"कलीनिंग हाउस टाइड तू मोर सेक्स (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल ३ ,२०१० )"
जो दम्पति घर की साफ़ सफाई में अभिरुचि रखतें हैं उनकी सेक्स लाइफ (लव मेकिंग ) भी बेहतर रहती है .यही कहना है डॉक्टर कांस्तांस गगेर का .आप अमरीका की मोंत्क्लैर यूनिवर्सिटी से ताल्लुक रखतें हैं .कारण जब मर्द घरेलू काम काज में हाथ बटाता है ,तब औरत को उसी अनुपात में थोड़ी राहत मिल जाती है ,थोड़ी ऊर्जा भी बची रहती है "सेक्स "के लिए .(जी हाँ बेडो- मीटर से सेक्स एपिसोड में खर्च हुई ऊर्जा का जायजा भी लिया जा सकता है ।).ऐसे में स्वाभाविक तौर पर उनकी अभिरुचि सेक्स में भी हो सकती है ।
यह बात औरत और मर्द दोनों के लिए सही है ."फलसफा है ,साथी हाथ बढ़ाना ,साथी रे ,एक अकेला थक जाए तो मिलकर बोझ उठाना "इसीलियें ना कहा गया है ,औरत और मर्द गृहस्थी के दो पाए हैं ।"
ज्यादा फुर्सत ज्यादा "काम".,दोनों को रहता आराम ।
डॉक्टर गगेर कहतें हैं ,सर्वे से पता चला कूकिंग ,वाशिंग ,लोंद्री करना ,या फिल बिल जमा करवाने जाना ,सभी का काम -संबंधों पर सकारात्मक (सुखात्मक )प्रभाव पड़ता है ।
आप भी आगे आइये ,मिलकर गाइए -साथी हाथ बढ़ाना .......
सन्दर्भ सामग्री :क्लीनिंग हाउस टाइड तू मोर सेक्स (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल ३ ,२०१० )
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
यौन उत्तेजना को ले उड़ सकती है -कोला पेयों की लत .
एक ताज़ा अध्धय्यन से पता चला है ,जो मर्द रोजाना एक लीटर या फिर और भी ज्यादा कोला पेयों यानी कथित "ठंडा "का सेवन करतें हैं उनकी मर्दानगी बेतरह असर ग्रस्त हो जाती है ,स्पर्म -काउंट तकरीबन ३० फीसद कम हो जाता है ।
अध्धय्यन के अगुवा रहे टीना कोल्ड जेन्सेन कहतें हैं ,डेनमार्क के युवा गत चंद दसक से केफीन -बहुल सोफ्ट ड्रिंक्स का अधिकाधिक उपयोग कर रहें हैं .इसीलिए केफीन की प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ताल के लिए यह अध्धय्यन करने की पहल की गई है ।
कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी अस्पताल के रिसर्चर कहतें हैं हो सकता है प्रजनन स्वास्थ्य असर ग्रस्त होने की वजह केफीन ना होकर कोला पेयों में शामिल अन्य तत्व और जीवन शैली में शामिल अन्य चीज़ें हों .क्योंकि जो लोग कोफ़ी ज्यादा पीतें हैं उनमे यह सब देखने को नहीं मिला है हालाकि कोफ़ी में अपेक्षाकृत ज्यादा केफीन रहता है ।
अध्धय्यन में २५०० युवाओं की पड़ताल की गई ,पता चला इनमे से जो कोला का सेवन नहीं कर रहे थे उनका स्पर्म काउंट ५० मिलियन प्रति मिली -लीटर था , हालाकि इनकी जीवन शैली भी दुरुस्त थी ,भ्रष्ट खान पान नहीं था ।
