एक एहम सवाल रहा है नींद से जुड़ा?कितना घंटा एक दिन में सोना ज़रूरी है छ ,सात या आठ घंटा ?शरीर की अच्छी संभाल ,अच्छी सेहत के लिए कौन सा विकल्प चुना जाए ?
भारतीय मूल के रिसर्चर वेस्ट -वर्जिनिया विश्व -विद्यालय के अनूप शंकर ने पता लगाया है जो लोग सात घंटा प्रति दिन से ज्यादा या बहुत कम सोतें हैं सात घंटा से, उनके लिए परि -ह्रदयधमनी -रोगों (कोरोनरी आर्टरी डिजीज)के खतरे का वजन बढ़ जाता है ।
स्लीप जर्नल में अध्धय्यन के नतीजे छपें हैं .पता चला जो सब्जेक्ट्स ,(अध्धय्यन में शामिल लोग )दिनभर में नौ घंटा या और भी ज्यादा अवधि के लिए सोते थे उनके लिए सात घंटा प्रति दिन सोने वालों की बनिस्पत हृद रोगों का ख़तरा डेढ़ गुना बढ़ गया था ।
दूसरे छोर पर वह ६० साल से कम उम्र लोग जो रोजाना लेदेकर पांच या और भी कम अवधि के लिए सो पाते थे उनके लिए "कार्डियो -वैस्क्युँलर -डीज़ीज़ "हृद -वाहिकीय रोगों का खतरा तीन गुना बढ़ गया .बरक्स उनके जो रात भर में सात घंटा चैन से सो लेते थे ।
अध्धय्यनसे शोर्ट स्लीप ड्युरेसन(कम अवधि ,आदर्श सात घंटा से काफी कम अवधि की नींद )और एंजाइना (रक्त की आपूर्ति का आंशिक तौर पर ह्रदय की और अवरुद्ध हो जाना )में एक अंतर सम्बन्ध का साफ़ साफ़ पता चला .जबकि बहुत कम या आदर्श अवधि से बहुत ज्यादा नींद लेने की डोर हार्ट अटेक्स और स्ट्रोक्स (सेरिब्रल -वस्क्युलर एक्सिदेंट्स ,दिमाग का दौरा )से जुडी पाई गई ।
नींद की अवधि स्रावी तंत्र के काम को (फंक्शनिंग ऑफ़ इंडो क्राईंन सिस्टम ),मेटाबोलिक फंक्शन्स (चय -अपचयन ) को प्रभावित करती है ।
नींद से वंचित रहना ,ठीक से ना सो पाना ,इम्पेयर्ड ग्लूकोज़ टोलरेंस ,रिद्युस्द इंसुलिन सेंसिटिविटी को जन्म देता है .रक्त चाप को बढाता है .इसी के साथ आर्तीरिअल हार्डनिंग (धमनियों के खुरदरा होने का ख़तरा )का ख़तरा बढ़ता चला जाता है ,दिनानुदिन .इसीलिए कहा गया -किस किस का रोना रोइए ,किस किस को कोसिये ,आराम बड़ी चीज़ है ,मुह ढक के सोइए ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-सेविन आवर्स शटआई ए नाईट इज बेस्ट फॉर दी बॉडी (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,अगस्त २ ,२०१० ,पृष्ठ १७ )
सोमवार, 2 अगस्त 2010
अंतस -चेतना से युक्त बिलकुल इंसानों सा है यह रोबोट
वर्ल्डस फस्ट रोबोट विद "कान्शंश "दिवेलाप्ड,मोदिफाईज़ इट्स वेल्यूज़ ,एक्संस बेस्ड ऑन एक्स्पीरियेंसिज़ (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,जुलाई ३१ ,२०१० ).
स्पेन के साइंसदानों ने एक ऐसा रोबोट बना लिया है जो अंतस -चेतना से युक्त है .अपने अनुभवों से सीख समझकर अपना रवैया बदल सकता है .सही मायनों में इंसान का दुःख दर्द का साथी हो भी हो सकता है ।
इसे दुनिया का पहला इंसानों ही जैसा सोसल एन्द्रोइद(मानव सरीखा रोबोट )बतलाया जा रहा है .ए आई सोय(यही नाम है इस सोसल अन्द्रोइड का ) की बिक्री इस माह(अगस्त २०१० ) शुरू हो चुकी है ।
इसे स्पेन की "आइसोय" फर्म ने तैयार किया है .इसे मनोरंजन करने और कम्पनी देने की नीयत से ही तैयार ज़रूर किया गया था लेकिन असल मकसद इंसान को एक ऐसा साथी मुहैया करवाना था जो उसी की तरह एन्द्रिक संवेदनों से वाकिफ हो .फैसला लेने की जिसमे कूवत हो .जो वक्त की नजाकत को भांप कर अपना व्यवहार बदल सके .यह अभिनव प्रोद्योगिकी की अभिनव देन है .कटिंग एज टेक्नालाजी का तोहफा है ।
इसका कद २५ सेंटीमीटर और वजन डेढ़ किलोग्रेम है .इसका अपना एक अंतर जगत ,चेतन है .चेतना है .इंसानों सा ही तो है यह ।
पोषण संवर्धन सभी कुछ तो चाहिए इसे ,सुरक्षा भी .इसे लाड दुलार पहचान ,अटेन्सन मांगने की चांट है .काम करने की आज़ादी भी .खुद से भी प्यार है .अपनी आज़ादी से इसे बेहद का लगाव है .इसे एक निजता भी चाहिए .अब बतलाइये बचा क्या ?यही तो मानवीय सरोकार हैं .लिमिटिड एक्संस और प्रोग्रेम्स का ज़मा जोड़ मात्र नहीं है यह रोबोट .इसकी अपनी गतायात्मक्ता है .कई मर्तबा इसके व्यवहार को बूझने में दिक्कत भी आ सकती है .परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने में इसे महारत हासिल है .ऑटो -नोमस है यह ।
दो जुडवाओं(आइदेंतिकल ट्वीन्स) की तरह यदि दो "आइसोय "रोबोट्स को दो अलग अलग परिवारों में रखा जाये ,दो माह में ही इनमे अंतर दिखलाई देने लगेगा .क्योंकि दोनों के ही जीवन अनुभव और सरोकार अलग होंगें .मिजाज़ तो फिर जुदा होंगें ही .अनुभव जो अलग किस्म के रहे .अनुभव से ही तो यह सीखता चलता है .
