेगों से किया गया .ज़ाहिर है इसमें माँ -बाप का सहयोग भी लिया गया ।
परीक्षणों के दौरान साइंसदानों ने उन बच्चों के रुदन की अलग से रिकोर्डिंग तैयार की जो किसी कष्ट साध्य जन्म जात रोग से ग्रस्त थे .ताकि इस विशिष्ठ रुदन तथा अन्यकिस्म की क्राइंग में साफ़ अंतर किया जा सके ।
इस प्रकार से पेनफुल और सामान्य क्राइंग में १०० फीसद कामयाबी के साथ अंतर किया जा सका ।
इस प्रकार शिशु रुदन
शराब खोरी के खिलाफ विज्ञापन शराब खोरी को हवा देतें हैं ...
जिन लोगों को लक्षित करके शराब -रोधी विज्ञापन तैयार किये जातें हैं ,उनमे एल्कोहल एब्यूज घटने के स्थान पर और ज्यादा हो जाता है .यानी मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की वाली उक्ति चरितार्थ होने लगती है यही लब्बोलुआब है एक अभिनव अध्धय्यन का ।यानी एल्कोहल एब्यूज से पार पाना आसान नहीं है .
अपने तरह के इस अलग अध्धय्यन में रिसर्चरों ने पता लगाया है ,एक जन्म जात तालमेल बिठाने की प्रवृत्ति के तहत जो लोग इन विज्ञापनों को देखतें पढतें हैं वह अपने गले यह बात उतरने ही नहीं देते ,शराब उनका भी कुछ बिगाड़ सकती है .उनका यही विशवास जोर मारता है मेरा कुछ नहीं होगा जो भी नुकसान होगा किसी और को होगा .इंडियाना यूनिवर्सिटी कल्ले स्कूल ऑफ़ बिजनेस द्वारा संपन्न इस अध्धय्यन के नतीजे "मार्केटिंग रिसर्च "जर्नल मेंशीघ्र प्रकाशित होंगे ।
अध्धय्यन के को -ऑथर दुहाचेक के अनुसार एक डिफेन्स मिकेनिज्म के तहत पियक्कड़ एक ऐसा माइंड सेट तैयार कर लेतें हैं जो नुक्सानात को कम करके आंकने लगता है .यानी विज्ञापन में बतलाये गए नुक्सानात को कमतर करके देखने समझने लागतें हैं .एच आई वी एड्स के बारे में भी तो लोगों का यही रवैया रहता है "मेरा कुछ नहीं हो सकता "
सन्दर्भ सामिग्री :एंटी -बूज अद्वेर्ट्स (एद्वर्ताइज़्मेन्त्स )में रेज़ एल्कोहल यूज़ (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २६ ,२०१० ).
अपने तरह के इस अलग अध्धय्यन में रिसर्चरों ने पता लगाया है ,एक जन्म जात तालमेल बिठाने की प्रवृत्ति के तहत जो लोग इन विज्ञापनों को देखतें पढतें हैं वह अपने गले यह बात उतरने ही नहीं देते ,शराब उनका भी कुछ बिगाड़ सकती है .उनका यही विशवास जोर मारता है मेरा कुछ नहीं होगा जो भी नुकसान होगा किसी और को होगा .इंडियाना यूनिवर्सिटी कल्ले स्कूल ऑफ़ बिजनेस द्वारा संपन्न इस अध्धय्यन के नतीजे "मार्केटिंग रिसर्च "जर्नल मेंशीघ्र प्रकाशित होंगे ।
अध्धय्यन के को -ऑथर दुहाचेक के अनुसार एक डिफेन्स मिकेनिज्म के तहत पियक्कड़ एक ऐसा माइंड सेट तैयार कर लेतें हैं जो नुक्सानात को कम करके आंकने लगता है .यानी विज्ञापन में बतलाये गए नुक्सानात को कमतर करके देखने समझने लागतें हैं .एच आई वी एड्स के बारे में भी तो लोगों का यही रवैया रहता है "मेरा कुछ नहीं हो सकता "
सन्दर्भ सामिग्री :एंटी -बूज अद्वेर्ट्स (एद्वर्ताइज़्मेन्त्स )में रेज़ एल्कोहल यूज़ (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २६ ,२०१० ).