इसके ठीक विपरीत वह ९३ युवा जो रोजाना एक लीटर कोला गटक रहे थे उनका स्पर्म काउंट ३५ मिलियन प्रति मिली -लीटर था .ये लोग हाई -केलोरी फ़ूड (फास्ट फ़ूड )ज्यादा जबकि सब्जी और फ्रूट्स कम ले रहे थे ।
हो सकता है इसके पीछे सिर्फ कोला या फिर सिर्फ फास्ट फ़ूड का हाथ रहा हो .कुसूरवार दोनों भी हो सकतें हैं ।
बेशक विश्व -स्वास्थ्य संगठन की नजर में यह स्पर्म काउंट भी सामान्य हो सकता है ,लेकिन तथ्य यह भी है जिन मर्दों का स्पर्म काउंट आम तौर पर कम पाया जाता है ,उनके बाँझ होने -रहने की जोखिम बढ़ी हुई रहती है ।
सन्दर्भ सामिग्री :कोला टेक्स फिज्ज़ आउट ऑफ़ मेल फर्टिलिटी .(टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल ३ ,२०१० )
अध्धय्यन के अगुवा रहे टीना कोल्ड जेन्सेन कहतें हैं ,डेनमार्क के युवा गत चंद दसक से केफीन -बहुल सोफ्ट ड्रिंक्स का अधिकाधिक उपयोग कर रहें हैं .इसीलिए केफीन की प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ताल के लिए यह अध्धय्यन करने की पहल की गई है ।
कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी अस्पताल के रिसर्चर कहतें हैं हो सकता है प्रजनन स्वास्थ्य असर ग्रस्त होने की वजह केफीन ना होकर कोला पेयों में शामिल अन्य तत्व और जीवन शैली में शामिल अन्य चीज़ें हों .क्योंकि जो लोग कोफ़ी ज्यादा पीतें हैं उनमे यह सब देखने को नहीं मिला है हालाकि कोफ़ी में अपेक्षाकृत ज्यादा केफीन रहता है ।
अध्धय्यन में २५०० युवाओं की पड़ताल की गई ,पता चला इनमे से जो कोला का सेवन नहीं कर रहे थे उनका स्पर्म काउंट ५० मिलियन प्रति मिली -लीटर था , हालाकि इनकी जीवन शैली भी दुरुस्त थी ,भ्रष्ट खान पान नहीं था ।
इसके ठीक विपरीत वह ९३ युवा जो रोजाना एक लीटर कोला गटक रहे थे उनका स्पर्म काउंट ३५ मिलियन प्रति मिली -लीटर था .ये लोग हाई -केलोरी फ़ूड (फास्ट फ़ूड )ज्यादा जबकि सब्जी और फ्रूट्स कम ले रहे थे ।
हो सकता है इसके पीछे सिर्फ कोला या फिर सिर्फ फास्ट फ़ूड का हाथ रहा हो .कुसूरवार दोनों भी हो सकतें हैं ।
बेशक विश्व -स्वास्थ्य संगठन की नजर में यह स्पर्म काउंट भी सामान्य हो सकता है ,लेकिन तथ्य यह भी है जिन मर्दों का स्पर्म काउंट आम तौर पर कम पाया जाता है ,उनके बाँझ होने -रहने की जोखिम बढ़ी हुई रहती है ।
सन्दर्भ सामिग्री :कोला टेक्स फिज्ज़ आउट ऑफ़ मेल फर्टिलिटी .(टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल ३ ,२०१० )
बौद्धिक कोशांक को भी जला डालती है -स्मोकिंग .