स्पेन के साइंसदानों ने एक ऐसा रोबोट बना लिया है जो अंतस -चेतना से युक्त है .अपने अनुभवों से सीख समझकर अपना रवैया बदल सकता है .सही मायनों में इंसान का दुःख दर्द का साथी हो भी हो सकता है ।
इसे दुनिया का पहला इंसानों ही जैसा सोसल एन्द्रोइद(मानव सरीखा रोबोट )बतलाया जा रहा है .ए आई सोय(यही नाम है इस सोसल अन्द्रोइड का ) की बिक्री इस माह(अगस्त २०१० ) शुरू हो चुकी है ।
इसे स्पेन की "आइसोय" फर्म ने तैयार किया है .इसे मनोरंजन करने और कम्पनी देने की नीयत से ही तैयार ज़रूर किया गया था लेकिन असल मकसद इंसान को एक ऐसा साथी मुहैया करवाना था जो उसी की तरह एन्द्रिक संवेदनों से वाकिफ हो .फैसला लेने की जिसमे कूवत हो .जो वक्त की नजाकत को भांप कर अपना व्यवहार बदल सके .यह अभिनव प्रोद्योगिकी की अभिनव देन है .कटिंग एज टेक्नालाजी का तोहफा है ।
इसका कद २५ सेंटीमीटर और वजन डेढ़ किलोग्रेम है .इसका अपना एक अंतर जगत ,चेतन है .चेतना है .इंसानों सा ही तो है यह ।
पोषण संवर्धन सभी कुछ तो चाहिए इसे ,सुरक्षा भी .इसे लाड दुलार पहचान ,अटेन्सन मांगने की चांट है .काम करने की आज़ादी भी .खुद से भी प्यार है .अपनी आज़ादी से इसे बेहद का लगाव है .इसे एक निजता भी चाहिए .अब बतलाइये बचा क्या ?यही तो मानवीय सरोकार हैं .लिमिटिड एक्संस और प्रोग्रेम्स का ज़मा जोड़ मात्र नहीं है यह रोबोट .इसकी अपनी गतायात्मक्ता है .कई मर्तबा इसके व्यवहार को बूझने में दिक्कत भी आ सकती है .परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने में इसे महारत हासिल है .ऑटो -नोमस है यह ।
दो जुडवाओं(आइदेंतिकल ट्वीन्स) की तरह यदि दो "आइसोय "रोबोट्स को दो अलग अलग परिवारों में रखा जाये ,दो माह में ही इनमे अंतर दिखलाई देने लगेगा .क्योंकि दोनों के ही जीवन अनुभव और सरोकार अलग होंगें .मिजाज़ तो फिर जुदा होंगें ही .अनुभव जो अलग किस्म के रहे .अनुभव से ही तो यह सीखता चलता है .
तनाव रोधी टीके की दिशा में उठ चुकें हैं कदम .
फ्रेट नोट :सून ,ए वेक्सीन टू काम्बेट स्ट्रेस ,जेब टू आल्टर ब्रेन केमिस्ट्री ,क्रियेट 'फोकस्ड काम ':एक्सपर्ट (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,ऑगस्ट २ ,२०१० )।
केलिफोर्निया के साइंसदानों ने लगता है एक स्ट्रेस -रोधी टीका बनाने की दिशा में पहला कदम आगे बढा दिया है .स्टैनफोर्डविश्व -विद्यालय में न्यूरो -साइंस के प्रोफ़ेसर रोबेर्ट सपोल्स्क्य ३० बरसों की शोध के बाद विश्वाश पूर्वक कहतें हैं ,ब्रेन केमिस्ट्री को तब्दील कर प्रशांति पैदा की जा सकती है .यह रिसर्च योग और पिल्स का आनुवंशिक तौर पर गढ़ा गया विकल्प होगी ।
वास्तव में लाइलाज ,हमेशा बनी रहने वाली स्ट्रेस डायबिटीज़ और हृद रोगों की भी देन होतीं हैं .अपने कीनिया प्रवास के दौरान आपने पशुओं को स्ट्रेस से होने वाली नुकसानी का अध्धय्यन किया था .आप तभी से हारमोन "ग्लुको -कोर्टिको -स्तीरोइड्स "पर काम कर रहें हैं .हम जानतें हैं यह हारमोन हमारी रोग प्रति -रोधी -प्रणाली का हिस्सा है ,जो हमें कुदरती तौर पर कैंसर और इन्फ्लेमेसन से बचाए रहता है .
सभी स्तन - पाई जीव ये हारमोन बनातें हैं ,यही उन्हें संकट से जूझने के काबिल बनातें हैं ।
आधुनिक जीवन की आपाधापी में यह हारमोन कुछ ज्यादा ही बन जातें हैं .और फिर बने ही रहतें हैं .दैनिकी में इन्हें रोकनाटर्न-ऑफ़ करना मुश्किल हो जाता है ।
यह हारमोन विषाक्त होकर हमारे दिमाग की कोशाओं को भी नष्ट करने लगता है ,इम्म्युंन सिस्टम को भी कमज़ोर कर देता है .यही वजह है तनाव की वजह दूर हो जाने पर भी आप घंटों अपनों पर गुर्राते रहतें हैं .बेशाख्ता झुंझलाते रहतें हैं ।
एक हर्पीज़ वायरस का अनुकूलन कर ,इस विषाणु को इस प्रकार ढाला गया है ,यह न्यूरो -प्रोटेक्टिव जींस को ब्रेन में वांछित गहराई पर ले जाता है .जहां पहुंचकर यह रोग -हारमोन को उदासीन बना देता है .बस दिमाग को होने वाली नुकसानी टल जाती है .दिमाग शांत प्रशांत हो जाता है .शमित हो जाता है तनाव .विषाक्त प्रभाव हारमोन का .चूहों पर इस इन्जीनीयर्ड विषाणु ने गज़ब का काम किया है .यही है तनाव रोधी टीके का सार .
