गुरुवार, 6 अगस्त 2009
आसमान से गिरे खजूर पे अटके .
प्रकृति का अपना देश -काल होता है ,उसी के अनुरूप आचरण जीवन में सुख आनंद की वृष्टि करता .नारी स्वयं प्रकृति ही है ,पुरूष निष्क्रिय रहता है ,नारी ही उसे सक्रीय करती है ,लेकिन ये क्या ,प्रजनन धर्म से ही भाग खड़ी हुई आज की नारी .एक तरफ़ सहजीवन ,लिविंग टुगेदर ,नो कमिटमेंट्स दूसरी तरफ़ डिंक(डी.आई .एन .के .यानी डबल इनकम नो किड्स ),देर से स्वयंवर कम बच्चे पैदा करने की आकांक्षा ,नतीजा "ब्रेस्ट केंसर में इजाफा "भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् की शीघ्र प्रकाश्य विज्यप्ती के अनुसार (टाइम्स ट्रेंड्स इन केंसर इन्सिडेन्सटेस रेट्स ,१९८२-२००५ )के अनुसार बेंगलोर -चेन्नई -दिल्ली -मुंबई महानगरों में जहाँ सर्विक्स केंसर (गर्भाशय -ग्रीवा ,गर्भाशय की गर्दन के केंसर ) के मामले ५० फीसद तक कम हुए वहीं स्तन केंसर के मामले उसी अनुपात में बढ़ गए ।बेशक देश के कई इलाकों में आज भी "बालिका वधु "प्रासगिक बनी हुई है ,कमसिन लडकियांब्याही जा रहीं है ,हरयाणा में तो बार्टर सिस्टम चल पडा है ,लेकिन जीवन से बढती प्रत्याशा ,उम्मीदी औरत -मर्द दोनों को देर से विवाह रचाने और कम से कम बच्चे पैदा करने की और धकेल रही है .जहाँ कम उम्र में विवाह ,कम फासले से बच्चे पैदा करते चले जाना ,हाई -जीन (स्वास्थ्य -विज्ञान ) का अभाव औरतों -मर्दों में भारत को सर्विक्स केंसर के नक्शे में शीर्ष पर ले आया था वहीं अब आधुनिक जीवन के तकाजे ,जीवन शैली रोग की वजह बन -ने लगें हैं .हमारे खान पान ,चिकनाई सनी खुराक ,रहनी -सहनी जहाँ एकऔर भारत को मधुमेह रोग का हब (दाया -बितिज़ हब ) बना -ने लगी है ,वहीं हम आसमान से गिर के खजूर में अटक गएँ हैं .एक केंसर की गिरिफ्त से निकल कर दूसरे केगिरिफ्त में आगये हैं .सफेदा और विलायती कीकर लाये थे हम लोग .दलदली प्रदेश के लिए था सफेदा ,हम इसकी बाढ़ लगा बैठे ,आंधी तूफ़ान रोकने के लिए खेत की हदबंदी करने लगे सफेदे से .फास्ट ग्रोइंग किस्में लगा बैठे सफेदे की हम लोग ,विदेशी कीकर को दिल दे बैठे ,नतीजा ,अंडर -वाटर टेबल और नीचे खिसक गई ,डिंक -लिविंग टूगेदर ने भी मिल जुल कर दाम्पत्य की दीवार दरका दी है .सेहत को घुन लगा लिया है लेट मेरिजिज़ अपना कर ,बच्चों को वेस्तिज़िअल आर्गन ,अपेंडिक्स सा गैरज़रूरी समझ -बूझकर .खुदा खैर करे ."कबीरा तेरी झोपडी ,गल -कटी -अन के पास ,करेंगे सो भरेंगे ,तू क्यों भया उदास .ओमशांति .
बुधवार, 5 अगस्त 2009
स्वानों को मिलता वस्त्र दूध .....
