शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

होली ग्रेल ऑफ़ फिजिक्स .एंटी -मैटर क्रिएतिद.

कहाँ गया सारा प्रति पदार्थ ?

पहले प्रति पदार्थ की अवधारणा को समझना होगा .जब यह सृष्टि अबसे कोई १३.६ अरब बरस पहले एक आदिम अणु में जो अपने सूक्ष्म (शून्य आयतन वत )कलेवरमें सृष्टि का तमाम गोचर ,अगोचर पदार्थ -ऊर्जा एक अति -उत्तप्त सूप के रूप में छिपाए हुआ था बनी तब पदार्थ के साथ -साथ उतना ही प्रति -पदार्थ भी पैदा हो गया था .पदार्थ से यह सृष्टि बनी लेकिन प्रति -पदार्थ आज भी हमारे लिए अज्ञेय अबूझ अदृशय बना हुआ है .यही कहानी डार्क मैटर और डार्क एनर्जी की है ।

समझा जाता है मैटर (पदार्थ )ग्रेविटी के लिए और प्रति - पदार्थ एंटी -ग्रेविटी के लिए उत्तर दाई है .तभी तो यह सृष्टि अपने जन्म के बाद से ही उत्तरोत्तर फैलती विस्तारित होती चली जा रही है ।

योरपीय ओर्गेनाइज़ेसन ऑफ़ न्यूक्लीयर फिजिक्स के तत्वावधान में भौतिकी के माहिरों की एक अंतर -राष्ट्रीय टीम ने पहली मर्तबा एंटी -हाइड्रोजन का एक परमाणु (इसे एंटी -हाइड्रोजन परमाणु कहना ज्यादा समीचीन रहेगा )अल्प काल के लिए ही सही रच डाला है .संभावना बनी है प्रति -पदार्थ हमारे प्रेक्षण जगत में आ सकता है .हम प्रति -पदार्थ का अध्ययन कर सकतें हैं ।

आपको बतला -दें यह वही योरोपीय नाभिकीय शोध संघ है जो महा -मशीन लार्ज -हेद्रोंन कोलाइदर से जिनेवा की बाहरी सीमा के पास से सम्बद्ध है ।

तब क्या अब पदार्थ और प्रति -पदार्थ का तुलनात्मक अध्ययन हो सकता है ?आखिरकार एक नहीं दो नहीं ३८ एंटी -हाइड्रोजन एटम संजोये गए है भले एक सेकिंड के दसवें भाग तक ही सही ।

विज्ञान पत्रिकानेचर (साप्ताहिक )के एक आलेख में "सर्न"योरोपियन न्यूक्लीयर रिसर्च सेंटर के साइंसदानों ने लिखा है हमने वेक्यूम में (निर्वात में )न सिर्फ एंटी -हाइड्रोजन एटम्सरचे हैं इन्हें बनाए भी रखा गया है सेकिंड के दसवें भाग तक .सवाल यही है यदि सृष्टि के आरम्भ में पदार्थ के साथ -साथ प्रति -पदार्थ भी पैदा हो गया था तो वह गया कहाँ ?क्यों हमारे दृश्यक्षेत्र और प्रेक्षणों से बाहर चला आया है ।

आपको बतला दें :फोर्सिज़ कम इन पे-यरस यानी बलों के कुदरती जोड़े होतें हैं (बल युग्म ).अकेले बल का कोई अस्तित्व नहीं है .वह परिणामी बल होता है ,रिज़ल्तेंत फ़ोर्स होता है एक सिस्टम पर लगने वाले तमाम बल युग्मो का .यही न्यूटन के पहले और तीसरे नियम का निचोड़ है .पहला नियम बल की नहीं ,बल की अनुपस्थिति (एब्सेंस ऑफ़ फ़ोर्स की बात करता है .इन दी एब्सेंस ऑफ़ ए फ़ोर्स ए बॉडी आइदर मूव्स इन ए स्ट्रेट लाइन विद युनिफोर्म मोशन ऑर स्टे अटरेस्ट ।यही न्यूटन का प्रथम नियम है .

प्रत्येक कण के लिए सृष्टि में एक प्रति कण मौजूद है .सीनों -निम् है तो एन्तिनिम भी है .इलेक्ट्रोनहै तो पोजिटिव इलेक्ट्रोन (पोजीत्रोंन ,इलेक्ट्रोन विद ए पोजिटिव चार्ज )भी है .प्रोटोन के लिए एंटी -प्रोटोन है ।न्युत्रोंन के लिए एंटी -न्युत्रोंन .ओबामा है तो मिशेल भी है .

