एक थाल मोती से भरा ,सबके सिर पे औंधा धरा
चारों और वो थाली फिरे ,मोती उस से एक न गिरा ।
ये पहेली गेलेक्सीज़ से ताल्लुक रखती है .सवाल यह है कि गेलेक्सीज़ कुल हैं कितनी और औसतन एक नीहारिका (गेलेक्सी )में कितने सितारे होतें हैं .सृष्टि में कुल कितने सितारे हैं .काल सागान इस सवाल पर अति उमंग और उत्तेजना से उमंग से भर जाते थे .अब तक के अनुमानों के अनुसार तो यही समझा जाता था इस सृष्टि में १०० अरब (हंड्रेड बिलियन )से लेकर १,००० अरब (वन ट्रिलियन )गेलेक्सीज़ हैं .और एक नीहारिका में औसतन १०० अरब से लेकर एक ट्रिलियन तक ही सितारे होतें हैं .इस प्रकार कुल सितारों कीसंख्या आएगी 'वन सेक्स -टीली -यन ' शब्दों में हंड्रेड ट्रिलियन टाइम्स ए बिलियन .लेकिन ताज़ा अनुमानों के अनुसार यह संख्या इस से भी तीन गुना ज्यादा है यानी गोचर सृष्टि में ३०० ट्रिलियन टाइम्स वन बिलीयन सितारे हैं ।इसे समझने के लिए ३ के अंक के आगे २३ बिंदी जड़ दीजिये .
दो बातें एक नए अध्ययन से सामने आईं हैं. एक तो यह, सारी गेलेक्सीज़ हमारी मिल्की -वे गेलेक्सीज़ जैसी नहीं हैं .दूसरी सृष्टि में रेड जाइंट्स की तादाद पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं ज्यादा है (कुल सितारों की आबादी का यह ८० फीसद तक हो सकतें हैं ).यह अन्वेषण विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुएँ हैं ।बस इसी के साथ सृष्टि में कुल सितारों की तादाद तीन गुना हो जाती है .अध्ययन में तारा -भौतिकी विद एवं खगोल विज्ञान के माहिर शामिल रहें हैं .याले विश्वविद्यालयके खगोल विदों ने इसका नेत्रित्व किया है शरीक हारवर्ड के साइंसदान भी रहें हैं ।
अध्ययन में इलिप्तिकल गेलेक्सीज़ से आने वाले प्रकाश का अध्ययन विश्लेसन किया गया है .पता चला इन नीहारिकाओं में लाल दानवों की भरमार है .रेड जाइंट्स तारों के विकास की वह अंतिम प्रावस्था है जिसमे सूरज जैसे बौने सितारे अपना सारा हाइड्रोजन ईंधन हजम कर जाने के बाद पहले फ्रूल के कुप्पा हो जातें हैं .पृथ्वी जैसे ग्रहों को लील जातें हैं और बाद में ठन्डे हो जातें हैं .दे आर कूल स्टार्स ।कूल मीन्स रिलेतिवली लेस हॉट .
खरबों पृथ्वियां इन सितारों के गिर्द घूम रहीं हैं .खगोल विज्ञान के माहिरों की इसीलिए इनमे दिलचस्पी है .पतायह भी चला है इन नीहारिकाओं में पहले लगाए गए अनुमानों के बरक्स बहुत कम डार्क मैटर है .बेशक इनके केंद्र में अनदेखा अनजाना ,अबूझ पदार्थ मौजूद है यह तो ज्ञात था लेकिन यह डार्क ही है ?स्टेलर बॉडीज की शक्ल में है यह किसी को नहीं पता ।
स्टेलर मीन्स रिलेटिड टू स्टार्स यानी तारकीय .साइंसदानों ने इन नीहारिकाओं (इलिप्तिकल गेलेक्सीज़ ) से आने वाले प्रकाश का स्पेक्त्रमीय विश्लेषण किया है .
लाल दानव सितारे (रेड जाइंट्स स्टार्स )दृश्य प्रकाश उतना नहीं छोड़ते की उनकी पृथ्वी से टोह ली जा सके लेकिन लेकिन किसी भी गेलेक्सीज़ की कुल ग्लो ,चमक और सुर्खी को असर ग्रस्त तो कर ही देतें हैं .इन नीहारिकाओं में कुछ वेव्लेंग्थ्स (छोटे छोटे रेनबो के अंश ) गायब हैं ,मिसिंग हैं .ये एब्ज़ोर्प्शन लाइनें रेड जाइंट्स ने ही पैदा की हैं .नीहारिकाओं में इन्हीं की भरमार है ।
तमाम नीहारिकाएं भी यकसां नहीं है .वहां कुछ और घटित हो रहा हो सकता है .जो हो नीहारिकाओं के उद्भव और विकास पर इस अध्ययन से नै रौशनी पड़ सकती है ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-हाव मैनी स्टार्स आर देयर ?३ फोलोड बाई २३ जीरोज़ (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,दिसंबर ३ ,२०१० ,पृष्ठ १९ ).
शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010
ऑटिज्म के लिए टेस्ट ईजाद किया गया ...
नाव ,ए टेस्ट देट डि -टेक्ट्स ऑटिज्म (दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,दिसंबर ३ ,२०१० ,पृष्ठ १९ )।
साइंसदानों कीमाने तो एक ब्रेन स्केन आधारित परीक्षण जो ब्रेन सर्किट्री में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर ऑटिज्म का पक्का सौ फीसद निदान कर लेता है ईजाद कर लिया गया है .यह शिशुओं ,बच्चों और बालिगों सभी के मामले में ऑटिज्म की डायग्नोसिस में स्तेमाल किया जा सकेगा ।
अभी तक ऑटिज्म (आत्म -विमोह )की पड़ताल एक प्रश्नावली भरवाकर की जाती रही है । पहली मर्तबा साइंसदानों की एक टीम ने जिसमे हारवर्ड यूनिवर्सिटी के म्क्लेँ अस्पताल तथा उताह विश्व -विद्यालय के साइंसदान शामिल है यह करिश्मा कर दिखाया है ।
साइंसदानों कीमाने तो एक ब्रेन स्केन आधारित परीक्षण जो ब्रेन सर्किट्री में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर ऑटिज्म का पक्का सौ फीसद निदान कर लेता है ईजाद कर लिया गया है .यह शिशुओं ,बच्चों और बालिगों सभी के मामले में ऑटिज्म की डायग्नोसिस में स्तेमाल किया जा सकेगा ।
अभी तक ऑटिज्म (आत्म -विमोह )की पड़ताल एक प्रश्नावली भरवाकर की जाती रही है । पहली मर्तबा साइंसदानों की एक टीम ने जिसमे हारवर्ड यूनिवर्सिटी के म्क्लेँ अस्पताल तथा उताह विश्व -विद्यालय के साइंसदान शामिल है यह करिश्मा कर दिखाया है ।
दूर तक जाता है किशोरावस्था में खान -पान का असर ..(ज़ारी ...)
बिलकुल ज़रूरी नहीं है आपका इम्तिहानी -लाल /लाली होना यानी हर परीक्षा में अव्वल अंक लाना .ज़रूरी है यह देखना जो भी कुछ व्यावहारिक जीवन में व्यक्तितिव निर्माण में काम आता है और जितना भी हमने उसमे से स्कूल में पढ़ा क्या उसे जीवन में अपनाया ?आत्म सात किया .या फिर रट्टा मारकर इम्तिहान अच्छे नंबरों से पास किया औ मान लिया किला फतह कर लिया ।
क्या आपने बचपन में छोटी कक्षाओं में नहीं पढ़ा ,विटामिन -सी कि कमी से 'स्कर्वी ',डी कीकमीबेशी से रिकेट्स तथा ए की कमी रतौंधी (नाईट ब्लाइंड नेस )की वजह बन सकती है ।
क्या आपने ऐसे लोगों को नहीं देखा- भाला जिनका आये दिन 'मूड स्विंग 'होता है ,जो अभी से स्ट्रेच मार्क्स से आजिज़ आ चुके हैं .पोट बेलीज़ लिए दिन रात वेट -लोस ,लव -हेन्दिल्स ,सादल - बेग्स ,लीथार्जी (आलस्य और प्रमाद से घिरे ),की चिंता लिए अनिद्रा रोग ,प्री -मेन्स्त्र्युअल् सिंड्रोम से घिरे रहतें हैं .दिन रात थके मांदे ,बे -नूर बने रहतें हैं ।
डिफिकल्ट प्रेग्नेंसीज़ कितनी आम है आये दिन .रजस्वला होने पर यकायक मोटाने लगतें हैं यही लोग .हिप फ्रेक्चर आफ्टर बाथ रूम फाल ,बेड नीज ,लोवर बेक पेंस इस दौर की आम शिकायतें हैं .क्यों ?
इन सबका सबन्ध पुष्टिकर तत्वों से महरूम रह जाना है .पुष्टिकर तत्वों की कमी हो जाना है .दादी माओं को भले ही आपने रिकेट्स होते नहीं देखा लेकिन बाथ रूम में गिरने के बाद हिप फ्रेक्चर या फिर थाई -फ्रेक्चर की चपेट में आते भी नहीं देखा .क्या उन्हें रोजाना केल्सियम तजवीज़ नहीं किया गया ?