स्वानों को मिलता वस्त्र दूध ,भूखे बच्चे अकुलातें हैं
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर ,जाडों की रात बितातें हैं ।
बेहद मौजूहैं ये पंक्तियाँ हिन्दुस्तान में सेहत के साथ होने वाले स्थाई खिलवाड़ से .रिदा शेख का यूँ सुपुर्दे ख़ाक होना एक सिलसिला है जो आइन्दा भी जारी रहेगा .ख़तरा इसी खिलवाड़ से है ,एच १एन १ इन्फ़्लुएन्ज़ा उतना खतरनाक नहीं हैं .बेहद शर्म औ हया की बात है ,देश में इसकी जांच के मात्र दो केन्द्र चालू
हैं ,प्रस्तावित १४ के पास अभी टेस्ट कित नहीं है ,इंशा अल्लाह होगी भी नहीं ,तिस पर तुर्रा ये :आप को जांच की ,अस्पताल में जांच की ज़रूरत है या नहीं इसका फैसला वो सरकारी अस्पताल करेंगे जो ख़ुद बीमार हैं .हमारा मानना :ये जांच निजी केन्द्रों को भी सौपीं जाए .बेशक चिकित्सा में प्रयुक्त दवा ,बचावी चिकित्सा के लिए नहीं है ।प्रो -फाई -लेक्टिक नहीं है तेमिफ्लू .लेकिन निजी अस्पताल अपने संसाधनों से टेस्ट कित तुरत फुरत मंगवा लेंगे .सी .दी .सी .(सेंटर फार ड्रग कंट्रोल ) से सलाह तो लीजिये .आने वाले २ बरसों में ही फ्लू के मामले बढ़कर दो अरब के पार चले जाने हैं .टीका बनाने के लियें भी जो दवा कंपनिया समर्थ हैं ,उनको लाइसेंस दीजिये .भुस पर लीपने से कुछ नहीं होगा .पर्सनल हाई -जीन की अपनी सीमाएं हैं .संभावनाओं में जीना छोडिये ,सबको मालूम है ,संक्रमित -गैर संक्रमित व्यक्ति को बारहा ,हाथ धोना है ,कुहनी में मुह छिपा कर छींकना है ,भीड़ -भरे स्थानों पर नहीं जाना है ,४८ घंटों के अन्दर संक्रमित होने पर जांच ज़रूरी है ।यहीं आकर गाड़ी अटक जाती है ,वगरना जानकारी जुटानें में हम किसी से पीछे नहीं हैं ,स्वानों के आगे पिट -तें हैं हम लोग .वो जो गाइड लाइंस जारी करतें हैं ,बेहूदा ,उसका ग्रासबन -तें हैं हम लोग ,लाइसेंस परमिट की हदों से बाहर निकालो सेहत के माम लात .फिलवक्त ज़बानी खर्च हो रहा है ,हिन्दुस्तान में ,१० जुलाई ,२००९ को हम एअर -इंडिया की फ्लाईट ऐ .आई १०२ ,से नूयार्क से उड़ इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पहुंचे डरे सहमें :हवाई अड्डे पर फ्लू के लिए जांच होगी ,बेशक हमसे पूछा गया ,बुखार तो नहीं है ,और बस कागज़ का पेट भर फार्म पकडा हम बाहर खुली हवा में ,अपने हवाले .तो भाई -साहिब :सवारी अपने सामान की ख़ुद जिम्मेवार है .हिफाज़त कर लेंगे हम अपनी सरकारी टांग अस्पताल की रास्ता ना रोके .
है
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर ,जाडों की रात बितातें हैं ।
बेहद मौजूहैं ये पंक्तियाँ हिन्दुस्तान में सेहत के साथ होने वाले स्थाई खिलवाड़ से .रिदा शेख का यूँ सुपुर्दे ख़ाक होना एक सिलसिला है जो आइन्दा भी जारी रहेगा .ख़तरा इसी खिलवाड़ से है ,एच १एन १ इन्फ़्लुएन्ज़ा उतना खतरनाक नहीं हैं .बेहद शर्म औ हया की बात है ,देश में इसकी जांच के मात्र दो केन्द्र चालू