ले उड़तीं हैं होठों की रंगत पुरानी लिप्स्तिकें......
ओल्ड एंड आउट ऑफ़ डेट मेक अप ना सिर्फ संक्रमण की वजह बनता है ,पुरानी पद चुकी लिप्स्तिकें गुलाबी होठों की रंगत हमेशा हमेशा के लिए ले उड़ सकतीं हैं .ओल्ड लिप्स्तिक्स दिस्कलर लिप्स फॉर एवर ।
जिन लिप्स्तिक्स का रंग खुद ही बदरंग हो चुका है ,दिस्कलार्ड हो चुकीं हैं जो लिप्स्तिकें और मस्कारा ,आई पेन्सिल्स जो पुरानी पड़ चुकीं हैं खतरनाक जीवाणु को पनाह देने लगतीं हैं .यही जीवाणु होठों की आभा चट कर जातें हैं ।
देबेन्हाम्स ने अपने अध्धय्यन में बतलाया है ज्यादर तर महिलायें (दो तिहाई जो कोस्मेतिक्स का स्तेमाल करतीं हैं )मेक अप का सामान तभी नया करतीं हैं जब पुराना पूरी तरह चुक जाता है .आखिर सौन्दर्य प्रसाधनों की भी तो एक सेल्फ लाइफ होती है ,गुणवत्ता मियाद होती है ।
सन्दर्भ सामिग्री :ओल्ड लिप्स्तिक्स दिस्कलर लिप्स फॉर एवर (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,२६ फरवरी ,२०१० )
जिन लिप्स्तिक्स का रंग खुद ही बदरंग हो चुका है ,दिस्कलार्ड हो चुकीं हैं जो लिप्स्तिकें और मस्कारा ,आई पेन्सिल्स जो पुरानी पड़ चुकीं हैं खतरनाक जीवाणु को पनाह देने लगतीं हैं .यही जीवाणु होठों की आभा चट कर जातें हैं ।
देबेन्हाम्स ने अपने अध्धय्यन में बतलाया है ज्यादर तर महिलायें (दो तिहाई जो कोस्मेतिक्स का स्तेमाल करतीं हैं )मेक अप का सामान तभी नया करतीं हैं जब पुराना पूरी तरह चुक जाता है .आखिर सौन्दर्य प्रसाधनों की भी तो एक सेल्फ लाइफ होती है ,गुणवत्ता मियाद होती है ।
सन्दर्भ सामिग्री :ओल्ड लिप्स्तिक्स दिस्कलर लिप्स फॉर एवर (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,२६ फरवरी ,२०१० )
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
देत रैप के बाद अब सेक्स्युअल शिकारियों की नजर "लीगल ड्रग्स "पर
डेट रैप के बाद अब सेक्स्युअल शिकारियों की नजर "लीगल ड्रग्स "पर आ टिकी है .दुनिया भर की सरकारों को एक ऐसा निगरानी और कारगर तंत्र खडा करने की ज़रुरत बतलाई है "इंटर -नेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड "ने .वियेना आधारित इस बोर्ड के मुताबिक़ यौन शिकारी अब उन वैधानिक दवाओं का दूर उपयोग करने को आतुर हैं जो इंटर -नेशनल ड्रग कन्वेंसंज़ के दायरे से बाहर हैं ।
बहुत आसान है "सेक्स्युअल प्रीडे -तरस के लिए अपने खूबसूरत शिकार की ड्रिंक्स ,इतर खाद्य पदार्थों में इन दवाओं को चुपके से मिला देना .ताकि बाद में वह अपने शिकार का मनमाना सेक्स्युअल एब्यूज कर सकें .इन सेदेतिव्स दवाओं के स्तेमाल के बाद युवतियां सेक्स्युअल असाल्ट्स का विरोध करने लायक नहीं रह जातीं हैं .अलबत्ता उन्हें धीरे धीरे सब याद आ जाता है .यह कहना है एक वाच दोगका .एक ऐसा व्यक्ति जो कंज्यूमर के हितों की हिफाज़त करता है इसके अलावा और कर भी क्या सकता है .अलबत्ता अब जो करना है वह सरकारें ही कर सकतीं हैं .उपभोक्ता को भी खबरदारी बरतनी होगी .पब्लिक स्पेस में होने वाली अनेक पार्टीज़ ,सभा सोसायटीज़ में परोसे जाने वाले खाद्य और पेय पदार्थों की भी निगरानी रखने की इस दौर में महती ज़रुरत है जबकि सेक्स्युअल प्री -देटार्ज़ खुला खेल फरुखाबादी खेल रहें हैं ऐसी खबरदारी और भी ज़रूरी है ।
