बुधवार, 17 नवंबर 2010

मधुमेह में पैरों की संभाल के लिए (ज़ारी...)

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यूज़ डाय -बेटिक इन -सोल्स विधिन योर फीट टू प्रोटेक्ट देम .जूता बनाने वाली कई कम्पनियां डाय बेटिक सोल्स तैयार करतीं हैं .मधुमेह से ग्रस्त चले आये लोगों के पैरों के नीचे "हाई -प्रेशर एरियाज़ "पैदा हो जाते हैं .कैल्सिज़ बहुत ज्यादा हो जातें हैं ऐसे में थीरापेतिक शूज़ तथा इन्सर्ट्स प्रेशर से बचाव के लिए पहनना ज़रूरी हो जाता है .किसी भी हिस्से में ज्यादा प्रेशर न पड़े ,एम्प्युतेसन की नौबत न आये इसी लिए थिअरा -पेटिक शूज़ पहनना चाहिए ।
बिवेयर ऑफ़ फुट अल्सर्स ।
डायबेटिक फुट वीअर फुट अल्सर्स से बचाव (पैरों में बनने वाले घावों से बचाव के लिए )में कारगर रहतें हैं .अल्सर्स अकर मोस्ट ओफतिन ऑन डी बाल ऑफ़ दी फुट ऑर ऑन दी बोटम ऑफ़ दी बिग टो.जो जूते आपको ठीक से फिट नहीं आते वह पैरों की साइड्स में घाव बना देतें हैं .दिक्कत यह है इनका मधुमेही नोटिस ही नहीं ले पाता.वजह दीज़ अल्सर्स डू नाट हर्ट.पैरों की जांच माहिरों के द्वारा होती रहनी चाहिए .ज़रुरत पड़ने पर मोबिलिटी कंसल्टेंट से मिलिए .अल्सर्स की अनदेखी करना पैरों के लिए मुसीबत बन सकता है .पहले रोग संक्रमण और फिर लोस ऑफ़ ए लिम्ब (एम्प्युतेसन )।
रिड्यूस स्मोकिंग :
मधुमेह पुरानी पड़ते जाने के साथ ब्लड वेसिल्स ऑफ़ फुट एंड लेग (पाँव और टांगों की रक्त वाहिकाएं )अन्दर से खुरदरी और संकरी पड़ने लगती हैं .हार्डनिंग ऑफ़ ब्लड वेसिल्स टेक्स प्लेस विद टाइम ।
स्मोकिंग इस स्थिति को बद से बदतरीन बना देती है .यह गिरते हुए को एक और लात मारने जैसा है .आर्तीरियो -स्केलेरोसिस (धमनी काठिन्य,हार्डनिंग ऑफ़ आर्ट -रीज )ऐसे में और भी जल्दी होता है .ब्लड प्रेसर और कोलेस्स्त्रोल को भी नियंत्रित रखिये ।
डाय -बितीज़ इज दी मदर ऑफ़ आल दीजीज़ एंड स्मोकिंग दी मदर ऑफ़ आल इल हेबिट्स .दोनों की दुर्भि -संधि क्या गुल नहीं खिला सकती ?
वीयर डाय -बेटिक सोक्स :
पैर ठंडे रहने पर आप गर्म करने की ताक़ में आप उन्हें गर्म पानी से जला बैठेंगे ,आप को हो सकता है गर्म पानी उतना गर्म न लगे जितना की वह है .ऐसे में हॉट वाटर बोटिल्स और हीटिंग पेड्स भी आपके लिए निरापद नहीं माने जा सकते ।
बेहतर है पैरों को गर्म रखने के लिए आप गर्म (ऊनी मौजे ) सोक्स पहने ।
कीप सुगर अंडर चेक एंड एक्सर -साइज़ वेळ :व्यायाम सर्क्युलेसन को बढाता है .एक्सर -साइज़ इज गुड फॉर पूअर सर्क्युलेसन .यह रक्त प्रवाह को टांगों और पाँव (पैरों ) की तरफ मोड़ देता है .काफ -मसल ,टांगों और पाँव की ओररक्त प्रवाह ज़रूरी है .यह आपका दूसरा दिल है .यहाँ खून का थक्का बनके रक्त प्रवाह को बाधित कर सकता है .उसी तरह चमड़ी आपकी दूसरी किडनी है .पसीना निकालिए थोड़ा व्यायाम करिए .सिदेंतरीलाइफ स्टाइल घातक सिद्ध होता है आम -ओ -ख़ास के लिए अधुनातन जीवन शैलियों के साथ ।
अपनी ब्लड सुगर को बढ़ने से रोकिये .विनियमन करते रहिये खून में शक्कर के स्तर का .अल्सर्स ,गैंग्रीन ,डायबेटिक -फुट से बचिए ,बचे रहिये .(समाप्त )
सन्दर्भ- सामिग्री :-लेफ्ट इन ए लिम्बो .डायबिटीज़ मे बी दी सायलेंट किलर ,बट इट आल्सो टेंड्स टू गिव मेनी ए पैन इन दी लिम्ब .मोबिलिटी कंसल्टेंट चैतन्य शाह गिव्ज़ यु ए १० पॉइंट फुट -मेनेजमेंट गाइड (मुंबई मिरर ,नवम्बर १६ ,२०१० ,पृष्ठ २४ ).

