शुक्रवार, 21 जून 2013

हाई रिस्क समूह में कौन आता है जिसे काला मोतिया(ग्लूकोमा ) हो सकता है

हाई रिस्क समूह में कौन आता है जिसे काला मोतिया(ग्लूकोमा ) हो सकता है



हाई रिस्क समूह में कौन आता है जिसे काला मोतिया(ग्लूकोमा ) हो सकता है 

(१)जिसके परिवार में काला मोतिया किसी सदस्य को हो या पूर्व में रहा हो 

(२)मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति को 

(३)हाई माइनस व प्लस नम्बर का चश्मा पहनने वाले को 

(४)हाइपरटेंशन से पीड़ित व्यक्ति को 

(५)आँखों की सर्जरी करा चुके व्यक्ति को 

(६ )थायराइड ग्रन्थि रोग से पीड़ित व्यक्ति को 

(७ )जिस व्यक्ति को काफी लम्बे समय से मोतियाबिंद (सफ़ेद मोतिया ,कैटरेक्ट )हो 

(८ )जिसको कभी आँख में चोट लगी हो 

(९ )लम्बे समय तक स्टेरोइड युक्त आई ड्राप प्रयोग करने वाले व्यक्ति को 

क्या काला मोतिया ठीक हो सकता है ?

काला मोतिया से आँखों को पहुंचे नुकसान की भरपाई संभव नहीं है .लेकिन इलाज़ के ज़रिये आप्टिक नर्व को होने वाले नुकसान की गति को कम व रोका जा सकता है .इस पर काबू पाने के लिए अच्छे नेत्र विशेषज्ञ की देखरेख में बेहद नियमित व सधे हुए इलाज़ की ज़रुरत होती है .यह जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है .


काला मोतिया के इलाज़ के लिए क्या विकल्प उपलब्ध हैं ?

इलाज़ का प्राथमिक उद्देश्य होता है कि आँखों के दवाब को कम किया जाए .यह ग्लूकोमा के प्रकार पर निर्भर करता है कि आँखों का दवाब कम करने के लिए दवा का प्रयोग किया जाए या सर्जरी का सहारा लिया जाए .साधारनतय: एक विशेष प्रकार की आई ड्राप दी जाती है जो आँखों के प्रेशर को कम करती   है .काला मोतिया के प्रकार व उसकी अवस्था पर निर्भर करता है कि इन आई ड्राप्स का प्रयोग दिन में एक बार या कई बार किया जाए .काला मोतिया की दवाएं मुंह से खाने व इंजेक्शन के माध्यम से भी दी जातीं हैं .

क्लोज्ड एंगिल काला मोतिया के इलाज़ के लिए आपात स्थिति में लेज़र (इरिडोटॉमी )का प्रयोग किया जाता है .लेजर के माध्यम से आँखों के अंदर बनने वाले जलीय द्रव की निकासी के लिए आँख के आइरिस में एक छिद्र बना दिया जाता है जिससे आँखों का दवाब कम हो जाता है .यह लेजर सर्जरी के माध्यम से किया जाता है ,इसमें किसी प्रकार का कोई चीरा नहीं लगता है .सर्जरी सामान्यतया अगला कदम होता है .ट्रेबीकुलेक्टोमी नाम की सर्जरी के माध्यम से काला मोतिया को कंट्रोल में लाया जा सकता है .इस तकनीक में जलीय द्रव की निकासी के लिए नया रास्ता बना दिया जाता है .इससे आँखों का दवाब सामान्य स्तर पर आ जाता है .

काला मोतिया से बचाव :

अधिकाँश मामलों में काला मोतिया से बचाव का कोई तरीका नहीं है ,लेकिन होने पर यह जितनी जल्दी पकड़ में आ जाए उतना बेहतर है .समय पर इलाज़ शुरू कर इससे दृष्टि ह्रास पर काबू पाया जा सकता है और अंधेपन को रोका जा सकता है .हमेशा सलाह दी जाती है कि अत्यधिक धूम्रपान से बचें और आँखों की नियमित जांच कराएं ,ख़ासतौर पर वह लोग जो हाईरिस्क समूह से सम्बन्ध रखते हैं .

काला मोतिया के बारे में ध्यान रखे जाने वाले तथ्य :

(१)कई बार काले मोतिया के लक्षण पकड़ में नहीं आते हैं 

(२) काला मोतिया चुपचाप आँखों की रौशनी चुरा सकता है 

(३) समय पर काला मोतिया के पकड़ में आने से ही दृष्टि ह्रास व अंधेपन को रोका जा सकता है .


तुरंत संपर्क करें ,यदि इनमें से किसी एक भी लक्षण का अनुभव आपको हो 

(१) आँखों में भयंकर दर्द 

(२) अचानक दृष्टि ह्रास (बीनाई का गिरना )

(३)रौशनी के चारों ओर इंद्रधनुषीय घेरा या प्रभामंडल का दिखना 

(४) जी मिचलाना या उलटी आना 

(५ )रात्रि में खराब दृष्टि 

(६ )आँखों में लम्बे समय से लाली 



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काला मोतिया

काला मोतिया (ग्लूकोमा )क्या है ?

एक प्रकार का जलीय द्रव (Aqueous humor)आँख के  ऊपरी एक तिहाई भाग में भरा रहता है ,जो कोर्निया (स्वच्छ पटल )को पोषण देने के साथ लेंस की सुरक्षा व आँखों को आकार देने का काम करता है .यह आँख के 

भीतर निरंतर बनता व एक कोने से बाहर निकलता रहता है .सामान्य आँख में इस द्रव के बनने व बाहर निकलने की प्रक्रिया संतुलित रहती है ,जिससे आँखों के अंदर दवाब (intraocular pressure )स्थिर बना रहता है .

कुछ लोगों में बढती उम्र के साथ ,आँखों के भीतर बनने वाले जलीय द्रव के निकलने का रास्ता बंद हो जाता है और द्रव बाहर नहीं निकल पाता .जिस कारण आँखों के भीतर का दवाब बढ़ने लगता है .इससे आँख को मस्तिष्क से जोड़ने वाली नसें (आप्टिक नर्व )क्षति ग्रस्त होने से दृष्टि का दायरा सिकुड़ जाता है .इस स्थिति को ग्लूकोमा या काला मोतिया कहते हैं .

ग्लूकोमा के प्रकार :

यह मुख्यतय: तीन प्रकार का होता है :

(१)प्राइमरी ओपन एंगिल काला मोतिया :यह काला मोतिया का सबसे सामान्य प्रकार है .इसमें दृष्टि बिना किसी दर्द के धीरे धीरे कम होती जाती है .प्रभावित व्यक्ति में इसका  कोई लक्षण नहीं दिखता 

.सामान्यतय : उसे इसका पता तब चलता है जब आँखों से मस्तिष्क को जोड़ने वाली नसें गंभीर रूप से क्षति ग्रस्त हो चुकी होती  हैं .