एक इलेक्ट्रोन जब एक प्रोटोन की परिक्रमा करने लगता है तब एक हाइड्रोजन एटम अस्तित्व में आता है .इसी प्रकार जब एक पोज़ित्रोंन एंटी -प्रोटोन की परिक्रमा करने लगेगा तब एक एंटी -हाइड्रोजन एटम अस्तित्व में आ जाएगा .दोनों का प्रेम मिलन घातक होगा .दोनों एक दूसरे को नष्ट कर देंगे इसलिए नदी के दो किनारों से बने रहतें हैं .सृष्टि है तो प्रति -सृष्टि भी है .कहाँ ?इसका कोई निश्चय नहीं .परमाणुओं के बन ने पर ऊर्जा मुक्त होती है क्योंकि इनके के घटकों को अनंत दूरी से (जहां से यह एक दूसरे पर आकर्षण बल नहीं डाल पाते) उठाकर इनके विद्युत् आकर्षण क्षेत्र में लाना पड़ता है .बस एक सिस्टम बन जाता है .जैसे पृथ्वी -चंद्रमा (अर्थ -मून सिस्टम ).

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

क्या होतें हैं खर्राटे ,कैसे और क्यों ?

स्नोरिंग यानी खर्राटे क्यों पैदा होतें हैं ?
किसी भी ध्वनी ,किसी भी किस्म की श्रव्य या अश्रव्य आवाज़ के पैदा होने के लिए कम्पनों का पैदा होना एक आवश्यक शर्त है .सोफ्ट पैलट (तालू )के कम्पन बनते हैं खर्राटे की वजह .कम्पनों की वजह सांस की धौकनी का अटक के लेकिन शोर पैदा करते हुए चलना है .कह सकतें हैं खर्राटे गले की घंटी हैं .गहरी नींद को छोडिये कुछ लोग तो उनींदे बैठे -बैठे दिन में भी खर्राटे लेतें हैं .(हाइपो -थारोइड -इज्म से ग्रस्त लोग ऐसा करते देखे जा सकतें हैं )।
अलबत्ता खर्राटे उप -ज्व्हिया (यूव्युला ,कौआ,गले की घंटी भी कहा जाता है इसे अलिजिह्व्या भी कहतें हैं जो मुख के एक दम भीतर ठीक गले से ऊपर लटकता छोटा मांस पिंड होता है )या एपिग्लोतिस (काग या कौआ ,काकल ) के ज़ोरदार हरकत में आने से भी पैदा होतें हैं .दायें -बाएं हिलने लगता है काग या कौआ .इट एग्जीक्युट्स टूएंड फ्रो मोशन .इन्हीं कम्पनों का नतीजा होता है स्नोरिंग जो हमारी औडिबिल रेंज (श्रवण की सीमा के अन्दर बने रहतें हैं .).अनेक वजहें होतीं हैं आ -बाल -वृद्धों में खर्राटों की .इससे पहले की ये खुद के लिए जान लेवा और दूसरे की नींद ले उड़ने वाले बने चिकित्सीय परामर्श ज़रूरी है .अलबत्ता मोटापा कम करना धूम्रपान छोड़ देना लाभ -दायक सिद्ध होता है .बच्चों में टोंसिल या एडी -नोइड्स बढ़ने पर इन्हें सर्जरी के द्वारा ज़रूरी होने पर निकाल दिया जाता है.दोनों का बढना बच्चों में खर्राटों की वजह बन सकता है .नासिका श्वसन मार्ग (नेज़ल ए-यर वे )की सर्जरी भी की जाती है ताकि सांस की आवाजाही में आने वाली बाधा को हठाया जा सके ।
पला -टो -प्लास्टी ,यूव्युलो -पला -टो -फेरिंगो -प्लास्टी भी की जाती है .

रोजाना कितनी नींद ले उड़तें हैं जीवन -साथी के खर्राटे ....

