शुक्रवार, 24 मई 2013

स्वयं की पहचान

स्वयं की पहचान 

संबंधों के अभिमान में ही हम रहते हैं .हम कहते हैं मैं फलाने का पिता हूँ ,मेरा बेटा 'ये' है 'वो' है .रिटायर होने के बाद भी हम यही कहते हैं :मैं एक्स प्रोफ़ेसर हूँ ,डीएम हूँ ,'ये' हूँ, 'वह' हूँ . 

यह कहते करते ,हम अपने आपकी पहचान ही भूल गए हैं .खुद को शरीर समझते हैं .

मैं ब्राह्मण हूँ ,वैश्य हूँ, कहीं यह जातिय अभिमान .कहीं भाषा की कानशस नेस ,लखनवी अंदाज़ है मेरा मैं यू  पी का रहना वाला अभिजात्य वर्ग हूँ .कहीं धर्म की कानशसनैस रहती है .कहीं राष्ट्र की मैं अमरीकी हूँ ,मैं योरपीय .कुलमिलाकर हमारा जीवन देहअभिमान युक्त बन गया है .देह सम्बन्धियों के बीच ही खर्च हो रहा है .रोज़ हम ड्रेसअप होते हैं .सारे दिन कुछ खाते ,कुछ चबाते (विचार चर्वण )रहते हैं .पचास फीसद समय खाने पीने  ड्रेस अप होने में  ही खर्च हो रहा है .८ -१ ० घंटा नौकरी धंधे के पीछे खर्च हो जाता है .हमारा जीवन मटीरियल कांशस बन गया है .देह कांशस बन गया है .जबकि आत्म कल्याण स्वयं की उन्नति जीवन का वास्तविक ध्येय है .हम इस लक्ष्य को ही भूल चुके हैं .सोचने की आवश्यकता है क्या हम महज़ शरीर हैं पदार्थ चेतना तक सीमित .शरीर तो जड़ है निर्जीव है .पञ्च तत्वों का मेल है आज है, कल नहीं है .हम इसे ही अपना नाम रूप परिचय समझ रहें हैं .जबकि यह तो आत्मा का उपकरण है .

Human body +being=Humanbeing

शरीर परिवर्तनशील तत्व है .शरीर को हम देख सकते हैं .नाशवान है शरीर .शरीर से परे एक चैतन्य शक्ति भी है जिसे हम चर्म चक्षु से देख नहीं सकते .समझ सकते हैं .महसूस कर सकते हैं .जैसे ही यह चैतन्य शक्ति (चेतन ऊर्जा )निकल जाती है शरीर जड़ हो जाता है .जड़ शरीर को कोई रखना नहीं चाहता .विद्युत् शवडाह गृह में एक बटन दबाते ही शरीर स्वाह हो जाता है भस्म हो जाता है .सम्बन्ध तो चैतन्य शक्ति से था जो अब यह शरीर छोड़ गई .यही चैतन्य शक्ति कर्म करती है .ऊर्जा कहा ही जाता है काम करने की क्षमता को  है  .

चीज़ द्वारा दिया हुआ स्वाद उसे पुन : प्राप्त करने की इच्छा इसी चैतन्य शक्ति को होती है .आँखों देखी सुन्दरता याद करने वाली भी चैतन्य शक्ति यही है .इसे ही होती है लालसा बारहा देखने की .भोग करने की .

शरीर स्त्री होता है शरीर ही पुरुष होता है मैं स्त्री हूँ या पुरुष हूँ यह कहना गलत है समीचीन नहीं है .क्यंकि चैतन्य शक्ति का कोई लिंग नहीं है .वह नर या नारी नहीं है .'HE 'और 'SHE 'नहीं है .

शरीर इस शक्ति का मकान है घर है .हर क्षण हम शरीर से ही काम लेते हैं करते हैं लेकिन मैं चैतन्य स्वरूपा आत्मा शरीर नहीं हूँ . मैं हाथ ,कान, नाक नहीं हूँ .

गीता में शरीर को 'रथ 'कहा गया है .चैतन्य शक्ति आत्मा को 'रथी'.देह का मालिक  आत्मा देही  कहलायेगा .देह से रथी (देही )चला गया तो शेष रह जायेगी अर्थी .वह अर्थी चली .वह देखो अर्थी जा रही है यही कहा जाता है .वह देखो आत्मा जा रही है यह कोई नहीं कहता .उसका जाना अगोचर बना रहता है .मुखरित होती है देही हीन देह बोले तो अर्थी .

आत्मा को पंछी कहा जाता है .आध्यात्मिक जगत का पहला सत्य यही है .आत्मा किसको कहते हैं ?आत्मा माने क्या ?जैसे शरीर माने पांच कर्मेन्द्रियाँ वैसे ही आत्मा माने मन ,बुद्धि और  संस्कार .

मन में अनेक विचार आते हैं लहरें उठती हैं मन भटकता रहता है .आत्मा की मनन शक्ति को ही मन कहते हैं .मन का कार्य ही है सोचना .प्रत्येक सेकिंड दो विचार उत्पन्न होते हैं मन में .एक दिन में बीस हज़ार .मन को आप विचार शून्य नहीं कर सकते .मन की विचार की दिशा बदल सकते हैं .चिंतन बदल सकते हैं .मन को मारना नहीं है सुधारना है .मन को श्रेष्ठ चिन्तन में लगाकर सु -मन (सुमन )बनाना है .

हम दिन भर में व्यर्थ चिंतन में ही समय बर्बाद करते रहते हैं .पांच मिनिट आत्म चिंतन में बिताने की बात आती है सत्संग में बैठने की बात आती है तो हम सो जाते हैं .कारण हमें अपने आप में दिलचस्पी ही नहीं है .हम खुद में नहीं हैं .कौन हैं हम ?कहाँ से आये हैं ?कहाँ हमें जाना है कहाँ मेरा घर है ?हमें कुछ पता नहीं है .हमारा जीवन 'पर 'चिंतन में दौड़ा चला जाता है .अब उसे अच्छी चीज़ों में लगाना है .

मन के अनेक विचारों पर आप निर्णय करते हैं .आत्मा की निर्णय शक्ति को ही बुद्धि कहा जाता है .मन घोड़े सा चंचल है बुद्धि उसकी लगाम है .बुद्धि को ही दिव्य बनाना है ."स्व "  चिंतन से,आत्म चिंतन से , श्रेष्ठ चिंतन से .

हमारे कर्म ही हमारे संस्कार बनते  हैं .बुद्धि को श्रेष्ठ कर्मों में लगाना है .कर्मों का सूक्ष्म प्रभाव हमारी चैतन्य शक्ति पर पड़ता है .वही कर्म बार बार करते रहने से वह हमारा स्वभाव बन जाता है .गुस्सा करते रहतें हैं तो गुस्सैल बन जाते हैं .हँसते रहते हैं तो  हसौड़ .

हम जो कर्म करते रहतें हैं उसका संस्कार हमारी आत्मा में संचित हो जाता है रिकार्ड हो जाता है .डिलीट नहीं कर सकते इस रिकार्डिंग को .इसलिए जो भी करना है सोच समझके करना है .शरीर छोड़ने पर यह कर्म ही आत्मा के साथ जाता है .

विचार ही कर्म का बीज है .वीडियो कैमरा लगा है आत्मा में .सारा व्यर्थ चिंतन दिन भर का रिकार्ड होता रहता है .खुद को देखना है स्वदर्शन करना है .

'You Are Being Observed.'

हरेक आत्मा मूल रूप में शुद्ध है सत्य है .हम यह स्मृति रखेंगे -मैं आत्मा शांत स्वरूप हूँ .शुद्ध हूँ .सत्य हूँ .मेरा स्वधर्म मेरा मूल स्वभाव शान्ति है .मेरी स्मृति में रहे  शान्ति मेरा स्वधर्म है कोई कित्ता भी गुस्सा करे मैं शांत रहूँ उसका अ -नुकरण कर मैं अपनी स्थिति खराब क्यों करूँ ?

आत्मा सुख स्वरूप है .इसलिए दुःख में भी हम सुख ढूंढते हैं .कोई हमें प्रेम करे तो हमें अच्छा लगता है क्योंकि आत्मा प्रेम स्वरूप है .हमें हरेक बात जानना अच्छा लगता है क्योंकि आत्मा ज्ञान स्वरूप है .

ॐ शान्ति 


आत्मा की खुराक है ख़ुशी .खुश और मौज में रहना इसीलिए हमें अच्छा लगता है .जो खुश नहीं रहता है उसे भी बार बार हम खुश करने की कोशिश करते हैं .ख़ुशी से बड़ी कोई दौलत नहीं है .

पानी का गुण जैसे शीतलता है वैसे आत्मा का गुण पवित्रता है आनंद  है .जैसे पानी आग के पास आकर अपना स्वधर्म छोड़ उबलने लगता है वैसे ही आत्मा विकारों में आकर अपना स्वधर्म छोड़ अ -पवित्र बन जाती है .विकारों में आ जाती है .विकृति विकार है आत्मा के गुणों में आने वाला .अगर मैं आनंद में नहीं हूँ तो मुझे वैभव में आकर,वैभव प्राप्त करके  भी आनंद नहीं आता है .आत्मा शरीर में आकर ही कर्म करती है फिर कर्म फल भोगती है अच्छा या बुरा .जैसा कर्म वैसा फल .