मधुमेह में पैरों की संभाल ...(ज़ारी ...)

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स्नान (नहाने ,बाथ लेने )के बाद पैरों को अच्छे से पोंछने के बाद बाकी बची नमी को प्लेन पेट्रोलियम जेली या फिर हाथों पर मलने वाली बिना खुशबू की क्रीम से ढक लीजिये .डायबिटीज़ पैरों की चमड़ी को बदल के रख सकती है .एक दम से नमी -रहित हो (सूख )सकतें हैं आपके पैर .ऐसे में ऊपर की चमड़ी उतर भी सकती है ,फट भी सकती है ।
दरअसल तेल एवं नमी को नियंत्रित (विनियमित )करने रखने वाली नर्व्ज़(स्नायु या नसें )मधु -मेह पुरानी हो जाने पर काम करना बंद कर देतीं हैं ।
ऊंगलियों और अगूंठे (बिग टो )और ऊंगलियों के बीच तेल या क्रीम कुछ भी मत लगाइए .अतिरिक्त नमी रोग -संक्रमण (इन्फेक्सन )की वजह बन सकती है ।
पैरों को सूखा (बिना नमी के, ड्राई )रखिये :
चमड़ी का घट्टा(कैलस)प्युमाईस स्टोन से हठाइये सावधानी पूर्वक बिना चमड़ी को विक्षत किये .डाय -बेटिक्स के लिए समस्या बने रहतें हैं कैलसिज़ यदि इन्हें सावधानी पूर्वक ट्रिम न किया जाए तोयह थिक होकर टूटने लगतें हैं ऐसे में अल्सर बनने का ख़तरा पैदा हो जाता है .(ओपन शोर्स से बचना है ).अपने स्वास्थ्य कर्मी से कैलसिज़ साफ़ करवाइए समस्या पेश आने पर ,खुद कुछ मत करिए .केमिकल एजेंट्स का कोंस ,कैलसिज़ को हठाने के लिए भूल कर भी स्तेमाल न करें .आपकी चमड़ी जल सकती है .(ज़ारी ....)

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

मधु -मह में पैरों की संभाल बेहद ज़रूरी है .