हैं ,प्रस्तावित १४ के पास अभी टेस्ट कित नहीं है ,इंशा अल्लाह होगी भी नहीं ,तिस पर तुर्रा ये :आप को जांच की ,अस्पताल में जांच की ज़रूरत है या नहीं इसका फैसला वो सरकारी अस्पताल करेंगे जो ख़ुद बीमार हैं .हमारा मानना :ये जांच निजी केन्द्रों को भी सौपीं जाए .बेशक चिकित्सा में प्रयुक्त दवा ,बचावी चिकित्सा के लिए नहीं है ।प्रो -फाई -लेक्टिक नहीं है तेमिफ्लू .लेकिन निजी अस्पताल अपने संसाधनों से टेस्ट कित तुरत फुरत मंगवा लेंगे .सी .दी .सी .(सेंटर फार ड्रग कंट्रोल ) से सलाह तो लीजिये .आने वाले २ बरसों में ही फ्लू के मामले बढ़कर दो अरब के पार चले जाने हैं .टीका बनाने के लियें भी जो दवा कंपनिया समर्थ हैं ,उनको लाइसेंस दीजिये .भुस पर लीपने से कुछ नहीं होगा .पर्सनल हाई -जीन की अपनी सीमाएं हैं .संभावनाओं में जीना छोडिये ,सबको मालूम है ,संक्रमित -गैर संक्रमित व्यक्ति को बारहा ,हाथ धोना है ,कुहनी में मुह छिपा कर छींकना है ,भीड़ -भरे स्थानों पर नहीं जाना है ,४८ घंटों के अन्दर संक्रमित होने पर जांच ज़रूरी है ।यहीं आकर गाड़ी अटक जाती है ,वगरना जानकारी जुटानें में हम किसी से पीछे नहीं हैं ,स्वानों के आगे पिट -तें हैं हम लोग .वो जो गाइड लाइंस जारी करतें हैं ,बेहूदा ,उसका ग्रासबन -तें हैं हम लोग ,लाइसेंस परमिट की हदों से बाहर निकालो सेहत के माम लात .फिलवक्त ज़बानी खर्च हो रहा है ,हिन्दुस्तान में ,१० जुलाई ,२००९ को हम एअर -इंडिया की फ्लाईट ऐ .आई १०२ ,से नूयार्क से उड़ इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पहुंचे डरे सहमें :हवाई अड्डे पर फ्लू के लिए जांच होगी ,बेशक हमसे पूछा गया ,बुखार तो नहीं है ,और बस कागज़ का पेट भर फार्म पकडा हम बाहर खुली हवा में ,अपने हवाले .तो भाई -साहिब :सवारी अपने सामान की ख़ुद जिम्मेवार है .हिफाज़त कर लेंगे हम अपनी सरकारी टांग अस्पताल की रास्ता ना रोके .
है
मंगलवार, 4 अगस्त 2009
मातु यसोदा और मिड -डे मील
एड प्रोग्रेम के तहत यूनिसेफ ने हिंदुस्तान के एक दो राज्यों में फ्रांस से आयातित प्लम्पि - नट्स क्या सप्लाई किए कई विघ्न संतोषी अपने बिलों से निकल आए .हिन्दुस्तान के जीर्ण -शीर्ण स्कूलों की इमारतें किस खस्ता हालत में हैं किसी से छिपा नहीं हैं ,फ़िर ना अब वो कदीमी रसोइए है और ना मातु यशोदा .हमारे जैसे उष्ण -कटिबंधी मुल्क में भोजन को ठीक ठाक तापमान पर बनाए रखना अपने आपमें एक मुसक्कत का काम है .रख -रखाव ,स्वास्थ्य -विज्ञान ,प्रोपर हाइजिनके अभाव में गत तीन सालों में ३२७३ बच्चे दूषित मिड -डे मील का ग्रास बन चुके हैं .अलग से रसोइए की प्रत्येक स्कूल में व्यवस्था कहाँ हैं ?ले देकर मॉस -साहिबान से ही ये काम करवा लिया जाता है ।हर काम की एक चलताऊ व्यवस्था है ,इससे कोई इनकार कर सकता है .ताज़ा गरमा गर्म भोजन हिन्दुस्तान का एक आदर्श है ,हकीकत नहीं .,है .कुपोषण चार्ट में हम बराबर बढ़त बनाए हुए हैं .लेकिन ना कुछ से कुछ तो होना ,मशीन का बना भरोसे मंद खाद्य तो नौनिहालों तक पहुंचे ,ये हिन्दुस्तान में एक बड़ा मुद्दा है ,जहाँ गावों -शहरों -महानगरों में बिजली के खम्बें हैं ,बिजली नहीं हैं .गामा -विकिरण से उपचारित खाद्य कमसे कम ख़राब तो नहीं होता ,६महिने बाद पनीर का पेकित खोलिए ताज़ा ही निकलेगा ,उसमें फंगस (फफूंद का डेरा नहीं होगा )।राष्ट्रिय सलाह कार समिति ,योजना आयोग ,बाल कल्याण मंत्रालय स्थानीय साधनों से तैयार ताज़ा भोजन की वकालत कर रहें है ,लेकिन हमारे पास अमलिया तंत्र कहाँ हैं ,वास्तव में तो सिस्टम (तंत्र ही नहीं हैं )ही नहीं हैं .बड़े से बड़े हादसे हो लेतें हैं ,कसूरवार ठेकेदारी तंत्र में हाथ नहीं आते .कोई ज़वाबदारी तय करके तो दिखलाये .ऐसे घटा टॉप में टेट्रा -पेक या फ़िर डिब्बा बंद पुष्टिकर आहार को अप्नालेने में क्या हर्ज़ है ?हिन्दुस्तानी farm से तैयार करवा लीजियेkया एतराज़ हो सकता है ?