(२)नार्मल टेंशन काला मोतिया :विशेष प्रकार के इस काला मोतिया में आँखों के भीतर का दवाब कम होने के बावजूद आँखों को मस्तिष्क से जोड़ने वाली नसें ,आँखों में रक्त प्रवाह घटने से प्रभावित होती हैं .

(३ )क्लोज्ड एंगिल काला मोतिया :इस प्रकार के काला मोतिया में ,आँख के भीतर बनने वाले जलीय द्रव की निकासी बाधित हो जाती है और आँख का दवाब अचानक से बढ़ जाता है .इसके  महत्वपूर्ण लक्षणों में आँखों में दर्द ,सिरदर्द ,दृष्टि का कम होना शामिल है .इस स्थिति में स्थाई दृष्टि ह्रास रोकने के लिए तुरंत नेत्र विशेषज्ञ की देख रेख में उपचार की ज़रुरत होती है .

अन्य प्रकार का काला मोतिया :जन्मजात काला मोतिया और अन्य कारणों से होने वाला काला मोतिया .

अधिकाँश प्रकार के काला मोतिया में यह तीन लक्षण देखने को मिलते हैं :

(१) आँखों के अन्दर का दवाब बढना :आँखों के दवाब का आकलन गोल्डमैन अप्लानेशन टोनो मीटर की मदद से करते हैं .इस उपकरण को मरीज़ की आँखों पर विपरीत दिशा में रखते हैं और आँखों का दवाब मापते हैं .

(२ )कपिंग या आप्टिक नर्व की क्षीणता :आँखों के अंदर दवाब बढ़ने से आँख को मस्तिष्क से जोड़ने वाली नस (आप्टिक नर्व )के फाइबर की परत को नुकसान पहुंचता है .नै इमेजिंग तकनीक जैसे आप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्रेफी (OCT),GDX,HRTसे आप्टिक नर्व के फाइबर की परत को कितना नुकसान पहुंचा है इसका आकलन किया जा सकता है और इसके विस्तार और बढ़ाव  के बारे में पता भी लगाया जा सकता है .

(४ )दृष्टि क्षेत्र में त्रुटि :इसमें दृष्टि का दायरा सिकुड़ जाता है ,मरीज़ का दृष्टि क्षेत्र संकरा हो जाता है .दृष्टि क्षेत्र में संकुचन का आकलन पैरीमीटर नाम के उपकरण से सम्भव है .

ग्लूकोमा के लक्षण :काला मोतिया के शुरूआती चरण में कोई ख़ास लक्षण दिखाई नहीं पड़ते ,जिससे इसका अंदाजा लगाया जा सके .यह भी संभव है कि प्राइ- मरी ओपन एंगिल काला मोतिया से पीड़ित इससे पूरी तरह अनजान हो .प्राइमरी ओपन एंगिल काला मोतिया सामान्यतय :बड़ी धीमी गति से बढ़ता है .इसके कुछ निम्नलिखित लक्षण हो सकते हैं .

(१)आँखों को थियेटर जैसे अँधेरे में से सामंजस्य बिठाने में दिक्कत होती है 

(२)पढ़ने  का नम्बर (रीडिंग ग्लास )जल्दी जल्दी बदलना 

(३) दृष्टि का क्रमिक ह्रास 

(४ )दृष्टि का धुंधला होना 

(५ )सिरदर्द 

(६)रात्रि में ठीक प्रकार से न दिखाई देना 

क्लोज्ड एंगिल मोतिया में आँखों का दवाब अचानक  से बढ़ जाता है .कई बार इसके गंभीर लक्षण  सामने आते हैं .

(१)रौशनी के चारों और इंद्रधनुषीय घेरा दिखना 

(२)आँखों में तेज़ दर्द चेहरे में दर्द 

(३ )आँखों का लाल होना 

(४ )धुंधली दृष्टि व रौशनी के चारों ओर एक चमकदार घेरा दिखना 

(५ )जी मिचलाना व उलटी आना 

(६ )आँखों के अंदर घुप्प अँधेरे क्षेत्र का एहसास 

काला मोतिया के लिए जांच :

(१)पैरीमीटरी -यह जांच ज़रूरी है न केवल काला मोतिया के वर्तमान दुष्प्रभाव व विस्तार का पता लगाने के लिए बल्कि इसकी मदद से यह भी पता लगाया जाता है कि काला मोतिया किस गति से आगे बढ़ रहा है .इससे उपचार व उसकी प्रतिक्रिया का भी पता चलता है .इस जांच के लिए आधुनिक व परिष्कृत मशीनों व एडवांस साफ्टवेयर की ज़रुरत पड़ती है .इसमें काफी समय लगता है और कई बार अच्छे नतीजों के लिए जांच को एक निश्चित अंतराल के बाद दोहराना भी पड़ सकता है .

(२ )टोनोमीटरी :आँखों के दवाब को नापने के लिए गोल्डमैन अप्लानेशन टोनो मीटर का प्रयोग किया जाता है .

(३ )गोनियोस्कोपि :आँखों के ऊपर एक लेंस रख कर जांच की जाती है कि काला मोतिया ओपन (खुले )या क्लोज्ड (बंद )किस प्रकार का है .

(४ )अन्य जांच :OCT (आप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्रेफ़ी ),CCT (पेसिमीट्री )आदि .ओसीटी एक नान इन्वेज़िव जांच है .इसमें आँखों को छूने की ज़रुरत नहीं पड़ती है .इसमें मरीज़ को एक एडवांस मशीन में छोटी लाइन पर दृष्टि केन्द्रित करने को कहा जाता है ,महज़ इतने भर में मशीन का आधुनिक साफ्वेयर आँखों के आप्टिक नर्व व नर्व के फाइ -बर परत की स्थिति का आकलन कर लेती है .वहीँ सी सी टी में कोर्निया (स्वच्छ मंडल )की अल्ट्रासोनिक जांच की जाती .

(ज़ारी )

बुधवार, 19 जून 2013

क्या आत्मा महज़ एक विचार है .आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है ?

क्या आत्मा महज़ एक विचार है .आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है ?शरीर के साथ सब कुछ चुक जाता है ?पुनर -जन्म की अवधारणा भ्रामक है ?

आज एक ब्लॉग पोस्ट पढ़ी उसका लब्बोलुआब यही था कि आत्मा एक विचार मात्र है और शरीर के क्षीण होने पर अंतिम संस्कार के वक्त हवा ,पानी ,अग्नि ,आकाश और पृथ्वी तत्व वायुमंडल में ही खो जाते हैं जिनसे पुनर्जन्म बोले तो नै काया  का निर्माण हो  ही नहीं  सकता .