लेफ्ट इन ए लिम्बो .डायबिटीज़ मे बी सायलेंट किलर बट इट आल्सो टेंड्स टू गिव मेनी ए पैन इन दी लिम्ब .मोबिलिटी कंसल्टेंट चैतन्य शाह गिव्स यु ए १० -पॉइंट फुट -मेनेजमेंट गाइड (डायबिटीज़ कैन कॉज़ चेंज़िज़ इन दी स्किन ऑफ़ योर फुट .एट टाइम्स योर फुट मे बिकम वेरी ड्राई )/मुंबई मिरर ,नवम्बर १६,२०१० ,पृष्ठ २४ ।
भारत में शहरी क्षेत्र के ११ फीसद लोग डायबिटीज़ की चपेट में हैं .दुर्भाग्य इनमे से कितने ही जानकार अनजान हैं .जबकि यह बीमारी चुपके -चुपके धीरे -धीरे मारती है .व्यायाम से कोसों दूर ले आया है हमें शहरी जीवन ,जीवन की आपाधापी .मोटापा (थेंक्स टू ओब्सेसिव ईटिंग्स),दैनिकी से रिश्ता तनाव ,चिकनाई सनी खुराक के चलते इस संख्या में इजाफा ही होना है ।
बेशक बहुत कुछ आपको बतलाया जा चुका बारहा खुराक (स्वास्थाय्कर,हेल्दी डाईट )वर्क -आउट्स (व्यायाम ,कसरत आदि )तथा इंसुलिन को काबू में रखने के विभिन्न तरीकों तरकीबों के बारे में .लेकिन मधुमेह आपके पैरों को भी निशाना बनाती है .कई किस्म की फुट प्रोब्लम्स की वजह बन जाती है डाय- बितीज़ ।
(१)न्यूरो -पैथी/ऑर दी पैथालोजी ऑफ़ योर नर्व्ज़(यहाँ पैथालोजी का अर्थ रोग विज्ञान है ,साइंस ऑफ़ डि -सीज़िज़ ) बेहद की कसूरवार है .लक्षण क्या है इसका ?आपको इल्म ही नहीं होता आपके जूते में टेक आ गया है ,छोटी सी कंक्री आपको लगातार चुभ रही है ,आपके जूते में थी ,आपको इल्म नहीं है .यु आर ओब्लिविय्स टू दिस फेक्ट ।
आपको किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती ,बेशक काँटा चुभ रहा हो आपको .यही है न्यूरो -पैथी ।
समाधान क्या है पैरों से जुडी समस्याओं का ?
(१)डू नोट वीयर ओपन फुट वीयर :आपको चलते -फिरते चोट लग सकती है .चप्पल नहीं सैंडिल पहननी हैं आपको .बेहतर है जूते पहने आरामदायक .मधुमेह आपकी दर्द ,गर्मी -सर्दी को महसूस करने की क्षमता को ले उडती है .बाकी सबको ठण्ड लग रही है आप ए सी में सो रहें हैं .यकीन मानिए मैंने ऐसा देखा है .चोट लग जाने के बाद भी ऐसे में आपको पता नहीं चलेगा .आपके जूते में सुबह से कंक्री थी आपको खबर नहीं है .पैर तो ऐसे में जख्मी होगा ही .आपके पैर में छाला है आपको खबर ही नहीं है .इस सबसे बचने का सरल उपाय है :डू नाट वीयर ओपन फुट वीयर ।
(२)नेवर इग्नोर दी स्लाई -टेस्ट फुट इंजरी :ज़रा सी भी फुट इंजरी होने पर ,पैरों में इर्रिटेसन होने पर ,रेडनेस होने पर अपने काया -चिकित्सक से संपर्क साधिये .हो सकता है आपकी चमड़ी कट फट गई हो और आपको खबर ही नहीं है .आपको हो सकता है इसी वजह से रोग संक्रमण भी लग गया हो .हो सकता नर्व डेमेज की वजह से आपके पैर और अंगूठे की रंगत ही बदल चुकी हो और आप बे -खबर हों .नर्व डेमेज के बाद ही रोग संक्रमण (इन्फेक्सन )का पता नहीं चलता .(ज़ारी ....)

रोबोट्स नर्स देंगी स्पोंज बाथ्स मरीजों को .

