डायबिटीज़ पैन से आगे निकल सकता है कल फ्लू का टीका शक्लो -सूरत में "बैंड ऐड "सा ,माइक्रो -नीडिल से लैस .इधर फाया चमड़ी से चिपकाया उधर माइक्रो -नीडिलस चमड़ी में घुलकर ख़त्म और दवा चमड़ी के अन्दर .डाक द्वारा लिफ़ाफ़े मेभी आ सकता हैकल यह फ्लू वेक्सीन ,दर्द रहित शाट बनकर .बिलकुल निकोटिन पैचिज़ की तरह ।
रिसर्चर फ्लू की काट के लिए एक ऐसा ही साल दर सालखुद ही लिए जा सकने योग्य फ्लू पैच बना लेना चाहतें हैं ।
नेचर मेडिसिन विज्ञान पत्रिका में जियोर्जिया इन्स्तित्युत ऑफ़ टेक्नोलोजी के रिसर्चरों ने इस पैच के बारे में लिखा है .इसकी बिजनिस साइड बिलकुल एक सैन -पेपर जैसी ही होगी ।
परीक्षणों में (इन टेस्ट्स ऑफ़ माइक्रो -नीडिलस विदाउट वेक्सीन )इससे पैदा पीड़ा को परम्परा गत टीके से पैदा पैन का १/१० -१/२० वां हिस्सा भर बतलाया गया है .यानी तकरीबन सभी ने इसे दर्द के एहसास से रहित ही बतलाया है ,पर्फेक्ली पैनलेस रहेगा यह फ्लू पैच ।
निकोटिन पैच त्वचा के नीचे निकोटीन छोड़कर अपना असर दिखलाता है लेकिन ऐसे प्रयास फ्लू टीके के मामले में अब तक कामयाब नहीं रहें हैं .
बेशक जोर्जिया टेक वर्क में वेक्सीन को अभी भी इंजेक्ट ही किया जाता रहा है .लेकिन नीड़ील्स यक़ीनन अति सूक्ष्म हैं इनके स्तेमाल केलिए कोई प्रशिक्षण लेना भी ज़रूरी नहीं है .दर्द रहित हैं यह माइक्रो -नीड़ील्स ।
अब ना दर्द का भय रहा है ना लेफ्ट ओवर हाई -पो -दर्मिक नीड़ील्स को ठीक से ठिकाने लगाने का जोखिम .लक्ष्य रहा है एक पेशेंट फ्रेंडली वेक्सीन .लोग बाग़ खुद से इसे लगा सकेंगें .संभावना यही है ,यह ज़ल्दी ही आपको नसीब होगी ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-नीडिल पैच टेक्स दी पैन आउट ऑफ़ फ्लू शोट्स (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,जुलाई २० ,२०१० ,पृष्ठ ,१५ )
बुधवार, 21 जुलाई 2010
जब औरत सबसे ज्यादा खूबसूरत दिखती है ,कब ?
"वोमेन मोस्ट ब्यूटीफुल एट ३१ "(दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,जुलाई २०,२०१० ).
एक नवीन अध्धय्यन की माने तो ३१ बरस की उम्र में औरत बेहद की खूबसूरत दिखती है ।
रिसर्चरों ने पता लगाया है औरतें बीस के दशक के बाद के सालों में या फिर फिर तीस के दशक के शुरूआती चरण में १८ -१९ साला युवतियों के बरक्स ज्यादा आकर्षक दिखतीं हैं .३१ साल की उम्र की किसी युवती को देख ही कवि दिनकर ने कहा होगा -"सत्य ही रहता नहीं यह ध्यान ,तुम ,कविता ,कुसुम या कामिनी हो "।देखें :उर्वशी काव्य ।
यही वह मुकाम है जब सौन्दर्य शिखर को छू लेता है ।
यह नतीजा २००० औरतों और मर्दों पर संपन्न एक सर्वे से निकाला गया है .पता चला सौन्दर्य सूरत और सीरत (व्यक्तित्व )दोनों का ज़मा जोड़ है .दोनों का कुल प्राप्य है ।
ज्यादातर लोगों की ऊंगली ३१ साला औरतों की ओर ही उठी जब उनसे पूछा गया -औरत कब (किस उम्र में) सबसे ज्यादा मनभावन लगती है ,मनोहर लगती है .सौन्दर्य की प्रतिमूर्ती लगती है ?