केलिफोर्निया के साइंसदानों ने लगता है एक स्ट्रेस -रोधी टीका बनाने की दिशा में पहला कदम आगे बढा दिया है .स्टैनफोर्डविश्व -विद्यालय में न्यूरो -साइंस के प्रोफ़ेसर रोबेर्ट सपोल्स्क्य ३० बरसों की शोध के बाद विश्वाश पूर्वक कहतें हैं ,ब्रेन केमिस्ट्री को तब्दील कर प्रशांति पैदा की जा सकती है .यह रिसर्च योग और पिल्स का आनुवंशिक तौर पर गढ़ा गया विकल्प होगी ।
वास्तव में लाइलाज ,हमेशा बनी रहने वाली स्ट्रेस डायबिटीज़ और हृद रोगों की भी देन होतीं हैं .अपने कीनिया प्रवास के दौरान आपने पशुओं को स्ट्रेस से होने वाली नुकसानी का अध्धय्यन किया था .आप तभी से हारमोन "ग्लुको -कोर्टिको -स्तीरोइड्स "पर काम कर रहें हैं .हम जानतें हैं यह हारमोन हमारी रोग प्रति -रोधी -प्रणाली का हिस्सा है ,जो हमें कुदरती तौर पर कैंसर और इन्फ्लेमेसन से बचाए रहता है .
सभी स्तन - पाई जीव ये हारमोन बनातें हैं ,यही उन्हें संकट से जूझने के काबिल बनातें हैं ।
आधुनिक जीवन की आपाधापी में यह हारमोन कुछ ज्यादा ही बन जातें हैं .और फिर बने ही रहतें हैं .दैनिकी में इन्हें रोकनाटर्न-ऑफ़ करना मुश्किल हो जाता है ।
यह हारमोन विषाक्त होकर हमारे दिमाग की कोशाओं को भी नष्ट करने लगता है ,इम्म्युंन सिस्टम को भी कमज़ोर कर देता है .यही वजह है तनाव की वजह दूर हो जाने पर भी आप घंटों अपनों पर गुर्राते रहतें हैं .बेशाख्ता झुंझलाते रहतें हैं ।
एक हर्पीज़ वायरस का अनुकूलन कर ,इस विषाणु को इस प्रकार ढाला गया है ,यह न्यूरो -प्रोटेक्टिव जींस को ब्रेन में वांछित गहराई पर ले जाता है .जहां पहुंचकर यह रोग -हारमोन को उदासीन बना देता है .बस दिमाग को होने वाली नुकसानी टल जाती है .दिमाग शांत प्रशांत हो जाता है .शमित हो जाता है तनाव .विषाक्त प्रभाव हारमोन का .चूहों पर इस इन्जीनीयर्ड विषाणु ने गज़ब का काम किया है .यही है तनाव रोधी टीके का सार .
दस सूत्री खुराख जो बनाए छरहरी कामिनी आपको
इसे कहा जाता है "दी विवा मेर डाईट"
आपके शरीर में से तमाम तरह के विष को निकाल बाहर करेगी यह खुराख योजना .कुल मिलाकर आपकी सेहत आपकी देह यष्टि की नव्ज़ जुडी है पाचन से .पोषक तत्वों को सुग्राहीय बनाने के लिए शरीर द्वारा बेहतर ज़ज्बी के लिए ही है यह डाईट ।
पहला सूत्र :मुख से ही शुरू हो जाती है पाचन की क्रिया .खाना अच्छी तरह चबा चबाकर ( ३०-४० बार ) ही खाइएगा .आधा पाचन यहीं संपन्न हो जाता है .पाचन तंत्र को भी इसी अनुपात में आराम मिल जाता है .दिमाग को भी अच्छा संकेत जाता है .इधर पेट भरा उधर तृप्त हुआ दिलो -दिमाग .मन भर के खाया सो अलग ।
दूसरा सूत्र :खाने के बीच में पानी नहीं पीना है .ऐसा करने से पाचक रस (दाइजेस्तिव एंजाइम्स ,किण्वक )तनुकृत होकर अपना असर कम कर लेतें हैं .अलबत्ता हर्बल टी या फिर वाइन (रेड वाइन या फिर वाईट वाइन कोई भी) आपके लिए ज़रूरी है पीना तो ले सकतें हैं खाने के साथ ,लेकिन पानी नहीं .वाइन भी खाद्य पदार्थों की तरह सरलीकृत रूपों में टूटती है .यह लार को तनुकृत (दाय्ल्युत )नहीं करती है .अलबत्ता मेजर मिल्स के बीच में दिन भर में आपको ३ लीटरतक तो पानी पीना ही चाहिए ।
तीसरा सूत्र :सेहत का मंगल सूत्र है पोषक होलसम ब्रेकफास्ट .लाईट सुपाच्य डिनर .हमारा पाचन तंत्र सुबह ज्यादा सुचारू ढंग से काम करता है .रात भर इसे आराम मिला है .रिजेंरेट करने का मौक़ा मिला है अपनी कूवत को .इस समय आप डिफिकल्ट टू डाइजेस्ट फूड्स भी ले सकतें हैं .दिमागी कोशायें ऊर्जा मांग रहीं हैं रात भर के उपवास के बाद .जैसे जैसे दिन चढ़ता है,पाचन तंत्र उतना सक्षम भी नहीं रह जाता है .शाम होते होते इसकी क्षमता न्यूनतम हो जाती है इसीलिए रात का खाना हल्का ही भला .अपने शरीर की लयताल के साथ ही खाइए ,उसके अनुरूप और उतना ही खाइए . शरीर सब बताता है .हम ही अनदेखी कर जातें हैं ।
चौथा सूत्र :बाद दोपहर चार बजे (आफ्टर ४ ओ -क्लोक ).रा फ़ूड फ़र्मेंट होने लगता है चार बजे के बाद .नतीजा होता है .डकार ,अपच ,ब्लोटिंग एंड इन -डायजेशन ।
पांचवां सूत्र :शाम के ६ बजे के बाद ज़रूरी होने पर हल्का नाश्ता ही करें .ज़ाहिर है डिनर अब तक कर लें .देर से खाया गया भोजन पाचन तंत्र पर भारी पड़ता है .सुबह सवेरे नाश्ते (ब्रेकफास्ट ) के वक्त भूख भी खुलकर और अच्छी लगेगी मन पसंद खाने के लिए .