करनी ,अन -करनी पहचान ,कहनी अन -कहनी ले जान ,

बहुत हो चुका गोलगपाड़ा ,अपनी हद बंदी पहचान .

मन तेरा हो फूल सरीखा ,खुश्बू हो तेरी पहचान ,

अपनों के तो सब होते हैं ,गैरों पे हो जा कुर्बान .

प्रकृति के पांच तत्वों से बनी दुनिया को ही साकारी दुनिया Corporeal world कहते हैं .हमारे लिए यह दुनिया ही कर्म क्षेत्र है .कुरुक्षेत्र है .वर्क प्लेस है .लेकिन यह हमारा असली घर नहीं है .इसीलिए यहाँ आत्मा को मुसाफिर खाना कहा गया है .

यह दुनिया खुद मुसाफिर है ,सफर कोई घर नहीं होता ,

सफर तो आना जाना है ,सफ़र कमतर नहीं होता .

यह सृष्टि एक रंग मंच है हम सब एक्टर हैं यहाँ .

निर्वाण धाम (जहां वाणी नहीं है ),मुक्ति धाम (जहां शरीर का बंधन नहीं है ),अखंड ज्योति ब्रह्मतत्व (परमधाम )हमारा ,हम आत्माओं का असली घर है .इस दुनिया में रहकर भी हम अनासक्त भाव लिए रह सकते हैं .साक्षी भाव से दृष्टा बन हर कर्म कर सकते हैं तो जीवन मुक्ति हो सकती है जीते जी मरजीवा (शरीर से मर सकते हैं हम ,विकारों का संन्यास कर यही मुक्ति ,जीवन मुक्ति है )बन सकते हैं हम .

इस शरीर में आत्मा मस्तक में निवास करती है भ्रू -मध्य में (भृकुटी के बीच ).ज्योति स्वरूप है आत्मा .स्मृति स्वरूप है आत्मा .जो आत्म ज्ञान है वही तीसरा नेत्र है .मैं कौन हूँ ?मेरा पिता कौन है ?गीता ज्ञान किसने किसको सुनाया .ब्रह्मा तन में बैठ निराकार शिव ने सुनाया जिसे सुन हमारा स्वभाव संस्कार बदला .यही ज्ञान ,तीसरा ज्ञान नेत्र है .तब हम बन जाते हैं ब्रह्मा- कुमार,ब्रह्मा - कुमारीज़ .

ॐ शान्ति .


भक्ति मार्ग की बातें

भक्ति मार्ग की बातें 

(१ )आत्मा सो परमात्मा ,शिवोहम शिवोहम .

क्या है यथार्थ इस कथन का तर्क की कसौटी  पर?

एक तरफ कहतें हैं सबका मालिक  एक .परमात्मा एक ही है .दूसरी तरफ कहते हैं आत्मा सो परमात्मा .वह कण कण में है .फिर तो सात अरब परमात्मा हो जायेंगे क्योंकि विश्व की आबादी सात  अरब हो गई है आगे और भी परमात्मा पैदा होंगें .जबकि  परमात्मा तो अजन्मा है नाम रूप से न्यारा  है निराकार है .फिर कण कण में कैसे हो सकता है कण तो स्थूल है .न्यूटन ने तो पृथ्वी को ही एक कण की संज्ञा दे दी थी .

आत्मा सो परमात्मा नहीं हो सकता क्योंकि हम कहतें हैं परमात्मा सर्व आत्माओं का पारलौकिक पिता है .पुत्र पिता जैसा तो हो सकता है ,पिता नहीं हो सकता अपना .

आत्मा परमात्मा के गुणों से तो संपन्न हो सकती है ,सुख शान्ति आनंद प्रेम से युक्त हो सकती है इन गुणों का असीम सागर नहीं हो सकती .परमात्मा नहीं हो सकती .शिवत्व तो हो सकता है उसमें वह शिव नहीं बन सकती .परमात्मा की शक्ति असीम रहती है कभी कम नहीं होती .आत्मा कमज़ोर हो जाती है ,विकार ग्रस्त होकर .यहाँ तक के एक व्यक्ति आवेश में आकर दूसरे  का खून भी कर देता है .अब यदि आत्मा सो परमात्मा है तो यह किसका कर्म माना जाएगा उस व्यक्ति का या उसमें मौजूद परमात्मा का ?यदि परमात्मा उस व्यक्ति में भी है तो क्या वह निरपेक्ष भाव से ह्त्या होते देखता रहेगा इतना कमज़ोर है परमात्मा  ?

शिव परमात्मा तो जन्म मरण से न्यारा है .सुख दुःख से परे है .

आत्मा सुख दुःख अनुभूत करती है शरीर में आती है अनेक बार .परमात्मा का कोई शरीर नहीं है .एक कल्प (अनादि काल चक्र )में सिर्फ एक बार उसका साधारण मनुष्य तन में अवतरण है .पुरानी दुनिया को नया बनाने के लिए . 

यूं दोनों का स्वरूप एक है परमात्मा को ज्योतिर -लिंगम कहा गया है आत्मा भी दीपक की लौ स्वरूप है मस्तक में चमकता चमकीला सितारा है .लेकिन आत्मा सो परमात्मा कहना सर्वथा गलत है .



( २ )गीता का सार है जो भी घटता है अच्छा घटता है .एक्यूरेट ड्रामा अनुसार .अनहोनी जैसा कुछ होता नहीं है .

जो कल हुआ था वह भी अच्छा था ,जो अब हो रहा है वह भी अच्छा है जो कल होगा वह भी अच्छा होगा .इसीलिए तुलसी बाबा ने कहा -

तुलसी भरोसे राम के रह्यो खाट पे सोय,

अनहोनी होनी नहीं ,होनी होय ,सो होय .

भक्ति मार्गियों में से अनेक को यह अन -उपयुक्त लगता है अटपटा लगता है .

एक उद्धरण लेते हैं .एक रोट्रेक्ट क्लब के गवर्नर साहब थे .परम दयालु .परम उपकारी .सबकी मदद करने वाले .कभी किसी का अहित नहीं किया था आपने .एक संस्था से उन्हें पत्र मिला पता चला उन्हें किसी शहर में विशेष  सम्मान के लिए बुलाया गया है .हवाई जहाज़ के टिकट भी आने जाने के भेज दिए गए थे .

गवर्नर साहब नियत समय पर घर से निकले .घर से एयरपोर्ट के रास्ते में उनकी कार दुर्घटना ग्रस्त हो गई .ज़नाब की दोनों टांगें टूट गईं .एक बहन उन्हें देखने अस्पताल पहुंची ,कहा ईश्वर सब ठीक करेगा .गवर्नर साहब बोले भगवान का नाम न लेना मेरे सामने .मैंने आज तक किसी का दिल नहीं दुखाया है .सबकी सेवा ही की है .क्रोध में उनका चेहरा तमतमा  गया था .बहन ॐ शान्ति कहके लौटने लगीं ,पीछे पीछे गवर्नर साहब की पत्नी आईं  -हाथ जोड़ के कहने लगीं ,इनका मन ठीक नहीं हैं वैसे ये ऐसे नहीं हैं ,इस आकस्मिक दुःख ने इनकी यह स्थिति कर दी है इन्हें तो सम्मान लेने जाना था .कहने लगे जब फल प्राप्ति का वक्त आया तो यह अनर्थ घट गया अनहोनी ये मेरे साथ ही  क्यों हुई .

बहन लौट आईं बाद इनके जितने भी लोग गवर्नर साहब को देखने आये और ईश्वर का नाम लिया ,इनका आवेश बढ़ता गया ,ईश्वर के प्रति .दस दिन गुज़रे वह बहन लौट के फिर आईं .देखा गवर्नर साहब शांत हैं ,प्रसन्न हैं ईश्वर के शुक्र गुज़ार हैं .बताने लगे बहन जी मुझे जिस प्लेन से जाना था वह दुर्घटना ग्रस्त हो गया सारे यात्री मारे गए .मेरी तो टांग ही टूटीं हैं .ठीक हो जायेंगी ,जान तो बच गई .जो हुआ अच्छा ही हुआ .बाकी लोगों की तो जान ही चली गई .

(३ )शिव और शंकर अलग अलग हैं 

शंकर परम योगी हैं .अपने शरीर का उन्हें कोई भान नहीं है .इसीलिए काया पर भभूत लगाया हुआ है .गले में सर्प की माला है .हाथ में डमरू है कैलाश परबत पर तपस्या रत हैं .आकारी देवता हैंशंकर  .शिव की स्तुति कर रहें हैं शंकर उनका आराध्य हैशिव  .पिता है शिव .

शंकर रचना है शिव रचता (रचना कार हैं ).शंकर प्रोडक्ट हैं शिव प्रोड्यूसर हैं .शिव के नै दुनिया के निर्माण कार्य में शंकर उनके सहयोगी बनते  हैं .पुरानी विकारग्रस्त दुनिया का विनाश करने में मदद करते हैं .