७३० आवर्स' स्लीप लोस्ट `ड्यू टू स्पाउस स्नोरिंग :(डी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,नवम्बर १८ ,२०१० ,पृष्ठ १७ ।).
एक हालिया सर्वे के अनुसार ब्रितानीदम्पत्तियों की नींद के ७३० घंटे हर साल साथी के खर्राटे ले उड़तें हैं.साथी का बारहा करवटें बदलना भी इसमें अपना पार्ट प्ले करता है .पति, पत्नी की वजह से या फिर पत्नी, अपने पति के खुर्राटे और नोइज़ी ब्रीथिंग (ब्रेअथिंग ) के हाथों हर रात अपनी नींद के औसतन दो घंटा हैरान -परेशान रहतें हैं .ब्रिटेन में यह तलाक का बड़ा मुद्दा बनता रहा है ।
वैसे भी खर्राटे लेना सांस लेने में खलल है .एक मेडिकल कंडीशन भी हो सकती है जिसका समाधान होना चाहिए ।
व्हाट इज स्नोरिंग ?
इट इज नोइज़ी ब्रेअथिंग व्हाइल एस्लीप ड्यू टू वाइब्रेशन ऑफ़ दी सोफ्ट पैलट(तालू ,मुख के अन्दर का ऊपरी भाग ),यूव्य्ला(कौआ,काकल ,मुख के एक दम भीतर ठीक गले से लटकता छोटा मांस -पिंड )फैरिन्जियल वाल्स ओर एपिग्लोतिस (गले की घंटी ,उप -जिव्ह्या ,कौआ )।
इन चिल्ड्रन इट इज ओफतिन एसोशियेतिदविद एनलार्जमेंट ऑफ़ दी टोंसिल्स एंड एडी -नोइड्स ।
ट्रीटमेंट ऑफ़ स्नोरिंग इनक्लूड वेट लोस ,टुबेको एंड एल्कोहल एव्होइदेन्स ,एडिनोई -डेक -टामी(एक्सीज़ंन ऑफ़ एडिनोइड ),tonsillectomy ,nasal airway surgery,uvulopalatoplasty .(continued ....)

कभी -कभार बीमार होना आपके लिए अच्छा है .

फ्लू को ही लीजिये .सर्दी आई नहीं ,आँख ,नाक से पानी बहना शुरू ,गले में खिच -खिच नाक से सूं-सूं .सूं -सुड़कबारहा .जुकाम -सर्दी न हो तो सर्दी बे -मजा ,न गर्म हल्दी वाला दूध न तुलसी चाय (मसाला चाय के तो कहने ही क्या दाल चीनी ,लॉन्ग ,काली मिर्च सभी एक साथ ,ऊपर से ताज़ा -ताज़ा तुलसी पत्ता ।
इधर कुछ जेहादी किस्म के लोग ना हक़ ही फ्लू के पीछे पड़े हैं .सुना है एक ही टीका बनाया जा रहा है फ्लू की सीजनल और पेंदेमिक स्ट्रेनदोनों ही किस्मों की काट के लिए .एक तरफ एक आजमाइशी (एक्सपेरिमेंटल पिल )आ रही है दूसरी तरफ सिल्वर टिप्द योघर्ट बेक्टीरिया है जो फ्लू की ऐसी तैसी कर देगा .ऐसी जैविक तरकीब भी सोची जा रहीं हैं जो रोग रोधी तंत्र को फ्लू से ताकतवर बनादे .रोग -प्रति -रोधी तंत्र के हाथ मज़बूत करके इसे बेहद खबरदार कर दे .दवा कम्पनियां भारी मुनाफ़ा कमा लेने की ताक में डॉक्टरों की चांदी करने वाली सभा गोष्ठियां आयोजित कर रहीं हैं ।
जरा सोचिये यदि बारहमासी फ्लू का नामो -निशाँ ही मिट गया तो आइन्दा आने वाली संतानों को पूरे साल स्कूल में ही खटना पड़ेगा .दादी -नानियों के सारे नुश्खे बे -कार हो जायेंगे ।नथुनों में गंध भरने वाला बेसन का हलुवा अन्य सुस्वादु जुकाम भगाऊ चीज़ें उन्हें कौन खिलाएगा .जुकाम -सर्दी ,फ्लू एक चेंज ,वेळ कम चेंज मुहैया करवातें हैं आम -ओ -ख़ास को .आ -बाल -वृद्धों को .दफ्तरी बोस की घुड़क -घू से निजात अल्पकाल के लिए ही सही बेहद ज़रूरी है .रजाई की गर्माहट और किस्म किस्म की चाय -कहवा .तन और मन को पूरा आराम .लोगों की सहानुभूति सब कुछ चुक जाएगा ।फ्लू बिना सब सून.
डॉक्टरों का क्या है ज़रा सा जुकाम हुआ नहीं ,ठण्ड लगी नहीं ,ले भैया एंटी -बाय -टिक्स ,पूछो उनसे यह तो वायरल होता है ,बेक्टीरिया से पैदा नहीं होता ,ज़वाब मिलेगा ,भाई साहिब सेकेंडरी इन्फेक्सन से बचायेगें एंटी -बाय -टिक्स .ड्रग -एडिक्ट बना रहीं हैं हमें ,दवा कम्पनी .हम ड्रग -जन्कीज़ जन्मजात पैदानहीं हुए थे .रोगों से लड़ने वाला कुदरती तंत्र हमें विकास -क्रम में मिला है .उसे हम नाकारा बनवा रहें हैं .ऐसा नहीं है आधुनिक चिकित्सा तंत्र में हमारी आस्था नहीं है .लेकिन यह क्या दवा ज्यादा खुराक कम .सर्दी -जुकाम में एंटी -बाय -टिक .कोई राष्ट्रीय एंटी -बाय -टिक पालिसी नहीं .ओवर दी काउंटरड्रग के नाम पर कुछ भी ले लो .ऊपर से विज्ञापनी नुश्खे .
मुफ्त में माहिरों सा परामर्श देने वाले देशी नुश्खे तजवीज़ करने वाले आम -ओ -ख़ास क्या करेंगे यदि फ्लू धरती से चला गया तो ?आप जानतेहैं यहाँ भारत में हर व्यक्ति डॉक्टरी के जींस लेकर पैदा होता है .उसके पास मेडिकल कोलिजों में सालों साल दिमाग खपाके कड़ी महनत करने वालों से ज्यादा जानकारी और माहिरी होती है .सर्दी - जुकाम के नुश्खे बतलाने में इनका कोई सानी नहीं . ये सारे लोग बेकार हो जायेंगे .फ्लू के संग साथ लिविंग -टुगेदर (सहजीवन ,सिम्बियो -टिक लिविंग ज़रूरी है .जेहादियों के चक्कर में आने की ज़रुरत नहीं है .