रोबोट्स नर्स कैन नाव गिव स्पोंज बाथ्स टू पेशेंट्स ( मुंबई मिरर ,नवम्बर १६ ,२०१० ,पृष्ठ २२ )।
साइंसदानों ने किसीभी तरह से अशक्त हो चुके मरीजों के लिए एक ऐसा रोबोट तैयार कर लिया है जो एक प्रशिक्षित नर्स की तरह मरीज़ को बेड पर ही स्पोंज बाथ करा सकता है .इसकी भुजाओं को मुलामियत दी गई है ताकि स्पोंज करते वक्त रोबोट की भुजाओं से डाला गया दवाब आसानी से सहन किया जा सके .मरीज़ की आखिर अपनी अस्मिता और प्राईवेसी भी होती है ,कई मर्तबा नर्स के लिए भी बेड बाथ देना असहज जान पड़ता है ।मरीज़ इस रोबोट नर्स के साथ ज्यादा सहज महसूस करेगा .
कोडी नाम की यह रोबोट नर्स जोर्जिया टेक्स हेल्थ के-यर रोबोटिक्स लेब की एक टीम ने तैयार की है .इस टीम की अगुवाई चार्ल्स केम्प ने की है .आप हेल्थ के-यर लेब के लिए प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर हैं ।
कोडी ने मरीज़ के लिम्ब्स की साफ़ -सफाई ,प्रोपर हाइजीन मेंटेन करने का करिश्मा कर दिखाया है .कोडी के खुद के लिम्ब्स को कम स्टिफ(कठोर,दृढ ) रखा गया है .ताकि स्पोंज़िंग मरीज़ को तकलीफ देह न लगे क्योंकि कोडी अपने लिम्ब्स से काम लेते वक्त थोड़ा दवाब तो डालेगी ही .इसे एक स्टॉप बटन से लैस किया गया है ताकि दवाब बर्दाश्त के बाहर होने पर इसे रोक दिया जाए ।हाड -मांस की नर्सों ने कोडी का स्वागत किया है .

वेंडिंग मशीन सुझाएगी आपको क्या पीना चाहिए ...

मौसम के मिजाज़ और आपकी पसंदगी के अनुरूप अब वेंडिंग मशीन आपको सुझाएगी आपकी पसंदीदा ड्रिंक्स .एक अभिनव जापानी केंड ड्रिंक वेंडिंग मशीन पहली मर्तबा एक फेशियल रिकग्नीशन टेक्नोलोजी का स्तेमाल कर रही है जो आपकी उम्र और लिंग (जेंडर ),आपको बतलाएगी आपको क्या पीना चाहिए दिन के उस पहर में .यह मशीन दिनानुदिन साधारण मशीनों के बरक्स लोकप्रिय हो रहीं हैं .तीन गुना ज्यादा हो गई है ड्रिंक्स की बिक्री ।
ये मशीनें लार्ज टच पेनल स्क्रीनों से लैस हैं जिनमे सेन्सर्स भी लगें हैं .बस यह पास आते ग्राहक की पसंदगी का जायजा चेहरे को पढ़ के लगा लेतीं हैं .हर उम्र के लोगों की औरत और मर्दों की उम्र के अनुरूप पसंद ना -पसंद होती है .इसी का सहारा लेती है यह मशीन ।
एक ख़ास ड्रिंक की सिफारिश ग्राहक के लिए प्रस्तुत कर देती है ये मशीन .दिन के तापमान और वक्त के मुताबिक़ एक ही उम्र के लोगों के लिए यह अलग अलग ड्रिंक्स की सिफारिश करेगी ।
अकसर मर्दों के लिए केंड कोफी ड्रिंक .यदि मर्द उम्रदराज़ हैं तो ग्रीन टी ,युवतियों के लिए जो २० इज़ में हैं टी ड्रिंक ,या फिर थोड़ा सा और मीठा पेय तजवीज़ करेगी .मार्किट रिसर्च का सहारा लेती है यह मशीन .किस उम्र के लोगों में कौन सा ड्रिंक ज्यादा लोक -प्रिय है इसे मालूम है .यह मशीनों के साथ आदमी का सीधा संवाद है ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-वेंडिंग मशीन देट रीड्स फेसिज़ ,सजेस्ट्स ड्रिंक्स (डी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,नवम्बर १६ ,२०१० ).

