सोमवार, 15 जुलाई 2013

शिवभगवान उवाच

शिवभगवान उवाच :

मीठे बच्चे जब भी तुम मुझे याद करते हो मैं हाज़िर होता हूँ .माया भी 

हाज़िर हो जाती है तब तब जब जब तुम कमज़ोर पड़ जाते हो .सर्वव्यापी  है 

माया .मैं सर्वव्यापी  नहीं हूँ कल्प में एक ही बार आता हूँ साधारण मनुष्य 

तन में .अमृत वेला कहलाता है यह समय .मेरा और तुम्हारा एक ही धाम है ,.
परमधाम .मैं वहीँ से आता हूँ इस भू -लोक साकारी दुनिया में अपना पार्ट 

बजाने .

जब तुम हिम्मत करके मुझे याद करते हो तुम्हें कदम दर कदम मेरी मदद 

मिलती है .(इसीलिए कहा गया है हिम्मते मर्दा मदद दे खुदा ).

मैं ही इस पुरुषोत्तम संगम युग पर वह आचार संहिता थमाता हूँ जिसे तुम 

'श्रीमत' कहते हो .मैं तुम्हारा आध्यात्मिक मार्ग दर्शक बनता हूँ क्या 

करना है क्या नहीं करना है ,बतलाता हूँ .

श्रीमत से तुम ही नहीं प्रकृति के तत्वों (वायु ,अग्नि ,आकाश ,पृथ्वी ,जल 

)का भी स्वमान बढ़ जाता है .मैं इन तत्वों को भी शुभ स्पंदन देता हूँ जो 

कलियुग के इस चरण में गंधा चुकें हैं कराह उठे हैं .

तुम्हारे गलत कर्मों का संचित प्रभाव तुम्हारे अनेक दुखों का मुश्किलातों 

को झेलते चले जाने की वजह बन रहा है .बच्चे अपने अनुपयुक्त कर्मों और 

हरकतों से ही दुःख भोगते हैं . मैं किसी को दुःख नहीं देता हूँ .

मैं तो सदैव ही सुख ही प्रदान करता हूँ .दुःख को मंजूरी नहीं देता हूँ .

मैं तुमें अब परम सुख ही दे रहा हूँ यह कहते हुए :मीठे बच्चे श्रीमत पे चलो .
इस रास्ते के कायदे क़ानून भी बड़े सख्त हैं .कड़ाई से पालना करनी है 

इनकी .मेरी श्रीमत पे चलना तुम्हारी और तुम्हारे लिए  ख़ुशी की बात है 

जोर जबरजस्ती नहीं है .मर्ज़ी का सौदा है .

तुमें श्रीमत मिलती है खुद का कल्याण करने के लिए .याद रखो मेरे बच्चे 

बेहद का बाप कल्याणकारी है .वह सबके कल्याण के लिए ही आता है .

बाप से मदद लेके उसकी श्रीमत पे चलके पहले अपना फिर औरों का भी 

भला करो .बाप के मददगार बनो .मास्टर कल्याण -कारी आत्मा बनो .

अब तुम अव्वल बन रहे हो .मैं तुमें ऊंचे ते ऊंचा मार्ग दिखाता हूँ 

.निर्देशिका (श्रीमत )देता हूँ ऊंचे ते  ऊंची .

मेरी कही मानके तुम इस (संगम युग पर,लीप युग पर  )अब श्रेष्ठ बनते हो .
निर्भय होकर मेरी श्रीमत पे चलो .डर  कैसा ?.

इस साकारी दुनिया के सब काम  रहनी सहनी  बाबा से पथ प्रदर्शन लेकर 

ही करो .किसकी श्रीमत है यह ?कौन दे रहा है ?मैं आता ही हूँ इस संगम 

युग में .कलयुग और सतयुग के संधि :काल में।

इस वेला ही अन्धकार का रास्ता उजले रास्ते से जा मिलता  है . मैं तुमें 

दिशा निर्देश देता हूँ ताकत देता हूँ सत्य को झूठ से अलग करके देखने की 

.मेरी पहली श्रीमत है :

अपने को  शरीर से न्यारी और प्यारी आत्मा समझो .अशरीरी समझो 

.आत्मा की काया नहीं होती वह तो निर-काया है मेरी तरह .मुझे, अपने 

बेहद   

के पारलौकिक बाप को याद करो .मैं जो सत्य स्वरूप हूँ ,आनंद स्वरूप हूँ 

.सदैव ही चैतन्य हूँ .

दो चीज़ों में गठान लगाने के लिए उन्हें परस्पर संपृक्त करने जोड़ने के 

लिए एक जैसा होना पड़ता है .स्वयं को आत्मा समझ ही तुम मुझ परम 

आत्मा की याद में टिक सकते हो . 