हार्ट अटक के इलाज़ के लिए "बेली फैट"?

बेली फैट एड्स रिकवरी आफ्टर हार्ट अटेक(दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,नवम्बर १८ ,२०१० ,पृष्ठ १७ )।
बेली फैट का पहली मर्तबा स्तेमाल हार्ट अटेक के मरीजों पर किया गया है .इस एवज़ कटि -प्रदेश वसीय ऊतकों (वेस्ट -लाइन फैट टिश्यु )से कलम -कोशायें (स्टेम सेल )जुटाई गई .इनकी मदद से दिल का दौरा भुगत चुके दिल को १० मिनिट के भीतर ही अनुप्राणित किया गया .स्टेम सेल्स को दिल में इन्फ्युज़ किया गया .इस अग्र- गामी स्टडी से लाभ उठाने के लिए ऐसे ११ मर्द और तीन औरतें आगें आईं जिन्हें हाल -फिलाल ही दिल का दौरा पड़ा था .इनमे से १० को स्टेम सेल्स तथा ४ को डमी (प्लेसिबो )दिया गया .सभी मरीजों की बेली से(एब्दोमन से )लाइपो -सक्शन विधि द्वारा २५० घन सेंटीमीटर फैट खींचा गया ।
इनमे से हरेक साम्पिल में से साइंसदानों ने २ करोड़ अडल्टस्टेम सेल्स अलग किये .एक मरीज़ के दिल तक इन्हें इन्फ्युज़ करने में बा -मुश्किल १० मिनिट लगे ।
आप जानते हैं स्टेम सेल्स (कलम कोशायें रिजेंरेतिव सेल्स ) होतीं हैं जो कई तरह के ऊतकों में ढल सकतीं हैं ।
१० मरीजों में जिनके दिल को कलम कोशाओं से अनुप्रेरित किया गया था हार्ट पर्फ्युज़ंन में ३.५ %सुधार देखा गया ,यानी ऑक्सीजन युक्त रक्त इनके दिल को ३.५% ज्यादा पहुंचा इस प्रोसीज़र के ६ माह बाद .इनके दिल के बाएं निलय ने ५.७ %ब्लड भी ज्यादा उलीचा .बरक्स उनके जिन्हें स्टेम कोशाओं के नाम पर छद्म नुस्खा ही दिया गया था ।
इस अध्ययनको नीदरलैंड्स के एरास्मुस यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटरके रिसर्च -दानों ने अंजाम तक पहुंचाया .६ माह के बाद परि -ह्रदय धमनी रोग(कोरोनरी -आर्ट -अरी दीजीज़ ) के मरीजों को ज्यादा ऑक्सीजन युक्त रक्त मिलने लगा ,दिल ने ज्यादा खून पम्प किया ,दिल को पहुँचने वाली नुकसानी भी कम हुई ।
इसका मतलब यह हुआ बेली फैट कितना ही बुरा सही ,इसका अच्छा स्तेमाल भी हो सकता है .वक्त पे खोटा सिक्का भी काम आ जाता है .