फ्यूज़न रिएक्टर की ओर दो कदम ...

बर्थ ऑफ़ "मिनी स्टार "ऑन अर्थ कुड सोल्व एनर्जी क्राइसिस .प्लान टू बिल्ड फस्ट "सस्टेनेबिल फ्यूज़न "रिएक्टर (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,नवम्बर १६ ,२०१० ,मुबई ,संस्करण ,पृष्ठ १७ )।
लिवरमोर ,केलिफोर्निया कैम्पस ,की नेशनल इग्नीशन फेसिलिटी में माहिरों की एक टीम इन दिनों एक फ्यूज़न रिएक्टर बना लेने की दिशा में एक अप्रतिम प्रयोग में मुब्तिला है .इसके तहत एक १९२ लेज़र्स से शक्तिशाली पुंज एक रिएक्टर की कोर पर रखे एक ग्लास टार्गेट पर डाला जा रहा है जिसमे ट्राई -तियम ओर ड्यू -टीरियमगैसें रखीं हैं .इनके संग्लन से हीलियम नाभिक जब पैदा होगा तब साथ में बाइंडिंग एनर्जी के रूप में १.३ मिलियन मेगा जूल ऊर्जा भी पैदा होगी .कोर का तापमान भी बढ़कर ६०लाख फारेन्हाईट हो जाएगा ।(६ मिलियन फारेन्हाईट ).यह अब तक हासिल तापमानों में सबसे ज्यादा है .
यकीन मानिए यह करिश्मा किया जा चुका है .प्रयोग इस दिशा में अभी भी ज़ारी हैं ताकि प्राप्त शिखर तापमान ओर बढाया जा सके .हम जानतें हैं जब हलके नाभिकों से अपेक्षतया एक भारी नाभिक बनता है जैसे इस प्रयोग में ट्राई -तियम ओर ड्यू -टीरियम के संगलन से हीलियम बना है तब अपार ऊर्जा मुक्त होती है .इसे ही बाइंडिंग एनर्जी कहा जाता है ।
बरक्स इसके सूरज की कोर का तापमान २७ मिलियन फारेन्हाईट है ।यानी प्रयोगशाला में एक सूरज पैदा कर लेने की दिशा में दो कदम रख दिए गए हैं .
इस फ्यूज़न रिएक्टर का प्रोटो -टाइप संस्करण साइंसदानों के मुताबिक़ २०२० में तैयार हो जाएगा .२०५० तक अमरीका अपनी कुल ऊर्जा का एक तिहाई भाग इसी फ्यूज़न एनर्जी से जुटाने लगेगा ।
फ्यूज़न रिएक्टर दुनिया भर से ऊर्जा की किल्लत हमेशा हमेशा के लिए दूर कर सकतें हैं .अलावा इसके ऊर्जा का यह साफ़ सुथरा स्रोत है (कार्बन मुक्त )।
ड्यू -टीरियम -ट्री -टियम टारगेट्स को इग्नीशन तापमान मुहैया करवाना एक एहम कदम रहा है .फ्यूज़न रिएक्टर के लिए बेशुमार ईंधन पृथ्वी पर मौजूद है .इस से हासिल ऊर्जा पारितंत्रों ओर पर्यावरण की दोस्त ठहरती है .उप -उत्पाद के रूप में प्राप्त रेडियो -एक्टिव पदार्थों का संग्रह भी एटमी भट्टियों से प्राप्त रेडियो -उत्पादों के बरक्स आसान रहता है ।संगलन (फ्यूज़न विधि से )
एक गेलन समुंदरी जल से प्राप्त ऊर्जा ३०० गेलन पेट्रोल से प्राप्त ऊर्जा के बराबर ठहरती है .५० कप पानी से हासिल ऊर्जा २ टन कोयले से मिलने वाली ऊर्जा के बराबर आएगी ।
२.२ अरब पोंड की फ्यूज़न एनर्जी योजना हरकत में आ चुकी है गत सप्ताह से .२०१२ तक पहले चरण का काम पूरा हो जाएगा .ट्री -टियम ओर ड्यू -टीरियम के परस्पर संगलन के ज़रूरी इग्नीशन टेम्प्रेचर हासिल हो सकेगा .उच्च से उच्तर की दिशा में बढा जाएगा .

