शनिवार, 20 नवंबर 2010

आपकी सुनने की क्षमता (श्रवण -शक्ति )को कम कर सकती है "पेसिव -स्मोकिंग ".

क्या आप स्मोकर्स की सोहबत में रहतें हैं ?पेसिव स्मोकर्स हैं ?यदि हाँ तब पेसिव स्मोकिंग की कीमत आपकी श्रवण क्षमता को चुकानी पड़ सकती है ।
यह तो पहले से ही पुष्ट हो चुका है जो लोग धूम्रपान करतें हैं उनकी श्रवण शक्ति असर ग्रस्त होती है .दे मे डेमेज देयर हीयरिंग ।
अब तकरीबन ३,००० अमरीकी बालिगों पर संपन्न एक अध्ययन से पुष्ट हुआ है ,यही बात पेसिव स्मोकिंग पर भी लागू होती है ।
माहिरों के अनुसार तम्बाकू पीना किसी भी विध (हुक्का या बीडी सिगरेट्स ) कान की स्माल वेसिल्स में ब्लड फ्लो को विच्छिन्न कर सकता है .विघ्न पैदा कर सकता है रक्त प्रवाह में .ऐसे में ऑक्सीजन की आपूर्ति कर्ण को नहीं हो पाती नतीज़नकान में टोक्सिक वेस्ट (विषाक्त -मल,मैला)ज़माहोकर कान को नुकसानी पहुंचा सकता है ।
शोर शराबे और बुढापे की सामान्य प्रक्रिया से होने वाली नुकसानी इस से फर्क होती है ।
अध्ययन में मियामी और फ्लोरिडा अंतर -राष्ट्रीय विश्व -विद्यालय के ३,३०७ नॉन -स्मोकर वोलन -टी -यर्स(गैर -धूम्र्पानी स्वयं -सेवियों ) के श्रवण नतीजों (हीयरिंग टेस्ट्स रिज़ल्ट्स ) का जायज़ा लिया गया .निम्न ,मध्य और उच्च आवृत्तियों के शोर (दी टेस्ट्स मेज़र्द रेंज ऑफ़ हीयरिंग ओवर लो ,मिड एंड हाई -नोइज़ ,फ्रीक्युवेंसीज़ ) का श्रवण -सम्बन्धी मापन किया गया ।
पेसिव स्मोक एक्सपोज़र का जायजा लेने के लिए स्वयं -सेवियों के रक्त में निकोटिन के एक उप -उत्पाद "कोतीनिन"का पता लगाया गया .यह तभी बनता है जब हमारा शरीर तंत्र सिगरेट के धुयें के संपर्क में आता है ।
इस से इल्म हुआ जो लोग सेकिंड हेंड स्मोक झेलतें हैं उनकी श्रवण शक्ति ह्रास की संभावना औरों से ज्यादा बनी रहती है .खासकर शोर शराबे वाली पृष्ठ भूमि में इन्हें कुछ भी सुन ने समझने में खासी दिक्कत पेश आती है ।
बी बी सी से प्रसारित एक खबर से भी इस बात की पुष्टि होती है ।
पेसिव स्मोकिंग इन्क्रीज्द देयर रिस्क ऑफ़ हीयरिंग लोस एक्रोस आल साउंड फ्रीक्युवेंसीज़ बाई अबाउट ए थर्ड .

कोलेस्ट्रोल को विनियमित करें वाली जादू दवा ...

न्यू -ड्रग ट्रिगर्स स्टीप ड्रॉप इन बेड कोलेस्ट्रोल (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुबई ,नवम्बर २० ,२०१० ,पृष्ठ २१ )।
ब्रिघम एंड वोमेन्स हॉस्पिटल ,बोस्टन के चिकित्सा माहिर इन दिनों एक दम से चमत्कृत हैं ,एक नै प्रायोगिक दवा के जादुई असर से जिसने हाई -डेंसिटी -लिपो -प्रोटीन कोलेस्ट्रोल का स्तर सब्जेक्ट्स के रक्त में एक दम से बढा दिया तथा साथ ही बेड कोलेस्ट्रोल (लो डेंसिटी लिपो -प्रोटीन कोलेस्ट्रोल ) को यक दम से घटा दिया .इस से दिल केदौरे और सेरिब्रल -वैस्क्युलर एक्सिदेंट्स (ब्रेन अटेक) के बचाव की नै रन -नीति तय की जा सकेगी ।
डॉ .क्रिस्टोफर काननों ने दवा फर्म "मेर्च्क एंड कम्पनी "की इस दवा "अनासत्रपिब "पर चलने वाले अध्ययनों का नेत्रित्व किया है .आप नतीजों से बेहद आशान्वित और उत्तेजित हैं .