इमरजेंसी पिल की सौगातें
सेक्स आदमी की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है .कौमारिय को बचाए रखना या फ़िर केंचुली की तरह उतार फेकना किशोर-अवस्था का नेजिक मसला है ,हमें इस विषय में कुछ नहीं कहना -करना है .अलबत्ता एक विज्ञान संचारक के बतौर जो जानकारी हमारे पास है ,उसे अपनी युवा भीड़ के साथ सांझा करना ,शेअर करना हमारा सुख -सुकून दोनों है गायना -कोलोजिस्त (प्रसूति एवं स्त्री रोगों के माहिर )का साफ़ -साफ़ कहना है ,जैसे पृथ्वी का हीट-बजट नाजुक है ,४ सेल्सिअस की घट- बढ़ एक छोर पर हिमयुग और दूसरे पर आलमी ताप जन्य दीलुज(जलप्लावन )ले आती है वैसे ही बड़ा ही नाज़ुक है नारी शरीर में हार्मोनो का संतुलन (हार्मोनल बेलेंस )बिना बिचारे स्वेच्छया ओवर दा काउँतार्स एमर्जेसी पिल का गाहे बगाहेइस्तेमाल एक साइकिल के बीच कई -कई बार नारी शरीर को बाँझपन की और भी धकेल सकता है आई पिल से सम्बद्ध सिप्ला फार्मेसी की वेब साईट बारहा पूछे गए इस सवाल का कितनी कारगर और असर कारी रहती है ,एमर्जेसी पिल ,दो टूक ज़वाब देती है ,अगले साईं कल का इंतज़ार कीजिये ,एक हफ्ता ऊपर होने पर ,यूरिन फार प्रेगनेंसी टेस्ट कराइए ,अपनी गायनी विशेश्ज्य से मशविरा कीजिये ,लेकिन १८ -२० साला युवती धैर्य खोकर एक और आई -पिल भकोस लेती है ,इसीलियें हड़बड़ी में ,महावारी (मेंस -त्रूअल साईं -कल )के दौरान अतिरिक्त रक्त स्राव की शिकायत लिए आज युवतियां ,किशोरियां स्त्री रोगों की माहिरों के पास पहुँच रहीं हैं कई तो छमाही में ३-३ आधे -अधूरे अबार्शन आई पिल के सहारे करवा कर रोज़ -बा -रोज़ गैनाकोलोजिस्त ही बदल रहीं हैं ताकि पूरा सच ना बतलाना पड़े पुरूष -प्रधान समाज में विवाह पूर्ण गर्भ धारण करना आज भी बड़ा मसला है ,इसी डर से संचालित हमारी युवतियां कमान अपने हाथ में ले रहीं हैं ,जबकि मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेगनेंसी कानूनन उपलब्ध है ,शादी शुदा या फ़िर लिव इन रिलेशन में भी युवक युवतियां इसका फायदा अनचाही प्रेगनेंसी से छुटकारे के लियें उठा रहें हैं कोई अनहोनी नहीं है ये .खुदमुख्तार बनना खतरनाक हो सकता है ,जीवन भर के लियें जी का जंजाल बन सकता है ,बाँझ पन की और धकेल सकता है मुतियाना (ओबेसिटी )पेडू (लोवर अब्दोमन )में बेहद का दर्द ,मतली आना (नौजिया ),महावारी (मासिक रक्त स्राव ,मेंस -त्रूअल -साइकिल )का अनियमत होकर लडखडा जाना आई -पिल के बिन -बिचारे -मनमाने सेवन की अन्य सौगातें हैं .फैसला आपको ही करना है .इससे तो कंडोम ही भला ,विविध रंगों में उपलब्ध है इस सब के चलते अन्वांतिद -७२ पिल की बिक्री ५० फीसद से ज्यादा बढ़ गई है अप्रेल मॉस की तुलना में जिस पिल ने मेंस -त्रूअल साइकिल का सत्या नाश कर दिया उसी के सहारे ललनाएं मिसिंग पिरिअद को दोबारा चालू करवाने की चाहमें एक और आई -पिल भकोस लेती हैं जबकि ये एक आपात कालीन गोली थी आज ४५ दिनी भ्रूण तक का अबोर्शन युवतियां नेट से सूचना डाउन लोड कर स्वेछया कर -करवा रहीं हैं इसीलियें कहा गया है नीम -हकीमkhatraa -ऐ जान पूरा अबोर्शन भी कहाँ होता है ,एक स्पॉट रह जाता है ,नतीजा बेतहाशा रक्त स्राव ,ब्लीडिंग ,महावारी का बंद हो जाना आदि यदि आप अपने बाय फ्रेंड से सचमुच प्यार करतीं हैं तो पहले अपने से भी प्यार करना तंदरुस्त रहना सीखिए ,एक तंदरुस्ती हज़ार नियामत
सोमवार, 3 अगस्त 2009
सबके मुह पर सिटकनी क्या करते संवाद ?