आप बचपन में ही ,वय -के खूबसूरत-संधि -स्थल ,किशोरावस्था में ले लीजिये पुष्टिकर तत्व .इन सबसे बचे रहिये आगे चलकर ।
खाने-पीने को 'फेड्स 'और फीयर मत बनाइये .अन्दर से खोखले हो जायेंगे आप .ऊपर से तुर्रा ये करीना सा खुद को मानने समझने लगेंगे जो हर तीसरी फिल्म में खुद को जीरो -साइज़ कहलवाना पसंद करतीं हैं ।
अलबत्ता किसी भी सौन्दर्य प्रतियोगिता के आधुनिक प्रतिमानों पर आज वह खरी नहीं उतरेंगी .वहां जीरो -साइज़ नहीं माँगता है .कुछ और माँगता है जो करीनाओं के पास नहीं है .(समाप्त )
क्या आपने बचपन में छोटी कक्षाओं में नहीं पढ़ा ,विटामिन -सी कि कमी से 'स्कर्वी ',डी कीकमीबेशी से रिकेट्स तथा ए की कमी रतौंधी (नाईट ब्लाइंड नेस )की वजह बन सकती है ।
क्या आपने ऐसे लोगों को नहीं देखा- भाला जिनका आये दिन 'मूड स्विंग 'होता है ,जो अभी से स्ट्रेच मार्क्स से आजिज़ आ चुके हैं .पोट बेलीज़ लिए दिन रात वेट -लोस ,लव -हेन्दिल्स ,सादल - बेग्स ,लीथार्जी (आलस्य और प्रमाद से घिरे ),की चिंता लिए अनिद्रा रोग ,प्री -मेन्स्त्र्युअल् सिंड्रोम से घिरे रहतें हैं .दिन रात थके मांदे ,बे -नूर बने रहतें हैं ।
डिफिकल्ट प्रेग्नेंसीज़ कितनी आम है आये दिन .रजस्वला होने पर यकायक मोटाने लगतें हैं यही लोग .हिप फ्रेक्चर आफ्टर बाथ रूम फाल ,बेड नीज ,लोवर बेक पेंस इस दौर की आम शिकायतें हैं .क्यों ?
इन सबका सबन्ध पुष्टिकर तत्वों से महरूम रह जाना है .पुष्टिकर तत्वों की कमी हो जाना है .दादी माओं को भले ही आपने रिकेट्स होते नहीं देखा लेकिन बाथ रूम में गिरने के बाद हिप फ्रेक्चर या फिर थाई -फ्रेक्चर की चपेट में आते भी नहीं देखा .क्या उन्हें रोजाना केल्सियम तजवीज़ नहीं किया गया ?
आप बचपन में ही ,वय -के खूबसूरत-संधि -स्थल ,किशोरावस्था में ले लीजिये पुष्टिकर तत्व .इन सबसे बचे रहिये आगे चलकर ।
खाने-पीने को 'फेड्स 'और फीयर मत बनाइये .अन्दर से खोखले हो जायेंगे आप .ऊपर से तुर्रा ये करीना सा खुद को मानने समझने लगेंगे जो हर तीसरी फिल्म में खुद को जीरो -साइज़ कहलवाना पसंद करतीं हैं ।
अलबत्ता किसी भी सौन्दर्य प्रतियोगिता के आधुनिक प्रतिमानों पर आज वह खरी नहीं उतरेंगी .वहां जीरो -साइज़ नहीं माँगता है .कुछ और माँगता है जो करीनाओं के पास नहीं है .(समाप्त )
दूर तक जाता है किशोरावस्था का खान -पान ....(ज़ारी .....)
गत पोस्ट से आगे .....
भ्रष्ट खान -पान ,सोने जागने का बे -तरतीब अव्यवस्थित रूटीन ,व्यायाम का अभाव सब मिलकर किशोआरावस्था को बीमारी और असंतुलन की tअरफ ले चलतें हैं ।
इस उम्र में माँ को अपना दोस्त बनाइये .वही समझती है समझा सकती है शरीर की बदलती हुई भाषा ,उठाव और पल्लवन .आप काया में घटित इन बदलावों को ठीक से न बांच पातें हैं न समझ और पचा पातें हैं जो सहज स्वाभाविक होतें हैं ।
व्हाट यु ईट एट दिस एज (ड्यूरिंग योर टींस) कैन मेक ऑर ब्रेक यु एज ए पर्सन .भौतिक और मानसिक सेहत ,आपके वेळ बींग ,खुश -हाली की, नव्ज़ जुडी है आपके शरीर को मिलने वाले पुष्टिकर तत्वों से ।
उचित पोषण के लिए पहली शर्त है उचित खान -पान .ऐसे में बेहद एहम है यह जानना हेल्थ फ़ूड है क्या ?क्या है हमारे शरीर की संरचना ,एनाटोमी (अनातोमी ).परिवार का रवैया और खान -पान सम्बन्धी मूल्य ऐसे में सहज ही अति महत्वपूर्ण हो उठतें हैं .किशोर - मन इन्हें आत्म - सात करता चलता है .पीयर प्रेशर और स्कूल कैंटीन इस दीर्धावधि असर के सामने कुछ भी नहीं है .(ज़ारी ....)