छटा सूत्र :दवाब में होने पर मत खाइए .स्ट्रेस में होने पर मन फाईट और फ्लाईट (भाग खड़े होवो या मुकाबला करो) की उधेड़ बुन में है .तमाम ऊर्जा इस वक्त दिमाग और पेशियों की और रूख किये है .पाचन तो एक तरह से इस वक्त निलंबित ही हो जाता है ।
सातवाँ सूत्र :नियमित व्यायाम ज़रूरी है .केलोरीज़ को रोज़ खर्चना ज़रूरी है .वरना चर्बी रोज़ चढ़ेगी ही .तेज़ कदमी रोजाना की काफी है .सप्ताह अंत में दौड़ना दस मील भी बेकार जाएगा ।
आठवां सूत्र :एल्केलाइन और एसिडिक प्रकृति के भोजन में एक संतुलन रखिये रोजाना .कमतर बासा ,तुरता जंक फ़ूड ,ज्यादा से ज्यादा तरकारियाँ ,नट्स और फ्रूट्स लीजिये .।
जंक ही बनता है अम्ल शूल (एसिडिटी की वजह ),अफारा ,डकार ,अपच .बुढापे की वजह भी यही कबाड़िया भोजन है .छरहरी ,कामिनी ,दिखें ताकि कोई दिनकर कहे -"सत्य ही रहता नहीं यह ध्यान ,तुम ,कविता ,कुसुम या कामिनी हो ?"एसिड -एल्केलाइन बेलेंस "कुंजी है ।
नौवां सूत्र :अपने पाचन तंत्र की अनदेखी मत कीजिये .संकेत देता है आपका पाचन तंत्र ,तृप्त होने की ।
दसवां सूत्र :गहरे रंगों के फल और तरकारियाँ (चुकंदर ,बेल -पेपर्स .लाल -पीले -नारंगी -हरे शिमला मिर्च ,ब्रोकली ,बेंगन,बादाम ,अखरोट ,बेरीज ,चैरीज़ ,शेह्तूत ,फालसा ,जामुन ,काले अंगूर ....).ज्यादा खाइए .एंटी -ओक्सिदेंट्स से भर -पूर हैं यह फल तरकारियाँ और मेवे .कैंसर ,हृद रोगों और बुढ़ाने की ख़ास वजह यही रोग -मोलिक्युल्स ,फ्री -रेडिकल्स ही बनतें हैं .
सन्दर्भ -सामिग्री :-डेली मिरर /यु /फ़ूड फेक्ट्स /मुंबई मिरर /पृष्ठ २६ ,ऑगस्ट १ ,२०१० )/ईट अवे टू वेट लोस ,फोलो दिस ईजी ,१० -स्टेप डाईट प्लान टू ट्रिम यूओर वैस्ट्लाइन विद -आउट सेइंग 'नो 'टू यूओर फेवरेट फूड्स .
आपके शरीर में से तमाम तरह के विष को निकाल बाहर करेगी यह खुराख योजना .कुल मिलाकर आपकी सेहत आपकी देह यष्टि की नव्ज़ जुडी है पाचन से .पोषक तत्वों को सुग्राहीय बनाने के लिए शरीर द्वारा बेहतर ज़ज्बी के लिए ही है यह डाईट ।
पहला सूत्र :मुख से ही शुरू हो जाती है पाचन की क्रिया .खाना अच्छी तरह चबा चबाकर ( ३०-४० बार ) ही खाइएगा .आधा पाचन यहीं संपन्न हो जाता है .पाचन तंत्र को भी इसी अनुपात में आराम मिल जाता है .दिमाग को भी अच्छा संकेत जाता है .इधर पेट भरा उधर तृप्त हुआ दिलो -दिमाग .मन भर के खाया सो अलग ।
दूसरा सूत्र :खाने के बीच में पानी नहीं पीना है .ऐसा करने से पाचक रस (दाइजेस्तिव एंजाइम्स ,किण्वक )तनुकृत होकर अपना असर कम कर लेतें हैं .अलबत्ता हर्बल टी या फिर वाइन (रेड वाइन या फिर वाईट वाइन कोई भी) आपके लिए ज़रूरी है पीना तो ले सकतें हैं खाने के साथ ,लेकिन पानी नहीं .वाइन भी खाद्य पदार्थों की तरह सरलीकृत रूपों में टूटती है .यह लार को तनुकृत (दाय्ल्युत )नहीं करती है .अलबत्ता मेजर मिल्स के बीच में दिन भर में आपको ३ लीटरतक तो पानी पीना ही चाहिए ।
तीसरा सूत्र :सेहत का मंगल सूत्र है पोषक होलसम ब्रेकफास्ट .लाईट सुपाच्य डिनर .हमारा पाचन तंत्र सुबह ज्यादा सुचारू ढंग से काम करता है .रात भर इसे आराम मिला है .रिजेंरेट करने का मौक़ा मिला है अपनी कूवत को .इस समय आप डिफिकल्ट टू डाइजेस्ट फूड्स भी ले सकतें हैं .दिमागी कोशायें ऊर्जा मांग रहीं हैं रात भर के उपवास के बाद .जैसे जैसे दिन चढ़ता है,पाचन तंत्र उतना सक्षम भी नहीं रह जाता है .शाम होते होते इसकी क्षमता न्यूनतम हो जाती है इसीलिए रात का खाना हल्का ही भला .अपने शरीर की लयताल के साथ ही खाइए ,उसके अनुरूप और उतना ही खाइए . शरीर सब बताता है .हम ही अनदेखी कर जातें हैं ।
चौथा सूत्र :बाद दोपहर चार बजे (आफ्टर ४ ओ -क्लोक ).रा फ़ूड फ़र्मेंट होने लगता है चार बजे के बाद .नतीजा होता है .डकार ,अपच ,ब्लोटिंग एंड इन -डायजेशन ।
पांचवां सूत्र :शाम के ६ बजे के बाद ज़रूरी होने पर हल्का नाश्ता ही करें .ज़ाहिर है डिनर अब तक कर लें .देर से खाया गया भोजन पाचन तंत्र पर भारी पड़ता है .सुबह सवेरे नाश्ते (ब्रेकफास्ट ) के वक्त भूख भी खुलकर और अच्छी लगेगी मन पसंद खाने के लिए .