फ्लुनी -त्रज़ेपम का दुरूपयोग इस दौर में खबरदारी के चलते ही कम हुआ है .जो ब्रांड नेम "रोह्य्प्नोल "के नाम से बाज़ार में सहज सुलभ रही है .अंतर -राष्ट्रीय बिरादरी के सहयोग से ही इस सेदेतिव का दुरूपयोग काबू में आया है । एक रिपोर्ट के अनुसार अब यौन -भखुए गामा -हाई -ड्रोक्स्य-ब्युत्रिक एसिड (जी एच बी /कीतामाइन ) तथा गामा ब्युतैरो लेक्तोंन (जी बी एल ) हथिया लेना चाहतें हैं .इंटर नेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड के अनुसार और प्रयासों की ज़रुरत है ताकि सभी तरह के ड्रग एब्यूज को रोका जा सके .एक पूरा क्रिमिनल माफिया सक्रीय है जो इन दवाओं के बहु विध निर्माण और दुरूपयोग की जुगत में है .तू दाल दाल मैं पांत पांत .....
बहुत आसान है "सेक्स्युअल प्रीडे -तरस के लिए अपने खूबसूरत शिकार की ड्रिंक्स ,इतर खाद्य पदार्थों में इन दवाओं को चुपके से मिला देना .ताकि बाद में वह अपने शिकार का मनमाना सेक्स्युअल एब्यूज कर सकें .इन सेदेतिव्स दवाओं के स्तेमाल के बाद युवतियां सेक्स्युअल असाल्ट्स का विरोध करने लायक नहीं रह जातीं हैं .अलबत्ता उन्हें धीरे धीरे सब याद आ जाता है .यह कहना है एक वाच दोगका .एक ऐसा व्यक्ति जो कंज्यूमर के हितों की हिफाज़त करता है इसके अलावा और कर भी क्या सकता है .अलबत्ता अब जो करना है वह सरकारें ही कर सकतीं हैं .उपभोक्ता को भी खबरदारी बरतनी होगी .पब्लिक स्पेस में होने वाली अनेक पार्टीज़ ,सभा सोसायटीज़ में परोसे जाने वाले खाद्य और पेय पदार्थों की भी निगरानी रखने की इस दौर में महती ज़रुरत है जबकि सेक्स्युअल प्री -देटार्ज़ खुला खेल फरुखाबादी खेल रहें हैं ऐसी खबरदारी और भी ज़रूरी है ।
फ्लुनी -त्रज़ेपम का दुरूपयोग इस दौर में खबरदारी के चलते ही कम हुआ है .जो ब्रांड नेम "रोह्य्प्नोल "के नाम से बाज़ार में सहज सुलभ रही है .अंतर -राष्ट्रीय बिरादरी के सहयोग से ही इस सेदेतिव का दुरूपयोग काबू में आया है । एक रिपोर्ट के अनुसार अब यौन -भखुए गामा -हाई -ड्रोक्स्य-ब्युत्रिक एसिड (जी एच बी /कीतामाइन ) तथा गामा ब्युतैरो लेक्तोंन (जी बी एल ) हथिया लेना चाहतें हैं .इंटर नेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड के अनुसार और प्रयासों की ज़रुरत है ताकि सभी तरह के ड्रग एब्यूज को रोका जा सके .एक पूरा क्रिमिनल माफिया सक्रीय है जो इन दवाओं के बहु विध निर्माण और दुरूपयोग की जुगत में है .तू दाल दाल मैं पांत पांत .....