तकरीबन दो तिहाई महिलाओं ने माना -उम्र के साथ ही सौन्दर्य परवान चढ़ता है ,शीर्ष को छूता है.
सर्वे में शामिल तकरीबन आधी मोतर्माओं ने माना -उम्र बढ़ने के साथ ही सुरक्षा kaa ehsaas hotaa hai ,asurakshaa ki bhaavnaa jaati rahti hai .
umr badhne ke saath yah dar bhi jaataa rahtaa hai doosre aapke baare me kyaa sochten hain .asali baat yah hai aap apne baare me kyaa sochtin samajhtin hain maantin hain .?kuchh to log kahengen logon kaa kaam hai kahnaa ,chhodo bekaar ki baaton me kahin beet naa jaaye rainaa ?
70 feesad ne maanaa khoobsoorti kaa matlab hai aatm vishvaash se paripoorn honaa ,67 feesad ne good looks ko tarzeeh di ,47 feesad ne staailish hone ko sabse oopar rakh kar dekhaa .
"beauty is in the eyes of the beholder"?/beauty is only skin deep ?
एक नवीन अध्धय्यन की माने तो ३१ बरस की उम्र में औरत बेहद की खूबसूरत दिखती है ।
रिसर्चरों ने पता लगाया है औरतें बीस के दशक के बाद के सालों में या फिर फिर तीस के दशक के शुरूआती चरण में १८ -१९ साला युवतियों के बरक्स ज्यादा आकर्षक दिखतीं हैं .३१ साल की उम्र की किसी युवती को देख ही कवि दिनकर ने कहा होगा -"सत्य ही रहता नहीं यह ध्यान ,तुम ,कविता ,कुसुम या कामिनी हो "।देखें :उर्वशी काव्य ।
यही वह मुकाम है जब सौन्दर्य शिखर को छू लेता है ।
यह नतीजा २००० औरतों और मर्दों पर संपन्न एक सर्वे से निकाला गया है .पता चला सौन्दर्य सूरत और सीरत (व्यक्तित्व )दोनों का ज़मा जोड़ है .दोनों का कुल प्राप्य है ।
ज्यादातर लोगों की ऊंगली ३१ साला औरतों की ओर ही उठी जब उनसे पूछा गया -औरत कब (किस उम्र में) सबसे ज्यादा मनभावन लगती है ,मनोहर लगती है .सौन्दर्य की प्रतिमूर्ती लगती है ?
तकरीबन दो तिहाई महिलाओं ने माना -उम्र के साथ ही सौन्दर्य परवान चढ़ता है ,शीर्ष को छूता है.
सर्वे में शामिल तकरीबन आधी मोतर्माओं ने माना -उम्र बढ़ने के साथ ही सुरक्षा kaa ehsaas hotaa hai ,asurakshaa ki bhaavnaa jaati rahti hai .
umr badhne ke saath yah dar bhi jaataa rahtaa hai doosre aapke baare me kyaa sochten hain .asali baat yah hai aap apne baare me kyaa sochtin samajhtin hain maantin hain .?kuchh to log kahengen logon kaa kaam hai kahnaa ,chhodo bekaar ki baaton me kahin beet naa jaaye rainaa ?
70 feesad ne maanaa khoobsoorti kaa matlab hai aatm vishvaash se paripoorn honaa ,67 feesad ne good looks ko tarzeeh di ,47 feesad ne staailish hone ko sabse oopar rakh kar dekhaa .
"beauty is in the eyes of the beholder"?/beauty is only skin deep ?
एज रिलेटिड मेक्युलर दिजेंरेशन से बचाव के लिए फेटि -फिश
एज रिलेटिड मेक्युलर दिजेंरेशन बुढापे में अकसर होने वाला ऐसा नेत्र रोग है जिसमे आँखों के परदे के पीछे या नीचे असामान्य तौर पर रक्त कोशायें पनपने लगतीं हैं ,कभी कभार रेटिना के भीतर भी प्रकाश संवेदी कोशायें (लाईट सेंसिटिव सेल्स ब्रेकडाउन करने लगती है )टूटने (अप -विकाश का शिकार होने लगतीं हैं )फूटने लगतीं हैं .सेन्ट्रल विज़न के लिए यह बहुत घातक सिद्ध होता है ।केरोतिनोइड्स बहुल खाद्यों का सेवन बचावी उपाय हो सकता है .