पुनश्चय :शारीरिक और पारिवारिक शिक्षा के महत्व को नजर अंदाज़ करना ख़तरा मोल लेना है .इस उम्र में किशोर -मन खाने -पीने की चीज़ों को पुष्टिकर -तत्वों ,खान -पानी के पोषण -मान से जोड़कर कहाँ देख पाता है .बेशक दिखना वह लोक -लुभावन ,मनभावन ,सुन्दर और मनोहर दिखना चाहता है ।
सौन्दर्य के प्रतिमानों ,सौन्दर्य और पुष्टिकर तत्वों से भरपू`र खुराक के बीच एक सहज सम्बन्ध है .न किशोर मन इसकी पड़ताल करता है न इस से कनेक्ट हो पाता है .उसके लिए चीज़ें दो किस्म की हैं या तो वो जिन्हें ज़रूर खाना है या फिर खाना ही नहीं है .स्वास्थ्य -विज्ञान ऐसे में लक्ष्य ही कहाँ रह जाता है ।?
आपको बत्लादें किशोरियों के लिए 'जीरो -साइज़ 'होना सुन्दर होना नहीं है .न ही गुड ,ब्यूटीफुल और गोर्जीयास और सेक्सी का मतलब क्षीण काया (पतला और छरहरा ,कनिका बने रहना है ).पर्याय -वाची शब्द नहीं है ये .खाना /फ़ूड, न 'फेड 'है न 'फीयर' .सौन्दर्य से जुडी नव्ज़ है काया की ,जैसा अन्न वैसा मन ,वैसी काया ,वैसा स्वभाव .जैसा पानी वैसी वाणी .(ज़ारी ...)
भ्रष्ट खान -पान ,सोने जागने का बे -तरतीब अव्यवस्थित रूटीन ,व्यायाम का अभाव सब मिलकर किशोआरावस्था को बीमारी और असंतुलन की tअरफ ले चलतें हैं ।
इस उम्र में माँ को अपना दोस्त बनाइये .वही समझती है समझा सकती है शरीर की बदलती हुई भाषा ,उठाव और पल्लवन .आप काया में घटित इन बदलावों को ठीक से न बांच पातें हैं न समझ और पचा पातें हैं जो सहज स्वाभाविक होतें हैं ।
व्हाट यु ईट एट दिस एज (ड्यूरिंग योर टींस) कैन मेक ऑर ब्रेक यु एज ए पर्सन .भौतिक और मानसिक सेहत ,आपके वेळ बींग ,खुश -हाली की, नव्ज़ जुडी है आपके शरीर को मिलने वाले पुष्टिकर तत्वों से ।
उचित पोषण के लिए पहली शर्त है उचित खान -पान .ऐसे में बेहद एहम है यह जानना हेल्थ फ़ूड है क्या ?क्या है हमारे शरीर की संरचना ,एनाटोमी (अनातोमी ).परिवार का रवैया और खान -पान सम्बन्धी मूल्य ऐसे में सहज ही अति महत्वपूर्ण हो उठतें हैं .किशोर - मन इन्हें आत्म - सात करता चलता है .पीयर प्रेशर और स्कूल कैंटीन इस दीर्धावधि असर के सामने कुछ भी नहीं है .(ज़ारी ....)
पुनश्चय :शारीरिक और पारिवारिक शिक्षा के महत्व को नजर अंदाज़ करना ख़तरा मोल लेना है .इस उम्र में किशोर -मन खाने -पीने की चीज़ों को पुष्टिकर -तत्वों ,खान -पानी के पोषण -मान से जोड़कर कहाँ देख पाता है .बेशक दिखना वह लोक -लुभावन ,मनभावन ,सुन्दर और मनोहर दिखना चाहता है ।
सौन्दर्य के प्रतिमानों ,सौन्दर्य और पुष्टिकर तत्वों से भरपू`र खुराक के बीच एक सहज सम्बन्ध है .न किशोर मन इसकी पड़ताल करता है न इस से कनेक्ट हो पाता है .उसके लिए चीज़ें दो किस्म की हैं या तो वो जिन्हें ज़रूर खाना है या फिर खाना ही नहीं है .स्वास्थ्य -विज्ञान ऐसे में लक्ष्य ही कहाँ रह जाता है ।?