मन में इस ब्लॉग पोस्ट को पढ़ने  पर यह सवाल कौंधा ,फिर आत्मा ,परमात्मा ,पापात्मा ,दुरात्मा ,हुतात्मा ,प्रेतात्मा ,महात्मा ,महान आत्मा ,दुष्टात्मा शब्द कहाँ से आये और इनका अर्थ क्या है ?

'मेरी तो उसे देख रूह फना हो गई' ऐसे जुमले वाक्य और   शब्द प्रयोग भी भाषिक जगत से बे -दखल करने पड़ेंगे .रूह रूहान शब्द भी भाषा कोष से बाहर करना पड़ेगा .परमात्मा से आत्मा का रूह रूहान बोले तो बातचीत निलंबित रखनी पड़ेगी .

फिर यह जुमला  क्यों चल निकला फलाने ने (अमुक ने )कल रात शरीर छोड़ दिया ?परमात्मा उसकी आत्मा को शान्ति दे .दो मिनिट का मौन रखके हम किसे श्रद्धांजलि देते हैं फिर .अकाल मृत्यु (आकस्मिक दुर्घटना मृत्यु )होने पर आत्मा की शांति के लिए विशेष स्थानों पर क्यों जाते हैं .महामृत्युंजय मन्त्र का जाप क्यों करते हैं .

तेरह दिन तक दीया (दीपक )क्यों जलाया जाता है उस स्थान पर जहां किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है (आत्मा शरीर छोडती है ).फिर साल भर बाद सनातन धर्मी गंगा ,यमुना या किसी भी नदी के तट पे जाके दीपक क्यों सिलाते हैं ?यही न की परलोक में भी वह आत्म तत्व आलोकित रहे जो स्वयं ज्योतिबिंदु स्वरूप है .दीपक की लौ सा पवित्र है .

क्या यह सब कल्पना मान लिया जाए .शरीर के साथ क्या सब कुछ खत्म हो जाता है .या फिर मुसाफिर (आत्मा )का सफर ज़ारी रहता है .एक से दूसरे  चोले  में ?८ ४ जन्मों तक और फिर सब कुछ की पुनरावृत्ति होती है .आवा जाहि ज़ारी रहती है आत्मा की एक से दूसरे  शरीर में .

क्यों कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा -हे अर्जुन आत्मा अजर अमर  अविनाशी है .पञ्च भूतों से परे निराकार परम ज्योति तत्व है .शश्त्र जिसे काट नहीं सकते ,अग्नि जिसे जला नहीं सकती .तू अपने बंधू बांधवों का मोह छोड़ नष्टो  मोहा बन कर्म कर .फल की चिंता मत कर .निष्काम कर्म ही गीता का सार है .जो हुआ अच्छा हुआ ,जो हो रहा है वह भी अच्छा हो रहा है जो होगा वह भी अच्छा होगा .फल की चिंता मत कर .

क्यों शरीर को आत्मा का वस्त्र कहा जाता है .क्यों कहा जाता है मनुष्य आत्मा अधिकतम ८ ४ और न्यूनतम एक मर्तबा जन्म लेती है .वस्त्र बदलती है .बंधू बांधव सखा बदलती है .जाति  धर्म देश बदलती है .दैहिक सम्बन्ध बदलती है .

क्यों कहा जाता है आत्मा अ-लैंगिक होती है शरीर स्त्री और पुरुष होता है आत्मा नहीं .रूह सबकी पञ्च तत्वों से परे अपने बुनियादी स्वरूप  में यकसां हैं .न स्त्री है न पुरुष .

शरीर को रथ, आत्मा को रथी ,बुद्धि को सारथी क्यों कहा गया फिर ?

रथी जब रथ (शरीर )छोड़ जाता है ,शेष को अर्थी क्यों कहते हैं .श्राद्ध पक्ष और पिंड दान का क्या मतलब है फिर ?पिंड कहा जाता है रहने की जगह को . आत्मा का अस्थाई गाँव उसका शरीर(पिंड ) ही है ?स्थाई है परमधाम जहां दिव्यप्रकाश है शान्ति है .


और आत्मा का स्थाई निवास ब्रह्मलोक (परलोक ),पार गगन ,परे से भी परे परम धाम है .

आत्मा का पारलौकिक पिता परम -आत्मा (निराकार शिव ,ज्योतिर्लिन्गम )है .लौकिक पिता शरीर का पिता है .दैहिक सम्बन्ध में शरीर आता है .इस देह में लौकिक मात पिता के जीवन खंड (जींस )होते हैं .अ-लौकिक शरीर बोले तो आत्मा का पिता  पार -लौकिक परमात्मा है .रूह के जींस नहीं होते कर्म की छाप लिए रहती है रूह .आपका क्या कहना है अपनी राय दें .

यह भी बतला दें -मनोविज्ञान की पहली परिभाषा -मनोविज्ञान आत्माओं का विज्ञान है दी गई है .विरोधाभास देखिये आज वही मनोविज्ञानी आत्मा का नाम लेने पर नाक भौं सिकोड़ते हुए उसके अस्तित्व को नकारते हुए कहतें हैं आत्मा यदि है तो लाओ उसे लैब में .

पूछा जा सकता है आत्मा क्या गिनी पिग है या लेबोरेट्री एनिमल  है  ?

सन्दर्भ- सामिग्री :

http://vichar-anubhuti.blogspot.com/2013/06/blog-post_8.html

जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !







            जन्म और मृत्यु ,यही है दो अटल सत्य।जन्म होगा तो मृत्यु  निश्चित है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन की संज्ञा  दी गई है। इस प्रकार जन्म ,जीवन और मृत्यु ,यही है कहानी हर जीव की।परन्तु जन्म के पहले की अवस्था ,स्थिति काया है , मृत्यु के बाद की स्थिति क्या है ? कहाँ  जाते हैं ? यह किसी को पता नहीं है।जन्म के पहले क्या ?  मृत्यु के बाद क्या ? यही है शाश्वत प्रश्न।
              शास्त्रों  में 'आत्मा' 'की  बात कही गई  है। कहते हैं आत्मा नश्वर शरीर  को छोड़कर अलग हो जाती है और परमात्मा में विलीन हो जाती  है जिसे 'मोक्ष' कहते हैं। अतृप्त आत्मा फिर जन्म लेती है अर्थात कोई नया शरीर धारण करती है और यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जबतक उसे 'मोक्ष' नहीं मिल जाता है।आत्मा का नया शरीर धारण करने को 'पुनर्जन्म ' कहा जाता है।अब प्रश्न उठता   है ,
 "आत्मा क्या है? शरीर क्या है ?"
शरीर में आत्मा है तो वह जीवित है। शरीर आत्माहीन है तो वह मृत है,शव है। इसका अर्थ है, आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है।शरीर पञ्च तत्व से बना है।शरीर के नष्ट होने पर वे तत्व पांच अलग अलग तत्वों में मिल  जाते हैं, अर्थात पूरा शरीर का रूप परिवर्तन हो जाता  है। यहाँ विज्ञान का सिद्धान्त लागू होता है कि ,"किसी पदार्थ को नष्ट नहीं किया जा सकता है केवल उसका रूप परिवर्तन किया जा सकता है। The matter cannot be destroyed but it can be transformed into another form." इसीलिए मरने के बाद शव को जलाना या कब्र में रखना, रूप परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसके बाद के जो क्रिया कर्म ,रस्म रिवाज़ हैं उस से न आत्मा का,  न शरीर का  कोई सम्बन्ध है और न उनको कोई लाभ या हानी होती है। ये क्रियाएं शरीर और आत्मा के लिए अर्थहीन हैं और अंधविश्वास से प्रेरित हैं।
               आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है इसीलिए आत्मा और शरीर का घनिष्ट सम्बन्ध है। शरीर स्थूल है ,दृश्य है।आत्मा सूक्ष्म ,तीक्ष्ण ,तीब्र और अदृश्य है।शरीर पाँच तत्वों से बना है। वे तत्व हैं अग्नि ,वायु ,जल ,मृत्तिका और आकाश।ये सब मिलकर शरीर बनाते हैं और इनकी प्राप्ति माँ से होती है।माँ के गर्भ में जब शरीर बनकर तैयार हो जाता है उसमें कम्पन उत्पन्न होता है जिसे आत्मा का शरीर में प्रवेश का नाम दिया गया है अर्थात आत्मा ने एक नया शरीर धारण कर लिया है। 
                लेकिन इसे यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कम्पन पैदा कैसे होता है?
               पाँच तत्वों में अग्नि उष्मा(Heat Energy)  का स्वरुप है।हीट एनर्जी परिवर्तित होकर (Electrical Energy )इलेक्ट्रिकल एनर्जी बन जाता है। यह शरीर के हर सेल (Bio Cell) को विद्युत् सेल बना देता है। यह स्वनिर्मित विद्युत् है। सब सेलों का  समुह शरीर का पॉवर हाउस बन जाता है।पुरे शरीर में विद्युत् प्रवाहित होने लगता है।हमारे शरीर में जो रिफ्लेक्स एक्शन होता है वह इसी विद्युत् प्रवाह के कारण  होता है।हमारे ब्रेन तेजी से काम करता है वह भी विद्युतप्रवाह के कारण कर पाता  है।पैर में चींटी काटता  है तो हमें दर्द महसूस होता है ,यह रिफ्लेक्स एक्शन के कारण होता है और रिफ्लेक्स एक्शन विद्युत प्रवाह के कारण होता है।जिस सेल में विद्युत् प्रवाह नहीं होता है उसमें चैतन्यता नहीं रहती (स्नायु हीन होता है ).इसीलिए उस सेल में होने वाले दर्द हमें पता नहीं लगता। यही विद्युत् जबतक शरीर में रहता है ,शरीर चैतन्य की हालत में रहता है।
              अग्नि उष्मा के रूप में वायु की गति को नियंत्रित करती है।यही वायु और विद्युत् मिलकर अपनी अपनी प्रवाह से ह्रदय ,फेफड़े तथा  अन्य महत्वपूर्ण अंगो  में कम्पन उत्पन्न करता है और यही कम्पन जीवन की निशनी है।जल और मृत्तिका शरीर को स्थूल रूप देने के साथ साथ विद्युत् और वायुके गति निर्धारण में निर्णायक भुमिका निभाते हैं। दो सेल के बीच  में कुछ स्थान खाली रहता है ,यह सेल के चलन में सहायक है।उसी प्रकार शरीर के अन्दर दो अंगो के बीच में खाली स्थान रहता है।सेल और अंगो के बीच में खालीस्थान को आकाश (शून्य ) कहते हैं।अगर खाली  स्थान नहीं होगा तो वांछित कम्पन उत्पन नहीं होगा। मन की शुन्यता भी आकाश है।इस प्रकार पञ्च तत्त्व शरीर में कम्पन उत्पन्न करने में (प्राण प्रतिष्ठा ) महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।शरीर में अग्नि का कमजोर होने पर या अत्यधिक बढ़ जाने पर वायु की गति में भी तदनुसार परिवर्तन होता है। विद्युत् संचार में भी परिवर्तन होता है।इसीलिए शरीर का तापक्रम पर नियंत्रण रखना बहुत जरुरी है।वृद्धावस्था में या बिमारी की अवस्था में शरीर में उष्मा की कमी हो जाता है। विद्युत् संचार कम हो जाता हैऔर धीरे धीरे ऐसी अवस्था में आ जाता है जब सेल आवश्यक विद्युत् उत्पन्न नहीं कर पाता  है। ऊष्मा की कमी के कारण हवा की गति रुक जाती है।यही मृत्यु की अवस्था है। शरीर में बचा  विद्युत् (Residual) निकलकर अंतरिक्ष के तरंगों में मिलजाता है। शरीर के पाँच तत्त्व अलग अलग होकर पञ्च तत्त्व में विलीन हो जाता है। इस अवस्था में किसी आत्मा की कल्पना करना या उसकी मोक्ष की कल्पना करना ,वास्तव में कल्पना ही लगता है।
           रही बात पुनर्जन्म की तो शरीर जिन अणु परमाणु से  बना था ,दूसरा शरीर वही अणु ,वही परमाणु से नहीं बनता ,इसीलिए शरीर का पुनर्जन्म संभव नहीं है। नया शरीर में पञ्च तत्व के नए अणु ,परमाणु होंगे। अत: उनमे नया कम्पन होगा।विद्युत् पॉवर हाउस भी नया होगा। यहाँ कम्पन का पुनर्जन्म या विद्युत् का पुनर्जन्म कहना सही नहीं लगता। कम्पन आत्मा नहीं ,विद्युत्  भी आत्मा नहीं। अत: 'आत्मा' एक वैचारिक तत्त्व है और वैचारिक  तत्त्व न नष्ट होता है, न उसका पुनर्जन्म 
होता है।

नोट : विद्वान पाठकों से निवेदन है कि  वे विषय पर केवल अपनी सोच/विचार व्यक्त करे।किसी के कमेंट्स के ऊपर कमेंट्स कर वाद विवाद ना करें। इस लेख का उद्देश्य है विभिन्न विचार धारायों से खुद को और पाठकों को  परिचय कराना।  


कालीपद "प्रसाद "


©सर्वाधिकार सुरक्षित
.


क्या आत्मा महज़ एक विचार है .आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है ?