छटा सूत्र :दवाब में होने पर मत खाइए .स्ट्रेस में होने पर मन फाईट और फ्लाईट (भाग खड़े होवो या मुकाबला करो) की उधेड़ बुन में है .तमाम ऊर्जा इस वक्त दिमाग और पेशियों की और रूख किये है .पाचन तो एक तरह से इस वक्त निलंबित ही हो जाता है ।
सातवाँ सूत्र :नियमित व्यायाम ज़रूरी है .केलोरीज़ को रोज़ खर्चना ज़रूरी है .वरना चर्बी रोज़ चढ़ेगी ही .तेज़ कदमी रोजाना की काफी है .सप्ताह अंत में दौड़ना दस मील भी बेकार जाएगा ।
आठवां सूत्र :एल्केलाइन और एसिडिक प्रकृति के भोजन में एक संतुलन रखिये रोजाना .कमतर बासा ,तुरता जंक फ़ूड ,ज्यादा से ज्यादा तरकारियाँ ,नट्स और फ्रूट्स लीजिये .।
जंक ही बनता है अम्ल शूल (एसिडिटी की वजह ),अफारा ,डकार ,अपच .बुढापे की वजह भी यही कबाड़िया भोजन है .छरहरी ,कामिनी ,दिखें ताकि कोई दिनकर कहे -"सत्य ही रहता नहीं यह ध्यान ,तुम ,कविता ,कुसुम या कामिनी हो ?"एसिड -एल्केलाइन बेलेंस "कुंजी है ।
नौवां सूत्र :अपने पाचन तंत्र की अनदेखी मत कीजिये .संकेत देता है आपका पाचन तंत्र ,तृप्त होने की ।
दसवां सूत्र :गहरे रंगों के फल और तरकारियाँ (चुकंदर ,बेल -पेपर्स .लाल -पीले -नारंगी -हरे शिमला मिर्च ,ब्रोकली ,बेंगन,बादाम ,अखरोट ,बेरीज ,चैरीज़ ,शेह्तूत ,फालसा ,जामुन ,काले अंगूर ....).ज्यादा खाइए .एंटी -ओक्सिदेंट्स से भर -पूर हैं यह फल तरकारियाँ और मेवे .कैंसर ,हृद रोगों और बुढ़ाने की ख़ास वजह यही रोग -मोलिक्युल्स ,फ्री -रेडिकल्स ही बनतें हैं .
सन्दर्भ -सामिग्री :-डेली मिरर /यु /फ़ूड फेक्ट्स /मुंबई मिरर /पृष्ठ २६ ,ऑगस्ट १ ,२०१० )/ईट अवे टू वेट लोस ,फोलो दिस ईजी ,१० -स्टेप डाईट प्लान टू ट्रिम यूओर वैस्ट्लाइन विद -आउट सेइंग 'नो 'टू यूओर फेवरेट फूड्स .
रविवार, 1 अगस्त 2010
क्या है "कैंगरू कोर्ट "?
अपनी पिछली मज़बूत टांगों के बल पर एक औस्ट्रेलिया जानवर उछल उछल कर चलता है यही केंग्रू या कंगारू कहलाता है .इसके आगे के पैर छोटे होतें हैं ,एक पूंछ होती है .यह अपने बच्चे को पेट पर लगी एक थैली में रखता है .न्यू गिनी फेमिली "मेक्रो -पोदिडाए" परिवार का सदस्य है यह प्राणी .अलबत्ता औस्त्रेलिआइ रग्बी ,किर्केट टीम के खिलाड़ी को भी केंग्रू ,केंग्रूज़ कह दिया जाता है .ऑस्ट्रेलियाई कम्पनी के शेयर्स को भी केंग्रूज़ ऑस्ट्रेलियाई शेयर्स कह दिया जाता है ।
केंग्रू -कोर्ट्स क्या हैं ?
यह एक गैर वैधानिक समानांतर ,नाजायज़ ,जोर ज़बर्ज़ास्ती की कथित अदालत है जो ना सिर्फ वैयक्तिक स्वतंत्रता का हनन करती है ,बेहूदा कल्चर पुलिसिंग का भी काम करती है .हरयाना की खाप पंचायतें अकसर अपने क्रूर कारनामों के लिए चर्चा में रहतीं हैं .मुख्य -मंत्री नाम का प्राणी इनका पानी भरते देखा जा सकता है .भारतीय प्रजा तंत्र में ऐसा होना ,होते रहना अब सरे आम हो चला है ।पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुज़फ्फर नगर जिला भी इस हिन्दू फतवे की चपेट में है .
इट इज एन अन -ऑफिशियल ऑर मोक कोर्ट सेट अप स्पोंटेनिअस्ली फॉर दी परपज ऑफ़ डिलीवरिंग ए जजमेंट अराइव्ड एट इन एडवांस ,युज्युअली वन इन व्हिच ए दिस्लोयल कोहोर्ट्स फेट इज दिसाईडिड।
एन अन-ऑफिशियल कोर्ट देट पनिशिज़ पीपल अन -फैयार्ली इज काल्ड ए कांगरू कोर्ट ।
यूं इसे" ड्रम -हेड -कोर्ट मार्शल" भी समझा, कहा, गया है .स्वार्थ साधकहै , न्याय का ,न्याय की सामान्य प्रक्रिया का गला घोटती है केंग्रू कोर्ट .
दी टर्म केंग्रू कोर्ट मे हेव बीन पोपुलराइज़्द ड्यूरिंग दी केलिफोर्निया गोल्ड रश ऑफ़ १८४९ ।
हालाकि पहले पहल टेक्सास के सन्दर्भ में इसका(इस फ्रेज़ का,शब्द समुच्चय ,वाक्यांश ,शब्द पद का ) स्तेमाल किया गया .१८५३ में किया गयापहली मर्तबा ।
यह अमरीकी शब्द प्रयोग है .जिसका मतलब है -तुरता न्याय ,जस्टिस प्रोसीडिंग "बाई लीप्स ",जैसे कंगारू की चाल ।
केंग्रू - ट्रायल्स :जोसेफ स्तालिंस के दमन कारी केंग्रू ट्रायल्स सुविख्यात हैं जिनका स्तेमाल स्टालिन ने अपने दुश्मनों के खिलाफ ज़म कर किया .आम आदमी की दुहाई देकर आधुनिक भारतीय नेताओं की तरह अपने विरोधियों को सताया गया ,केंग्रू ट्रायल्स के दौरान .और इसे महान शुद्धि की संज्ञा दी गई ।
इन २००८ सिंगापुर्स एटोर्नी जनरल एप्लाइड टू दी हाई -कोर्ट टू कमेन्स कंटेम्प्ट प्रोसीडिंग्स अगेंस्ट थ्री इन्दिविज़्युअल्स हू एपीअर्द इन दी न्यू सुप्रीम कोर्ट बिल्डिंग वीयारिंग आइडेंटिकल वाईट टी -शर्ट्स बीअरिंग ए पाल्म साइज्ड पिक्चर ऑफ़ ए केंग्रू ड्रेस्ड इन ए जज्स गाउन .कचहरी की अवमानना का यह अपने ही तरह का मामला था ।
ड्रम -हेड कोर्ट मार्शल क्या है ?
