यादों के भंवर में डूबती -उतराती बेहतरीन रचना -भावबिम्ब सजीव -जी हाँकमरे की दीवारें बोलती भी हैं सुनतीं हैं चहचहाती भी हैं ,हमारे संग रुदाली भी बनती हैं। दीवारों से एक माहौल की सृष्टि होती है-हमारे सुख की, अंतरंग क्षणों की साक्षी बनतीं हैं दीवारें -तुम कहते हो दीवारें सिर्फ दीवारें -वह कहता ज़िंदा शख्सियत ,संवेदना का स्रोत होती हैं हंसती बोलती गाती दीवारें ,मैं तो सिर्फ सहभावी बना हूँ सहभोक्ता भी आप भी सांझा करें दीवारों को बधाई दें आशीष दें शकुंतला जी की इस रचना को।
वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा )
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विशेष :आपकी यह रचना मैं ने राम राम भाई ब्लॉग पे सांझा की है पुनर्प्रकाशित की है।
मेरा कमरा जानता है......
मैं कितनी भी लापरवाह रहूं पर
हर चीज को करीने से ही रखूंगी
कमरे का कोना कोना
बड़े ही प्यार से सजाऊंगी
मेरा कमरा जानता है.....
कि मैंने न जाने कितनी सारी
यादों को संजो के रखा है
न जाने कितनी बातें सांझा की है
मेरा कमरा जानता है..…
मेरे बचपन की कितनी खट्टी मीठी बातें
न जाने कितनी रातें मां के प्यार
दुलार,लोरियों के बिना काटी है
मेरा कमरा जानता है कि
मैं कितना रोई थी मां के जाने के बाद
मेरा तकिया भी मेरे साथ रोता है हर पल
हर तरफ बस मां की यादें हैं
मेरा कमरा जानता है .....
वो दादाजी और दादीजी की प्यार भरी बातें
मेरी हर ज़िद को पूरा करना
मां मारती तो दादी डांटती दादा दुलार करते
मेरा कमरा जानता है .......
हम भाई बहनो का आपस का जुड़ाव
वो लड़ना झगड़ना फिर एक हो जाना
एकदूसरे की गलतियों को छुपा लेना
मेरा कमरा ही जानता है..…
कितने अकेले हो गए हैं हम और हमारा कमरा
बस जुड़ी है सारी बातें , यादें ,वादे ,कसमें, झगड़े ,लोरिया,त्योहार, पागलपन सब कुछ
मेरा कमरा ही जानता है ...…
शकुंतला
अयोध्या (फैज़ाबाद)
2 टिप्पणियां:
शकुंतला जी की कविता बहुत अच्छी लगी ।
कई दिन से आपका ब्लॉग खुल नहीं रह था । आना नहीं हो सका इस लिए ।
वाह
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