मंगलवार, 9 जुलाई 2013

"GOD IS LIGHT " SAID CHRIST .




‘अहम् ब्रह्मास्मि’  और 


‘मैं’ ही व्याप्त समस्त प्राणी में


‘मैं’ ही व्याप्त सूक्ष्मतम कण में"


ये दोनों  ही सूत्र अस्वीकार्य हैं .यदि मैं ही ब्रह्म हूँ तब इसका पहले  अर्थ  

तो समझ लें ज़रा .


"ब्रहम एक महत तत्व है आकाश की   तरह  पञ्च  तत्व नहीं है .

 .इसकी व्याप्ति  तारागण 

से परे ,परे से भी परे है .पञ्च तत्व से परे यह छटा तत्व है .ब्रह्म   

मतलब परमेश्वर नहीं है .यह तो परमात्मा के रहने की जगह है .समस्त 

आत्माओं का भी मूल  आवास ,नेचुरल हेबीटाट यही ब्रह्म तत्व है .


ईश्वर भी  कण कण में नहीं है होता तो हम केदार नाथ ,अमर नाथ में 

जाके क्यों मरते ?हालाकि ईश्वर वहां भी नहीं है .पत्थर में ( मूर्तियों में 

)ईश्वर हो भी कैसे सकता है ?वह तो ज्योतिर्लिन्गम है .प्रकाश है .


"GOD IS LIGHT " SAID CHRIST .


"एकहू ओंकार  निराकार " हाँ यही कहा था गुरु नानक देव ने ईश्वर  के 

बारे में .

यदि  परमात्मा हम सब में  है फिर एकहू ओंकार सतनाम किसकी 

 महिमा है .ये एकहू ओंकार  क्या कोई और परमात्मा है ?

एक बात और यदि परमात्मा को सर्व -व्यापी मान लिया ,कण कण में 

व्याप्त मान लिया ,फिर भगत ही भगवान हो जाएगा .फिर खबर यह 

बनेगी -केदारनाथ   में बादल   फटने से ५ ० ,० ० ० भगवान मारे गए ,

४ ५ ० 

भगवान  ला -पता हैं .

 विश्वस्त सूत्रों  के अनुसार  लापता भगवानों की संख्या सरकारी 

अनुमानों से   

कहीं ज्यादा है .

  ॐ शान्ति 


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अहम् ब्रह्मास्मि

‘अहम् ब्रह्मास्मि’

नहीं है सन्निहित

कोई अहंकार इस सूत्र में,


केवल अक्षुण विश्वास

अपनी असीमित क्षमता पर

.
‘मैं’ ही व्याप्त समस्त प्राणी में

‘मैं’ ही व्याप्त सूक्ष्मतम कण में


क्यों मैं त्यक्त करूँ इस ‘मैं’ को,

करें तादात्म जब अपने इस ‘मैं’ का

अन्य प्राणियों में स्थित ‘मैं' से

होती एक अद्भुत अनुभूति

अपने अहम् की,

नहीं होता अहंकार या ग्लानि

अपने ‘मैं’ पर.

असंभव है आगे बढ़ना

अपने ‘मैं’ का परित्याग कर के,

यही ‘मैं’ तो है एक आधार

चढ़ने का अगली सीढ़ी ‘हम’ की,

अगर नहीं होगा ‘मैं’

तो कैसे होगा अस्तित्व ‘हम’ का,

सब बिखरने लगेंगे

उद्देश्यहीन, आधारहीन दिवास्वप्न से.


‘मैं’ केवल जब ‘मैं’ न हो

समाहित हो जाये उसमें ‘हम’ भी

तब नहीं होता कोई कलुष या अहंकार,

दृष्टिगत होता रूप

केवल उस ‘मैं’ का

जो है सर्वव्यापी, संप्रभु,

और हो जाता उसका ‘मैं’

एकाकार मेरे ‘मैं’ से.

असंभव है यह सोचना भी

कि नहीं कोई अस्तित्व ‘मैं’ का,

यदि नहीं है ‘मैं’

तो नहीं कोई अस्तित्व मेरा भी,

‘मैं’ है नहीं मेरा अहंकार

‘मैं’ है मेरा विश्वास

मेरी संभावनाओं पर

मेरी क्षमता पर,

जो हैं सन्निहित सभी प्राणियों में

जब तक है उनको आभास

अपने ‘मैं’ का.

...कैलाश शर्मा


ईश्वर  सर्व आत्माओं का पिता है .क्या पिता ही अपना  पुत्र ,पुत्र ही 

अपना पिता हो सकता ?


बहर सूरत आपकी  रचना बेहद सुन्दर है .भाव सौन्दर्य लिए है . अर्थ 

भ्रामक है .


वीरुभाई 


ॐ शान्ति 

4 टिप्‍पणियां:

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

अहं ब्रह्मास्मि को व्यापक अर्थों में लिया जाना चाहिए. कैलास जी की इस रचना में कन्फ्यूजन सा लगता है.

madhu singh ने कहा…

सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

विश्लेषण आपका सार्थक है ... कैलाश जी अपनी रचना में मैं यानि व्यक्तित्त्व की बात पर ज़ोर दे रहे हैं .... यहाँ मैं अहम से नहीं मैं एक इकाई से अर्थ लिया है ।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का शाब्दिक अर्थ बखूबी समझाया आपने, काश इसकी अनुभुति हो सके.

बहुत ही सुंदर आलेख.

रामराम.