क्या आत्मा महज़ एक विचार है .आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है ?शरीर के साथ सब कुछ चुक जाता है ?पुनर -जन्म की अवधारणा भ्रामक है ?

आज एक ब्लॉग पोस्ट पढ़ी उसका लब्बोलुआब यही था कि आत्मा एक विचार मात्र है और शरीर के क्षीण होने पर अंतिम संस्कार के वक्त हवा ,पानी ,अग्नि ,आकाश और पृथ्वी तत्व वायुमंडल में ही खो जाते हैं जिनसे पुनर्जन्म बोले तो नै काया  का निर्माण हो  ही नहीं  सकता .



मन में इस ब्लॉग पोस्ट को पढ़ने  पर यह सवाल कौंधा ,फिर आत्मा ,परमात्मा ,पापात्मा ,दुरात्मा ,हुतात्मा ,प्रेतात्मा ,महात्मा ,महान आत्मा ,दुष्टात्मा शब्द कहाँ से आये और इनका अर्थ क्या है ?

'मेरी तो उसे देख रूह फना हो गई' ऐसे जुमले वाक्य और   शब्द प्रयोग भी भाषिक जगत से बे -दखल करने पड़ेंगे .रूह रूहान शब्द भी भाषा कोष से बाहर करना पड़ेगा .परमात्मा से आत्मा का रूह रूहान बोले तो बातचीत निलंबित रखनी पड़ेगी .

फिर यह जुमला  क्यों चल निकला फलाने ने (अमुक ने )कल रात शरीर छोड़ दिया ?परमात्मा उसकी आत्मा को शान्ति दे .दो मिनिट का मौन रखके हम किसे श्रद्धांजलि देते हैं फिर .अकाल मृत्यु (आकस्मिक दुर्घटना मृत्यु )होने पर आत्मा की शांति के लिए विशेष स्थानों पर क्यों जाते हैं .महामृत्युंजय मन्त्र का जाप क्यों करते हैं .

तेरह दिन तक दीया (दीपक )क्यों जलाया जाता है उस स्थान पर जहां किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है (आत्मा शरीर छोडती है ).फिर साल भर बाद सनातन धर्मी गंगा ,यमुना या किसी भी नदी के तट पे जाके दीपक क्यों सिलाते हैं ?यही न की परलोक में भी वह आत्म तत्व आलोकित रहे जो स्वयं ज्योतिबिंदु स्वरूप है .दीपक की लौ सा पवित्र है .

क्या यह सब कल्पना मान लिया जाए .शरीर के साथ क्या सब कुछ खत्म हो जाता है .या फिर मुसाफिर (आत्मा )का सफर ज़ारी रहता है .एक से दूसरे  चोले  में ?८ ४ लाख जन्मों तक और फिर सब कुछ की पुनरावृत्ति होती है .आवाजाही  ज़ारी रहती है आत्मा की एक से दूसरे  शरीर में .

क्यों कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा -हे अर्जुन आत्मा अजर अमर  अविनाशी है .पञ्च भूतों से परे निराकार परम ज्योति तत्व है .शश्त्र जिसे काट नहीं सकते ,अग्नि जिसे जला नहीं सकती .तू अपने बंधू बांधवों का मोह छोड़ नष्टो  मोहा बन कर्म कर .फल की चिंता मत कर .निष्काम कर्म ही गीता का सार है .जो हुआ अच्छा हुआ ,जो हो रहा है वह भी अच्छा हो रहा है जो होगा वह भी अच्छा होगा .फल की चिंता मत कर .

क्यों शरीर को आत्मा का वस्त्र कहा जाता है .क्यों कहा जाता है मनुष्य आत्मा अधिकतम ८ ४लाख  और न्यूनतम एक मर्तबा जन्म लेती है .वस्त्र बदलती है .बंधू बांधव सखा बदलती है .जाति  धर्म देश बदलती है .दैहिक सम्बन्ध बदलती है .

क्यों कहा जाता है आत्मा अ-लैंगिक होती है शरीर स्त्री और पुरुष होता है आत्मा नहीं .रूह सबकी पञ्च तत्वों से परे अपने बुनियादी स्वरूप  में यकसां हैं .न स्त्री है न पुरुष .

शरीर को रथ, आत्मा को रथी ,बुद्धि को सारथी क्यों कहा गया फिर ?

रथी जब रथ (शरीर )छोड़ जाता है ,शेष को अर्थी क्यों कहते हैं .श्राद्ध पक्ष और पिंड दान का क्या मतलब है फिर ?पिंड कहा जाता है रहने की जगह को . आत्मा का अस्थाई गाँव उसका शरीर(पिंड ) ही है ?स्थाई है परमधाम जहां दिव्यप्रकाश है शान्ति है .


और आत्मा का स्थाई निवास ब्रह्मलोक (परलोक ),पार गगन ,परे से भी परे परम धाम है .

आत्मा का पारलौकिक पिता परम -आत्मा (निराकार शिव ,ज्योतिर्लिन्गम )है .लौकिक पिता शरीर का पिता है .दैहिक सम्बन्ध में शरीर आता है .इस देह में लौकिक मात पिता के जीवन खंड (जींस )होते हैं .अ-लौकिक शरीर बोले तो आत्मा का पिता  पार -लौकिक परमात्मा है .रूह के जींस नहीं होते कर्म की छाप लिए रहती है रूह .आपका क्या कहना है अपनी राय दें .

यह भी बतला दें -मनोविज्ञान की पहली परिभाषा -मनोविज्ञान आत्माओं का विज्ञान है दी गई है .विरोधाभास देखिये आज वही मनोविज्ञानी आत्मा का नाम लेने पर नाक भौं सिकोड़ते हुए उसके अस्तित्व को नकारते हुए कहतें हैं आत्मा यदि है तो लाओ उसे लैब में .

पूछा जा सकता है आत्मा क्या गिनी पिग है या लेबोरेट्री एनिमल  है  ?

कुछ कहते हैं आत्मा का यदि  अस्तित्व है तो  वह दिखाई क्यों नहीं देता ?

बतलादें आत्मा पंचभूतों की निर्मिति  नहीं है जो नेत्र उसे देख सकें। दिखलाई तो दूध में मख्खन लकड़ी में अग्नि जल में तरंग भी नहीं देती लेकिन इनकी  व्याप्ति रहती है दूध लकड़ी तथा जल में। जो चीज़ दिखलाई नहीं देती क्या उसका अस्तित्व नहीं होता। 

सन्दर्भ- सामिग्री :

http://vichar-anubhuti.blogspot.com/2013/06/blog-post_8.html


जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !







            जन्म और मृत्यु ,यही है दो अटल सत्य।जन्म होगा तो मृत्यु  निश्चित है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन की संज्ञा  दी गई है। इस प्रकार जन्म ,जीवन और मृत्यु ,यही है कहानी हर जीव की।परन्तु जन्म के पहले की अवस्था ,स्थिति काया है , मृत्यु के बाद की स्थिति क्या है ? कहाँ  जाते हैं ? यह किसी को पता नहीं है।जन्म के पहले क्या ?  मृत्यु के बाद क्या ? यही है शाश्वत प्रश्न।
              शास्त्रों  में 'आत्मा' 'की  बात कही गई  है। कहते हैं आत्मा नश्वर शरीर  को छोड़कर अलग हो जाती है और परमात्मा में विलीन हो जाती  है जिसे 'मोक्ष' कहते हैं। अतृप्त आत्मा फिर जन्म लेती है अर्थात कोई नया शरीर धारण करती है और यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जबतक उसे 'मोक्ष' नहीं मिल जाता है।आत्मा का नया शरीर धारण करने को 'पुनर्जन्म ' कहा जाता है।अब प्रश्न उठता   है ,
 "आत्मा क्या है? शरीर क्या है ?"
शरीर में आत्मा है तो वह जीवित है। शरीर आत्माहीन है तो वह मृत है,शव है। इसका अर्थ है, आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है।शरीर पञ्च तत्व से बना है।शरीर के नष्ट होने पर वे तत्व पांच अलग अलग तत्वों में मिल  जाते हैं, अर्थात पूरा शरीर का रूप परिवर्तन हो जाता  है। यहाँ विज्ञान का सिद्धान्त लागू होता है कि ,"किसी पदार्थ को नष्ट नहीं किया जा सकता है केवल उसका रूप परिवर्तन किया जा सकता है। The matter cannot be destroyed but it can be transformed into another form." इसीलिए मरने के बाद शव को जलाना या कब्र में रखना, रूप परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसके बाद के जो क्रिया कर्म ,रस्म रिवाज़ हैं उस से न आत्मा का,  न शरीर का  कोई सम्बन्ध है और न उनको कोई लाभ या हानी होती है। ये क्रियाएं शरीर और आत्मा के लिए अर्थहीन हैं और अंधविश्वास से प्रेरित हैं।
               आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है इसीलिए आत्मा और शरीर का घनिष्ट सम्बन्ध है। शरीर स्थूल है ,दृश्य है।आत्मा सूक्ष्म ,तीक्ष्ण ,तीब्र और अदृश्य है।शरीर पाँच तत्वों से बना है। वे तत्व हैं अग्नि ,वायु ,जल ,मृत्तिका और आकाश।ये सब मिलकर शरीर बनाते हैं और इनकी प्राप्ति माँ से होती है।माँ के गर्भ में जब शरीर बनकर तैयार हो जाता है उसमें कम्पन उत्पन्न होता है जिसे आत्मा का शरीर में प्रवेश का नाम दिया गया है अर्थात आत्मा ने एक नया शरीर धारण कर लिया है। 
                लेकिन इसे यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कम्पन पैदा कैसे होता है?
               पाँच तत्वों में अग्नि उष्मा(Heat Energy)  का स्वरुप है।हीट एनर्जी परिवर्तित होकर (Electrical Energy )इलेक्ट्रिकल एनर्जी बन जाता है। यह शरीर के हर सेल (Bio Cell) को विद्युत् सेल बना देता है। यह स्वनिर्मित विद्युत् है। सब सेलों का  समुह शरीर का पॉवर हाउस बन जाता है।पुरे शरीर में विद्युत् प्रवाहित होने लगता है।हमारे शरीर में जो रिफ्लेक्स एक्शन होता है वह इसी विद्युत् प्रवाह के कारण  होता है।हमारे ब्रेन तेजी से काम करता है वह भी विद्युतप्रवाह के कारण कर पाता  है।पैर में चींटी काटता  है तो हमें दर्द महसूस होता है ,यह रिफ्लेक्स एक्शन के कारण होता है और रिफ्लेक्स एक्शन विद्युत प्रवाह के कारण होता है।जिस सेल में विद्युत् प्रवाह नहीं होता है उसमें चैतन्यता नहीं रहती (स्नायु हीन होता है ).इसीलिए उस सेल में होने वाले दर्द हमें पता नहीं लगता। यही विद्युत् जबतक शरीर में रहता है ,शरीर चैतन्य की हालत में रहता है।
              अग्नि उष्मा के रूप में वायु की गति को नियंत्रित करती है।यही वायु और विद्युत् मिलकर अपनी अपनी प्रवाह से ह्रदय ,फेफड़े तथा  अन्य महत्वपूर्ण अंगो  में कम्पन उत्पन्न करता है और यही कम्पन जीवन की निशनी है।जल और मृत्तिका शरीर को स्थूल रूप देने के साथ साथ विद्युत् और वायुके गति निर्धारण में निर्णायक भुमिका निभाते हैं। दो सेल के बीच  में कुछ स्थान खाली रहता है ,यह सेल के चलन में सहायक है।उसी प्रकार शरीर के अन्दर दो अंगो के बीच में खाली स्थान रहता है।सेल और अंगो के बीच में खालीस्थान को आकाश (शून्य ) कहते हैं।अगर खाली  स्थान नहीं होगा तो वांछित कम्पन उत्पन नहीं होगा। मन की शुन्यता भी आकाश है।इस प्रकार पञ्च तत्त्व शरीर में कम्पन उत्पन्न करने में (प्राण प्रतिष्ठा ) महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।शरीर में अग्नि का कमजोर होने पर या अत्यधिक बढ़ जाने पर वायु की गति में भी तदनुसार परिवर्तन होता है। विद्युत् संचार में भी परिवर्तन होता है।इसीलिए शरीर का तापक्रम पर नियंत्रण रखना बहुत जरुरी है।वृद्धावस्था में या बिमारी की अवस्था में शरीर में उष्मा की कमी हो जाता है। विद्युत् संचार कम हो जाता हैऔर धीरे धीरे ऐसी अवस्था में आ जाता है जब सेल आवश्यक विद्युत् उत्पन्न नहीं कर पाता  है। ऊष्मा की कमी के कारण हवा की गति रुक जाती है।यही मृत्यु की अवस्था है। शरीर में बचा  विद्युत् (Residual) निकलकर अंतरिक्ष के तरंगों में मिलजाता है। शरीर के पाँच तत्त्व अलग अलग होकर पञ्च तत्त्व में विलीन हो जाता है। इस अवस्था में किसी आत्मा की कल्पना करना या उसकी मोक्ष की कल्पना करना ,वास्तव में कल्पना ही लगता है।
           रही बात पुनर्जन्म की तो शरीर जिन अणु परमाणु से  बना था ,दूसरा शरीर वही अणु ,वही परमाणु से नहीं बनता ,इसीलिए शरीर का पुनर्जन्म संभव नहीं है। नया शरीर में पञ्च तत्व के नए अणु ,परमाणु होंगे। अत: उनमे नया कम्पन होगा।विद्युत् पॉवर हाउस भी नया होगा। यहाँ कम्पन का पुनर्जन्म या विद्युत् का पुनर्जन्म कहना सही नहीं लगता। कम्पन आत्मा नहीं ,विद्युत्  भी आत्मा नहीं। अत: 'आत्मा' एक वैचारिक तत्त्व है और वैचारिक  तत्त्व न नष्ट होता है, न उसका पुनर्जन्म 
होता है।