आपको बत्लादें किशोरियों के लिए 'जीरो -साइज़ 'होना सुन्दर होना नहीं है .न ही गुड ,ब्यूटीफुल और गोर्जीयास और सेक्सी का मतलब क्षीण काया (पतला और छरहरा ,कनिका बने रहना है ).पर्याय -वाची शब्द नहीं है ये .खाना /फ़ूड, न 'फेड 'है न 'फीयर' .सौन्दर्य से जुडी नव्ज़ है काया की ,जैसा अन्न वैसा मन ,वैसी काया ,वैसा स्वभाव .जैसा पानी वैसी वाणी .(ज़ारी ...)
दूर तक जाता है किशोरावस्था में खानपान का असर .
टफ बींग ए टीन व्हाट यु ईट एट दिस एज कैन मेक ऑर ब्रेक यु ,सेज न्युत्रिशिनिष्ट रुजुता दिवेकर .एक्स्त्रेक्ट्स फ्रॉम हर सून टू बी रीलीज्द बुक वोमेन एंड दी वेट लोस तमाशा .(मुंबई मिरर ,दिसंबर २ ,२०१० ,पृष्ठ २४ )।
यु बिकम व्हाट यु ईट .जैसा अन्न वैसा मन .जैसा पानी वैसी वाणी .यकीन मानिए ये सारी लोकोक्तियाँ ,मुहावरे जितनी किशोरावस्था पर सटीक बैठतीं हैं उम्र के किसी अन्य सौपान पर नहीं .व्यक्तित्व (जिसमे मन और बुद्धि तत्व ,कद काठी ,शक्लो -सूरत ,सीरत सभी कुछ आजाता है ,इंटेलिजेंस एंड इमोशनल कोशेंट्स भी ) इसी उम्र में गढ़ा जाता है.कुम्हार की
मिट्टी सी कच्ची होती है यह उम्र ,शरीर सौष्ठव,काया जिसे कसाव दार बना लो या थुलथुल सबकुछ आपके हाथ में है .कर लो दुनिया मुठ्ठी में बा -रास्ता खान पान ।
इस उम्र में जंक फ़ूड का चस्का (चस्का क्या नशा और लत कहिये इसे ),व्यायाम का दैनिकी से नदारद रहना न सिर्फ आपको गुब्बार्रे सा फुला देगा ,स्ट्रेच मार्क्स और कील -मुहासे भी आपसे प्यार करने आ जायेंगे .और कोई आये न आये ।
लेकिन यकीन मानिए सब कुछ आपके हाथ में है .खानपान में बदलाव ,स्वास्थाय्कर भोजन ,घंटा भर का अच्छाखासा व्यायाम इस सबको बदल सकता है .आपकी तकदीर बदल सकता है .शरीर और मन का पोषण है पुष्टिकर तत्व है व्यायाम .व्यक्तित्व का निखार है व्यायाम .सब कुछ आपकी शख्शियत पर निर्भर है जो गढ़ी जा रही है आपही के हाथों और आपको खबर नहीं है .तो ज़नाब बा -खबर रहिये ।
फिर दोहरा दें एक घंटा का हार्ड कोर व्यायाम ,वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया स्वास्थ्य कर भोजन (परम्परा गत भारतीय थाली )आपके शरीर में इस दरमियान होने वाले हारमोन परिवर्तन को संभाल लेगा .न सिर्फ काया में निखार आयेगा हारमोनों में आने वाले सटीक बदलाव आपको अपने पारि -तंत्र ,पर्यावरण के प्रति भी संवेदी बनाते हैं उम्र के इस सौपान में .कसरत और हेल्दी फ़ूड कच्चा माल है इस उम्र में व्यक्तित्व निर्माण के लिए ।
दोनों का अभाव (लेक ऑफ़ गुड फ़ूड एंड एकसार -साइज़ ) सोने जागने का बिगड़ा हुआ ढर्रा हमारे कायिक (भौतिक ),मानसिक और अध्यात्मिक विकास को अवरुद्ध कर देता है .कुछ भी ठीक से काम नहीं करता ,विकसता न दिल न गुर्दे न यकृत (लीवर ),न फेफड़े न इन्तेस्ताइन्स ,मसल मॉस ,बोन डेंसिटी .हाईट ,हारमोंस ,एंजाइम्स कुछ भी तो नहीं ।
एवरी सिंगिल सेल एंड फंक्शन इन दी बॉडी ग्रो /ओपरेट टू देयर ओप्तिमम केपेसिटी .इस से बड़ी और क्या ट्रेजिडी होगी इस उम्र में .(ज़ारी .....)