शंकर की तरह ब्रह्मा ,विष्णु ,श्री रामचन्द्र ,श्री कृष्ण ,श्री गणेश ,कार्तिकेय आदि भी आकारी देवता हैं .भगवान् भगवती स्वरूप  हैं .यदि ये सभी भगवानभगवती भगवान हो जायेंगे तो पूछा जाएगा इनका हेड कौन हैं .हेड तो एक ही है परमात्मा शिव .३ ३ करोड़ देवता भगवान नहीं हो सकते .भगवान् भगवती स्वरूपा ज़रूर हो सकते हैं .

(4 )जीव ही ब्रह्म है 

यथार्थ :पञ्च तत्वों से बनी साकारी दुनिया (मृत्यु लोक ,Corporeal world)से परे छटा महत्व तत्व है ब्रह्म .रहने की जगह है यह तो कुदरती आवास है यह तो आत्मा का परमात्मा  का  .आत्मा इस सृष्टि रुपी रंग मंच पर अपना एक्यूरेट पार्ट बजाने इसी ब्रह्मलोक से उतर कर काया (पञ्च भूतों से बने शरीर)में प्रवेश करती है .देवात्माएँ सतयुग से नीचे आतीं हैं इस ब्रह्म लोक से उतर .पूरे ८ ४ जन्म हैं सतयुगी आत्माओं के ,शुरू से आतीं हैं  येपरमधाम (मुक्ति धाम ब्रह्म लोक से ),त्रेता युगी भी देवात्माएँ हैं बस थोड़ा पवित्रता का स्तर कम हुआ है .सतयुगी आत्माओं का ही नौवां जन्म है यहाँ .उसके आगे दसवां ....फिर बारहवां .बाद इसके द्वापर शुरू हो जाता है .पांच हज़ार वर्ष के अनादि सृष्टि चक्र में प्रत्येक युग की अवधि बराबर बराबर है १ २ ५ ० वर्ष अलबत्ता पवित्रता का स्तर कमतर होता जाता है .सतयुग में डायमंड तो कलियुग में कोयला हो जाती है आत्मा .जबकि कोयला और डायमंड हैं एक ही तत्व कार्बन (graphite )के ही  अपरूप ,Allotropes हैं . सारे स्केंडल ,मेच फिक्सिंग ,तस्करी ,अंडर वर्ल्ड माफिया यहीं आते हैं .सारा खेला कर्मों का है .
धर्मात्माएं द्वापर से आती हैं और साधारण एवं पापात्माएं आती ही कलियुग में हैं .इससे पहले इनका कोई रोल नहीं है . 

अत :भ्रामक है यह कहना जीव ही ब्रह्म है .जीव रहने का कमरा है  ,आवास कैसे हो सकता हैजीव  .अलबत्ता जीव अपने नेचुरक हेबिटाट  में रह सकता है शीत निद्रा में अपना पार्ट आने तक सृष्टि रुपी मंच पर तब तक यह शीत निद्रा रहती है जब तक उसका कोई पार्ट नहीं होता . इसे ही इस अक्रिय अवस्था को मोक्ष (मुक्ति )मान लिया जाता है भक्ति मार्ग में जबकि मोक्ष ,जीवन मुक्ति तो गृहस्थ में रहते साक्षी भाव से मरजीवा बन जीते जी शरीर से मरना है आत्म स्वरूप में रहना है याद में परमात्मा के कर्म करते हुए .

गुरुवार, 23 मई 2013

भक्ति मार्ग की बातें

भक्ति मार्ग की बातें 

(१ )आत्मा सो परमात्मा ,शिवोहम शिवोहम .

क्या है यथार्थ इस कथन का तर्क की कसौटी  पर?

एक तरफ कहतें हैं सबका मालिक  एक .परमात्मा एक ही है .दूसरी तरफ कहते हैं आत्मा सो परमात्मा .वह कण कण में है .फिर तो सात अरब परमात्मा हो जायेंगे क्योंकि विश्व की आबादी सात  अरब हो गई है आगे और भी परमात्मा पैदा होंगें .जबकि  परमात्मा तो अजन्मा है नाम रूप से न्यारा  है निराकार है .फिर कण कण में कैसे हो सकता है कण तो स्थूल है .न्यूटन ने तो पृथ्वी को ही एक कण की संज्ञा दे दी थी .

आत्मा सो परमात्मा नहीं हो सकता क्योंकि हम कहतें हैं परमात्मा सर्व आत्माओं का पारलौकिक पिता है .पुत्र पिता जैसा तो हो सकता है ,पिता नहीं हो सकता अपना .

आत्मा परमात्मा के गुणों से तो संपन्न हो सकती है ,सुख शान्ति आनंद प्रेम से युक्त हो सकती है इन गुणों का असीम सागर नहीं हो सकती .परमात्मा नहीं हो सकती .शिवत्व तो हो सकता है उसमें वह शिव नहीं बन सकती .परमात्मा की शक्ति असीम रहती है कभी कम नहीं होती .आत्मा कमज़ोर हो जाती है ,विकार ग्रस्त होकर .यहाँ तक के एक व्यक्ति आवेश में आकर दूसरे  का खून भी कर देता है .अब यदि आत्मा सो परमात्मा है तो यह किसका कर्म माना जाएगा उस व्यक्ति का या उसमें मौजूद परमात्मा का ?यदि परमात्मा उस व्यक्ति में भी है तो क्या वह निरपेक्ष भाव से ह्त्या होते देखता रहेगा इतना कमज़ोर है परमात्मा  ?

शिव परमात्मा तो जन्म मरण से न्यारा है .सुख दुःख से परे है .

आत्मा सुख दुःख अनुभूत करती है शरीर में आती है अनेक बार .परमात्मा का कोई शरीर नहीं है .एक कल्प (अनादि काल चक्र )में सिर्फ एक बार उसका साधारण मनुष्य तन में अवतरण है .पुरानी दुनिया को नया बनाने के लिए . 

यूं दोनों का स्वरूप एक है परमात्मा को ज्योतिर -लिंगम कहा गया है आत्मा भी दीपक की लौ स्वरूप है मस्तक में चमकता चमकीला सितारा है .लेकिन आत्मा सो परमात्मा कहना सर्वथा गलत है .



( २ )गीता का सार है जो भी घटता है अच्छा घटता है .एक्यूरेट ड्रामा अनुसार .अनहोनी जैसा कुछ होता नहीं है .

जो कल हुआ था वह भी अच्छा था ,जो अब हो रहा है वह भी अच्छा है जो कल होगा वह भी अच्छा होगा .इसीलिए तुलसी बाबा ने कहा -

तुलसी भरोसे राम के रह्यो खाट पे सोय,

अनहोनी होनी नहीं ,होनी होय ,सो होय .

भक्ति मार्गियों में से अनेक को यह अन -उपयुक्त लगता है अटपटा लगता है .

एक उद्धरण लेते हैं .एक रोट्रेक्ट क्लब के गवर्नर साहब थे .परम दयालु .परम उपकारी .सबकी मदद करने वाले .कभी किसी का अहित नहीं किया था आपने .एक संस्था से उन्हें पत्र मिला पता चला उन्हें किसी शहर में विशेष  सम्मान के लिए बुलाया गया है .हवाई जहाज़ के टिकट भी आने जाने के भेज दिए गए थे .

गवर्नर साहब नियत समय पर घर से निकले .घर से एयरपोर्ट के रास्ते में उनकी कार दुर्घटना ग्रस्त हो गई .ज़नाब की दोनों टांगें टूट गईं .एक बहन उन्हें देखने अस्पताल पहुंची ,कहा ईश्वर सब ठीक करेगा .गवर्नर साहब बोले भगवान का नाम न लेना मेरे सामने .मैंने आज तक किसी का दिल नहीं दुखाया है .सबकी सेवा ही की है .क्रोध में उनका चेहरा तमतमा  गया था .बहन ॐ शान्ति कहके लौटने लगीं ,पीछे पीछे गवर्नर साहब की पत्नी आईं  -हाथ जोड़ के कहने लगीं ,इनका मन ठीक नहीं हैं वैसे ये ऐसे नहीं हैं ,इस आकस्मिक दुःख ने इनकी यह स्थिति कर दी है इन्हें तो सम्मान लेने जाना था .कहने लगे जब फल प्राप्ति का वक्त आया तो यह अनर्थ घट गया अनहोनी ये मेरे साथ ही  क्यों हुई .

बहन लौट आईं बाद इनके जितने भी लोग गवर्नर साहब को देखने आये और ईश्वर का नाम लिया ,इनका आवेश बढ़ता गया ,ईश्वर के प्रति .दस दिन गुज़रे वह बहन लौट के फिर आईं .देखा गवर्नर साहब शांत हैं ,प्रसन्न हैं ईश्वर के शुक्र गुज़ार हैं .बताने लगे बहन जी मुझे जिस प्लेन से जाना था वह दुर्घटना ग्रस्त हो गया सारे यात्री मारे गए .मेरी तो टांग ही टूटीं हैं .ठीक हो जायेंगी ,जान तो बच गई .जो हुआ अच्छा ही हुआ .बाकी लोगों की तो जान ही चली गई .