बेशक एज रिलेटिड मेक्युलर दिजेंरेशन (ए एम् डी ) लाइलाज है ,लेकिन कमोबेश बचावी चिकित्सा या फिर रोग को मुल्तवी रखने के उपाय मौजूद हैं .
जॉन होपकिंस यूनिवर्सिटी ,बाल्टीमोर कैम्पस के रिसर्चरों ने ६५ -८४ साला बुजुर्गों की बाबत आंकडें जुटाएं हैं .ये तमाम लोग ना सिर्फ नेत्र परिक्षण के लिए आगे आये एक खुराख सम्बन्धी प्रश्नोत्तरी भी भरी ,
पता चला इनमे से जो लोग सप्ताह में कमसे कम एक दफा या और भी ज्यादा बार फेटि फिश लेते रहे थे ,इनमे ए एम् डी रोग की एडवांस्ड स्टेज तक पहुँचने की संभावना ६० फीसद कम रह गई थी बनिस्पत उनके जो कभी कभार ही ,बामुश्किल हफ्ते में एक दफा ही फेटि फिश का सेवन कर रहे थे ।
बेशक सालमोन ,माक्केरेल,अल्बकोरे टूना ऐसी तेलीय मच्छी हैं जो ३ ओमेगा फेटि एसिड्स से भरपूर हैं ,तथा यह इस नेत्र रोग को मुल्तवी रखने में पूर्व अध्धय्यनों में भी कारगर पाया गया है .लेकिन एडवांस्ड स्टेज तक रोग के आजाने पर विशेष कुछ नहीं किया जा सकता .जो हो सकता है ,वह संभावित बचाव ही है .कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है .नेत्र रोगों के विज्ञान पत्र "आव्थेल्मोलोजी"में उक्त अध्धय्यन के नतीजे छपें हैं .
सन्दर्भ -सामिग्री :-फिश ईटर्स शो लोवर रिस्क ऑफ़ एज रिलेटिड आई डिजीज (न्यू -योर्क /रायटर्स /मुंबई मिरर /दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,जुलाई २१ ,२०१० ,पृष्ठ २४ ,पृष्ठ २१ )
बेशक एज रिलेटिड मेक्युलर दिजेंरेशन (ए एम् डी ) लाइलाज है ,लेकिन कमोबेश बचावी चिकित्सा या फिर रोग को मुल्तवी रखने के उपाय मौजूद हैं .
जॉन होपकिंस यूनिवर्सिटी ,बाल्टीमोर कैम्पस के रिसर्चरों ने ६५ -८४ साला बुजुर्गों की बाबत आंकडें जुटाएं हैं .ये तमाम लोग ना सिर्फ नेत्र परिक्षण के लिए आगे आये एक खुराख सम्बन्धी प्रश्नोत्तरी भी भरी ,
पता चला इनमे से जो लोग सप्ताह में कमसे कम एक दफा या और भी ज्यादा बार फेटि फिश लेते रहे थे ,इनमे ए एम् डी रोग की एडवांस्ड स्टेज तक पहुँचने की संभावना ६० फीसद कम रह गई थी बनिस्पत उनके जो कभी कभार ही ,बामुश्किल हफ्ते में एक दफा ही फेटि फिश का सेवन कर रहे थे ।
बेशक सालमोन ,माक्केरेल,अल्बकोरे टूना ऐसी तेलीय मच्छी हैं जो ३ ओमेगा फेटि एसिड्स से भरपूर हैं ,तथा यह इस नेत्र रोग को मुल्तवी रखने में पूर्व अध्धय्यनों में भी कारगर पाया गया है .लेकिन एडवांस्ड स्टेज तक रोग के आजाने पर विशेष कुछ नहीं किया जा सकता .जो हो सकता है ,वह संभावित बचाव ही है .कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है .नेत्र रोगों के विज्ञान पत्र "आव्थेल्मोलोजी"में उक्त अध्धय्यन के नतीजे छपें हैं .