तेलअवीव विश्व -विद्यालय के रिसर्चरों ने मार्क वाइज़र के नेत्रित्व में पता लगाया है ,वह युवजन जो धूम्र -पान करतें हैं उनका इंटेलिजेंस कोशेंट अपने नॉन -स्मोकर्स साथियों के बरक्स कम रह सकता है .यानी निकोटिन आपके बौद्धिक -कोशांक का ही पान करने लगती है ,पलीता लगा देती है आपके इंटेलिजेंस कोशेंट को ।
इजरायली फौजियों के १८ -२१ साला आयु वर्ग का दीर्घावधि अध्धय्यन विश्लेषण करने के बाद पता चला है आप कितनी सिगरेट रोजाना फूंक देते है इसका आपके आई .क्यू पर सीधा असर पड़ता है ।
एकनॉन -स्मोकर का औसत आई .क्यू .१०६ आंका गया .,जबकि स्मोकर्स में यह घटकर औसतन ९४ अंक रह गया .यानी ७ अंक निकोटिन ने जला डाले ।
स्मोकर्स में जो युवा रोजाना एक पैकिट सिगरेट धुएं में उड़ा रहे थे उनका आई .क्यू और भी कम ९० पाया गया युव -जनों में जो सेहत मंद हैं और हर तरह के मानसिक रोग से मुक्त हैं यह ८४-११६ अंकों के बीच रहा है ।
लोवर आई क्यू का मतलब स्मोकिंग की लत भी होसकती है .यूँ अध्धय्यन में शामिल ज्यदातर फौजियों का आई क्यू एक औसत रेंज में ही दर्ज़ किया गया है ।
सन्दर्भ सामिग्री :स्मोकिंग केंन सिंज योर आई क्यू (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल ३,२०१० )
इजरायली फौजियों के १८ -२१ साला आयु वर्ग का दीर्घावधि अध्धय्यन विश्लेषण करने के बाद पता चला है आप कितनी सिगरेट रोजाना फूंक देते है इसका आपके आई .क्यू पर सीधा असर पड़ता है ।
एकनॉन -स्मोकर का औसत आई .क्यू .१०६ आंका गया .,जबकि स्मोकर्स में यह घटकर औसतन ९४ अंक रह गया .यानी ७ अंक निकोटिन ने जला डाले ।
स्मोकर्स में जो युवा रोजाना एक पैकिट सिगरेट धुएं में उड़ा रहे थे उनका आई .क्यू और भी कम ९० पाया गया युव -जनों में जो सेहत मंद हैं और हर तरह के मानसिक रोग से मुक्त हैं यह ८४-११६ अंकों के बीच रहा है ।
लोवर आई क्यू का मतलब स्मोकिंग की लत भी होसकती है .यूँ अध्धय्यन में शामिल ज्यदातर फौजियों का आई क्यू एक औसत रेंज में ही दर्ज़ किया गया है ।
सन्दर्भ सामिग्री :स्मोकिंग केंन सिंज योर आई क्यू (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल ३,२०१० )
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
सर्व -खाप पंचायतों से निवेदन .
इतिहास के झरोंखे से देखें ,विदित होगा सर्व -खाप पंचायतों ने ना सिर्फ अपने अपने इलाकों की आतताइयों से हिफाज़त की है ,अपने सामाजिक सरोकारों को भी तरजीह दी है ।
आज के सन्दर्भ में जो सर्व खाप पंचायतें खेती किसानी की ताकत बन किसानों के हितों की हिफाज़त कर सकतीं है .किसी बेसहारा विधवा को भू -माफिया से बचा सकतीं हैं .पद दलित को सरे आम बेईज्ज़त होने से बचा सकतीं हैं गाहे बगाहे इस या उस प्रांत में कितनी ही औरतों को (ज्यादातर बेसहारा विधवाओं को ,वह किसी ज़ाबाज़ फौजी की माँ भी हो सकती है जो देश की सीमाओं पर तैनात है ) डायन घोषित कर दिया जाता है .एच आई वी एड्स ग्रस्त औरत को तिरिश्क्रित होने से बचा सकतीं है जिसे यह सौगात अमूमन अपने पति परमेश्वर से ही मिलती है ।
लेकिन राजनीति पोषित आज की जातीय पंचायते अंतर जातीय ,सजातीय ,सगोत्रीय ,सग्रामीडएक ही गाँव में विवाह जो अक्सर प्रेम विवाह होतें हैं जैसे मुद्दे पर जडवतहोकर रह गईं हैं ।
यह उनकी समाज प्रदत्त ऊर्जा का अपक्षय नहीं तो और क्या है ।
ताज़ा प्रकरण करनाल की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश वाणी गोपाल शर्मा द्वारा सुनाये गए बहु चर्चित दोहरे ह्त्या -काण्ड (बबली -मनोज दम्पति )से तालुक रखता है ।
सगोत्रीय विवाह एक सामाजिक दायरे में अमान्य हो सकता है लेकिन किसी भी कंगारू कोर्ट को सगोत्रीय दम्पतियों की सरे आम निर्मम हत्या करने की छूट नहीं दी जा सकती .विरोध के मान्य तरीके हुक्का पानी बंद करना रहे आये हैं .फिर ह्त्या जैसा खुद -मुख्त्यारी का फैसला क्यों ?