(३ )शिव और शंकर अलग अलग हैं 

शंकर परम योगी हैं .अपने शरीर का उन्हें कोई भान नहीं है .इसीलिए काया पर भभूत लगाया हुआ है .गले में सर्प की माला है .हाथ में डमरू है कैलाश परबत पर तपस्या रत हैं .आकारी देवता हैंशंकर  .शिव की स्तुति कर रहें हैं शंकर उनका आराध्य हैशिव  .पिता है शिव .

शंकर रचना है शिव रचता (रचना कार हैं ).शंकर प्रोडक्ट हैं शिव प्रोड्यूसर हैं .शिव के नै दुनिया के निर्माण कार्य में शंकर उनके सहयोगी बनते  हैं .पुरानी विकारग्रस्त दुनिया का विनाश करने में मदद करते हैं .

शंकर की तरह ब्रह्मा ,विष्णु ,श्री रामचन्द्र ,श्री कृष्ण ,श्री गणेश ,कार्तिकेय आदि भी आकारी देवता हैं .भगवान् भगवती स्वरूप  हैं .यदि ये सभी भगवानभगवती भगवान हो जायेंगे तो पूछा जाएगा इनका हेड कौन हैं .हेड तो एक ही है परमात्मा शिव .३ ३ करोड़ देवता भगवान नहीं हो सकते .भगवान् भगवती स्वरूपा ज़रूर हो सकते हैं .

(4 )जीव ही ब्रह्म है 

यथार्थ :पञ्च तत्वों से बनी साकारी दुनिया (मृत्यु लोक ,Corporeal world)से परे छटा महत्व तत्व है ब्रह्म .रहने की जगह है यह तो कुदरती आवास है यह तो आत्मा का परमात्मा  का  .आत्मा इस सृष्टि रुपी रंग मंच पर अपना एक्यूरेट पार्ट बजाने इसी ब्रह्मलोक से उतर कर काया (पञ्च भूतों से बने शरीर)में प्रवेश करती है .देवात्माएँ सतयुग से नीचे आतीं हैं इस ब्रह्म लोक से उतर .पूरे ८ ४ जन्म हैं सतयुगी आत्माओं के ,शुरू से आतीं हैं  येपरमधाम (मुक्ति धाम ब्रह्म लोक से ),त्रेता युगी भी देवात्माएँ हैं बस थोड़ा पवित्रता का स्तर कम हुआ है .सतयुगी आत्माओं का ही नौवां जन्म है यहाँ .उसके आगे दसवां ....फिर बारहवां .बाद इसके द्वापर शुरू हो जाता है .पांच हज़ार वर्ष के अनादि सृष्टि चक्र में प्रत्येक युग की अवधि बराबर बराबर है १ २ ५ ० वर्ष अलबत्ता पवित्रता का स्तर कमतर होता जाता है .सतयुग में डायमंड तो कलियुग में कोयला हो जाती है आत्मा .जबकि कोयला और डायमंड हैं एक ही तत्व कार्बन (graphite )के ही  अपरूप ,Allotropes हैं . सारे स्केंडल ,मेच फिक्सिंग ,तस्करी ,अंडर वर्ल्ड माफिया यहीं आते हैं .सारा खेला कर्मों का है .
धर्मात्माएं द्वापर से आती हैं और साधारण एवं पापात्माएं आती ही कलियुग में हैं .इससे पहले इनका कोई रोल नहीं है . 

अत :भ्रामक है यह कहना जीव ही ब्रह्म है .जीव रहने का कमरा है  ,आवास कैसे हो सकता हैजीव  .अलबत्ता जीव अपने नेचुरक हेबिटाट  में रह सकता है शीत निद्रा में अपना पार्ट आने तक सृष्टि रुपी मंच पर तब तक यह शीत निद्रा रहती है जब तक उसका कोई पार्ट नहीं होता . इसे ही इस अक्रिय अवस्था को मोक्ष (मुक्ति )मान लिया जाता है भक्ति मार्ग में जबकि मोक्ष ,जीवन मुक्ति तो गृहस्थ में रहते साक्षी भाव से मरजीवा बन जीते जी शरीर से मरना है आत्म स्वरूप में रहना है याद में परमात्मा के कर्म करते हुए .


कर्मों की गुह्य गति (II)

कर्मों की गुह्य गति (II)
द्वापर शुरू होते ही हम देह अभिमान में आ जाते हैं .विकारों में आते चले जाने से हमारी आत्मा कमज़ोर होती चली जाती है .यद्यपि धर्मात्माएं इस अवपतन को रोकने की पूरी चेष्टा करतीं हैं लेकिन ईश्वर का सही परिचय न मिल पाने से पुण्य का खाता चुकता जाता है पाप का बढ़ता जाता है .

वर्तमान युग जो कलियुग का अंतिम चरण है पुरुषोत्तम संगम युग है .अब समय है हम पूर्व के तरेसठ  (६ ३ )जन्मों (२ १ द्वापर ,४ २ कलियुग )के पाप कर्मों का खाता योगबल से भस्म करें .वर्तमान में अब पाप कर्म करने से बाज़ आयें .इस दौर में हमारे तो राजनीतिक धन्धेबाज़ (कथित रहनुमा ,नेता )भी तीर्थों के तीर्थ तिहाड़ की यात्रा कर आये हैं ,अब बस करें .देह और देह के सम्बन्ध ही इस दौर की हकीकत बनके रह गए हैं .फॉकस में नारी की देह है .देह का मेला है .जिस देश में नारी का सम्मान  नहीं होता ,उसकी आत्मा कुचली जाती है उसका सर्व नाश होना सुनिश्चित होता है .इसीलिए पाप का बोझा बढ़ता जा रहा है .

अब इस आखरी जन्म में संगम युग पर ब्रह्मा कमल मुखवंशावली ब्राह्मणों को (ब्रह्मा के मुख से गीता ज्ञान सुन  जिनका स्वभाव बदला है,जिन्होनें अपने अ -लौकिक पिता ब्रह्मा और पार -लौकिक पिता शिव परमात्माको जान लिया है ,काल चक्र को जान लिया है   )सतयुग और त्रेता के २ १ जन्मों की पूँजी इस एक जन्म में जमा करनी होगी .पावन बनना होगा .श्रेष्ठ कर्म ही अब करना होगा .

घटनाओं को पकड़ो मत छोड़ दो .छोड़ो तो छूटो .क्षमा करो और भूल जाओ .व्यर्थ संकल्प के लिए अब समय ही कहाँ बचा है .पंख लगाके उड़ जाओ .अब अपने घर (ब्रह्म लोक ,शान्ति धाम ,परमधाम ,मुक्ति धाम )जाना है पूर्ण पावन बनके .नहीं बनेंगे तो सज़ा खायेंगे .विकर्म विनाश तो करने ही होंगें सजा खाके या फिर योग बल से .खुद को आत्मा समझ सब कर्म परमात्मा की याद में करते हुए ,कर्म योगी बन .फिर दूसरे चक्र (अनादि काल चक्र )में अपना पार्ट नाटक में बजाने के लिए फिर से  आना होगा .यह बना बनाया परफेक्ट ड्रामा है .याद रहे मैं विश्व मंच पर एक अभिनेता हूँ ,मुझे हर पार्ट ,हर अभिनय अच्छे से भी अच्छा करना है .मेरे कर्म ऐसे हो जिससे मेरे बेहद के बाप का नाम बाला हो रोशन हो ..

बुरी चीज़ें (प्रतिबंधित चीज़ें )लेकर विदेश (धर्मराजपुरी )में जाओगे ,पकड़े  जाओगे जैसे यहाँ कस्टम वाले पकड़ लेते हैं .चीज़ भी जब्त होगी जेल भी जाओगे ,धर्मराज शिव दूतों से सजा भी पाओगे .

संकल्प करो सम्मान के साथ हम जायेंगे और सद्कर्मों (श्रेष्ठ कर्मों )की पूँजी खायेंगे .इस खेल को खेलो दुखी मत होवो .हमको अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाना हैं कोई विक्रम हम नहीं करेंगे .

शिव पिता  को अब याद करो ,मुक्ति धाम तुम्हें जाना है ,

अपने सुकर्मों (सद्कर्मों) के बल पर ही, सतयुग में तुमको आना है .

ये संगम  का स्वर्णिम  युग है ,शिव पिता फिर से आया है ,

ब्रह्मा मुख से शिव बाबा ने, वही गीता ज्ञान सुनाया है .



कलयुग का अंत  अब आया है ,विकराल विनाश खड़ा  आगे ,

है अंत समय अब हम सब को, शिव पिता ने बतलाया है .


पांडव शिव शक्ति सेना भी रणभेरीअब  फिर से बजती है ,


शिव पिता  के ज्ञान से  फिर , माया को मार भगाना है .






शिव पिता को अब याद करो मुक्ति धाम तुम्हें जाना है .

ॐ शान्ति .   