इट इज ए कोर्ट मार्शल इन दी फील्ड टू हेअर अर्जेंट चार्ज़िज़ ऑफ़ ओफेंसिज़ कमितिद इन एक्सन .युद्ध क्षेत्र में की गई अनियमितताओं की तुरन्त सजा दी जाती थी इनके तहत ।
खेल कूदों में भी "केंग्रू -कोर्ट्स "शब्द प्रयोग चलन में हैं लेकिन सकारात्मक अर्थों में केंग्रू कोर्ट वाक्यांश का स्तेमाल स्पोर्ट्स की दुनिया में किया जाता रहा है ,ना की नकारात्मक अर्थों में ।
मेजर लीग बेस बाल टीमें इस शब्द पद का जम कर स्तेमाल करतीं हैं .खेल के मैदान में गलती करने वालों ,प्रेक्टिस से गैर हाज़िर रहने वालों के खिलाफ जुर्माना ठोकतीं हैं केंग्रू कोर्ट्स .अकसर यह राशि या तो चैरिटी में चली जाती है या फिर खिलाड़ियों को पार्टी देने में ।
लिंचिंग भी केंग्रू कोर्ट्स करतीं रहीं हैं .भारत में भीड़ तंत्र यह सरे आम जब चाहें कर देता है खाप पंचायतों के नाम पर .बदजात जात ह्त्या के नाम पर (कैसी ऑनर किलिंग ,यह तो सरासर डिस -ऑनर किलिंग है ,जात पात के नाम पर ह्त्या है .प्रेम के खिलाफ दमनात्मक क्रूर कारवाई है ।).
अमरीका में १८६० -१८९० के दरमियान ५००० से ज्यादा अफ़्रीकी अमरीकियों को (क्षमा करें कालों को )जिब्ह किया गया .नस्ल भेद के ,गोरों की सर्व श्रेष्ठता के नाम पर .मेरी लैंड विश्व -विद्यालय की एक प्रोफ़ेसर शेर्रिल्यं ए .इफिल्ल अपनी किताब में खुल कर इस बाबत चर्चा करतीं हैं .ज़रुरत केंग्रू कोर्ट्स को जड़ मूल से नष्ट करने की है .आखिर जनता तमाशबीन कब तक बनी रहेगी .सरकारें तो क़ानून लागू करवाना भूल चुकीं हैं .जैसे बिल्ली को ख़्वाब में भी छिछड़े(छीछड़े) नजर आतें हैं वैसे ही आज के नेता को वोट नजर आता है .वोट और सिर्फ वोट .प्रजातंत्र खेल है वोट का .सिरों की गिनती का .किस काम का ऐसा प्रजा -तंत्र ,जहां तंत्र प्रजा- निरपेक्ष है .
केंग्रू -कोर्ट्स क्या हैं ?
यह एक गैर वैधानिक समानांतर ,नाजायज़ ,जोर ज़बर्ज़ास्ती की कथित अदालत है जो ना सिर्फ वैयक्तिक स्वतंत्रता का हनन करती है ,बेहूदा कल्चर पुलिसिंग का भी काम करती है .हरयाना की खाप पंचायतें अकसर अपने क्रूर कारनामों के लिए चर्चा में रहतीं हैं .मुख्य -मंत्री नाम का प्राणी इनका पानी भरते देखा जा सकता है .भारतीय प्रजा तंत्र में ऐसा होना ,होते रहना अब सरे आम हो चला है ।पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुज़फ्फर नगर जिला भी इस हिन्दू फतवे की चपेट में है .
इट इज एन अन -ऑफिशियल ऑर मोक कोर्ट सेट अप स्पोंटेनिअस्ली फॉर दी परपज ऑफ़ डिलीवरिंग ए जजमेंट अराइव्ड एट इन एडवांस ,युज्युअली वन इन व्हिच ए दिस्लोयल कोहोर्ट्स फेट इज दिसाईडिड।
एन अन-ऑफिशियल कोर्ट देट पनिशिज़ पीपल अन -फैयार्ली इज काल्ड ए कांगरू कोर्ट ।
यूं इसे" ड्रम -हेड -कोर्ट मार्शल" भी समझा, कहा, गया है .स्वार्थ साधकहै , न्याय का ,न्याय की सामान्य प्रक्रिया का गला घोटती है केंग्रू कोर्ट .
दी टर्म केंग्रू कोर्ट मे हेव बीन पोपुलराइज़्द ड्यूरिंग दी केलिफोर्निया गोल्ड रश ऑफ़ १८४९ ।
हालाकि पहले पहल टेक्सास के सन्दर्भ में इसका(इस फ्रेज़ का,शब्द समुच्चय ,वाक्यांश ,शब्द पद का ) स्तेमाल किया गया .१८५३ में किया गयापहली मर्तबा ।
यह अमरीकी शब्द प्रयोग है .जिसका मतलब है -तुरता न्याय ,जस्टिस प्रोसीडिंग "बाई लीप्स ",जैसे कंगारू की चाल ।
केंग्रू - ट्रायल्स :जोसेफ स्तालिंस के दमन कारी केंग्रू ट्रायल्स सुविख्यात हैं जिनका स्तेमाल स्टालिन ने अपने दुश्मनों के खिलाफ ज़म कर किया .आम आदमी की दुहाई देकर आधुनिक भारतीय नेताओं की तरह अपने विरोधियों को सताया गया ,केंग्रू ट्रायल्स के दौरान .और इसे महान शुद्धि की संज्ञा दी गई ।
इन २००८ सिंगापुर्स एटोर्नी जनरल एप्लाइड टू दी हाई -कोर्ट टू कमेन्स कंटेम्प्ट प्रोसीडिंग्स अगेंस्ट थ्री इन्दिविज़्युअल्स हू एपीअर्द इन दी न्यू सुप्रीम कोर्ट बिल्डिंग वीयारिंग आइडेंटिकल वाईट टी -शर्ट्स बीअरिंग ए पाल्म साइज्ड पिक्चर ऑफ़ ए केंग्रू ड्रेस्ड इन ए जज्स गाउन .कचहरी की अवमानना का यह अपने ही तरह का मामला था ।
ड्रम -हेड कोर्ट मार्शल क्या है ?