सन्दर्भ -सामिग्री :-फिश ईटर्स शो लोवर रिस्क ऑफ़ एज रिलेटिड आई डिजीज (न्यू -योर्क /रायटर्स /मुंबई मिरर /दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,जुलाई २१ ,२०१० ,पृष्ठ २४ ,पृष्ठ २१ )
मंगलवार, 20 जुलाई 2010
चेहरे से शिकन (झुर्री )हठाने के लिए अब इलेक्ट्रिक क्रीम
हमारी त्वचा एक कुदरती जैव -विद्युत् के तहत पडोसी कोशाओं के साथ सम्प्रेषण ,संवाद करती है .कोशाओं को उत्प्रेरण प्रदान करने के अलावा टूट फूट की मुरम्मत का काम भी अंजाम देती है ,पुनर -उत्पादन भी करती है कोशाओं का .अलबत्ता जवानी के दिनों में यह जैव विद्युतसम्प्रेषण अपेक्षाकृत शक्ति शाली होता है लेकिन उम्र के साथ जैव विद्युत् की शक्ति भी क्षीण होने लगती है .नतीज़ा होता है झुर्रियां ,शिकन भरा चेहरा ।
इसी अवधारणा का सहारा लिया है अमरीकी फर्म जोहन्सन एंड जोहन्सन के साइंसदानों ने .जैव -विद्युत् ऊर्जा को व्यवस्थित किया है एक पोट में ।
न्यू -स्किन हाई टेक क्रीम जिसे इसीलिए इलेक्ट्रिक क्रीम कहा जा रहा है जैव -विद्युत् के रूप में अति -सूक्ष्म परिमाण वाले "माइक्रो -करेंट्स "के सहारे ही चेहरे की पेशियों को लिफ्ट कर न्यू -कोलाजन को उत्तेजन प्रदान करेगी ,ताकत देगी अनुप्राणित करेगी .संपुष्ट करेगी .सौन्दर्य सचेत लोगों को अब चेहरे की झुर्रियों की चिंता में अन्दर अन्दर दुखी होने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी .परम्परा गत इलेक्ट्रिकल फेसलिफ्टिंग ट्रीटमेंट भी इसी तरह असर दिखलाता है ।
दोनों का मकसद चमड़ी में नए प्राण फूंकना है ,जान डालना है ढीली ढाली पड़ी चमड़ी में .कसाव देना है चेहरे की पेशियों को .कोलाजन को नै ताकत देना है .ताकि चेहरा स्पोट लेस दिखे ,उम्र के निशाँ ही मिटादेगी यह इलेक्ट्रिकल क्रीम ऐसा कम्पनी का दावा है ।
बुढाती त्वचा मेंकोशाओं में परस्पर जैव -विद्युत् सम्प्रेषण छीजते चले जाने की पुष्टि की गई है .दीज़ चेंज़िज़ मे अफेक्ट बेलेंस ऑफ़ हेल्दी टर्नओवर इन स्किन ,रिज़ल्टिंग इन विजिबिल साइंस ऑफ़ एजिंग लाइक रिन्किल्स .यही विचार व्यक्त किया है चर्म-रोग चिकित्सा के माहिर जाने खोय्री ने ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-नाओ ,"इलेक्ट्रिक "क्रीम ज़ेप्स रिन्किल्स (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,जुलाई २०,२०१० .)