यु बिकम व्हाट यु ईट .जैसा अन्न वैसा मन .जैसा पानी वैसी वाणी .यकीन मानिए ये सारी लोकोक्तियाँ ,मुहावरे जितनी किशोरावस्था पर सटीक बैठतीं हैं उम्र के किसी अन्य सौपान पर नहीं .व्यक्तित्व (जिसमे मन और बुद्धि तत्व ,कद काठी ,शक्लो -सूरत ,सीरत सभी कुछ आजाता है ,इंटेलिजेंस एंड इमोशनल कोशेंट्स भी ) इसी उम्र में गढ़ा जाता है.कुम्हार की
मिट्टी सी कच्ची होती है यह उम्र ,शरीर सौष्ठव,काया जिसे कसाव दार बना लो या थुलथुल सबकुछ आपके हाथ में है .कर लो दुनिया मुठ्ठी में बा -रास्ता खान पान ।
इस उम्र में जंक फ़ूड का चस्का (चस्का क्या नशा और लत कहिये इसे ),व्यायाम का दैनिकी से नदारद रहना न सिर्फ आपको गुब्बार्रे सा फुला देगा ,स्ट्रेच मार्क्स और कील -मुहासे भी आपसे प्यार करने आ जायेंगे .और कोई आये न आये ।
लेकिन यकीन मानिए सब कुछ आपके हाथ में है .खानपान में बदलाव ,स्वास्थाय्कर भोजन ,घंटा भर का अच्छाखासा व्यायाम इस सबको बदल सकता है .आपकी तकदीर बदल सकता है .शरीर और मन का पोषण है पुष्टिकर तत्व है व्यायाम .व्यक्तित्व का निखार है व्यायाम .सब कुछ आपकी शख्शियत पर निर्भर है जो गढ़ी जा रही है आपही के हाथों और आपको खबर नहीं है .तो ज़नाब बा -खबर रहिये ।
फिर दोहरा दें एक घंटा का हार्ड कोर व्यायाम ,वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया स्वास्थ्य कर भोजन (परम्परा गत भारतीय थाली )आपके शरीर में इस दरमियान होने वाले हारमोन परिवर्तन को संभाल लेगा .न सिर्फ काया में निखार आयेगा हारमोनों में आने वाले सटीक बदलाव आपको अपने पारि -तंत्र ,पर्यावरण के प्रति भी संवेदी बनाते हैं उम्र के इस सौपान में .कसरत और हेल्दी फ़ूड कच्चा माल है इस उम्र में व्यक्तित्व निर्माण के लिए ।
दोनों का अभाव (लेक ऑफ़ गुड फ़ूड एंड एकसार -साइज़ ) सोने जागने का बिगड़ा हुआ ढर्रा हमारे कायिक (भौतिक ),मानसिक और अध्यात्मिक विकास को अवरुद्ध कर देता है .कुछ भी ठीक से काम नहीं करता ,विकसता न दिल न गुर्दे न यकृत (लीवर ),न फेफड़े न इन्तेस्ताइन्स ,मसल मॉस ,बोन डेंसिटी .हाईट ,हारमोंस ,एंजाइम्स कुछ भी तो नहीं ।
एवरी सिंगिल सेल एंड फंक्शन इन दी बॉडी ग्रो /ओपरेट टू देयर ओप्तिमम केपेसिटी .इस से बड़ी और क्या ट्रेजिडी होगी इस उम्र में .(ज़ारी .....)
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
फेसबुक बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए ....
फेसबुक ,ट्वीटर तू ब्लेम फॉर १ इन ५ डिवोर्स इन यु एस .(दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,दिसंबर २ ,२०१० ,पृष्ठ १९ )।
बेशक भूमंडलीय स्तर पर फेसबुक और ट्वीटर और कई अन्य सोसल नेट्वर्किंग वेब -साइट्स ने दुनिया भए के भूले बिसरे लोगों को मिलाया है लेकिन एक ताज़ा अमरीकी सर्व कि माने तो अमरीका में हर पांचवें तलाक के पीछे फेसबुकजैसी वेब -साइटों का हाथ नजर आ रहा है जिसे अब एक साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है ।
बेशक दुनिया सिकुड़ कर बहुत छोटी हो गई है .लेकिन अमरीकी अकादमी ऑफ़ मेट्रीमोनियल लाइयर्स के अनुसार इन वेब साइटों का स्तेमाल बे -वफाई के सबूत के बतौर ८० फीसद मामलों में बा -कायदा किया जा रहा है .सेक्सुअली एक्स्प्लिसित भाषा इसका सबब बन रही है जहां कुछ छिपाव की गुंजाइश ही नहीं है .अलावा इसके एक से एक तस्वीरें संबंधों का कच्चा चिठ्ठा खोल रहीं हैं .इसी से पति -पत्नी के बीच की खाई,संबंधों में पैदा दरारें न पाट सकने की हद तक बढ़ रही है।
इन सफीलों में वो दरारें हैं जिनमे बसके ,
नमी नहीं जाती ,ज़िंदगी है की जी नहीं जाती ।
मुझको ईसा बना दिया तुमने ,अब शिकायत भी की नहीं जाती ।
ye jubaan hamse see nahi jaati ,zindagee hai ki jee nahin jaati .
talaak ke maamlon me saakashay ke roop me jahaan "fesbuk "kaa stemaal vakeelon ne 66%maamlon me kiyaa vahin "Myspace " "aur "Tutor "ki hisse daari aise maamlon me 15%aur 5%feesad rahi hai .baaki sabki milaakar 14%.
sabhi maamlon me 'inappropriate sexual chats 'badi vajah rhi hai .