वैज्ञानिकों की पकड़ में आया एंटी -मैटर ...

साइंटिस्ट ट्रेप एंटी -मैटर .इट वाज़ वंस यूस्ड टू प्रोपेल केप्टन क्रिक एक्रोस दी स्टार्स .नाव बोफ्फिंस से दे हेव केप्चार्ड ए सेम्पिल ऑफ़ रीयल -लाइफ एंटी मैटर फॉर दी फस्ट टाइम ,व्हाइल इट इज अन -लाइक -ली टू लीड टू वार्प एन्जिंस,इट कुड शेड लाईट ऑन दी नेचर एंड ओरिजिंस ऑफ़ दी यूनिवर्स .(एससीआई -टीईसीएच /मुंबई मिरर ,नवम्बर १९ ,२०१० ,पृष्ठ २९ )।
अमरीकी धारावाहिक स्टार ट्रेक में "वार्प ड्राइव "का ज़िक्र है जिसका मतलब है अन्तरिक्ष यानों को प्रकाश के अपने निर्वातीय वेग से तेज़ दौडाया जा सकता है .और वह भी एंटी -मैटर के हाथों ।
योरोपीय न्यूक्लीयर रिसर्च सेंटर के साइंसदानों ने एंटी -एटम्स (सर्न,जिनेवा के निकट महा -मशीन ,लार्ज -हैद्रान कोलाईदार,योरोपीय न्यूक्लीयर रिसर्च सेंटर सर्न का विस्तार है ) चंद लम्हों के लिए लेब में बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है ।
एटम और एंटी -एटम का मिलन ही वार्प ड्राइव को स्टार ट्रेक में पावर करता है .प्रयोग शाला की परिश्थितियों में एंटी -एटम्स अल्पकाल तक ही हमारे प्रेक्षण का हिस्सा बन सकतें हैं ।
यूनिवर्स में जहां तक हमारी जानकारी है इनकी तंगी है .दुर्लभ है इन्हें पकड़ पाना .विरल है इनकी मौजूदगी .अन्तरिक्ष में इनका कोई सुराग नहीं मिला है ।
अलबत्ता पार्टिकिल एक्सलारेटर (कणों को वेगवान बनाने वाले कण त्वरकों )में इन्हें अल्पकाल के लिए ही सही पैदा किया जा सकता है .लेकिन हमारे प्रेक्षण अध्ययन के दायरे में आने से पहले ही यह ओझल हो जातें हैं .क्योंकि परम्परा गत बोतल में इन्हें नहीं रखा जा सकता .नियमित एटम्स के संपर्क में आते ही ये पारस्परिक तौर पर नष्ट हो जाते हैं .अलबत्ता अल्पकाल के लिए ही सही इन्हें बनाए रखने की तरकीब ढूंढ ली गई है ।
आखिर एंटी मैटर लेब में पैदा ही क्यों किया जाए ?
आखिर यह एक गुत्थी चली आई है हमारे चारों तरफ पदार्थ ही पदार्थ का बसेरा है ,प्रति -पदार्थ यदि है भी तो अल्पांश में ही है .ऐसा क्यों है ?इसी गुत्थी को सुलझाने के लिए लेब में एंटी -मैटर चाहिए ।
सरलतम परमाणु हमारे गिर्द हाइड्रोजन परमाणु है .विश्व में इसकी बहुतायत है .सभी सितारों की एटमी भट्टी का यही ईंधन है .हमारे शरीर में यह पाचन की क्रिया में भागेदारी करता है ,गैसोलीन के दहन में इसका ही हाथ होता है ।
एक प्रोटोन और एक इलेक्त्रोंन का गठबंधन है हाइड्रोजन एटम ।