इसी अवधारणा का सहारा लिया है अमरीकी फर्म जोहन्सन एंड जोहन्सन के साइंसदानों ने .जैव -विद्युत् ऊर्जा को व्यवस्थित किया है एक पोट में ।
न्यू -स्किन हाई टेक क्रीम जिसे इसीलिए इलेक्ट्रिक क्रीम कहा जा रहा है जैव -विद्युत् के रूप में अति -सूक्ष्म परिमाण वाले "माइक्रो -करेंट्स "के सहारे ही चेहरे की पेशियों को लिफ्ट कर न्यू -कोलाजन को उत्तेजन प्रदान करेगी ,ताकत देगी अनुप्राणित करेगी .संपुष्ट करेगी .सौन्दर्य सचेत लोगों को अब चेहरे की झुर्रियों की चिंता में अन्दर अन्दर दुखी होने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी .परम्परा गत इलेक्ट्रिकल फेसलिफ्टिंग ट्रीटमेंट भी इसी तरह असर दिखलाता है ।
दोनों का मकसद चमड़ी में नए प्राण फूंकना है ,जान डालना है ढीली ढाली पड़ी चमड़ी में .कसाव देना है चेहरे की पेशियों को .कोलाजन को नै ताकत देना है .ताकि चेहरा स्पोट लेस दिखे ,उम्र के निशाँ ही मिटादेगी यह इलेक्ट्रिकल क्रीम ऐसा कम्पनी का दावा है ।
बुढाती त्वचा मेंकोशाओं में परस्पर जैव -विद्युत् सम्प्रेषण छीजते चले जाने की पुष्टि की गई है .दीज़ चेंज़िज़ मे अफेक्ट बेलेंस ऑफ़ हेल्दी टर्नओवर इन स्किन ,रिज़ल्टिंग इन विजिबिल साइंस ऑफ़ एजिंग लाइक रिन्किल्स .यही विचार व्यक्त किया है चर्म-रोग चिकित्सा के माहिर जाने खोय्री ने ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-नाओ ,"इलेक्ट्रिक "क्रीम ज़ेप्स रिन्किल्स (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,जुलाई २०,२०१० .)
एक्सटेसी बन सकती है पोस्ट ट्रौमेतिक स्ट्रेस दिस -ऑर्डर का समाधान
पहले "एक्सटेसी "शब्द के अर्थ की विवेचना कर लें .आनंदातिरेक ,आह्लाद ,एन इंटेंस फीलिंग ऑफ़ हेपीनेस एक अर्थ है "एक्सटेसी" का ।
दूसरा अर्थ अकसर मौज मस्ती के लिए हाई -सोसायटी में ली जाने वाली एक इल्लीगल ड्रग के स्तेमाल से जुड़ा है .
किशोर भी इस एक्सटेसी की गिरफ्त में हैं .एक्सटेसी इज एन इल्लीगल ड्रग सी ११ एच १५ एन ओ २ (रासायनिक सूत्र है इस अवैधानिक दवा का ).यूस्ड इल्लिसितली एज अ स्तिम्युलेंत एंड रिलेक्सर ऑफ़ इन्हिबिसंस ।
एक्सटेसी इज अ मेंटल स्टेट ,युज्युअली कौज्द बाई इंटेंस रिलीजियस एक्सपीरिएंस ,सेक्स्युअल प्लेज़र आर ड्रग्स ,इन व्हिच सम -बडी इज सो दोमिनेतिद बाई एन इमोसन देत सेल्फ कंट्रोल एंड समटाइम्स कोंशशनेस आर लोस्ट ।
अब रिसर्च रिपोर्ट को लेतें हैं (कृपया विस्तार के लियें पढ़ें -एक्सटेसी कैन क्युओर पोस्ट -त्रौमेटिक स्ट्रेस ,दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,जुलाई २० ,२०१० ,पृष्ठ १५ )।
एक अभिनव रिसर्च के अनुसार 'एक्सटेसी 'का स्तेमाल "पोस्ट त्रौमेटिक स्ट्रेस दिस ऑर्डर "की लपेट में आकर हताश हो चुके लोगों को सदमे से उबार लेने में मददगार हो सकता है ।
एक परीक्षण में इस दवा का जादुई असर देखा गया है जिसमे गत १९ सालों से सदमे की गिरिफ्त में चले आयेमरीजों को इस डेमन की गिरिफ्त से बाहर लाने में मदद मिली है ।
बस डॉक्टरों को दो साइकोथिरेपी सत्र ३-५ सप्ताह के अंतर से (सेसंस ) आयोजित करने पड़ें इन मरीजों के लिए .इन सत्रों में इस दवा "एक्सटेसी केमिकल "एमडीएम्ऐ को मरीजों पर आजमाया गया ।
दो महीनो के बाद उन तमाम लोगों को इससे छुट कारा मिल गया जिन्हें एक्सटेसी केमिकल दिया गया था .."मेडिकल देफिनीशन ऑफ़ पोस्ट त्रौमेटिक स्ट्रेस दिस -ऑर्डर "के लक्षणों का इनमे नामोनिशान नहीं रह गया था .