सगोत्रीय विवाह आधुनिक भारत की एक हकीकत है इससे कोई इनकार नहीं कर सकेगा भले ऐसे विवाह उत्तम संततियों के उपयुक्त विज्ञान की निगाह में ना हों .लेकिन प्रेम आदमी तौल कर नहीं करता ।"प्रेम ना बाड़ी उपजे ,प्रेम ना हाट बिकाय ....".
सच यह भी है :जान देना किसी पे लाजिम था ,ज़िन्दगी यूँ बसरनहीं होती ।
और जान लेना सरा - सर जुर्म है .अपने खुद के जायों की आदमी जान ले कैसे लेता है ?
मनो विज्ञानी इसके लिए उस प्रवृत्ति को कुसूरवार ठहरातें हैं जिसका बचपन से ही पोषण -पल्लवन किया जाता है सती मंदिरों को इसी केटेगरी में रखा जाए गा ।
विपथगामी वोट केन्द्रित राजनीति सब कुछ लील गई है .पथ-च्युत जातीय पंचायतें उसी सर्वभक्षी राजनीति की उप -शाखा हैं ।
फिलवक्त मनोज -बबली दम्पति की जांबाज़ माँ को सुरक्षा मुहैया करवाने का आदेश कोर्ट को पारित करना चाहिए माननीय मुख्य मंत्री हरियाणा सरकार न्यायाधीशा वाणी गोपाल शर्मा को भी एन एस जी सुरक्षा मुहैया करवाएं
विपथगामी सर्व -खापी पंचायतें कुछ भी करवा सकतीं हैं .यदि चन्द्र -पति की इस दौर में ह्त्या कर दी गई तो सभी औरतों का आइन्दा के लिए हौसला टूट जाएगा .बेहतर हो :दुश्मनी लाख सही ख़त्म ना कीजे रिश्ते ,दिल मिले या ना मिले हाथ मिलाते रहिये .खाप पंचायतें इस मर्म को समझें .अपने सामाजिक सरोकारों की जानिब लोटें ।
खुदा हाफ़िज़ ।
वीरुभाई .
आज के सन्दर्भ में जो सर्व खाप पंचायतें खेती किसानी की ताकत बन किसानों के हितों की हिफाज़त कर सकतीं है .किसी बेसहारा विधवा को भू -माफिया से बचा सकतीं हैं .पद दलित को सरे आम बेईज्ज़त होने से बचा सकतीं हैं गाहे बगाहे इस या उस प्रांत में कितनी ही औरतों को (ज्यादातर बेसहारा विधवाओं को ,वह किसी ज़ाबाज़ फौजी की माँ भी हो सकती है जो देश की सीमाओं पर तैनात है ) डायन घोषित कर दिया जाता है .एच आई वी एड्स ग्रस्त औरत को तिरिश्क्रित होने से बचा सकतीं है जिसे यह सौगात अमूमन अपने पति परमेश्वर से ही मिलती है ।
लेकिन राजनीति पोषित आज की जातीय पंचायते अंतर जातीय ,सजातीय ,सगोत्रीय ,सग्रामीडएक ही गाँव में विवाह जो अक्सर प्रेम विवाह होतें हैं जैसे मुद्दे पर जडवतहोकर रह गईं हैं ।
यह उनकी समाज प्रदत्त ऊर्जा का अपक्षय नहीं तो और क्या है ।
ताज़ा प्रकरण करनाल की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश वाणी गोपाल शर्मा द्वारा सुनाये गए बहु चर्चित दोहरे ह्त्या -काण्ड (बबली -मनोज दम्पति )से तालुक रखता है ।
सगोत्रीय विवाह एक सामाजिक दायरे में अमान्य हो सकता है लेकिन किसी भी कंगारू कोर्ट को सगोत्रीय दम्पतियों की सरे आम निर्मम हत्या करने की छूट नहीं दी जा सकती .विरोध के मान्य तरीके हुक्का पानी बंद करना रहे आये हैं .फिर ह्त्या जैसा खुद -मुख्त्यारी का फैसला क्यों ?