नोट : विद्वान पाठकों से निवेदन है कि  वे विषय पर केवल अपनी सोच/विचार व्यक्त करे।किसी के कमेंट्स के ऊपर कमेंट्स कर वाद विवाद ना करें। इस लेख का उद्देश्य है विभिन्न विचार धारायों से खुद को और पाठकों को  परिचय कराना।  


कालीपद "प्रसाद "


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आत्मा की खुराक है ख़ुशी

आत्मा की खुराक है ख़ुशी 

ख़ुशी वह शह है जो हमारे नकारात्मक स्वभाव संस्कार को बदल हमारे अनुभूत अभावों को समाप्त कर देती है .होंठों की मुस्कान जीवन की हर्षित मुखता है ख़ुशी .मुस्कान चेहरे का आभूषण है अलंकरण है जिस चेहरे पे मुस्कान नहीं वह चेहरा फीका रह जाता है .

किसी शायर ने कहा है -

ज़िन्दगी जब भी रुलाने लगे ,

आप इतना मुस्कुराओ ,ज़िन्दगी शर्माने लगे .

फटोग्रेफर फोटो उतारने  से पूर्व आपको कहता है -स्माइल प्लीज़ .ज़रा सोचिये जब ज़रा सी मुस्कान से फोटो अच्छा आ सकता है तो सदा ही मुस्कुराते  रहने से क्या ज़िन्दगी खुशहाल न होगी ?

आखिर चलते चलते जीवन में ऐसा क्या आ जाता है, हमारी ख़ुशी गायब हो जाती है .हम  इतने कमज़ोर हैं किसी ने हमसे ठीक से व्यवहार नहीं  किया बस हमारी ख़ुशी कम हो जाती है .मन हलचल में आजाता है .उसने मुझसे ऐसा क्यों कहा वैसा क्यों कहा .बस पकड़ के बैठ जाते हैं हम उसके व्यवहार को शब्दों को .

ज़रा सोचिये प्यार से बात करते समय हम क्या करते  हैं .कब किससे  कित्ती बार प्यार से बात करना है यह भी हम निश्चय कर लेते हैं .अरे मैं ने तो तीन चार बार उससे प्यार से बात की उसने कोई रेस्पांस  ही नहीं दिया .चूल्हे में जाए वह .ज़रा सोचिये बस इत्ता ही लक्ष्य था आपका ?वह प्यार से बात करे तो मैं भी करूँ  .क्या प्यार करना एक व्यापार है ?ये तो एक्सचेंज हुआ भाईसाहब . यह प्यार का व्यापार चल रहा है इसलिए इससे जीवन में ख़ुशी हो ही नहीं सकती .

ज़रा सोचिये हम किसे महत्व दे रहें हैं सामने वाले के व्यवहार को या अपनी प्यार करने की विशेषता को .अपनी आदत ,स्वभाव संस्कार को ?उसने मुझे देखकर मुंह उधर कर लिया .मैं भी ऐसा ही करूँ ?

जब हम ऐसा करते हैं हम सामने वाले के नकारात्मक स्वभाव संस्कार की नकल कर रहें हैं .नकल करनी ही है तो मैं अच्छी बात की करूँ ,गलत बात की नकल क्यों करूँ ?

मैं अपनी ओरिजिनल विशेषता से ही व्यवहार  करूँ .क्यों छोड़ू अपनी विशेषता को .दिक्कत यह है हमने इन चीज़ों को नेचुरल समझना शुरू कर दिया है .हम अपने मूल स्वभाव ,स्वमान ,अपने आत्म स्वरूप को भूल गए हैं .कई तो आत्मा के स्वरूप ,आत्मा के अस्तित्व को ही नकारने लगें हैं .कहतें हैं आत्मा तो एक काल्पनिक विचार मात्र है वास्तविक तत्व नहीं  है.अपने को देह मानने लगें हैं हम लोग .देह दर्शन ,देह प्रतियोगिता में ही मशगूल हैं दिन रात .इसलिए आत्मा के निजी गुणों की भी ह्त्या हो गई है जबकि अपने बुनियादी स्वरूप में आत्मा (चैतन्य शक्ति ,चैतन्य ऊर्जा )आनंद स्वरूप है ,प्रेम स्वरूप है ख़ुशी आत्मा  की खुराक है .जैसे देह की खुराक भोजन है .देह दर्शन ,देह के सम्बन्ध स्वरूप को ही हम सब कुछ मानने लगें हैं .जबकि देह से परे ,पञ्च तत्वों से परे जो निराकार सूक्ष्म  सनातन तत्व है वही इस शरीर का करता धरता है स्वामी है .दिव्य आत्मा है .यह शरीर तो आत्मा का अस्थाई घर है .उसका मूल वतन तो ब्रह्म तत्व ,ब्रह्म लोक है .उसका स्थाई निवास परमधाम है सूरज चाँद सितारा से परे ,परे से भी परे जो शान्ति धाम है मुक्ति धाम है वही आत्मा का घर है .यह शरीर तो जड़ है .आज है कल नहीं है निरंतर परिवर्तन होता रहता है छीजता रहता है .आत्मा पर भी कर्म का सूक्ष्म प्रभाव पड़ता रहता है .जो कर्म बार बार दोहराया जाता है धीरे धीरे वही आत्मा का स्वभाव संस्कार बन जाता है .मसलन आप किसी से चिढ़ते हैं चिढ़ना  धीरे धीरे आपका स्वभाव बन जाता है .

जबकि इंद्र धनुष के सात रंगों की तरह आत्मा भी एक सप्त वर्णी सितारा है शाइनिंग स्टार है .दिव्यज्योति है .इसीलिए संध्या को दीपक जलाते समय हम अपने ही आत्म स्वरूप उस दीपक की लौ को प्रणाम करते हैं .दूकानदार के हाथ प्रणाम की मुद्रा में आजाते हैं सांझ को बत्ती जलाते वक्त .मस्तक के   बीच तिलक लगाते हैं .महिलाएं बिंदी लगातीं हैं .क्योंकि शरीर में यहीं निवास करती है आत्मा इसीलिए जब आत्मा शरीर छोडती है सनातन धर्मी समाज कपाल क्रिया करता है लठ्ठ मारता है ताकि आत्मा राम मुक्त हो जाए .शरीर से पूरी तरह बे -दखल हो जाए .शरीर तो अब किसी काम का रह नहीं गया है ,हमारी आत्मा भी कमज़ोर हो चली है जीते जी .