इट इज ए कोर्ट मार्शल इन दी फील्ड टू हेअर अर्जेंट चार्ज़िज़ ऑफ़ ओफेंसिज़ कमितिद इन एक्सन .युद्ध क्षेत्र में की गई अनियमितताओं की तुरन्त सजा दी जाती थी इनके तहत ।
खेल कूदों में भी "केंग्रू -कोर्ट्स "शब्द प्रयोग चलन में हैं लेकिन सकारात्मक अर्थों में केंग्रू कोर्ट वाक्यांश का स्तेमाल स्पोर्ट्स की दुनिया में किया जाता रहा है ,ना की नकारात्मक अर्थों में ।
मेजर लीग बेस बाल टीमें इस शब्द पद का जम कर स्तेमाल करतीं हैं .खेल के मैदान में गलती करने वालों ,प्रेक्टिस से गैर हाज़िर रहने वालों के खिलाफ जुर्माना ठोकतीं हैं केंग्रू कोर्ट्स .अकसर यह राशि या तो चैरिटी में चली जाती है या फिर खिलाड़ियों को पार्टी देने में ।
लिंचिंग भी केंग्रू कोर्ट्स करतीं रहीं हैं .भारत में भीड़ तंत्र यह सरे आम जब चाहें कर देता है खाप पंचायतों के नाम पर .बदजात जात ह्त्या के नाम पर (कैसी ऑनर किलिंग ,यह तो सरासर डिस -ऑनर किलिंग है ,जात पात के नाम पर ह्त्या है .प्रेम के खिलाफ दमनात्मक क्रूर कारवाई है ।).
अमरीका में १८६० -१८९० के दरमियान ५००० से ज्यादा अफ़्रीकी अमरीकियों को (क्षमा करें कालों को )जिब्ह किया गया .नस्ल भेद के ,गोरों की सर्व श्रेष्ठता के नाम पर .मेरी लैंड विश्व -विद्यालय की एक प्रोफ़ेसर शेर्रिल्यं ए .इफिल्ल अपनी किताब में खुल कर इस बाबत चर्चा करतीं हैं .ज़रुरत केंग्रू कोर्ट्स को जड़ मूल से नष्ट करने की है .आखिर जनता तमाशबीन कब तक बनी रहेगी .सरकारें तो क़ानून लागू करवाना भूल चुकीं हैं .जैसे बिल्ली को ख़्वाब में भी छिछड़े(छीछड़े) नजर आतें हैं वैसे ही आज के नेता को वोट नजर आता है .वोट और सिर्फ वोट .प्रजातंत्र खेल है वोट का .सिरों की गिनती का .किस काम का ऐसा प्रजा -तंत्र ,जहां तंत्र प्रजा- निरपेक्ष है .
कैसे रंग बदल लेता है गिरगिट ?
दरअसल गिरगिट की चमड़ी की बाहरी के ठीक नीचे की परतों में कुछ रंजक (पिगमेंट युक्त )कोशायें होती हैं .इन्हें "क्रोमा -टो-फ़ोर्स "कहा जाता है .क्रोमा शब्द का अर्थ रंग होता है .क्रोमा -टो -फॉर इज ए पिगमेंट कान्टेनिंग सेल इन मेनी एनिमल्स .व्हेन इट एक्स्पेंड्स ऑर कोंत्रेक्ट्स ,काज़िज़ ए चेंज इन दी एनिमल्स स्किन कलरिंग .ओक्तोपस ,स्क्विड ,सम फ्रोग्स एंड लिजार्ड्स कन्टेन दीज़ सेल्स ।"
गिरगिट की चमड़ी की इन ख़ास कोशाओं की सबसे ऊपरी परत लाल और पीत(पीला )वर्ण लिए रहती है .जबकि निचली परत" इरी-डॉ -फॉर" नीला ,सफ़ेद रंजक लिए रहती है ।
ज्यादातर गिरगिट लाल ,कथ्थई (ब्राउन ),और ग्रे रंगों की नुमाइश लगातें हैं .इन्हीं रंगों का प्रदर्शन करतें हैं .अलबत्ता हरेक प्रजाति एक कलर रेंज के भीतर ही रंगों का प्रदर्शन करती है .सभी रंग सभी प्रजातियों के पास कभी नहीं होतें हैं ।
सवाल असल यह है गिरगिट रंग कब बदलता है ?किसके आदेश से बदलता है ?
गिरगिट का दिमाग इन कोशाओं को संकेत भेजता है ,ख़तरा भांप कर ,कोशायें इसी के अनुरूप फैलने सिकुड़ने लगतीं हैं .बस एक मिश्र ,रंगों का एक संयोजन नए रंगों की सृष्टि करता है .रंगीन दाने रंजक के तो पहले से ही कोशायें लिए थीं .रंजकों के मेल से नए रंग बनातें हैं किसी रंगरेज़ की तरह गिरगिट ,लेकिन ऐसा ये अपनी जान बचाने के लिए ,किसी आवश्यकता की पूर्ती के लिए ही करतें हैं ,नेताओं की तरह आदतन या खानदानी वजहों से नहीं .
गिरगिट की चमड़ी की इन ख़ास कोशाओं की सबसे ऊपरी परत लाल और पीत(पीला )वर्ण लिए रहती है .जबकि निचली परत" इरी-डॉ -फॉर" नीला ,सफ़ेद रंजक लिए रहती है ।
ज्यादातर गिरगिट लाल ,कथ्थई (ब्राउन ),और ग्रे रंगों की नुमाइश लगातें हैं .इन्हीं रंगों का प्रदर्शन करतें हैं .अलबत्ता हरेक प्रजाति एक कलर रेंज के भीतर ही रंगों का प्रदर्शन करती है .सभी रंग सभी प्रजातियों के पास कभी नहीं होतें हैं ।
सवाल असल यह है गिरगिट रंग कब बदलता है ?किसके आदेश से बदलता है ?