कोई हफ्ता भर पहले प्रोफेस्सर हेनरी लुईस गेट्स (हारवर्ड प्रोफेस्सर )जिनकी चमड़ी काली है लेकिन वैसे सुविख्यात हैं .लोगबाग उनेह उनके काम की वजह से पूजतेहैं गैरमुनासिब बर्ताव करते हुए धर लिए गए गोरे सार्जेंट जेम्स क्रोव्ली द्वारा .तुरत फुरत बराक ओबामा साहिब ने दोनों को बिअर पार्टी पर आमने साम ने बिठालिया.आप जानतें हैं अमरीकी नीति निर्धारण में रंग भेद काले गोरे का सवाल विशेष स्थान रखता है .दोनों परस्पर असहमत दिखे लेकिन बातचीत की .आइन्दा भी बातचीत के लिए राजी हुए .दीगर है परस्पर असहमत ही रहे दिखे अपना एतराज़ दर्ज कराया .लेकिन संवाद का रास्ता खुला रख्खा .क्या हमारे रहनुमा सिर्फ़ इफ्त्यार पार्टियों में ही परस्पर मेल मिलाप रखतें हैं .अपनी कंस्तितुएंसी से मुखातिब होतें हैं ,या फ़िर उनमें आपसी मनमुटाव को बातचीत के ज़रिये निपटाने का माद्दा भी है ?नीयतभी है ?क्या प्रदेश कांग्रेस मुखिया (उत्तर प्रदेश )और बहिन मायावती मौजूदा कलह चाय का प्याला या फ़िर निम्बू पानी लस्सी आदि साथ साथ पी -बैठकर सुलझा सकतीं हैं .?मामला दलित महिला के साथ हुए बलात्कार तथा उसकी एवज में प्रदेश सरकार द्वारा मुआवजा देने से ताल्लुक रखता था .जिस पर रीता जी ने गैरवाजिब टिपण्णी की ,कांग्रेस युवराज ने उनकी टिपण्णी को तो खारिज किया ,लेकिन भावना से सहमत दिखे .ये कैसी भावना है "पीड़ित के ज़ख्म पर नमक छिड़कते आप कहें -ये पैसा मायावती के मुह पर मारो और कहो आप अपना बलात्कार करवाओं हम एक करोड़ रुपया देंगें ।"मायावती जी की प्रतिकिर्या उग्रतररही ,रीताजी का घर फुंकवा दिया ,जेल में ठूंस दिया .इसलिये हमने कहा -सबके मुह पर सिटकनी क्या करते संवाद .रीता बहुगुणा और माया
बात करें तो कैसे ?राजनीती में एहसास का अभाव है .निर्भाव है राजनीती .यहाँ तो कानून भी शपथ नहीं वोट के हवाले है .रहनुमाहमारे फंस जाने पर जनता की अदालत में जाने की बात करतें हैं .उसे ही सर्वोपरि अदालत बतलातें हैं .नक्सली -माओवादी अदालतें अपनी ढाल चलतीं हैं .प्रादेशिक सेनायें अलग हैं .राजठाकरे ख़ुद ही एक सेना हैं .पंचायतें जात बिरादरी के नाम पर नौज़वान जोडों को ठिकाने लगा रहीं हैं .दलित और बामन ठाकुरों के कुँए बा -व्दियाँ अलग अलग हैं ,स्कूल में दलित बच्चों की अलग पांत हैं ,नास्ता है ,मिड डे मील है .ऐसा है मेरा हिन्दुस्तान आज़ादी मिले कोई ६२ बरस बीते सामाजिक राजनितिक विक्रित्यान ज्यों की त्यों हैं ,उनमें इजाफा ही हुआ है .उग्रतर हुए हैं रिताओं के तेवर और अंदाजे बयान .बातचीत की मेज़ पर रीता माया कब साथ आएँगी ?हम इंतज़ार करेंगे .