मुझको ईसा बना दिया तुमने ,अब शिकायत भी की नहीं जाती .
बेशक भूमंडलीय स्तर पर फेसबुक और ट्वीटर और कई अन्य सोसल नेट्वर्किंग वेब -साइट्स ने दुनिया भए के भूले बिसरे लोगों को मिलाया है लेकिन एक ताज़ा अमरीकी सर्व कि माने तो अमरीका में हर पांचवें तलाक के पीछे फेसबुकजैसी वेब -साइटों का हाथ नजर आ रहा है जिसे अब एक साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है ।
बेशक दुनिया सिकुड़ कर बहुत छोटी हो गई है .लेकिन अमरीकी अकादमी ऑफ़ मेट्रीमोनियल लाइयर्स के अनुसार इन वेब साइटों का स्तेमाल बे -वफाई के सबूत के बतौर ८० फीसद मामलों में बा -कायदा किया जा रहा है .सेक्सुअली एक्स्प्लिसित भाषा इसका सबब बन रही है जहां कुछ छिपाव की गुंजाइश ही नहीं है .अलावा इसके एक से एक तस्वीरें संबंधों का कच्चा चिठ्ठा खोल रहीं हैं .इसी से पति -पत्नी के बीच की खाई,संबंधों में पैदा दरारें न पाट सकने की हद तक बढ़ रही है।
इन सफीलों में वो दरारें हैं जिनमे बसके ,
नमी नहीं जाती ,ज़िंदगी है की जी नहीं जाती ।
मुझको ईसा बना दिया तुमने ,अब शिकायत भी की नहीं जाती ।
ye jubaan hamse see nahi jaati ,zindagee hai ki jee nahin jaati .
talaak ke maamlon me saakashay ke roop me jahaan "fesbuk "kaa stemaal vakeelon ne 66%maamlon me kiyaa vahin "Myspace " "aur "Tutor "ki hisse daari aise maamlon me 15%aur 5%feesad rahi hai .baaki sabki milaakar 14%.
sabhi maamlon me 'inappropriate sexual chats 'badi vajah rhi hai .
मुझको ईसा बना दिया तुमने ,अब शिकायत भी की नहीं जाती .
वृक्ष लेंगे स्ट्रीट लाइट्स का स्थान .....
ग्लोइंग बायो -लाईट एमिटिंग डायोड (एल ई डी ) ट्रीज़ कुड रिप्लेस स्ट्रीट लेम्प्स (मुंबई मिरर ,नवम्बर २७ ,२०१० ,पृष्ठ १८ )।
एक दिन ऐसे पेड़ उगाये जा सकेंगे जिन की
पत्तियाँ उजाला पैदा करेंगी . ये स्ट्रीट लाईट की जगह ले सकेंगे .दरअसल रिसर्चर्स सी अर्चिन की आकृति के नेनो -गोल्ड -पार्तिकिल्स वृक्षों की पत्तियों में प्रत्यारोपित (इम्प्लांट )करने में कामयाब रहें हैं .यही बायो -लाईट -एमिटिंग डायोड्स की तरह ग्लो करेंगे .कैसे ?