दूसरा अर्थ अकसर मौज मस्ती के लिए हाई -सोसायटी में ली जाने वाली एक इल्लीगल ड्रग के स्तेमाल से जुड़ा है .
किशोर भी इस एक्सटेसी की गिरफ्त में हैं .एक्सटेसी इज एन इल्लीगल ड्रग सी ११ एच १५ एन ओ २ (रासायनिक सूत्र है इस अवैधानिक दवा का ).यूस्ड इल्लिसितली एज अ स्तिम्युलेंत एंड रिलेक्सर ऑफ़ इन्हिबिसंस ।
एक्सटेसी इज अ मेंटल स्टेट ,युज्युअली कौज्द बाई इंटेंस रिलीजियस एक्सपीरिएंस ,सेक्स्युअल प्लेज़र आर ड्रग्स ,इन व्हिच सम -बडी इज सो दोमिनेतिद बाई एन इमोसन देत सेल्फ कंट्रोल एंड समटाइम्स कोंशशनेस आर लोस्ट ।
अब रिसर्च रिपोर्ट को लेतें हैं (कृपया विस्तार के लियें पढ़ें -एक्सटेसी कैन क्युओर पोस्ट -त्रौमेटिक स्ट्रेस ,दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,जुलाई २० ,२०१० ,पृष्ठ १५ )।
एक अभिनव रिसर्च के अनुसार 'एक्सटेसी 'का स्तेमाल "पोस्ट त्रौमेटिक स्ट्रेस दिस ऑर्डर "की लपेट में आकर हताश हो चुके लोगों को सदमे से उबार लेने में मददगार हो सकता है ।
एक परीक्षण में इस दवा का जादुई असर देखा गया है जिसमे गत १९ सालों से सदमे की गिरिफ्त में चले आयेमरीजों को इस डेमन की गिरिफ्त से बाहर लाने में मदद मिली है ।
बस डॉक्टरों को दो साइकोथिरेपी सत्र ३-५ सप्ताह के अंतर से (सेसंस ) आयोजित करने पड़ें इन मरीजों के लिए .इन सत्रों में इस दवा "एक्सटेसी केमिकल "एमडीएम्ऐ को मरीजों पर आजमाया गया ।
दो महीनो के बाद उन तमाम लोगों को इससे छुट कारा मिल गया जिन्हें एक्सटेसी केमिकल दिया गया था .."मेडिकल देफिनीशन ऑफ़ पोस्ट त्रौमेटिक स्ट्रेस दिस -ऑर्डर "के लक्षणों का इनमे नामोनिशान नहीं रह गया था .
अब बच्चे नहीं देख सकेंगें एडल्ट प्रोग्रेम
अकसर माँ -बाप यही चाहतें हैं ,उनकी अनुपस्थिति में उनका बच्चा एडल्ट प्रोग्रेम ना देखे ।
बच्चे चोरी छिपे एडल्ट कार्यक्रम देख ही लेतें हैं .उनकी इसी चिंता का समाधान साइंसदानों ने प्रस्तुत कियाहै एक ऐसा रिमोट तैयार करके जो प्रकृति गत विलक्षण -ताओं ,व्यक्ति के व्यवहार करने के ख़ास और अकसर असामान्य तरीके को जान समझ लेता है .तद -अनुरूप आवश्यक कदम भी उठा लेता है ।
न्यू -साइंटिस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ आम रिमोट को साइंसदानों ने संशोधित परिमार्जित करके एक ऐसा रिमोट तैयार कर लिया है जिसमे ऐसे सेन्सर्स समाहित किये गये हैं जो आपकी व्यक्तिगत अभिरुचि ,विशेष पसंदगी को जान लेंगें .आपकोएवं अलग से ,एक परिवार के तमाम सदस्यों की प्रकृतिगत विलक्षण- ताओं को जान पहचान लेगायह रिमोट .प्रतिबन्ध भी लागू करदेगा कुछ कार्यक्रमों के प्रदर्शन पर ।
अरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी ,तेम्पे कैम्पस की एक टीम ने ,"इंटेल लैब्स" में एक ऐसा ही रिमोट तैयार किया है .प्रत्येक पांच में से एक सेशन में स्वयं -सेवियों ने स्वयं की शिनाख्त एक पिन एंटर करके दर्ज़ की .बाकी सेशंस में यह रिमोट व्यक्तिगत विलक्षण -ता के आधार पर आपकी ,व्यक्ति -विशेष की विशेष और असामान्य पसंदगी ,ना -पसंदगी का ६०-९० फीसद शुद्धता के साथ जायजा लेने में कामयाब रहा ।
असोसिएशन फॉर दी एडवांसमेंट ऑफ़ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कोंफरेंस ,एटलांटा में इसका गत सप्ताह प्रदर्शन किया गया है ..