है
बात करें तो कैसे ?राजनीती में एहसास का अभाव है .निर्भाव है राजनीती .यहाँ तो कानून भी शपथ नहीं वोट के हवाले है .रहनुमाहमारे फंस जाने पर जनता की अदालत में जाने की बात करतें हैं .उसे ही सर्वोपरि अदालत बतलातें हैं .नक्सली -माओवादी अदालतें अपनी ढाल चलतीं हैं .प्रादेशिक सेनायें अलग हैं .राजठाकरे ख़ुद ही एक सेना हैं .पंचायतें जात बिरादरी के नाम पर नौज़वान जोडों को ठिकाने लगा रहीं हैं .दलित और बामन ठाकुरों के कुँए बा -व्दियाँ अलग अलग हैं ,स्कूल में दलित बच्चों की अलग पांत हैं ,नास्ता है ,मिड डे मील है .ऐसा है मेरा हिन्दुस्तान आज़ादी मिले कोई ६२ बरस बीते सामाजिक राजनितिक विक्रित्यान ज्यों की त्यों हैं ,उनमें इजाफा ही हुआ है .उग्रतर हुए हैं रिताओं के तेवर और अंदाजे बयान .बातचीत की मेज़ पर रीता माया कब साथ आएँगी ?हम इंतज़ार करेंगे .
है
रविवार, 2 अगस्त 2009
काम के बदले अनाज बहिन के बदले बीबी .
बार्टर सिस्टम को नए आयाम दिए हैं हरयाणा ने .सचमुच प्रगति के पथ पर है हरयाणा .नाथू राम का विवाह गीता सेहोना है ,नाथू राम की नाबालिग़ बहिन बदले में आज ही के दिन गीता के मामा से ब्याही जानी है .किस्सा फतेहाबाद जिले के जांडली गाँव का है .शादी गीता की माँ की मर्जी से हो रही है ताकि गीता का मामा भी ब्याहा जाए ,अलबत्ता गीता के समझदार पिता की रजा - मंदी नहीं है ,इस शादी को .एन मौके पर वह उपायुक्त महोदय के समक्ष हाज़िर होकर शादी रुकवा देतेंहैं .शादी को बचाने के लिए गीता की चचेरी बहिन को मनाया जाता है ,लेकिन वह भी नाबालिग़ ठहरती है ,गीता के बड़े कुनबे से तुरत फुरत ले देकर एक २० वर्षीय लड़की हाथ लग जाती है ,उसी से नाथू राम को ब्याह दिया जाता है .काम के बदले अनाज की तरह हरयाणा में बहिन -भांजियों के बदले बहु -बेगम की खरीदारी हो रही है .हेना हरयाणा प्रगति के पथ पर .खाप पंचायतें दूसरी और सगोत्री विवाह करने वाले युवा जोडों को ठिकाने लगा रहीं हैं .सिरसा जिले के गाँव केहार्वाला का किस्सा भी जुदा नहीं हैं ,अलबत्ता भावी दुल्हनें और भी कमसिन और नादाँ हैं १२ -१४ बरस की ही हैं .लड़के की चाह में लड़की की कब्र माँ की कोख को ही बना दिया जाता है ,इसी के चलतेयहाँ आज ०-६ साला आयु वर्ग में १००० लड़कों के पीछे मात्र ८२२ लडकियां हैं ,जबकि अपेक्षतया शिक्षित वर्ग में लडकियां घटकर कर ६१८ रह गयीं हैं १००० लड़कों के बरक्स .मलेरना और दुलेपुरगाँव में जन्मना ३७० -४०० लडकियां ही हैं प्रति १००० मेल चाइल्ड के पीछे ।राखी सावंत का बहुचर्चित स्वयाम्बर भविष्य का कम्पास है .सामाजिक मार्ग दर्शक वस्तु विनिमय के तहत बहुरिया लाने के लियें नाबालिग़ कन्याओं को दाव पर लगाया जा रहा है .कमतर जोत वाले किसानों में ये प्रथा जोर पकड़ रही है .बड़ी जोत वाले किसान बेटे के लिए पुत्र वधु जुटाने में समर्थ हैं ,इनकी पहुँच मध्य प्रदेश ,आसाम और उडीसा तक है .गरीब की बालिग़ नाबालिग़ लड़की हिदुस्तान में उपलब्ध है हरयाणा केखाते पीते किसान को ।छोटा जोतदार घर द्वारे जा रहा है बहु के बदले अपने खानदान की वयस्क -अवयस्क लडकियां विनिमय करने .इस राज्य में ये बीमारी वैसे ही व्याप्त है ,जैसे अमरीका में एच १एन १ ऐ इन्फ्लुएंजा .यहाँ १४ लाख बेघर बसेरा और बहुरिया साथ -साथ तलाश रहें हैं .यही है मेरा हरयाणा जित दूध -दही का खाना .