बुधवार, 22 मई 2013

कर्मों की गहन गति (I )

कर्मों की गहन गति 

बड़ी गुह्य है,गहन है कर्म की गति .जो करेगा वह भरेगा .जैसा करेगा वैसा भरेगा .कर्म शब्द में बहुत बड़ी गहराई छिपी है इसका शब्दिक अर्थ है कोई कार्य ,क्रिया अथवा कृति कर्म है .कर्म का व्यापक अर्थ है क्रिया और उसका परिणाम .जैसे बीज के अन्दर फल ,फल में बीज समाया हुआ है .वैसे ही कार्य (एक्शन )और उसका परिणाम (रिएक्शन )कर्म में समाया हुआ है .लेकिन वह परिणाम (फल ,दुःख भोग कब मिलेगा )हमें ठीक ठीक पता नहीं है .यह ठीक ऐसे ही है जैसे हम खुले मैदान में आवाज़ कर रहें हैं और कोई प्रतिक्रिया (प्रतिध्वनि )हमें नहीं मिलती है .

Open window is the unit of sound intensity  .

यहाँ तो आप खुले में ही बोल रहे हैं जहां ध्वनी खो जाती है आकाश में समा जाती है .इसीलिए स्थान अंतर से प्रतिक्रिया भी बदल जाती है .

हवा में आप लकीर खींचेगे ,दिखाई नहीं देगी .पानी में खींचेंगे थोड़ी देर तक ज़रूर दिखलाई देगी फिर ओझल हो जायेगी .लहरें उसे ले उडेंगी .वही लकीर पत्थर पर खींच दी तो सालों साल रह जायेगी .

अगर मैं आज स्वस्थ हूँ तो यह परिणाम है मेरी जीवन शैली  का ,पिछले जन्म के कर्म का .परिणाम का फिर कर्म बनता है .कार्य -करण  सिद्धांत है यह .

जो हम दूसरों को देते हैं वही हमारे पास लौटके आता है .हमें वही मिलता है जो हम दूसरों को देते हैं .इस शिक्षा के सिद्धांत से हम कर्मों की गहराई में जा सकते हैं .आप वैसा ही व्यवहार करें औरों  के साथ जैसा आप अपने लिए दूसरों से चाहतें हैं .

हमारे कर्म ही वह कारक (कारण )है जो सही समय पर कर्मफल के रूप में आते हैं .बीज बोया है तो समय आने पर ही फल आयेगा .फ़ौरन नहीं आयेगा .दादा बोय , पोता खाय .पेड़ दादा जी लगा गए आम का ,फल पोते जी खा रहें हैं .

एक होटल के बाहर लिखा था यहाँ आप जितना भी खाइये ,जो भी खाइये ,निश्चिन्त होके  खाइये ,बिल आपका पोता  चुकाएगा .एक व्यक्ति पहुंचा उस होटल में जी भरके खूब खाया .चलने लगा तो वेटर बिल लेके आ गया ,व्यक्ति  ने पूछा यहाँ तो आपने कुछ और लिखा है व्यक्ति बोला बिलकुल ठीक लिखा है यह बिल आपके बाबा  का है .कर्म का बीज ऐसा क्यों है आप बोयें दूसरा खाए ?

जैसा बीज वैसा फल .एक बीज से फिर अनेक फल मिल जाते हैं .बीज बोने और फल खाने का समय अलग अलग है .फल की सीजन होती है .एक ख़ास ऋतू में ही फल आयेगा .उससे पहले नहीं .

बोये पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से पाय?

सुख देंगे तो सुख मिलेगा ,

दुःख देंगे तो दुःख मिलेगा .आम के बीज से आम का ही फल मिलेगा .बबूल से कांटे ही मिलेंगे .अगर आज कोई दुःख दे रहा है तो समझो पीछे का कोई हिसाब किताब चुक्तू  हो रहा है .

फूल का एक ही बीज बोने से अनेक फूल निकलते हैं .गेंहू का एक ही दाना बोने से कितने ही दाने निकलते हैं .

समय और स्थान से भी कर्म का निर्धारण होता है 

बोर्डर पर गोली चलाना पाप नहीं कहलायेगा .अगर मारे गए तो शहीद कहलायेंगे .

क्योंकि समय अलग है स्थान अलग है .

क़ानून को भी जानना बहुत ज़रूरी है 

अभी भी डॉ टरमिनली इल पेशेंट को जहर नहीं देगा .इच्छा मृत्यु का क़ानून किसी किसी देश में ही अभी बना है .

बीज बोने और फल पाने का समय अलग अलग है 

याद रखें हमारे कर्मों का फल मिलेगा ज़रूर आज नहीं तो कल .इसलिए गलती हो गई है तो उसे छिपाइए मत वरना गलती करने का संस्कार पक्का हो जाएगा .सच बोलके माफ़ी मांगके छूट जाओ .शिव बाबा को सोरी बोल दो .

धीरज का फल मीठा होता है 

धरती पर पहले हल चलाया जाता है .खेत की जुताई की जाती है .बीज को बोया और सींचा जाता है .कोपलों की रक्षा करनी होती है .फल को पकने का वक्त देना होता है .पका हुआ फल खुद भी खाया जाता है औरों को भी खिलाया जाता है .खाओ और खिलाओ !ख़ुशी बांटो !मैं भी स्वस्थ और खुश तू भी स्वस्थ और खुश .आम के आम और गुठलियों के दाम .गुठलियों को फिर बो दो .

वक्त से पहले जब कुछ भी नहीं होता तो कर्म फल कैसे मिल जाएगा .इसलिए धीरज रखो .

एक वृत्तांत है एक बुजुर्ग व्यक्ति ने अपनी तीनों बहुओं को कुछ गीले बीज इस हिदायत के साथ दिए -इन्हें संभाल के रखना मैं यात्रा पर जारहा हूँ लौट के ले लूंगा .

पहली ने बीजों को ये सोच के फैंक दिया इन बीजों को फैंकना ही बेहतर ,बेकार हैं यह .

दूसरी ने सहेज के रख लिए .कुछ समय बाद बीज सड़ गए .

तीसरी ने बीज बो दिए .कुछ समय बाद वे पल्लवित हो गए .पौधा भी बन गया बड़ा हो गया नए बीज मिल गए .

बुजुर्ग व्यक्ति तीसरी बहु से मिलके बहुत खुश हुआ .पहली खुले हाथ से खर्च करने वाली सिद्ध हुई दूसरी कंजूस .और तीसरी विवेकवान .

विचार ही भाग्य का निर्धारण करते हैं 

विचार से ही वृत्ति बनती है फिर कर्म बनता है .हमारे स्वभाव का निर्धारण होता है .अपने कर्मों के लिए व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेवार होता है .भाग्य तो परिणाम है आपके ही कर्मों का .कर्म के फल से कोई बच  नहीं सकता .कर्म ही जीवन का आधार है .सच्ची पूँजी है जो जन्म के साथ चलती है .इस दुनिया की कोई भी पूँजी हमारे साथ नहीं जायेगी सिर्फ कर्म जायेंगे .

कर्म फल एक उपहार है एक शिक्षक है जो हमें शिक्षा देता रहता है .

कर्म का संन्यास नहीं हो सकता हमें सिर्फ अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाना है 

एक व्यक्ति मुझे अपशब्द कह रहा है गाली दे रहा है .क्या मैं भी उसे गाली दूं ?उसके कर्म का अनुसरण  करू? ?

उत्तर :वह देहअभिमान ,अहंकार में आके ऐसा कर रहा है मैं उसकी इस वृत्ति का अनुगामी क्यों बनूँ  ?अपनी स्थिति क्यों खराब करूँ ?

चार प्रकार की वृत्तियाँ हैं 

(१)दानवी वृत्ति :मेरा सो मेरा ,तेरा भी मेरा 

(२ )मानवी वृत्ति :मेरा सो मेरा ,तेरा सो तेरा 

(३ )दैवीय वृत्ति :मेरा सो तेरा 

(४ )योगी वृत्ति :मेरा सब कुछ परमात्मा का 

चार प्रकार के कर्म 

(१ ) पाप कर्म (जिसकी आगे चलके सजा मिलेगी ज़रूर )

(२ )पुण्य कर्म 

(३ )श्रेष्ठ कर्म 

(४ )अकर्म (जिसका आगे फल नहीं है )

दया धरम को मूल है ,

पाप मूल अभिमान .

देह अभिमान पर आधारित नकारात्मक विचारों के वश किए गए कर्म पाप के खाते में जाते हैं .

तन के रोग ,मन के रोग ,मन की अशांति पाप का ही परिणाम है .

ज़रुरत मंदों की मदद करना पुण्य कर्म है .पुण्य कर्म में भी व्यक्ति नाम और यश की आशा रखता है .पुण्य कर्म के लिए ज़रूरी है नाम, मान ,अभिमान न हो .गुप्त दान महा दान .लेकिन लोग दान देने के बाद नाम लिखवाते हैं पत्थर पर .

श्रेष्ठ कर्म आत्मा ,परमात्मा के ज्ञान बिना हो नहीं सकता .आत्मिक स्थिति (स्वयं को ज्योति स्वरूप आत्मा समझ )ज्योतिबिंदु स्वरूप परमात्मा की याद में किए गए कर्म श्रेष्ठ कर्म बनते हैं .नर ऐसी करनी करे सत्य नारायण बन जाए ,नारी ऐसी करनी करे नारायणी (महा लक्ष्मी )बन जाए .