गोल्ड नेनो कणों की मौजूदगीमें वह पदार्थ जो आम तौर पर प्रकाश को ज़ज्ब कर लेता है (रोक लेता है कुछ वेव्लेंग्थ्स को ) प्रकाश को उत्सर्जित (एमिट )करने लगता है ,निकालने लगता है अपने अंदरसे ।
आप जानतें हैं पादप जगत की हरियाली का राज .पादपों की पत्तियों के हरे (ग्रीन )रंग की वजह एक प्रकाश संवेदी रंजक (पिगमेंट होता है लाईट सेंसिटिव )होता है जिसे क्लोरोप्लास्त कहा जाता है .यह क्लोरोप्लास्त सतरंगी स्वेत प्रकाश कीकुछ तरंगों को (कुछ चिनिन्दा रंगों को )ज़ज्ब कर लेता है .लेकिन जब इसे बैंजनी प्रकाशसे तकरीबन ४०० नेनो मीटर्स वेवलेंग्थ के प्रकाश से आलोकित किया जाता है ,इस पर वायलेट लाईट डाली जाती है तब यह इसे तो रोक लेता है लेकिन यह खुद लाल रंग का प्रकाश छोड़ने लगता है ।
गोल्ड नैन पार्तिकिल्स का किया धरा है यह सब जिन्हें पत्तियों में इम्प्लांट किया गया था .गोल्ड नेनो कण इसी वायलेट लाईट का एक कुदरती स्रोत हैं ।raat
raat ke andhere me अदृशय शोर्ट वेव लाईट ऐसे में जब गोल्ड नेनो कणों पर पडती है ,ये उतेजित होकर शीघ्र ही वायलेट लाईट छोड़ने लगतें हैं .यही वायलेट लाईट जब आसपास के क्लोरोफिल अणुओं पर पडती है तब वह इसे तो रोक लेतें हैं ,इसके बाद खुद लाल रंग छोड़ने लगतें हैं ।
इस फिनोमिना को बायो -ल्युमिनिसेंस कहा जाता है .बायो -लाईट एमिटिंग डायोड की मौजूदगी में वृक्ष रात को भी प्रकाश संस्लेषण की क्रिया करने लगेंगे ।
ऐसे में गोल्ड नेनो कणों से उपचारित वृक्ष रात में ग्लो कर सकेंगे .स्ट्रीट लाईट का काम लिया जा सकेगा इस ग्लो से .ये वृक्ष दिन और रात दोनों पहर वायुमंडल से कार्बन -डाय-ऑक्साइड को खींच कर अपने फेफड़ों में भर सकेंगे .पर्यावरण -मित्र होगा यह प्रकाश .
एक दिन ऐसे पेड़ उगाये जा सकेंगे जिन की
पत्तियाँ उजाला पैदा करेंगी . ये स्ट्रीट लाईट की जगह ले सकेंगे .दरअसल रिसर्चर्स सी अर्चिन की आकृति के नेनो -गोल्ड -पार्तिकिल्स वृक्षों की पत्तियों में प्रत्यारोपित (इम्प्लांट )करने में कामयाब रहें हैं .यही बायो -लाईट -एमिटिंग डायोड्स की तरह ग्लो करेंगे .कैसे ?
गोल्ड नेनो कणों की मौजूदगीमें वह पदार्थ जो आम तौर पर प्रकाश को ज़ज्ब कर लेता है (रोक लेता है कुछ वेव्लेंग्थ्स को ) प्रकाश को उत्सर्जित (एमिट )करने लगता है ,निकालने लगता है अपने अंदरसे ।
आप जानतें हैं पादप जगत की हरियाली का राज .पादपों की पत्तियों के हरे (ग्रीन )रंग की वजह एक प्रकाश संवेदी रंजक (पिगमेंट होता है लाईट सेंसिटिव )होता है जिसे क्लोरोप्लास्त कहा जाता है .यह क्लोरोप्लास्त सतरंगी स्वेत प्रकाश कीकुछ तरंगों को (कुछ चिनिन्दा रंगों को )ज़ज्ब कर लेता है .लेकिन जब इसे बैंजनी प्रकाशसे तकरीबन ४०० नेनो मीटर्स वेवलेंग्थ के प्रकाश से आलोकित किया जाता है ,इस पर वायलेट लाईट डाली जाती है तब यह इसे तो रोक लेता है लेकिन यह खुद लाल रंग का प्रकाश छोड़ने लगता है ।
गोल्ड नैन पार्तिकिल्स का किया धरा है यह सब जिन्हें पत्तियों में इम्प्लांट किया गया था .गोल्ड नेनो कण इसी वायलेट लाईट का एक कुदरती स्रोत हैं ।raat
raat ke andhere me अदृशय शोर्ट वेव लाईट ऐसे में जब गोल्ड नेनो कणों पर पडती है ,ये उतेजित होकर शीघ्र ही वायलेट लाईट छोड़ने लगतें हैं .यही वायलेट लाईट जब आसपास के क्लोरोफिल अणुओं पर पडती है तब वह इसे तो रोक लेतें हैं ,इसके बाद खुद लाल रंग छोड़ने लगतें हैं ।
इस फिनोमिना को बायो -ल्युमिनिसेंस कहा जाता है .बायो -लाईट एमिटिंग डायोड की मौजूदगी में वृक्ष रात को भी प्रकाश संस्लेषण की क्रिया करने लगेंगे ।
ऐसे में गोल्ड नेनो कणों से उपचारित वृक्ष रात में ग्लो कर सकेंगे .स्ट्रीट लाईट का काम लिया जा सकेगा इस ग्लो से .ये वृक्ष दिन और रात दोनों पहर वायुमंडल से कार्बन -डाय-ऑक्साइड को खींच कर अपने फेफड़ों में भर सकेंगे .पर्यावरण -मित्र होगा यह प्रकाश .
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