शनिवार, 1 अगस्त 2009
पदार्थ की पांचवी अवस्था ,पारदर्शी अलुमिनिअम
ठोस द्रव तथा गैस एवं प्लाज्मा पदार्थ की चार ज्यात अवस्थाएं हैं .ठोस द्रव तथा गैस से तो आप परिचित हैं .प्लाज्मा अति उत्तप्त (सुपरहितिद गैस )गैसीय अवस्था है ,जो अति उच्च चालकता (हाइली कान्दक्टिंग )से तो संपन्न है ,लेकिन कुल आवेश इस गैसीय अवस्था पर शून्य ही बना रहता है ,यानी यह विद्दुत तौर पर उदासीन ही है .रंग बिरंगी रोशनियों में ,नियोन साइंस में ,इतर फ्लोरोसेंट लेम्पों में प्लाज्मा अवस्था पदार्थ की पैदा होती है .अलबत्ता अति उच्च ताप और निम्नतर दाब चाहिए इस अवस्था को प्राप्त करने के लियें .लेकिन पारदर्शी एलुमिनियम शोध की खिड़की से झांकती पदार्थ की एक और भी नै अवस्था है .आप चाहें तो इसे पदार्थ की पांचवी अवस्था शौक से कह समझ सकतें हैं
ऐसा विज्ञानियों का कहना है .यह अवस्था एलुमिनिअम धातु (मेतिल )पर अति शक्तिशाली साफ्ट लेजर पुंज डाल कर ऑक्सफोर्ड के विज्ञानियों ने अतिअल्पाव्धि के दौरान हांसिल कर लेने का दावा किया है ।अभी तलक विज्यानदंत कथाओं पर आधारित स्टार ट्रेक ४,जैसी फिल्मों में ही पारदर्शी एलुमिनिअम की चर्चा थी .लेकिन पारदर्शी अलुमिनिअम एक अभिनवअवस्था है पदार्थ की .जिससे मेजर प्लेनेट्स (जुपिटर और उसके बाद के सभी ग्रह )के बारे में नै समझ पैदा हो सकती है .अतोमिक फूज़न(हलके नाभिकों से अपेक्षतय भारी का बनना ,जैसे सूरज के गर्भ प्रदेश में हाइड्रोजन से हिलिअम गैस बनती है .साप्ताहिक विज्ञान पत्रिका "नेचर फिजिक्स "में इसी सप्ताह (जुलाई २००९ का आखिरी हफ्ता )पारदर्शी एलुमिनिअम प्राप्त करने की इस शोध के तमाम नतीजे प्रकाशित हुए हैं .बतलाया गया है :की जब हेम्बर्ग आधारित फ्लेश लेजर किरण पुंज एलुमिनिअम के एक साम्पिल पर डाला गया ,तब ठोस के क्रिस्टल स्ट्रक्चर को बिना असर ग्रस्त किए ,प्रत्येक परमाणु की कोर से (सबसे अंदरूनी ,नाभिक के नजदीक -तर कक्षा से एक -एक एलेक्त्रोन बाहर खदेड़ दिया गया .अब एक ऐसा मनोरम पदार्थ प्राप्त हुआ जो अति -परा बेंगनी विकिरण के लियें अदृश्य बना रहा .परा बेंगनी सौर विकिरण का वही अंश है जिसे ओज़ोन कवच रोक कर पृथ्वी पर जैव मंडल की हिफाज़त करता है .क्लोरोफ्लोरो कार्बनों ,एरोसोल स्प्रे ,फ्रिज ,एअर -कंडीशनर का बढ़ता चलन क्लीन टेक्नालाजी के आम फहम ना हो पाने के कारन इस ओजोन कवच को रोंद कर जैव मंडल के लियें ,मानव मात्र के लियें खतरे का सबब बन रहा है .बकौल ऑक्सफोर्ड विश्व -विद्द्यालय के भौतिकी विद जस्टिन वाक् :एक अभिनव पदार्थ बना लिया गया .एक अन्तर -राष्ट्रीय टीम का सयुंक्त प्रयास है हालिया शोध जिसके नतीजे हमने यहाँ प्रकाशित किए है ,आम और ख़ास के लिए .ये तो शुरुआत भर है ,पारदर्शी एलुमिनिअम के भौतिक गुन वृहद् ग्रह (मेजर प्लेनेट्स )के अन्दर क्या चल रहा है (रासायनिक किर्यायें ) वैसे ही हालत की ख़बर है .बेहद प्रासंगिक है "पारदर्शी एलुमिनिअम "मेजर प्लेनेट्स के सन्दर्भ में .हर हाल में ऐसा लगे है की साम्पिल पदार्थ की एक नै अवस्था में रूपांतरित हो गया है ,यह वैसा ही विस्मय कारी है ,जैसा कीमिया -गरों का ये खाब :एक दिन लेड धातु को स्वर्ण में बदल लिया जाएगा .यह मुमकिन भी है लेकिन महंगा सौदा है .इनपुट (खर्ची )बहुत ज्यादा है ,आउट पुट से .जो हो ऑक्सफोर्ड विश्व -विद्द्यालय के विज्ञानियों में अपार उतेजना है .