सगोत्रीय विवाह आधुनिक भारत की एक हकीकत है इससे कोई इनकार नहीं कर सकेगा भले ऐसे विवाह उत्तम संततियों के उपयुक्त विज्ञान की निगाह में ना हों .लेकिन प्रेम आदमी तौल कर नहीं करता ।"प्रेम ना बाड़ी उपजे ,प्रेम ना हाट बिकाय ....".
सच यह भी है :जान देना किसी पे लाजिम था ,ज़िन्दगी यूँ बसरनहीं होती ।
और जान लेना सरा - सर जुर्म है .अपने खुद के जायों की आदमी जान ले कैसे लेता है ?
मनो विज्ञानी इसके लिए उस प्रवृत्ति को कुसूरवार ठहरातें हैं जिसका बचपन से ही पोषण -पल्लवन किया जाता है सती मंदिरों को इसी केटेगरी में रखा जाए गा ।
विपथगामी वोट केन्द्रित राजनीति सब कुछ लील गई है .पथ-च्युत जातीय पंचायतें उसी सर्वभक्षी राजनीति की उप -शाखा हैं ।
फिलवक्त मनोज -बबली दम्पति की जांबाज़ माँ को सुरक्षा मुहैया करवाने का आदेश कोर्ट को पारित करना चाहिए माननीय मुख्य मंत्री हरियाणा सरकार न्यायाधीशा वाणी गोपाल शर्मा को भी एन एस जी सुरक्षा मुहैया करवाएं
विपथगामी सर्व -खापी पंचायतें कुछ भी करवा सकतीं हैं .यदि चन्द्र -पति की इस दौर में ह्त्या कर दी गई तो सभी औरतों का आइन्दा के लिए हौसला टूट जाएगा .बेहतर हो :दुश्मनी लाख सही ख़त्म ना कीजे रिश्ते ,दिल मिले या ना मिले हाथ मिलाते रहिये .खाप पंचायतें इस मर्म को समझें .अपने सामाजिक सरोकारों की जानिब लोटें ।
खुदा हाफ़िज़ ।
वीरुभाई .
सुपर -टास्कर नहीं हैं मैं और आप ....