सन्दर्भ -सामिग्री :-दिस रिमोट सेन्सर्स टीवी शोज़ फॉर किड्स (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,जुलाई १२ ,२०१० ,केपिटल एडिशन ,न्यू -देहली )
बच्चे चोरी छिपे एडल्ट कार्यक्रम देख ही लेतें हैं .उनकी इसी चिंता का समाधान साइंसदानों ने प्रस्तुत कियाहै एक ऐसा रिमोट तैयार करके जो प्रकृति गत विलक्षण -ताओं ,व्यक्ति के व्यवहार करने के ख़ास और अकसर असामान्य तरीके को जान समझ लेता है .तद -अनुरूप आवश्यक कदम भी उठा लेता है ।
न्यू -साइंटिस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ आम रिमोट को साइंसदानों ने संशोधित परिमार्जित करके एक ऐसा रिमोट तैयार कर लिया है जिसमे ऐसे सेन्सर्स समाहित किये गये हैं जो आपकी व्यक्तिगत अभिरुचि ,विशेष पसंदगी को जान लेंगें .आपकोएवं अलग से ,एक परिवार के तमाम सदस्यों की प्रकृतिगत विलक्षण- ताओं को जान पहचान लेगायह रिमोट .प्रतिबन्ध भी लागू करदेगा कुछ कार्यक्रमों के प्रदर्शन पर ।
अरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी ,तेम्पे कैम्पस की एक टीम ने ,"इंटेल लैब्स" में एक ऐसा ही रिमोट तैयार किया है .प्रत्येक पांच में से एक सेशन में स्वयं -सेवियों ने स्वयं की शिनाख्त एक पिन एंटर करके दर्ज़ की .बाकी सेशंस में यह रिमोट व्यक्तिगत विलक्षण -ता के आधार पर आपकी ,व्यक्ति -विशेष की विशेष और असामान्य पसंदगी ,ना -पसंदगी का ६०-९० फीसद शुद्धता के साथ जायजा लेने में कामयाब रहा ।
असोसिएशन फॉर दी एडवांसमेंट ऑफ़ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कोंफरेंस ,एटलांटा में इसका गत सप्ताह प्रदर्शन किया गया है ..
सन्दर्भ -सामिग्री :-दिस रिमोट सेन्सर्स टीवी शोज़ फॉर किड्स (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,जुलाई १२ ,२०१० ,केपिटल एडिशन ,न्यू -देहली )
पूर्व के अनुमानों से कहीं कम है पृथ्वी की उम्र
बेशक अब से कोई ४.५६७ अरब बरस पहले हमारा सौर मंडल बना था लेकिन पृथ्वी को निर्माण प्रक्रिया में बहुत समय लग गया था जो पूर्व के अनुमानों से बहुत ज्यादा ठहरता है .केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के भू -वेत्ताओंने पृथ्वी की पपड़ी (मेंतिल )और उल्काओं (मितीयोराइट्स) में मौजूद रासायनिक समस्थानिकों (केमिकल आइसोटोप्स )की परस्पर तुलना के बाद बतलाया है ,पृथ्वी ने अपना वर्तमान आकार ४.४६७ अरबबरस पूर्व ही जाकर हासिल किया था .