हाई -केफ्फीन एनर्जी ड्रिंक्स और एल्कोहल का बे -हिसाब स्तेमाल ...

हाई -केफीन एनर्जी ड्रिंक्स और एल्कोहल एब्यूज (बे -हिआब और ज़रुरत से ज्यादाएल्कोहल का स्तेमाल )क्या कहीं एक दूसरे से जुड़े हैं .एक की लत दूसरी लत को हवा देती है ?एक अध्ययन से कुछ ऐसे ही संकेत मिले हैं ,पता चला है हाई -केफ्फीन युक्त कथित एनर्जी ड्रिंक्स का सेवन कम समय में ज्यादा शराब पीने के दौर को बढाता है .बिंज ड्रिंकिंग की और ले जाता है .एल्कोहल की गुलामी करता व्यक्ति हेवी ड्रिंकिंग करने लगता है ।
एक हज़ार अमरीकी छात्रों पर संपन्न इस अध्ययन में देखा गया इनमे से जो विश्व -विद्यालयी छात्र हाई -केफीन से लदी लोकप्रिय ब्रांड 'रेड बुल ',मोंस्टर ,,रोक्स्टार आदि का नियमित (रोजाना या फिर हफ्तावार )सेवन करते थे .वे अकसर शराब भी पीते थे और ज्यादा भी पी लेते थे एक बार में .इनके एल्कोहल आश्रित हो जाने की संभावना भी बलवती दिखलाई दी बरक्स उन छात्रों के जो कभी कभार ही बेहद केफीन युक्त ऊर्जा पेयों के माया जाल में फंसते थे ।
एनर्जी ड्रिंक्स का बेहद सेवन करने वाले एल्कोहलसे पैदा होने वाली कई अन्य परेशानियों (ब्लेक -आउट्स ,हंग -ओवर ,क्लास से नदारद रहना ,सेल्फ इंजरी आदि ) की चपेट में आते देखे गए .बरक्स इनके वे तमाम छात्र जिनके लिए एनर्जी ड्रिंक कोई ख़ास आकर्षण या फैशन स्टेटमेंट नहीं थी या जो इधर रुख ही नहीं करते थे इन तकलीफों से बचे रहते थे ।अध्ययन की अगुवाई मेरी लैंड विश्व विद्यालय की रिसर्च दान अमेलिया अररिया ने की है ।
अध्ययन पूर्व में सम्पान ऐसे अध्ययनों की पुष्टि करता है जिनमे हाई -एनर्जी -ड्रिंक्स कन्ज़म्प्सन ,सब्सटेंस एब्यूज (नशीली दवाओं आदि का बेहिसाब सेवन )और जोखिम भरे व्यवहार में एक अंतर -सम्बन्ध देखा गया है ।
सन्दर्भ -सामिग्री :-हाई -केफीन एनर्जी ड्रिंक्स टाइड टू एल्कोहल एब्यूज(दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई ,नवम्बर १८ ,२०१० )/पृष्ठ १७

न्यूरल -स्टेम सेल थिरेपी से ब्रेन अटेक के इलाज़ की पहली आज़माइश ..

फस्ट स्ट्रोक स्टेम सेल ट्रायल स्टार्ट्सदी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,मुंबई नवम्बर १७ ,२०१० ,पृष्ठ २१ )।
ब्रितानी बायो -टेक कम्पनी "रिन्यूरोंन "के साथ काम करते हुए स्कोट -लैंड के चिकित्सकों ने एक पायो -नीयर क्लिनिकल ट्रायल (अपने किस्म के पहले नैदानिक परीक्षण )में आज़माइश के तौर पर पहले ब्रेन स्ट्रोक के मरीज़ का इलाज़ किया है ।
इस से इस से इस बात का जायजा लिया जा सकेगा क्या सेरिब्रल वैस्क्युलर एक्सीडेंट (ब्रेन अटेक )से शारीरिक रूप से अशक्त या थोड़ा विकलांग (अपंग )हुए लोगों को फायदा पहुँच सकता है ।
बिला -शक दुनिया भर में न्यूरल स्टेम सेल थिरेपी की आज़माइश का यह अग्रणी मामला है .बहर -सूरत ग्लासगो विश्विद्यालय के "न्यूरो -साइंस और मनो -विज्ञान विभाग,संस्थान "के तत्वावधान में एक मरीज़ का न्यूरो -स्टेम सेल थिरेपी( शल्य, सर्जरी )की जा चुकी है .नतीजों के प्रति कीथ मुइर आशान्वित रहें हैं .