ज्ञान ,पवित्रता ,शान्ति ,प्रेम ,आनंद ,शक्ति ,प्रसन्नता यह मेरा (मुझ आत्मा का ही )निजी गुण धर्म था .कहाँ छीज गया यह गुण ?

जब तक जीवन में तनिक आध्यात्मिकता नहीं  होगी  ख़ुशी आ नहीं सकती .चाहे पार्क में सुबह सवेरे जाके हम कितना भी ठाहाका मारते रहें तालियाँ पीटते  रहें .शरीर को भले कुछ लाभ हो इस कसरत से आत्मा को कोई लाभ नहीं पहुंचेगा .

मुझे अपने व्यवहार में आत्मा के निजी गुणों को ही महत्व देना है किसी और के व्यवहार को नहीं .यह संकल्प कर लें .दोहरालें मैं उस परम पिता का वंश हूँ (अंश नहीं ),संतान हूँ जो विश्व की समस्त आत्माओं का सच्चा सच्चा पिता है .निरहंकारी पिता है सुखदाता दुःख हरता .उसी का वंश हूँ उसी के गुण धर्म धारूं किसी ऐरे गैरे  नथ्थू खैरे (एवरी टॉम एंड हेरी )के नहीं .

उसने ऐसा कहा तो क्यों कहा .ऐसे मुझे देखा तो क्यों देखा .डंक मारना बिच्छु की आदत है .वह अपने स्वभाव में है .मैं अपने स्वभाव में रहूँ .अपनी स्थिति क्यों खराब करूँ ?

सामने वाला व्यक्ति भूल कर रहा है ,तो मैं भी करूँ ?जीवन को जीने का आपका एक अंदाज़ होना चाहिए .

कोई परिस्थिति आ गई .रुक कर बस इतना सोचिये परिस्थिति ने मेरी स्थिति बिगाड़ी या मेरी सोच ने .आपकी नै गाड़ी  में किसी ने टक्कर मार दी , आप तैश में आगये .भाई साहब उसका डेंट निकल जाएगा .आपकी सोच बिगड़ेगी तो उसका आपके शरीर पर भी प्रभाव पडेगा .एक नुकसान  के पीछे एक और बड़ा नुकसान  कर लेना कहाँ की अक्लमंदी है .

बात साफ़ है हम अपनी निजी शक्ति को भूल चुकें हैं भूल चुकें हैं हम किसकी संतान हैं .देह के पिता पर गुमान कर रहें हैं सामने वाले को कह रहें हैं -तुझे मालूम है मेरा बाप कौन है ?लौकिक बाप  की शक्ति पर उछल रहें हैं पारलौकिक को भूल .जबकि लौकिक बाप तो हमारी देह का ही पिता है आत्मा का नहीं .आत्मा का पिता भी आत्मा ही होगा यह हमें अब याद नहीं है यही हमारे दुखों का कारण है .वह पिता है परमपरमात्मा जिसे हमने सर्वव्यापी कह उसकी बड़ी अवमानना की है .फिर तो भगत ही भगवान हो गया .फिर क्या भगवान ही  भगवान की पूजा कर रहा है . फिर क्यों कहा जाता है आत्मा और परमात्मा अलग रहे बहुकाल .

परिश्थितियाँ तो आती रहतीं हैं .साइड सीन्स हैं इन्हें बड़ा नहीं मानना है .परिश्थितियाँ शक्ति शाली नहीं हैं हम शक्तिशाली हैं .मैं अपनी स्थिति सुधार लूं तो परिश्थिति आपसे आप छोटी हो जाती है .जैसे विमान से देखने पर पृथ्वी छोटी दिखने लगती है .अपने उसी स्वमान में टिकके मैं परिश्थिति को देखूं .

सामने वाला व्यक्ति मुझे धोखा तो दे सकता है दर्द नहीं .दर्द हम खुद पैदा कर लेते हैं .हम उसे पकड़  के बैठे रहते हैं उस दर्द को .जबकि ख़ुशी और दर्द अपोजिट हैं रात  दिन की तरह .अगर ख़ुशी चाहिए तो दर्द को छोड़ो पकडे हुए क्यों बैठे हो .

रात गई सो बात गई ..हो ली सो हो ली .

लेकिन हम घटना को उससे पैदा स्थिति को पकड़े पकड़े अपनी स्थिति को भी खराब कर लेते हैं .

हम आत्माएं बे -दागी हीरा हैं .दागी बन जाते हैं परिश्थिति को पकड़ के जबकि असली हीरा धूप  में गर्म नहीं होता हम ज़रा सी सी परिश्थिति से गर्म हो जातें हैं .
अगर जीवन  में ख़ुशी चाहिए तो अपने आपको शक्तिशाली समझो .मेरी खुद की सोच मेरी ख़ुशी की हकदार है .

हमारा स्वभाव और जीवन के अ -भाव ये दो ही बातें हैं जो हमें तंग करती हैं .जब इन दोनों में कनेक्शन हो जाता है ,जीवन दुखमय हो जाता है .इसलिए ख़ुशी हासिल करने के लिए मुझे अपनी सोच को बदलना होगा .किसी की कही बातों को नहीं खुद को बड़ा समझना है .

ये संसार प्रकृति और पुरुष के मेल से बनता है .मन में उठने वाले विचारों से प्रवृत्ति का निर्माण होता है .याद रहे जो हमने सोचा ,दूसरे  को दिया वही लौटके हमारे पास आयेगा .

मन को अगर अच्छे संस्कार नहीं देंगें ,यह गलत ही सोचता रहेगा .फिर हम कह उठते हैं मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है .मैं ने किसी का क्या बिगाड़ा है ?

इसलिए मन की शक्ति के सृजनात्मक प्रयोग करें .अपने मन को दिशा दें .आदेश दें .आत्मा की मनन शक्ति है आपका मन इसे मनमानी न करने दें .आप इसके मालिक बनें .आत्मा की निर्णय शक्ति है बुद्धि .बुद्धि का पात्र शुद्ध रखें .निर्णय करने की इस शक्ति में निखार आयेगा .हमारे दिन की शुरुआत अच्छी हो इसपर पूरा पूरा ध्यान दें .ख़ुशी में रहने और ख़ुशी बांटने की प्रतिज्ञा करें .सुबह उठके शिव बाबा को गुड मोर्निंग कहें ,हेपी मोर्निंग ,गोल्डन मोर्निंग कहें .सोते वक्त भीयाद में सोयें .  नारायणी नशा रहे .ॐ शान्ति .