औरतों के दिल के लिए अच्छा नहीं है कामकाजी दवाब .

जॉब स्ट्रेन इज बेड फॉर वोमेन्स हार्ट्स ।
वर्क रिलेटिड स्ट्रेस डबल्स डी रिस्क ऑफ़ हार्ट एटेक एंड अदर कार्डिएक प्रोब्लम्स .(डी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,नवम्बर १५ ,२०१० ,पृष्ठ १७ )।
कामकाजी महिलाओं के लिए दफ्तरी दवाब (हाई -जॉब स्ट्रेन ) हृद वाहिकीय रोगों के खतरे को ४०%फीसद बढा देता है .हार्ट एटेक तथा एनजीओ -प्लास्टी जैसे प्रोसीजर्स के मामले भी बढ़ जातें हैं .एक अध्ययन से यह पुष्ट हुआ है ।
जॉब स्ट्रेन है क्या ?
यह एक तरह का मनो -वैज्ञानिक दवाब है जहां आपको निर्णय लेने और अपनी रचनात्मक -प्रतिभा दिखलाने करने की आज़ादी नहीं है .आपको तो बस ले देके लक्ष्य पूरे करने हैं दिन-रात खटके ।
इसके कुछ बुरे असर आपकी हृद -वाहिकीय सेहत (कार्डियो -वैस्क्युलर हेल्थ )पर तुरत तथा कुछ दीर्घकालिक प्रभाव बाद में दिखलाई देते हैं .जॉब स्ट्रेस इज बेड फॉर योर हार्ट ।
ब्रिघम एंड वोमेन्स हॉस्पिटल बोस्टन के साइंसदानों ने इस अध्ययन को संपन्न किया है १७४१५ तंदरुस्त महिलाओं के कामकाजी दवाब का विश्लेसन करने के बाद .ये सभी महिलायें काउस्कासियन हेल्थ प्रो -फेशानल हैं ,औसतन ५७ साला , इस लैंडमार्क वोमेन्स हेल्थ स्टडी का हिस्सा बनी हैं .इन्होने सारी सूचनाअपने लिए दिल की बीमारियों से जुड़े मौजूदा खतरों ,कामकाजी दवाब तथा नौकरी के हाथ से निकल जाने की शंका के बाबत मुहैया करवाई थी .इनका १० सालों तक स्वास्थ्य सम्बन्धी रिकार्ड रखा गया है .एक मानक प्रश्नावली इनसे भरवाई गई है ताकि नौकरी से जुडी अनिश्चितता ,जॉब स्ट्रेन का वस्तु - परक तरीके से विश्लेसन किया जा सके ।
पता चला जो महिलाए हाई -वर्क स्ट्रेन से जूझ रहीं थीं उनके लिए दिल के दौरों का ख़तरा ४०%बढ़ गया था .इनमे कोरोनरी आर्ट -अरि- बाई -पास -सर्जरी ,बेलून एंजियो -प्लास्टी ,तथा मृत्यु का जोखिम भी बढा हुआ दर्ज़ हुआ ।
बात साफ़ है: दफ्तरी काम का सकारात्मक या फिर नकारात्मक असर औरत के स्वास्थ्य पर पड़ता ही है .ज़रूरी है दवाबों को तौलना समझना उनसे पार पाना ।
रिसर्च्दानों ने इस अध्ययन के तमाम नतीजे अमरीकी ह्रदय संघ के समक्ष रखें हैं .संघ का वैज्ञानिक सत्र २०१० हाल ही में शिकागो में संपन्न हुआ हुआ है ।