सिद्धांत -तय एंटी -हाई -द्रोजन एक एंटी -प्रोटोन (प्रोटोन विद ए पोजिटिव चार्ज ) और एक पोजिटिव इलेक्त्रोंन (पोज़ित्रोंन ) का गठबंधन है .हरेक कण के लिए सृष्टि में एक प्रति -कण भी है .लेकिन प्रति -पदार्थ की प्राप्ति आसान नहीं है .इक्का दुक्का बना भी लो लेकिन बड़ी तादाद में एंटी -प्रोटोन प्राप्त करना मुश्किल काम है .इसके लिए पहले रेग्युलर प्रोटानों को वेगवान बनाना पड़ेगा पार्टिकिल एक्स्लारेतर्स में फिर इन्हें मेटल टारगेट्स पर दागना पड़ेगा .इन्हीं टक्करों के फलस्वरूप यदा कदा "प्रोटोन -एंटी -प्रोटोन युग्म ,प्रोटोन -एंटी -प्रोटोन पे -यर"पैदा होतें हैं ।
एंटी -प्रोटानों को एक अलग पुंज के रूप में प्राप्त करने के लिए इन्हें अदबदाकर मंदा (रिटार्ड )करना पड़ता है .सर्न -योरोपियन ओर्गेनाइज़ेशन फॉर न्यूक्लीयर रिसर्च ,जिनेवा के निकट जिसके तत्वावधान में लार्ज हेड्रोंन -कोलाईदर काम कर रहा है यही काम करता है .हेयर एक्सलरेशन इज दी थीम ।
लेकिन एंटी -प्रोटोन बाने के लिए सर्न को समर्साल्ट करना पड़ता है पलटी खानी पडती है एक्सलरेशन नहीं ,दी -सलेरेशन देना पड़ता है एंटी -प्रोटानों को .अरबों इलेक्त्रोंन वोल्ट ऊर्जा से चंद इलेकत्रोंन वोल्ट तक ले आना पड़ता है वेगवान एंटी -प्रोटोनों को .दूसरे शब्दों में इसे यूं समझें कणों का तापमान १० ट्रिलियन डिग्री से घटाकर ०.५ केल्विन (परम -शून्य से आधा डिग्री ऊपर )लाया जा रहा है .कणों का तापमान उनकी औसत ऊर्जा का द्योतक ही तो होता है ।
अगला कदम इन एंटी -प्रोटानों का गठबंधन पोज़ित्रानों के साथ करवाना है .ज़ाहिर है ऐसा करने के लिए इन्हें न्यूनतम संभव तापमानों तक लाना पड़ता है .ताकि ये एक दूसरे से आबद्ध हो सकें ।
हाव टू ट्रेप एंटी -मैटर ?
एंटी -एटम्स को एक स्थान पर बनाए रखना बहुत दुष्कर सिद्ध होता है क्योंकि इन्हें परम्परागत पात्रों में नहीं रखा जा सकता .रेग्युलर एटम्स के साथ संपर्क होते ही दोनों विस्फोट के साथ नष्ट हो जातें हैं .इन्हें स्पेस में लोकेलाइज़ करने के लिए शक्ति -शाली चुम्बकीय क्षेत्रों का स्तेमाल किया जाता है ।
इस एवज़ विशेष चुम्बकों का स्तेमाल किया जाता है .कणों को ठंडा करने के लिए बेहद सुधरी हुई प्रणाली अपनाई जाती है .और बेहद के संवेदी सेन्सर्स का स्तेमाल किया जाता है जो आखिरकार एंटी -एटम्स का विनष्ट होना तब दर्ज़ करतें हैं जब यह अपने अल्पकालिक ट्रेप से ओझल होने लगतें हैं ।
सर्न का एल्फा ग्रुप इस पर काम कर रहा है .इसने ३८ एंटी -हाई-द्रोजन एटमों को स्पेस में लोकेलाइज़ करके दिखलाया है .दूसरे चरण में इन्हें बड़ी तादाद में जुटाया जाएगा .देखना यह भी बाकी है क्या इनकी आंतरिक ऊर्जा का स्तर रेग्युलर हाई -द्रोजन एटम्स जैसा ही होता है .यदि दोनों जुदा है तब एक नै भौतिकी कार्य -रत होगी .