अतीत में लगाए गये अनुमानों के अनुसार पृथ्वी को पर्त -दर -पर्त गैस, धूल,इतर पदार्थ को गुरुत्व के तहत जुटाने में ,एक्रीशन में मात्र ३ करोड़ साल लगे .लेकिन वर्तमान अनुमानों के अनुसार यह अवधि १० करोड़ साल ठहरती है यानी तीन गुना से भी ज्यादा वक्त लगा एक्रीशन में आसपास से पदार्थ जुटाने में ।
बेशक अपने वर्तमान आकार का ६०फ़ीसद पृथ्वी ने अपेक्षया(अपेक्षतया ,रीलेतिवली ) जल्दी हासिल कर लिया था,लेकिन उसके बाद संभवतया एक्रीशन की रफ्तार कम हुई ,और वर्तमान स्वरूप को हासिल करते करते १० करोड़ वर्ष लग गए ।
एक्रीशन के दौरान अर्थस एम्ब्रियोज़ (भू -भूर्ण )परस्पर पास आकर जुड़ गए .ऐसा परस्पर टक्कर होने के बाद हुआ .संघात से जो गर्मी (ताप -ऊर्जा )पैदा हुई उससे ही पृथ्वी का क्रोड़ (कोर ,अंतर प्रदेश ) पिघल गया मेल्ट हो गया .तभी से यह कोर मोल्टन अवस्था में बनी हुई है .पपड़ी (मेंटिल) इसके बाहर का हिस्सा है ।जो बाद में बनी .
रासायनिक आइसोटोप्स ने जो पृथ्वी के मेंटिल और मितीयोराइट्स से जुटाए गएँ हैं एक बेहतरीन घड़ी की तरह ,जियोलोजिकल क्लोक की मानिंद काम किया है .
अलबत्ता कोर को बनने संपन्न होने में कुल कितना वक्त लगा यह सवाल आज भी एहम है .अनुत्तरित है ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-अर्थ मच यंगर देन थाट (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,जुलाई १२ ,२०१० ,पृष्ठ १५, केपिटल एडिशन )
अतीत में लगाए गये अनुमानों के अनुसार पृथ्वी को पर्त -दर -पर्त गैस, धूल,इतर पदार्थ को गुरुत्व के तहत जुटाने में ,एक्रीशन में मात्र ३ करोड़ साल लगे .लेकिन वर्तमान अनुमानों के अनुसार यह अवधि १० करोड़ साल ठहरती है यानी तीन गुना से भी ज्यादा वक्त लगा एक्रीशन में आसपास से पदार्थ जुटाने में ।
बेशक अपने वर्तमान आकार का ६०फ़ीसद पृथ्वी ने अपेक्षया(अपेक्षतया ,रीलेतिवली ) जल्दी हासिल कर लिया था,लेकिन उसके बाद संभवतया एक्रीशन की रफ्तार कम हुई ,और वर्तमान स्वरूप को हासिल करते करते १० करोड़ वर्ष लग गए ।
एक्रीशन के दौरान अर्थस एम्ब्रियोज़ (भू -भूर्ण )परस्पर पास आकर जुड़ गए .ऐसा परस्पर टक्कर होने के बाद हुआ .संघात से जो गर्मी (ताप -ऊर्जा )पैदा हुई उससे ही पृथ्वी का क्रोड़ (कोर ,अंतर प्रदेश ) पिघल गया मेल्ट हो गया .तभी से यह कोर मोल्टन अवस्था में बनी हुई है .पपड़ी (मेंटिल) इसके बाहर का हिस्सा है ।जो बाद में बनी .
रासायनिक आइसोटोप्स ने जो पृथ्वी के मेंटिल और मितीयोराइट्स से जुटाए गएँ हैं एक बेहतरीन घड़ी की तरह ,जियोलोजिकल क्लोक की मानिंद काम किया है .
अलबत्ता कोर को बनने संपन्न होने में कुल कितना वक्त लगा यह सवाल आज भी एहम है .अनुत्तरित है ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-अर्थ मच यंगर देन थाट (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,जुलाई १२ ,२०१० ,पृष्ठ १५, केपिटल एडिशन )
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