सभी दिशा निर्देशों का मूलाधार यही पहली श्रीमत है .शेष सभी दिशा 

निर्देश सहज अनुकरणीय पालनीय हो जायेंगें .केवल इसी और तवज्जो 

देने से . 

इसी विधि को मेथड को कहते हैं :मन्मना भव।ओ !आत्मा मुझ( परमात्मा )

अपने बाप को याद कर .

जितना बुद्धि इस तथ्य को ग्रहण करेगी इस याद में रहेगी यह उतना ही 

बोध गम्य ,ग्राहीय बनता जाएगा .



आ अब लौट चलें 

आचार संहिता जेड सिक्युरिटी है तुम्हारीअभेद्य  सुरक्षा 

कवच है 

आत्मा का बुनियादी मजहब सुकून और अहिंसा है .आत्मा को अब 

अपने मूल स्वभाव निज धर्म में लौट आना चाहिए .अहिंसक हो जाना 

चाहिए .आपके संकल्पों में ,शब्दों में ,करनी में जरा भी हिंसा न हो .न मन 

की हिंसा न संकल्प की (विचार भी न आये किसी के प्रति हिंसा का 

).आपकी आँख आपराधिक (हिंसक) न बने .हिंसा आँख से ज्यादा होती है 

.जो संस्कार तुम अब अपनी झोली में डाल  लोगे कई जन्मों तक लेप के 

रूप में रहेंगे आत्मा पर .अपनी प्राप्ति पर तुमें ज़रा भी गुमान (अभिमान 

,अहंकार) न हो .

नोटिस नहीं लेना है अपनी प्राप्ति का .निरहंकारी बनना है .निगेटिव बातों 

को कान नहीं देना है .आप निगेटिव बातों का कूड़ा दान नहीं हैं कान नहीं 

देना है न्कारात्माक बातों को .न मुख से कुछ उलटा सीधा बोलना है न 

आँखों से उलटा सीधा देखना है .बाहर 

से आती हैं ये चीज़ें ,तुम्हारे मन में घर बना लेती हैं .

तुम्हारा हर मन ,वचन, कर्म और सपने एक दम से सटीक (युक्तियुक्त 

)हों .हर क्षण के संग्रहनीय  अर्थ हों .

श्रीमत एक लफ्ज़ मात्र है लेकिन इसके गहरे निहितार्थ हैं .बड़ा महात्म्य है 

.महत्व है इसका  .श्रीमत तुम्हें  बताती है :

क्या सोचना है ,क्या और कैसे देखना है .किस चेतना (देह अभिमान /

आत्म अभिमान )में आके हम देखें कर्म करें सुनें .आत्म अभिमानी बन या 

देह अभिमान में आके .देही अभिमानी बन ?

कैसे भोजन ग्रहण करें .कैसे निद्रा लें .श्रीमत एक आचार संहिता रच देती है 

.जिसके अनुसार आपको रोजाना अपना पोतामेल (चार्ट ,रोजनामचा )चेक 

करना है .आध्यात्मिक रास्ते पे ले जाती है श्रीमत .चेक करो अपना चैतन्य 

स्वरूप (चेतना ),अपना रुझान (प्रवृत्ति ),दृष्टि .

ॐ शान्ति 

सन्दर्भ सामिग्री :

The Story of Immortality: A Return to Self Sovereignty [Hardcover]


ऑथर मोहिनी पंजाबी 

copyright (c)2008 Brahma Kumaris World Spiritual Organization (USA)

46 South Middle neck Road 

Great Neck ,11021 

516.773 .097

प्रस्तुति भावार्थ है अनुवाद नहीं .

वीरुभाई  

(ज़ारी )




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8 टिप्‍पणियां:

Aziz Jaunpuri ने कहा…

सर जी बेहद गंभीर और गहन संदेस देती
बेहतरीन प्रस्तुति

arvind mishra ने कहा…

एक मार्ग यह भी है !

रविकर ने कहा…

प्रभावी प्रस्तुति-

आभार आदरणीय वीरू भाई-

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही शांत चित करते वचन, आभार.

रामराम.

Anita ने कहा…

मन को सही रास्ता दिखाते पावन वचन..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये गहन चिंतन है या पथ की खोज ... या अन्वेषण बाबा का या माया का ...

Vikesh Badola ने कहा…

आप ब्रह्मकुमारी वालों के सान्निध्‍य में हैं, अच्‍छा है। श्रीमत का अनुकरणीय विवेचन।

Madan Mohan Saxena ने कहा…

गहन संदेस देती बेहतरीन प्रस्तुति.आभार.