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

गरीब दूसरे की भावना को बेहतर समझ लेते हैं .

गरीब दूसरे की भावना को बेहतर समझ लेतें हैं .समानु -भूति ,दूसरे की भावना को समझ कर उसके दुःख को अनुभव करना अमीरों के बसकी बात नहीं .उच्च सामाजिक पद -प्रतिष्ठा वाले लोग दूसरे की भावना को बूझ ही नहीं पाते .पैसे से खुशियाँ भी नहीं खरीद सकते .दूसरों की भावना सुख दुःख को समझने की इनमे कूवत ही नहीं होती ।इन्हें नहीं मालूम क्या होती है 'तदानु -भूति ',एमपेथी .

केलिफोर्निया विश्व -विद्यालय के रिसर्चरों ने बहु -विध प्रयोगों से पता लगाया है समाज के ऊपरले पायेदान पर खड़े लोग दूसरों के ज़ज्बातों को समझने का माद्दा ही नहीं रखतें हैं .जबकि सामाजिक हाशिये पर खड़े लोग बा -खूबी दूसरे की संवेदनाओं और आवेगों को समझ लेतें हैं .जीवन निर्वाह के लिए भी ऐसा करना उनकी मजबूरी हो जाती है वरना उनकी तो ज़िन्दगी ही ठहर जाये .गुज़ारे के लाले पड़ जाएँ .अध्ययन के अगुवा मिचेल क्रॉस इसकी तस्दीक करतें हैं .सही बतलाते है इसे ।

सन्दर्भ -सामिग्री :-'पूअर आर बेटर एट एमपेथी देन दी रिच (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,नवम्बर १८ ,२०१० ).

ब्लड प्रेशर से मुक्ति के लिए नई तरकीब .

ज़ेप नर्व्ज़ फॉर जस्ट वन आवर ,बी फ्री ऑफ़ हाई बी पी फॉर -एवर (दी टाइम ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,नवम्बर १९ ,२०१० )।
परमानेंट फिक्स :दी सिम्पली -सिटी केथीटर सिस्टम डि -ली -वर्स लो पावर रेडियो वेव्ज़ टू डि -एक्टिवेट दी नर्व्ज़ नीयर दी किड -नीज देट फ्यूल हाई ब्लड प्रेशर ।
यकीन मानिए ऐसा भी होता है .एक घंटे का मामूली शल्य कर्म ब्लड प्रेशर से हमेशा हमेशा के लिए भी छुटकारा दिलवा सकता है .लांसेट में प्रकाशित एक अंतर -राष्ट्रीय अध्ययन ने इस ओपरेशन को पूरी तरह सुरक्षित और असरदार माना है ।
इस इलाज़ के तहत एक केथीटर सिस्टम द्वारा कम शक्ति की रेडिओ -तरंगें किडनी के आसपास की नर्व्ज़ को दी -एक्टिवेट कर देतीं हैं (निष्क्रिय बना देतीं हैं ).हाई -ब्लड प्रेशर को यही नसें हवा देतीं हैं .बस एंजियोप्लास्टी प्रोसीज़र की तरह ही ग्रोइन से एक पतली सी ट्यूब(केथीटर की तरह ही ) रक्त वाहिकाओं में पहुंचाई जाती है.यही किडनी के आसपास की नसों कोकम शक्ति की रेडियो -तरंगे डालकर ठप्प कर देती है ,निष्क्रिय बना देती है ।
इस अधययन में शरीक १०० लोगों को इलाज़ मुहैया करवाया गया .इनके रक्त चाप का ऊपरी पाठ औसतन (सिस्टोलिक रीडिंग ,दी कोंत्रेक्शन ऑफ़ दी हार्ट ड्यूरिंग व्हिच ब्लड इज पम्प्द इनटू दी आर्ट -रीज ) ३३ पॉइंट्स कम हो गया .ऐसे में यदि इलाज़ आंशिक तौर भी कामयाब रहता है तब भी हाई -पर -टेंशन से ग्रस्त लोगों के लिए इस से दिल के दौरे ,सेरिब्रल -वैस्क्युलर एक्सीडेंट (ब्रेन -अटेक) और आखिरकार इनसे संभावित मृत्यु का ख़तरा तो कमतर हो ही जाएगा .ड्रग्स रक्त चाप को नीचे लाने में उतना कारगर नहीं रहीं हैं यह कहना मानना समझना है "ब्रिघम एंड वोमेन्स हॉस्पिटल "में हृद -रोगों के माहिर (उप -मुखिया अमरीकी ह्रदय संघ सभा ,शिकागो )का ।
उन मरीजों के लिए यह इलाज़ बेहद उपयोगी रहेगा जो हाई -ब्लड प्रेशर के संग -साथ मधुमेह से भी पीड़ित हैं .बोनस के रू में यह इलाज़ ब्लड सुगर का भी विनियमन करता है .बेहतर ढंग से प्रबंधन और नियंत्रण होता है खून में घुली शक्कर का ।
एक अनुमान के अनुसार सात करोड़ पचास लाख (७५ मिलियन )अमरीकी तथा दुनिया भर में एक अरब लोग जीवन शैली रोग हाई -ब्लड प्रेशर की जद में हैं इनका ब्लड प्रेशर १४०/९० या और भी ज्यादा बना रहता है .ब्लड प्रेशर का आदर्श मान अब ११० /७० माना जाता है .तीन से लेकर चार दवाओं का सहारा लेना पड़ता है तब जाकर इनमे से एक तिहाई का ही ब्लड प्रेशर प्रभावी तौर पर कम हो पाता है .इस नज़रिए से सोचेंगे तो संदर्भित इलाज़ जादुई नजर आयेगा .