ऐसा विज्ञानियों का कहना है .यह अवस्था एलुमिनिअम धातु (मेतिल )पर अति शक्तिशाली साफ्ट लेजर पुंज डाल कर ऑक्सफोर्ड के विज्ञानियों ने अतिअल्पाव्धि के दौरान हांसिल कर लेने का दावा किया है ।अभी तलक विज्यानदंत कथाओं पर आधारित स्टार ट्रेक ४,जैसी फिल्मों में ही पारदर्शी एलुमिनिअम की चर्चा थी .लेकिन पारदर्शी अलुमिनिअम एक अभिनवअवस्था है पदार्थ की .जिससे मेजर प्लेनेट्स (जुपिटर और उसके बाद के सभी ग्रह )के बारे में नै समझ पैदा हो सकती है .अतोमिक फूज़न(हलके नाभिकों से अपेक्षतय भारी का बनना ,जैसे सूरज के गर्भ प्रदेश में हाइड्रोजन से हिलिअम गैस बनती है .साप्ताहिक विज्ञान पत्रिका "नेचर फिजिक्स "में इसी सप्ताह (जुलाई २००९ का आखिरी हफ्ता )पारदर्शी एलुमिनिअम प्राप्त करने की इस शोध के तमाम नतीजे प्रकाशित हुए हैं .बतलाया गया है :की जब हेम्बर्ग आधारित फ्लेश लेजर किरण पुंज एलुमिनिअम के एक साम्पिल पर डाला गया ,तब ठोस के क्रिस्टल स्ट्रक्चर को बिना असर ग्रस्त किए ,प्रत्येक परमाणु की कोर से (सबसे अंदरूनी ,नाभिक के नजदीक -तर कक्षा से एक -एक एलेक्त्रोन बाहर खदेड़ दिया गया .अब एक ऐसा मनोरम पदार्थ प्राप्त हुआ जो अति -परा बेंगनी विकिरण के लियें अदृश्य बना रहा .परा बेंगनी सौर विकिरण का वही अंश है जिसे ओज़ोन कवच रोक कर पृथ्वी पर जैव मंडल की हिफाज़त करता है .क्लोरोफ्लोरो कार्बनों ,एरोसोल स्प्रे ,फ्रिज ,एअर -कंडीशनर का बढ़ता चलन क्लीन टेक्नालाजी के आम फहम ना हो पाने के कारन इस ओजोन कवच को रोंद कर जैव मंडल के लियें ,मानव मात्र के लियें खतरे का सबब बन रहा है .बकौल ऑक्सफोर्ड विश्व -विद्द्यालय के भौतिकी विद जस्टिन वाक् :एक अभिनव पदार्थ बना लिया गया .एक अन्तर -राष्ट्रीय टीम का सयुंक्त प्रयास है हालिया शोध जिसके नतीजे हमने यहाँ प्रकाशित किए है ,आम और ख़ास के लिए .ये तो शुरुआत भर है ,पारदर्शी एलुमिनिअम के भौतिक गुन वृहद् ग्रह (मेजर प्लेनेट्स )के अन्दर क्या चल रहा है (रासायनिक किर्यायें ) वैसे ही हालत की ख़बर है .बेहद प्रासंगिक है "पारदर्शी एलुमिनिअम "मेजर प्लेनेट्स के सन्दर्भ में .हर हाल में ऐसा लगे है की साम्पिल पदार्थ की एक नै अवस्था में रूपांतरित हो गया है ,यह वैसा ही विस्मय कारी है ,जैसा कीमिया -गरों का ये खाब :एक दिन लेड धातु को स्वर्ण में बदल लिया जाएगा .यह मुमकिन भी है लेकिन महंगा सौदा है .इनपुट (खर्ची )बहुत ज्यादा है ,आउट पुट से .जो हो ऑक्सफोर्ड विश्व -विद्द्यालय के विज्ञानियों में अपार उतेजना है .
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