सुपर -तास्कर्स : जस्ट वन इन फोर्टी केंन ड्राइव वेळ वाईल ऑन फोन (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल २ ,२०१० )।
अक्सर हम अपने को सुपर -टास्कर मान समझ बैठतें हैं ,तभी तो हम हीरा -लाल बनने की असफल कोशिश करते रहतें हैं .हाथ हमारा स्टीअरिंग पर होता है दिमाग फोन काल्स में अटका रहता है .उताह मनो विज्ञानियों ने पता लगाया है बिरले हीहम यह दोनों काम कुशलता पूर्वक कर सकतें हैं .फिर भी यदि आप ऐसा कर रहें हैं तो जोखिम उठा रहें हैं .क्योंकि ४० में से कोई एक बिरला ही इन दोनों कामों को बिना जोखिम अंजाम दे सकता है ।
२०० प्रति -भागियों पर संपन्न इस अध्धय्यन में केवल २.५ प्रतिभागी ही काम याब रहें हैं .इन्हें एक ड्राइविंग सिम्युलेटर ओपरेट करने को कहा गया .साथ ही एक सेल फोन पर बतियाने के लिए कहा गया ।
९७.५ फीसद प्रति भागी सिम्युलेटर पर गलती करते देखे गए .केवल २.५ फीसद से ही कोईउल्लेखनीय चूक नहीं हुई ।
मनोविज्ञानी जसन वाटसन और डेविड स्ट्रेअर के नेत्रित्व में संपन्न इस अध्धययन के नतीजे जौर्नल साइकोनोमिक बुलेटिन एंड रिव्यू में प्रकाशित होने हैं ।
कोगनिटिव थिएरी के मुताबिक़ सुपर -टास्कर का अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए .किसी किसी में ही असाधारण काबलियत (मल्तीटास्किंग की क्षमता ) होती है .फिरभी कितने ही लोग ड्राविंग को सेल फोन के साथ मिक्स करते देखे जातें हैं .हर कोई अपने आप को माहिर समझता है ,मल्ती -टास्कर माने बैठा है .हेंड्स फ्री सेल फोन स्तेमाल करना भी उतना ही खतरनाक है .ये तमाम लोग ब्रेक मारने में २० फीसद ज्यादा वक्त लेतें हैं .सिम्युलेतिद ट्रेफिक के साथ ९७.५ फीसद लोग ताल मेल नहीं रख सके ३० फीसद ज्यादा दूर जाकर रुकी इन की गाडी . ड्राइविंग के दरमियान .,ब्रेक लगाने के बाद भी .यही हैं इस अध्धय्यन के नतीजे .
अक्सर हम अपने को सुपर -टास्कर मान समझ बैठतें हैं ,तभी तो हम हीरा -लाल बनने की असफल कोशिश करते रहतें हैं .हाथ हमारा स्टीअरिंग पर होता है दिमाग फोन काल्स में अटका रहता है .उताह मनो विज्ञानियों ने पता लगाया है बिरले हीहम यह दोनों काम कुशलता पूर्वक कर सकतें हैं .फिर भी यदि आप ऐसा कर रहें हैं तो जोखिम उठा रहें हैं .क्योंकि ४० में से कोई एक बिरला ही इन दोनों कामों को बिना जोखिम अंजाम दे सकता है ।
२०० प्रति -भागियों पर संपन्न इस अध्धय्यन में केवल २.५ प्रतिभागी ही काम याब रहें हैं .इन्हें एक ड्राइविंग सिम्युलेटर ओपरेट करने को कहा गया .साथ ही एक सेल फोन पर बतियाने के लिए कहा गया ।
९७.५ फीसद प्रति भागी सिम्युलेटर पर गलती करते देखे गए .केवल २.५ फीसद से ही कोईउल्लेखनीय चूक नहीं हुई ।
मनोविज्ञानी जसन वाटसन और डेविड स्ट्रेअर के नेत्रित्व में संपन्न इस अध्धययन के नतीजे जौर्नल साइकोनोमिक बुलेटिन एंड रिव्यू में प्रकाशित होने हैं ।
कोगनिटिव थिएरी के मुताबिक़ सुपर -टास्कर का अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए .किसी किसी में ही असाधारण काबलियत (मल्तीटास्किंग की क्षमता ) होती है .फिरभी कितने ही लोग ड्राविंग को सेल फोन के साथ मिक्स करते देखे जातें हैं .हर कोई अपने आप को माहिर समझता है ,मल्ती -टास्कर माने बैठा है .हेंड्स फ्री सेल फोन स्तेमाल करना भी उतना ही खतरनाक है .ये तमाम लोग ब्रेक मारने में २० फीसद ज्यादा वक्त लेतें हैं .सिम्युलेतिद ट्रेफिक के साथ ९७.५ फीसद लोग ताल मेल नहीं रख सके ३० फीसद ज्यादा दूर जाकर रुकी इन की गाडी . ड्राइविंग के दरमियान .,ब्रेक लगाने के बाद भी .यही हैं इस अध्धय्यन के नतीजे .