परख नली गर्भाधान के कारण कितने बच्चे मरे हुए पैदा होतें हैं ?
आई वी ऍफ़ ट्रीटमेंट रेज़िज़ रिस्क ऑफ़ स्टिल बर्थ ४ टाइम्स (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,फरवरी २५ ,२०१० )
डेनमार्क में संपन्न एक हालिया अध्धय्यन से पता चला है जो महिलायें गर्भ धारण के लिए "परखनली गर्भाधान ,इनवीट्रो फर्टिलाई जेशन" का सहारा लेतीं हैं उनके लिए स्टिल बर्थ का जोखिम उन महिलाओं के बरक्स जो कुदरती तौर पर या फिर गर्भाधान के लिए अन्य तकनीकों का सहारा लेतीं हैं ,चार गुना ज्यादा हो जाता है ।
आरहस यूनिवर्सिटी डेनमार्क के फर्टिलिटी एक्सपर्ट किर्स्तें विस्बोर्ग के नेत्रित्व में साइंसदानों की एक टीम ने २०१६६ शिश्युओं (बेबीज़ ) का जन्म सम्बन्धी डाटा संजोया है .यह तमाम शिशु सिंगिल बर्थ्स में ही पैदा हो गए थे .और यह पहली प्रेगनेंसी की सौगातें थे .१९८९ -२००६ के बीच में जन्मे थे ये नौनिहाल ।
उन महिलाओं में जिन्होंने गर्भ धारण के लिए "आई वी ऍफ़ /आई सी एस आई तकनीक अपनाई थी स्तिल्बर्थ (जब बच्चा मरा हुआ ही पैदा होता है )का जोखिम १६.२ फीसद पाया गया .लेकिन उन महिलाओं के लिए जिन्होनें नॉन -आई वी ऍफ़ ट्रीटमेंट के बाद गर्भ धारण किया था स्तिबर्थ का ख़तरा घटकर २.३ प्रति एक हज़ार प्रसव ही रह गया था ।
फर्टाइल और सब- फर्टाइल महिलाओं के मामले में यही जोखिम ३.७ और ५.४ पाया गया (प्रति -हज़ार प्रसव के पीछे ).
डेनमार्क में संपन्न एक हालिया अध्धय्यन से पता चला है जो महिलायें गर्भ धारण के लिए "परखनली गर्भाधान ,इनवीट्रो फर्टिलाई जेशन" का सहारा लेतीं हैं उनके लिए स्टिल बर्थ का जोखिम उन महिलाओं के बरक्स जो कुदरती तौर पर या फिर गर्भाधान के लिए अन्य तकनीकों का सहारा लेतीं हैं ,चार गुना ज्यादा हो जाता है ।
आरहस यूनिवर्सिटी डेनमार्क के फर्टिलिटी एक्सपर्ट किर्स्तें विस्बोर्ग के नेत्रित्व में साइंसदानों की एक टीम ने २०१६६ शिश्युओं (बेबीज़ ) का जन्म सम्बन्धी डाटा संजोया है .यह तमाम शिशु सिंगिल बर्थ्स में ही पैदा हो गए थे .और यह पहली प्रेगनेंसी की सौगातें थे .१९८९ -२००६ के बीच में जन्मे थे ये नौनिहाल ।
उन महिलाओं में जिन्होंने गर्भ धारण के लिए "आई वी ऍफ़ /आई सी एस आई तकनीक अपनाई थी स्तिल्बर्थ (जब बच्चा मरा हुआ ही पैदा होता है )का जोखिम १६.२ फीसद पाया गया .लेकिन उन महिलाओं के लिए जिन्होनें नॉन -आई वी ऍफ़ ट्रीटमेंट के बाद गर्भ धारण किया था स्तिबर्थ का ख़तरा घटकर २.३ प्रति एक हज़ार प्रसव ही रह गया था ।
फर्टाइल और सब- फर्टाइल महिलाओं के मामले में यही जोखिम ३.७ और ५.४ पाया गया (प्रति -हज़ार प्रसव के पीछे ).
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