अकर्म  में बीज बोते ही नहीं है बस फल खाते हैं .सतयुग और त्रेता युग का कर्म अ -कर्म है .जब पूँजी  चुक जाती है फल की हम द्वापर में आ जाते हैं .क्योंकि सतयुग और त्रेता के २  १ जन्मों तक भगवान् को याद ही नहीं करते हैं .गीता ज्ञान का यहाँ प्राय :लोप हो जाता है .

कर्मों की गुह्य गति (II)
द्वापर शुरू होते ही हम देह अभिमान में आ जाते हैं .विकारों में आते चले जाने से हमारी आत्मा कमज़ोर होती चली जाती है .यद्यपि धर्मात्माएं इस अवपतन को रोकने की पूरी चेष्टा करतीं हैं लेकिन ईश्वर का सही परिचय न मिल पाने से पुण्य का खाता चुकता जाता है पाप का बढ़ता जाता है .

वर्तमान युग जो कलियुग का अंतिम चरण है पुरुषोत्तम संगम युग है .अब समय है हम पूर्व के तरेसठ  (६ ३ )जन्मों (२ १ द्वापर ,४ २ कलियुग )के पाप कर्मों का खाता योगबल से भस्म करें .वर्तमान में अब पाप कर्म करने से बाज़ आयें .इस दौर में हमारे तो राजनीतिक धन्धेबाज़ (कथित रहनुमा ,नेता )भी तीर्थों के तीर्थ तिहाड़ की यात्रा कर आये हैं ,अब बस करें .देह और देह के सम्बन्ध ही इस दौर की हकीकत बनके रह गए हैं .फॉकस में नारी की देह है .देह का मेला है .जिस देश में नारी का सम्मान  नहीं होता ,उसकी आत्मा कुचली जाती है उसका सर्व नाश होना सुनिश्चित होता है .इसीलिए पाप का बोझा बढ़ता जा रहा है .

अब इस आखरी जन्म में संगम युग पर ब्रह्मा कमल मुखवंशावली ब्राह्मणों को (ब्रह्मा के मुख से गीता ज्ञान सुन  जिनका स्वभाव बदला है,जिन्होनें अपने अ -लौकिक पिता ब्रह्मा और पार -लौकिक पिता शिव परमात्माको जान लिया है ,काल चक्र को जान लिया है   )सतयुग और त्रेता के २ १ जन्मों की पूँजी इस एक जन्म में जमा करनी होगी .पावन बनना होगा .श्रेष्ठ कर्म ही अब करना होगा .

घटनाओं को पकड़ो मत छोड़ दो .छोड़ो तो छूटो .क्षमा करो और भूल जाओ .व्यर्थ संकल्प के लिए अब समय ही कहाँ बचा है .पंख लगाके उड़ जाओ .अब अपने घर (ब्रह्म लोक ,शान्ति धाम ,परमधाम ,मुक्ति धाम )जाना है पूर्ण पावन बनके .नहीं बनेंगे तो सज़ा खायेंगे .विकर्म विनाश तो करने ही होंगें सजा खाके या फिर योग बल से .खुद को आत्मा समझ सब कर्म परमात्मा की याद में करते हुए ,कर्म योगी बन .फिर दूसरे चक्र (अनादि काल चक्र )में अपना पार्ट नाटक में बजाने के लिए फिर से  आना होगा .यह बना बनाया परफेक्ट ड्रामा है .याद रहे मैं विश्व मंच पर एक अभिनेता हूँ ,मुझे हर पार्ट ,हर अभिनय अच्छे से भी अच्छा करना है .मेरे कर्म ऐसे हो जिससे मेरे बेहद के बाप का नाम बाला हो रोशन हो ..

बुरी चीज़ें (प्रतिबंधित चीज़ें )लेकर विदेश (धर्मराजपुरी )में जाओगे ,पकड़े  जाओगे जैसे यहाँ कस्टम वाले पकड़ लेते हैं .चीज़ भी जब्त होगी जेल भी जाओगे ,धर्मराज शिव दूतों से सजा भी पाओगे .

संकल्प करो सम्मान के साथ हम जायेंगे और सद्कर्मों (श्रेष्ठ कर्मों )की पूँजी खायेंगे .इस खेल को खेलो दुखी मत होवो .हमको अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाना हैं कोई विक्रम हम नहीं करेंगे .

शिव पिता  को अब याद करो ,मुक्ति धाम तुम्हें जाना है ,

अपने सुकर्मों (सद्कर्मों) के बल पर ही, सतयुग में तुमको आना है .

ये संगम  का स्वर्णिम  युग है ,शिव पिता फिर से आया है ,

ब्रह्मा मुख से शिव बाबा ने, वही गीता ज्ञान सुनाया है .



कलयुग का अंत  अब आया है ,विकराल विनाश खड़ा  आगे ,

है अंत समय अब हम सब को, शिव पिता ने बतलाया है .


पांडव शिव शक्ति सेना भी रणभेरीअब  फिर से बजती है ,


शिव पिता  के ज्ञान से  फिर , माया को मार भगाना है .






शिव पिता को अब याद करो मुक्ति धाम तुम्हें जाना है .

ॐ शान्ति .   


मंगलवार, 21 मई 2013

सेहतनामा

सेहतनामा 

(१ ) अक्सर जो लोग कैंसर के मुंह से निकल आते हैं रोग मुक्त होकर ,उनमें रसायन चिकित्सा (chemotherapy )के पार्श्व प्रभाव (अवांच्छित असर )के रूप में बोध सम्बन्धी ह्रास (cognitive impairments)दिखलाई देता है .रिसर्चरों ने पता लगाया है तीन माह तक आन लाइन गेम्स खेलने के बाद ही इनकी बौद्धिक क्षमता में गिरावट की भरपाई होने लगती है .शोध कर्ताओं ने इनकी मौखिक वाचन एवं संभाषण क्षमता तथा याददाश्त का जायजा लेने के बाद यह अन्वेषण किया है .

(2 )लैमोनेड (Lemonade)शिकंजवी ,उच्च रक्त चाप ,नाजिया (उलटी होने की अनुभूति ,मतली )तथा चक्कर आने की तकलीफ में राहत  पहुंचाता है .

(३ )पालक बीटा -कैरोटिन का एक उत्तम स्रोत है .रोगों का मुकाबला करने वाला एक शक्तिशाली असर कारक एंटीओक्सिडेंट भी है नेत्र रोग  सफ़ेद मोतिया (cataract ) के पनपने के  जोखिम कम करदेता है यह असरदार  प्रति ओक्सिकारक . 

(४ )अवसाद ग्रस्त मरीजों के दिमाग में जैविक घड़ी  की लय ताल को नियंत्रित  करने वाले जींस (जीवन इकाइयां )में गंभीर किस्म की रद्दो बदल हो जाती है .इस अन्वेषण से डिप्रेशन के द्रुत गामी इलाज़ के नए तरीके ढूँढने में मदद मिल सकती है इन अ-सामन्य  हो चुके जीवन खंडों की दुरुस्ती  के द्वारा .आखिर जीवन इकाइयों में आये विक्षोभ को अब ठीक कर लिया जाता ही है .

(५ )खाते वक्त यदि आप शाष्त्रीय  संगीत का लुत्फ़ उठा रहें हैं ,आप ज्यादा नहीं खायेंगे ,कम खायेंगे ,आप संगीत की विलंबित लय के साथ चलते हैं ,चलने लगते हैं खाते वक्त .

(६ )जले हुए भाग पर कोल्ड ब्लेक या कोल्ड ग्रीन टी में रसोई में इस्तेमाल होने वाले dish towel को डुबोकर आहिस्ता आहिस्ता लगाएं .आराम मिलेगा .

(७ )A SMALL BREAKFAST CAN HELP YOU SHED THE KILOS 

मेडिकल रिसर्च कोंसिल (MRC )ह्यूमेन न्यूट्रीशन रिसर्च यूनिट ने अपने ताज़ा अन्वेषणों से पता लगाया है जो लोग सुबह के वक्त अपने पोर्शन साइज़ को घटाकर हल्का नाश्ता करते हैं वह बाकी दिन के बचे हुए हिस्से में भी इसकी भरपाई के लिए ज्यादा केलोरी वाला भोजन नहीं करते हैं .

(८ )लहसुन का इस्तेमाल न सिर्फ रक्त चाप को कम करता है प्लेटलेट के पुंजन /समूहन /एकत्रीकरण बोले तो एगरिगेशन को कम करने भी मदद करता है ,झुण्ड नहीं बना पातीं हैं प्लेटलेटें .

(९ )कच्ची प्याज का सेवन दिल के मित्र माने गए HDL CHOLESTEROL के निर्माण को प्रेरित करता है .आपका दिल तंदरुस्त रहता है .

(१ ० ) रिसर्च से पता चला है दाल चीनी का खाने पीने  की चीज़ों चाय ,सब्जी आदि में नियमित सेवन खून में तैरती शक्कर की घट बढ़ को थामकर नियमित और संतुलित बनाए रखने में मदद गार सिद्ध हो सकता है .