गिरगिट का दिमाग इन कोशाओं को संकेत भेजता है ,ख़तरा भांप कर ,कोशायें इसी के अनुरूप फैलने सिकुड़ने लगतीं हैं .बस एक मिश्र ,रंगों का एक संयोजन नए रंगों की सृष्टि करता है .रंगीन दाने रंजक के तो पहले से ही कोशायें लिए थीं .रंजकों के मेल से नए रंग बनातें हैं किसी रंगरेज़ की तरह गिरगिट ,लेकिन ऐसा ये अपनी जान बचाने के लिए ,किसी आवश्यकता की पूर्ती के लिए ही करतें हैं ,नेताओं की तरह आदतन या खानदानी वजहों से नहीं .
क्याहै क्वर्टी टमी?
पहले क्वर्टी शब्द के अर्थ को समझ लें .इस शब्द का स्तेमाल एक टाइप राइटर या फिर कंप्यूटर की -बोर्ड के लिए भी आजकल किया जाता है .इसमें रोमन वर्ण -माला (अल्फाबेट्स )के मुताबिक़ सबसे ऊपर की वर्णमाला पंक्ती में क्यू डब्ल्यू ई आर टी ,वाई आदिलेटर्स का स्तेमाल किया जाता है ।
एज़र्ती :ए जेड ई आर टी वाई क्या है ?यह भी एक टाइप राइटर या कंप्यूटर की -बोर्ड ही है जिसका स्तेमाल कांटिनेंटल योरोप में किया जाता है .इसमें भी बाएं से शुरू कर लेटर्स ए जेड ई आर टी वाई आदि शामिल होतें हैं ।
असल मुद्दा यह है हमारी अपनी ला -परवाही से ये की -बोर्ड्स बे तरह गंदे रहतें हैं .यकीन मानिए आपकी टोइलेट सीट से ज्यादा बेक-टीरिया को ये पनाह दिए रहतें हैं ।
ऐसे में कंप्यूटर पर काम करते हुए कई मर्तबा कुछ लोग अपनी ऊंगली अपने अनजाने ही मुख में ले आतें हैं .कुछ को थूक लगाकर पन्ना (पृष्ठ) पलटने की आदत होती है .नतीजा होता है "बैड तमि"स्टमक अपसेट ।फ़ूड पोइजनिंग .
एक अध्धय्यन के मुताबिक़ की -बोर्ड्स पर आपकी टोइलेट सीट से पांच गुना ज्यादा जीवाणु पसरा होता है .एक्क्युट फ़ूड पोइजनिंग की वजह बन रहें हैं यही जीवाणु लदे की -बोर्ड्स ।
होता यह है आपकी कंप्यूटर से हुकिंग इस तरह हो जाती है आप खाने -पीने की ज़हमत भी डाइनिंग तक जाकर नहीं उठातें हैं .कंप्यूटर डेस्क ही डाइनिंग बन जाती है .ऐसे में जूठन के टुकड़े ,ब्रेड, बिस्किट के क्रम्बस की -बोर्ड से चस्पां हो रहतें हैं ।
यही क्रम्बस माइस(चूहों )को आमंत्रित करतें हैं की बोर्ड्स तक .कई महानुभाव वाश रूम्स से बिना हस्त -प्रक्षालन (बिना हाथ धोये )लौट आतें हैं ।
"प्रिफिक्स्द क्वार्टी आफ्टर दी की बोर्ड ,दिस इलनेस इज नाव फाउंड टू बी वाइडस्प्रेड .
पहले क्वर्टी शब्द के अर्थ को समझ लें .इस शब्द का स्तेमाल एक टाइप राइटर या फिर कंप्यूटर की -बोर्ड के लिए भी आजकल किया जाता है .इसमें रोमन वर्ण -माला (अल्फाबेट्स )के मुताबिक़ सबसे ऊपर की वर्णमाला पंक्ती में क्यू डब्ल्यू ई आर टी ,वाई आदिलेटर्स का स्तेमाल किया जाता है ।
एज़र्ती :ए जेड ई आर टी वाई क्या है ?यह भी एक टाइप राइटर या कंप्यूटर की -बोर्ड ही है जिसका स्तेमाल कांटिनेंटल योरोप में किया जाता है .इसमें भी बाएं से शुरू कर लेटर्स ए जेड ई आर टी वाई आदि शामिल होतें हैं ।
असल मुद्दा यह है हमारी अपनी ला -परवाही से ये की -बोर्ड्स बे तरह गंदे रहतें हैं .यकीन मानिए आपकी टोइलेट सीट से ज्यादा बेक-टीरिया को ये पनाह दिए रहतें हैं ।
ऐसे में कंप्यूटर पर काम करते हुए कई मर्तबा कुछ लोग अपनी ऊंगली अपने अनजाने ही मुख में ले आतें हैं .कुछ को थूक लगाकर पन्ना (पृष्ठ) पलटने की आदत होती है .नतीजा होता है "बैड तमि"स्टमक अपसेट ।फ़ूड पोइजनिंग .
एक अध्धय्यन के मुताबिक़ की -बोर्ड्स पर आपकी टोइलेट सीट से पांच गुना ज्यादा जीवाणु पसरा होता है .एक्क्युट फ़ूड पोइजनिंग की वजह बन रहें हैं यही जीवाणु लदे की -बोर्ड्स ।
होता यह है आपकी कंप्यूटर से हुकिंग इस तरह हो जाती है आप खाने -पीने की ज़हमत भी डाइनिंग तक जाकर नहीं उठातें हैं .कंप्यूटर डेस्क ही डाइनिंग बन जाती है .ऐसे में जूठन के टुकड़े ,ब्रेड, बिस्किट के क्रम्बस की -बोर्ड से चस्पां हो रहतें हैं ।
यही क्रम्बस माइस(चूहों )को आमंत्रित करतें हैं की बोर्ड्स तक .कई महानुभाव वाश रूम्स से बिना हस्त -प्रक्षालन (बिना हाथ धोये )लौट आतें हैं ।
"प्रिफिक्स्द क्वार्टी आफ्टर दी की बोर्ड ,दिस इलनेस इज नाव फाउंड टू बी वाइडस्प्रेड .
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