दिल के लिए भली है चोकलेट्स ....
एक नवीन अध्धय्यन के मुताबिक़ रोजाना बस ६ ग्रेम चोकलेट्स का सेवन हार्ट -अटेक और सेरिब्रल वेस्क्युलर एक्स्सीदेंत (आघात )के खतरों को ४० फीसद तक कम कर सकता है ।
अध्धय्यन के तहत जर्मन रिसर्चरों ने २०००० लोगों की रहनी सहनी (खान पान ,कसरत आदि की आदतों )का ८ साल तक जायजा लिया है .यूरोपीय हार्ट जरनैल में प्रकाशाधीन इस अध्धययन के अनुसार जो लोग औसतन चोकलेट बार का कमसे कम एक स्क्वायर (तकरीबन ६ ग्रेम )रोजाना ले रहे तह उनमे हार्ट -अटेक और आघात का ख़तरा ३९ फीसद घाट गया था ।
पूर्व में डार्क चोकलेट्स के फायदे सामने आयें है लेकिन यह एक दीर्घावधि अध्धययन है .माहिरों के मुताबिक़ चोकलेट्स में मौजूद फ्लेव्नोल ब्लड वेसिल्स की पेशियों को चोडा (वाई -दिन )कर देता है .जिसके कारन ब्लड प्रेसर कम हो जाता है ।
ब्रियन बुइज्स्से (जर्मन इन्स्तित्युत ऑफ़ ह्यूमेन न्यूट्रीशन ,नुठेतल )कहतें हैं ,चीनी और हाई -फेट -स्नेक्स के स्थान पर बेशक थोड़ी सी डार्क चोकलेट लेना फायदे मंद हो सकता है .(लेकिन अध्धयन चोकलेट्स के बेतहाशा स्तेमाल की बात बिलकुल नहीं करता है ।)
सन्दर्भ -सामिग्री :चोकलेट केंन कट स्ट्रोक एंड हार्ट अटेक रिस्क बाई ४० %(टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल १ ,२०१० )
अध्धय्यन के तहत जर्मन रिसर्चरों ने २०००० लोगों की रहनी सहनी (खान पान ,कसरत आदि की आदतों )का ८ साल तक जायजा लिया है .यूरोपीय हार्ट जरनैल में प्रकाशाधीन इस अध्धययन के अनुसार जो लोग औसतन चोकलेट बार का कमसे कम एक स्क्वायर (तकरीबन ६ ग्रेम )रोजाना ले रहे तह उनमे हार्ट -अटेक और आघात का ख़तरा ३९ फीसद घाट गया था ।
पूर्व में डार्क चोकलेट्स के फायदे सामने आयें है लेकिन यह एक दीर्घावधि अध्धययन है .माहिरों के मुताबिक़ चोकलेट्स में मौजूद फ्लेव्नोल ब्लड वेसिल्स की पेशियों को चोडा (वाई -दिन )कर देता है .जिसके कारन ब्लड प्रेसर कम हो जाता है ।
ब्रियन बुइज्स्से (जर्मन इन्स्तित्युत ऑफ़ ह्यूमेन न्यूट्रीशन ,नुठेतल )कहतें हैं ,चीनी और हाई -फेट -स्नेक्स के स्थान पर बेशक थोड़ी सी डार्क चोकलेट लेना फायदे मंद हो सकता है .(लेकिन अध्धयन चोकलेट्स के बेतहाशा स्तेमाल की बात बिलकुल नहीं करता है ।)
सन्दर्भ -सामिग्री :चोकलेट केंन कट स्ट्रोक एंड हार्ट अटेक रिस्क बाई ४० %(टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल १ ,२०१० )
भूकंप का पूर्वाभास लगालेतें हैं "टोड्स ".