(१ १ )कम सोना और ज़रुरत से बहुत ज्यादा नींद लेना देर तक सोते रहना दोनों ही परि -हृदय धमनी रोग तथा ब्रेन अटेक (स्ट्रोक )के खतरे को बढ़ा सकता है .नियमित छ :से आठ घंटा ही सोयें .

(१ २ ) CELLPHONE CALLS CAN SPIKE BLOOD PRESSURE 

A Study has found that talking on a phone causes systolic blood pressure -a risk factor for cardiovascular disease -to rise significantly .They also found that patients who got more than 30 calls a day developed a form of immunity to the spikes.

(१ ३ )Sleeping on two pillows can help prevent swollen eyes in the morning .

(१ ४ )White distilled water (आसवित सफ़ेद सिरका )acts as a disinfectant (संक्रमण रोधी रोगाणु नाशक पदार्थ )against germs (ज़रासीम ,रोगकारक कीटाणु )and is also safe around children .बालकों के लिए भी निरापद है यह .

(१ ५ )WORK STRESS INCREASES BLOOD FAT LEVELS 

Spanish researchers have studied how high job stress affects cardiovascular health and linked the results to dyslipidemia , a disorder that alters the levels of lipids and lipoproteins in the blood .The findings appear in the Scandinavian Journal of Public Health.

(१ ६ )Love looking taller ?Be careful !Higher the heel ,greater the risk of stress on your knees.

ऊंची एड़ी  की सैंडिल पहना माने घुटनों पर दवाब के जोखिम को बढ़ाना।घुटनों का काम बढ़ाना .

(१ ७ )दांत में दर्द है तो असर ग्रस्त दांत के पड़ोसी दांत के नीचे लॉन्ग रखें रहें थोड़ा थोड़ा दबाएँ ताकि रस असर ग्रस्त दांत तक पहुंचे .

(१ ८ )व्यक्ति के पीले नाखून मधुमेह या फिर फेफड़ों के विकार का पूर्व संकेत भी हो सकते हैं .

(१ ९ )तरबूज (Watermelon )विटामिन B6 से युक्त रहता है यही वह हारमोन है जिसका इस्तेमाल हमारा शरीर हेपी हारमोन Dopamine के संश्लेषण में करता है .यह वास्तव में एक ऐसा दिमागी रसायन है जो जहां बनता है वहां से ट्रेन्समीटर का कम करता है .मैराथन दौड़ संपन्न होने पर धावक जो अपार सुखानुभूति करता है वह इसी दिमागी रसायन के अतिरिक्त निर्माण की वजह से होती है .

(२ ० )







  1. Images for dish towels

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काल चक्र :अनादि विश्व नाटक


काल चक्र :अनादि विश्व नाटक 

काल चक्र की अपनी गति होती है कर्मों की अपनी .अपनी रफ़्तार से चलता 


है समय .मनुष्य सोचता कुछ और है होता कुछ और है .जब हो जाता 

मनुष्य कहने लगता है मेरे साथ ही क्यों होता है यह .मैं ने तो किसी का 

कुछ बुरा नहीं किया .इस प्रश्न का उत्तर न मिलने पर मनुष्य चिड़चिड़ा हो 

जाता है . 

फिर भी बिना समय के मिजाज़ को समझे आदमी समय की मेनेजिंग करता है .लिस्ट बना लेता है कब क्या करना है .बेशक ऐसा करने से समय का अधिकतम दोहन (उपयोग )तो हो जाता है लेकिन कई बार फिर भी ऐसा समय आ जाता है, दिवसांत में व्यक्ति कह उठता है आज कुछ नहीं किया आजका दिन यूं ही गया .

अचानक कुछ आकस्मिक घट गया .समय हमसे प्रतिउत्तर की मांग करने लगता है .समय बड़ा बलवान है .समय के आगे न चले किसी का जोर .

नर चाहत कुछ और ,होवत है कुछ और .

और हम कह उठते हैं :

समय करे नर क्या करे ,समय समय की बात ,

किसी समय के दिन बड़े ,किसी समय की बात .

समय की मांग है परिवर्तन 

परिवर्तन न किया तो समय महाकाल भी बन जाएगा 

अचानक  किसी के लिए कहने लगते हैं -उसे कोई नहीं बदल सकता .वह बड़ा हटी है ,जिद्दी है मनमाने की करता है .

समय का पंछी उड़ता जाए कहता जाए -इस संसार में हर चीज़ परिवर्तन शील है केवल परिवर्तन ही शाश्वत है .संसार परिवर्तन शील है यहाँ हर चीज़ एक चक्र में चलती है .

चक्र माने जिसका आदि और अंत न हो .जैसे दिन और रात .भोर कब आजाती है सहज रूप ,किसी को पता नहीं चलता .दिन के बाद रात ,रात के बाद फिर दिन .जन्म के बाद मृत्यु ,मृत्यु के बाद फिर जन्म .अनादि काल से यह हो रहा है। होता आया है, होता रहेगा .जैसे कार्बन -नाइट्रोजन साइकिल ,और जैसे -जल चक्र .

हर चक्र की चार अवस्थाएं हैं :

सुबह ,दोपहर ,शाम और रात्रि .रितु चक्र की अवधि एक साल है :ग्रीष्म ,बरसात ,शीतकाल ,बसंत .ऐसे ही काल चक्र की अवधि है ५ ० ० ० वर्ष .उसके बाद पुनरा -वृति ,रिपीटीशन चक्र का .अनादि काल से ऐसा ही हो रहा है होता रहेगा .

अंग्रेजी केलेंडर में साल सवा ३ ६ ५ दिनी है हिन्दू केलेंडर में ३ ५ ४ दिनी .माया केलेंडर की भविष्य वाणी को लेकर बड़ा हू हल्ला मचाया गया .कहा गया २ १ दिसंबर २ ० १ २ को दुनिया नष्ट हो जायेगी .हुआ कुछ नहीं .

२ २ दिसंबर से माया चक्र फिर शुरू हो गया .माया केलेंडर के हिमायतियों से जब पूछा गया उन्होंने कहा हमने विनाश  की बात की ही नहीं थी .परिवर्तन की बात की थी जो इस अवधि के बाद तेज़ी से होने लगेगा .प्राकृतिक तत्वों वायु ,जल ,अग्नि ,पृथ्वी आकाश की तात्विकता और भी अधिक तेज़ी से विनष्ट होने लगेगी .परिवर्तन की प्रक्रिया समाज में भी आरम्भ हो चुकी है .एक तरफ पाप कर्मों ने माया रावण ने उग्र रूप धरा है दूसरी तरफ कुछ लोग सुकर्म भी कर रहे हैं .

स्वास्तिक का चिन्ह (चित्र )काल गति (काल चक्र )को बा -खूबी समझाता है .


Right-facing swastika in the decorative form, used to evoke sacred force
The swastika (卐) (Sanskritस्वस्तिक) is an equilateral cross with four arms bent at 90 degrees. The earliest archaeological evidence of swastika-shaped ornaments dates back to the Indus Valley Civilization as well as the Mediterranean Classical Antiquity. Swastikas have also been used in various other ancient civilizations around the world including China, Japan, India, and Southern Europe. It remains widely used in Indian religions, specifically in HinduismBuddhism, and Jainism, primarily as a tantric symbol to evoke shakti or the sacred symbol of auspiciousness. The word "swastika" comes from the Sanskrit svastika - "su" meaning "good" or "auspicious," "asti" meaning "to be," and "ka" as a suffix. The swastika literally means "to be good". Or another translation can be made: "swa" is "higher self", "asti" meaning "being", and "ka" as a suffix, so the translation can be interpreted as "being with higher self".[1]
The symbol has a long history in Europe reaching back to antiquity. In modern times, following a brief surge of popularity as a good luck symbol in Western culture, a swastika was adopted as a symbol of the Nazi Party of Germany in 1920, who used the swastika as a symbol of the Aryan race. After Adolf Hitler came to power in 1933, a right-facing 45° rotated swastika was incorporated into the Nazi party flag, which was made the state flag of Germany during Nazism. Hence, the swastika has become strongly associated with Nazism and related ideologies such as antisemitism, hate, violence, death, and murder in many countries, and is now largely stigmatized there due to the changed connotations of the symbol.[1] Notably, it has been outlawed in Germany and other countries if used as a symbol of Nazism in certain instances . Many modern political extremists and Neo-Nazi groups such as the Russian National Unity use stylized swastikas or similar symbols.


स्वस्तिक का अर्थ है: सु +अस्ति का संधि योग है स्वास्तिक 

बोले तो हर घड़ी शुभ है ,निश्चिन्त रहो जो कार्य करना चाहते हो श्री गणेश करो .

यहाँ स्वास्तिक की दाएँ भुजा का अर्थ है सतयुग .दायाँ बोले तो शुभ ,सत्य ,१ २ ५ ० वर्ष की सतयुगी कालावधि में सूर्य वंशी आत्माओं का सुशासन है राज्य है .मुखिया हैं श्री नारायण और नारायणी श्री लक्ष्मी .यहाँ आत्मा की कलाएं (गुण )कम जास्ती नहीं होते .यहाँ सब कुछ सोलह आने सच है .सच खंड है सत  युग .यहाँ सब देवात्माएँ हैं जिन्हें हम भगवान भगवती समझते हैं .लेकिन इनका हेड कौन है हम नहीं जानते .हेड है निराकार शिव परमात्मा .वह जो पिताओं का भी पिता है .देवात्माओं का भी वही पिता है सर्वोच्च सत्ता है वह परमधाम वासी जन्ममरण से परे .काल चक्र से परे .