सिर्फ एक पिल आपके जीवन की गुणवत्ता (लाइफ स्पेन )को १० साल और बढा सकती है

हारवर्ड विश्वविद्यालय के रोग -विज्ञान विभाग में असोशियेट प्रो -फेसर , डेविड सिंक्लेयर एक ऐसी जी- वन इकाई(क्वांटम ऑफ़ लाइफ ) जीन या जीवन खण्ड को एक्टिवेट करने में मशगूल हैं जो बकौल उनके बुढ़ाने की प्रक्रिया को विनियमित करके हमारे जीवन की गुणवत्ता को ५-१० साल आगे बढा सकती है .इसका मतलब यह नहीं है कि उम्र ठहर जायेगी हम बूढ़े ही नहीं होंगे ,उम्र बढ़ेगी लेकिन हम बुढ़ाने कि सामान्य प्रक्रिया के साथ -साथ अशक्त नहीं हो पायेंगे .ता -उम्र ,मरते दम तक हम जीवन क्षमता से भरे रहेंगे ।
सिर्तुइन जींस हैं ये .जिन पर आप काम कर रहें हैं .सिर्तुइंस को एक्टिवेट करने से याददाश्त में इजाफा होगा ,काम करते रहने कि क्षमता बढ़ेगी ,हाई -फैट डाइट से होने वाली नुकसानी कम होगी बुढ़ाने कि रफ्तार कम हो जायेगी ।
यदि एनीमल स्टडीज़ को मनुष्यों में भी आज़माइश के बाद अनुकूल पाया गया तब हमारे हाथ में जोड़ों के दर्द "आर्थ -राय -टिस"के समाधान के लिए भी पिल होगी जो एल्जाई -मर्स (न्यूरो -दिजेंरेतिव डीज़ीज़ ऑफ़ ओल्ड एज )से भी हमारी हिफाज़त करेगी ,सफ़ेद मोतिया बिन्द को भी रोकेगी ,कार्डिएक अरेस्ट (हृद गति रुक जाने )और हृद रोगों के बढ़ने को भी थाम लेगी ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-सून ,ए पिल मे एक्सटेंड लाइफ बाई १० ईयर्स (डी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,नवम्बर १९ ,२०१० ,पृष्ठ २१ ).

अवसाद की वजह बन सकता है बत्ती जलाकर सोना ...

स्लीपिंग विद लाइट्स ऑन काज़िज़ डिप्रेसन (डी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,२०१० ,पृष्ठ ,२१ )।
एक अध्ययन के अनुसार यदि आप लाइट्स ऑन किये ही नींद की गोद में चले जाते हैं ,रोशन कमरों में ही सो जातें है तो सुबह आपकी उनींदी और बेचैनी से भरी हुई हो सकती है -आप चिडचिडे और अवसाद ग्रस्त भी हो सकतें हैं .नाईट लेम्प जलाकर सोना ,टी वी की पावर ऑन छोड़ देना आपके मानसिक स्वास्थ्य को असर ग्रस्त बना सकता है ।
दी ग्लो एमितिड बाई ए टी वी ऑर दी रिअस्योरिंग प्रिज़ेंस ऑफ़ ए नाईट लेम्प कूद एक्चुअली इम्पेक्ट ऑन मेंटल हेल्थ ।
यही वजह है सोने के कमरों में लोग मोटे पर्दे लगाते हैं ताकि बाहर की रौशनी भी सोते वक्त किसी भी पहर आपको डिस्टर्ब न कर सके .