जर्नल ऑफ़ जूआलोजी में प्रकाशित एक अध्धययन के मुताबिक़ मेढकों की ज्यादर स्थल पर रहने वाली एक किस्म (टोड्स, एन एम्फीबियन ) भूकंप से पहले रिसने वाली गैसों और आवेशित कणों को भांप कर आपदाग्रस्त होने वाले स्थान से भाग खड़ी होती है ।
इटली में अप्रैल २००९ को आये भूकंप से पांच दिन पहले ही टोड्स ने चेतावनी प्रसारित कर दी थी .तीन दिन पहले हीये सारे उभयचर (एम्फिबीय्न्स ,टोड्स )ल"अकुइला शहर से भाग खड़े हुए थे .इस काम में नर मेढक ज्यादा संवेदी थे .इस शहर में ३०० लोग मारे गए थे ,चालीस हजार बेघर हो गए थे ।
इस अध्धययन के अगुवा रहे राचेल ग्रांट कहतें हैं यह अपने तरह का पहला अध्धययन है जिसमे भूकंप से पहले ,भूदोलन के दरमियान और इसके बाद टोड्स के व्यवहार और आवास में आये बदलाव का जायजा लिया गया है ।
पूर्व में आयनमंडल में होने वाले विक्षोभ (पर -तर -बेशन ) का सम्बन्ध भूकंप से पूर्व ज़मीन के नीचे से भूकंप पूर्व रिसने वाली रे -दोन गैस ,गुरूत्वीय तरंगों आदि से जोड़ा जा चुका है .हाथी घोड़ों भेडियो सर्पों ,मच्छियों के व्यवहार में भूकंप पूर्व होने वाले बदलावों को भी दर्ज किया गया है .कहतें हैं भूकंप से पहले घोड़े अस्तबल से भाग खड़ें होतें हैं ,सर्प बिलों (बाम्बिओं )से बाहर निकल आतें हैं ।
लेकिन फिर भी भूकंप अबूझ रहा है .हो सकता है इस अध्धययन से एक नै रौशनी पड़े ।
सन्दर्भ सामिग्री :टोड्स केंन तेल वेंन क्युएक्स एबाउट तू स्ट्राइक .(टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल १ ,२०१० )
इटली में अप्रैल २००९ को आये भूकंप से पांच दिन पहले ही टोड्स ने चेतावनी प्रसारित कर दी थी .तीन दिन पहले हीये सारे उभयचर (एम्फिबीय्न्स ,टोड्स )ल"अकुइला शहर से भाग खड़े हुए थे .इस काम में नर मेढक ज्यादा संवेदी थे .इस शहर में ३०० लोग मारे गए थे ,चालीस हजार बेघर हो गए थे ।
इस अध्धययन के अगुवा रहे राचेल ग्रांट कहतें हैं यह अपने तरह का पहला अध्धययन है जिसमे भूकंप से पहले ,भूदोलन के दरमियान और इसके बाद टोड्स के व्यवहार और आवास में आये बदलाव का जायजा लिया गया है ।
पूर्व में आयनमंडल में होने वाले विक्षोभ (पर -तर -बेशन ) का सम्बन्ध भूकंप से पूर्व ज़मीन के नीचे से भूकंप पूर्व रिसने वाली रे -दोन गैस ,गुरूत्वीय तरंगों आदि से जोड़ा जा चुका है .हाथी घोड़ों भेडियो सर्पों ,मच्छियों के व्यवहार में भूकंप पूर्व होने वाले बदलावों को भी दर्ज किया गया है .कहतें हैं भूकंप से पहले घोड़े अस्तबल से भाग खड़ें होतें हैं ,सर्प बिलों (बाम्बिओं )से बाहर निकल आतें हैं ।
लेकिन फिर भी भूकंप अबूझ रहा है .हो सकता है इस अध्धययन से एक नै रौशनी पड़े ।
सन्दर्भ सामिग्री :टोड्स केंन तेल वेंन क्युएक्स एबाउट तू स्ट्राइक .(टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,अप्रैल १ ,२०१० )
सदस्यता लें
संदेश (Atom)