सूर्य वंशी देवता स्वेच्छा से अपना प्रकाश मय शरीर छोड़ते हैं . संकल्प सृष्टि है यहाँ .अ -मैथुनी सृष्टि है यहाँ . 

यहाँ कोई असुर नहीं है कोई हिंसा नहीं है .असुर नहीं है तो देवासुर संग्राम भी नहीं है .शेर और बकरी एक ही नदी घाट पानी पीते हैं .

इसके बाद आता है १ २ ५ ० वर्ष कालावधि का ही त्रेता युग जहां चन्द्र वंशी आत्माओं का सुराज्य है .लेकिन स्वास्तिक की भुजा नीचे की और मुड़ गई है .है सच खंड ही लेकिन थोड़ा कम तीव्रता लिए सुख की .

यहाँ श्री रामचन्द्र और श्री सीता का सुराज्य है .सतयुग में नारायण कृष्ण का ही रूप हैं .श्री लक्ष्मी राधा का .इसीलिए कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं .

कृष्ण का ही नौवां जन्म है श्री रामचन्द्र ,चन्द्रवंशी .उनके नाम के आगे ही चन्द्र जड़ा  हुआ है .१ २ ५ ० वर्ष की कालावधि में यहाँ चन्द्र वंश की बारह पीढियां हैं .ये सभी देवात्माएँ १ २ कला संपन्न हैं .आत्मा की शक्ति थोड़ी सी क्षीण ज़रूर हो जाती है .फिर भी सुख शान्ति है सर्वत्र .सब आत्माएं कर्म फल का भोग कर रहीं हैं .इनका कर्म अ-कर्म  कहलाएगा .जिसकी आगे सजा नहीं हैं .वह अ -कर्म है .

पूछा जा सकता है जब हर तरफ सुख शान्ति है पवित्रता है तब देवात्माएँ सतयुग से नीचे त्रेता में क्यों चली आईं .और फिर वाम मार्गी बन द्वापर में जहां स्वास्तिक की भुजा बाएँ मुड़ गई है .

उत्तर :ये सारी  कायनात  ,सृष्टि व्यवस्था से अ -व्यवस्था की ओर  बढ़ रही है . ऑर्डर से डिस -ऑर्डर की ओर .यही है ऊष्मा गति विज्ञान का दूसरा नियम है .(Second law of thermodynamics:There is more dis -order in the universe than order .Enotropy ,a measure of dis -order   in the universe thus tends to increase.)

हर चीज़ पहले सु -व्यवस्थित होती है फिर अ -व्यवस्थित हो जाती है .पूर्णिमा अमावस्या में बदल जाती है .पूर्णता अ -पूर्णता में .

अगले १ २ ५ ० वर्षों में देवात्माएँ उतर कर द्वापर में चली आती हैं .द्वापर वासी अपने ही पूर्वज देवताओं की प्रतिमा मंदिर में स्थापित कर उन्हें ही पूजने लगतीं हैं .अपने ही देव स्वरूप की प्रतिमाएं बना उनकी पूजा करने लगतीं हैं .पूज्य से पुजारी बन जाती हैं .सत्य के साथ असत्य मिक्स हो जाता है .धर्म संस्थापक धर्मात्माएं द्वापर में ही पहले इस्लाम फिर बौद्ध , ईसाई,संन्यास ,फिर मोहम्मदी (मुस्लिम धर्म वंश ),सिख आदि धर्म की स्थापना करतीं हैं .लेकिन आत्मा की गिरावट यह पूजा पाठ ,धार्मिक कर्मकांड रोक नहीं पाता  है . 

दुख आता है क्योंकि किसी ने सुख में भगवान को याद ही नहीं किया था .भगवान का परिचय ही नहीं था देवात्माओं को .वह तो सभी कर्म फल के रूप में सिर्फ सुख भोग रहे थे .

सुख में सुमिरन न किया ,दुःख में करता याद रे ,

कहे कबीर उस दास की कौन सुने फ़रियाद रे .

और कलियुग  आते आते तो लोग खुद को ही भगवान घोषित कर अपनी  ही पूजा करवाने लगे .तत्वों को ही पूजने लगते हैं .कोई जल पूजता है कोई अग्नि .मठ और मठाधीशों ने आमजन को मूंडना शुरू किया .व्यभिचार आज अपने चरम को छूने लगा है .अब विकृतियाँ ही राज करतीं हैं न कोई राजा है न प्रजा .कैसा प्रजा तंत्र ?माया तन्त्र है माया रावण का राज्य है .

अब लोग गांधी को तो मानते हैं गांधी की नहीं मानते .बुद्ध को तो मानते हैं बुद्ध की नहीं मानते .ईसा को तो मानते हैं ईसा की नहीं मानते .आज हर आदमी के अन्दर अहंकार का रावण है .माया रावण का ही राज्य है विश्व पर .मनुष्य जो सब प्राणियों में श्रेष्ठ था विकारों का गुलाम बन गया है .उसे अब न खुद का परिचय है न खुदा का .अपने  रूहानी स्वरूप को ही वह भूल चुका है .खुद को रूह मान अल्ला से रूह रूहान (बात चीत )करे तो कैसे करे ?

ठीक लिखा था यह गीत किसी ने -

रामचन्द्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आयेगा ,

हंस चुगेगा दाना भैया ,कौवा मोती खायेगा .

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान ,

कितना बदल गया इंसान ,

सूरज न बदला चाँद न बदला ,न बदला रे आसमान ,

कितना बदल गया इंसान .

आज दुनिया कैसे नष्ट होगी इसे लेके किताबें लिखी जा चुकी हैं।

Eagle Editions Limited से प्रकाशित एक किताब का शीर्षक है :

DOOMSDAY -WRITTEN BY NIGEL CAWTHORNE 

इस किताब में हमारे दौर की उन तमाम समस्याओं का ज़िक्र है जो दुनिया के महा विनाश का कारण बन सकतीं हैं .ओजोन होल से लेकर ,न्यूक्लियर विंटर ,जलवायु परिवर्तन ,बढ़ते कार्बन फुटप्रिंट सभी का किताब में ज़िक्र है .जैविक अस्त्रों से विनाश का भी .

विश्व का तापमान ४ सेल्सियस ऊपर होने की देर है ,जलप्लावन में देर न होगी फिर न होगा नोहाज़ आर्क (Noah's Ark)वहां . एक सनकी शासक की ज़रुरत है जो एटमी असलाह के रिमोट का ट्रिगर दबा दे .विनाश अब हुआ के तब हुआ .

इसलिए परमात्मा कहतें हैं :

योगी बनो ,पवित्र बनो,योगी जीवन है प्यारा 

तभी भगवान की मदद मिलेगी .हमारे वक्त की द्रौपदियां ,सीताएं तभी  दुर्योधन  और दुश्शासन  से बच सकेंगी .सदा काल ये संसार भोग बल से नहीं चला है .सतयुग और त्रेता तक सृष्टि योग बल और संकल्प से ही संचालित थी .

द्वापर से मैथुनी सृष्टि का आरम्भ हुआ जो अब अपने शिखर को छू  रही है ,भोगवाद के रूप में भोगावती के रूप में सिर्फ एक लास वेगस नहीं है अनेक हैं .

आखिर जीसस का जन्म भी भोग से नहीं हुआ था .कैसे हुआ था सब जानते हैं .पांडव और कौरव भी  योग बल से पैदा हुए थे .मन्त्र की शक्ति से जन्मे थे .श्री कृष्ण योग बल से पैदा हुए थे इसीलिए योगेश्वर श्री कृष्ण कहलाए .

मोर आज भी पवित्र विधि से प्रजनन करता है .
इसीलिए मोर पंख श्री कृष्ण के मुकुट में सु -शोभित है .इसी घोर कलियुग के भी घोरतम समय पर परमात्मा नै दुनिया की रचना सलेक्शन से करते हैं इलेक्शन से नहीं .जो योग युक्त है वह एक बार फिर सतयुग में जाएगा .

इसलिए यह मत कहो मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ मैं ने तो किसी का बुरा नहीं किया .पिछले चौरासी जन्मों से आत्मा पे मेल चढ़ा है न जाने कौन से जन्म का कर्म फल सजा के रूप में कब हमारे सामने आये इसका कोई निश्चय नहीं इसलिए अच्छे कर्म करो भैया .ताकि आपका कल अच्छा हो .

और एक बात याद रखो -जो हुआ वह अच्छा हुआ ,जो अब हो रहा है वह भी अच्छा है जो आगे होगा वह भी अच्छा ही होगा .परफेक्ट ड्रामा है यह काल चक्र है .कर्मों की गुह्य गति का परिणाम है .चाहे हंसके भोगो या रोके .या जीवन को आगे साक्षी भाव से दृष्टा भाव से देखो .

(   ज़ारी .....)