रविवार, 21 जुलाई 2013

आध्यात्मिक शब्दावली (चौथा भाग )

आध्यात्मिक शब्दावली (चौथा  भाग )

(१ ९ )कल्प :५ ० ० ० वर्ष अवधि का एक सृष्टि चक्र है जिसकी अनादि  काल से पुनरावृत्ति होती रही है .

यह सृष्टि सतो- प्रधान से सतो फिर रजोप्रधान  से रजो और  फिरअंत में  तमो प्रधान होती जाती है एक से दूसरे चरण तक आतेआते  .पहले स्वर्ण फिर थोड़े मिश्र के साथ रजत फिर और ज्यादा मिश्र के साथ ताम्र तथा कल्प के आखिरी चरण में लौह प्रधान हो जाती है .व्यवस्था अव्यवस्था को जन्म देती चली जाती है .जो नया है वही पुराना होता जाता है .जब सृष्टि में अव्यवस्था (एन्ट्रापी) बढ़ते  हुए  अधिकतम हो जाती है चक्र (कल्प )की पुनरावृत्ति होती है .दो कल्पों के संधि स्थल के बीच की अल्पावधि जब एक कल्प (कलियुग) समाप्ति की ओर  तथा दूसरे कल्प का उदय (सतयुग का उदय हुआ) चाहता है को कहा जाता है पुरुषोत्तम संगम युग .यही वह वक्त है जब परमात्मा अपने खोये हुए कल्प पहले के लाडले बच्चों को श्रीमत पे चलके पतित से पावन बनने का मार्ग बतलाता है .

kalpa :duration of 5 ,000 years ,which is the period of time measuring one complete cycle of the world .A kalpa consists of the Golden ,Silver ,Copper ,and Iron Ages ,and within each of these ages there is a progressive decline through which the world passes .The Confluence Age is the highest and most auspicious age ,and it is the meeting of the end of one kalpa and the beginning of a new kalpa. This is a cycle with no beginning and end which has always existed and will remain so for all times to come in a steady state .This is the eternal world drama wheel which repeats itself with history and geography of the world.

(२ ० )कलियुग :एक कल्प (सृष्टि चक्र ,साइकिल आफ टाइम )का आखिरी चरण जब यह सृष्टि एक दम से तमो-प्रधान ,निम्नीकृत हो जाती है कलह युग या लौह युग कहलाता है .यह रौरव नरक की स्थिति होती है जब चारों और अज्ञान अन्धकार छा जाता है .ख़ुशी बे -हद की ना -ख़ुशी में बदल जाती है .इसकी अवधि कल्प का चतुरांश १ २ ५ ० वर्ष होती है .आत्मा कलियुग में अधिकतम ४ २   बार चौला बदलती है।क्षीण होती जाती है अपने गुणधर्मों में .देह भान रह जाता है आत्माभिमान गुम  हो जाता है .

kaliyug :last of four ages ,the Iron Age ,when the world reaches its most degraded stage .The world is in a state of total darkness ,when happiness is replaced by sorrow .Its duration is 1250 years .The maximum number of births taken in this age is 4 2.

(२ १ )कर्म :

कर्म ही हमारा भाग्य लिखते हैं .जीवन निर्वाह के लिए हम जो भी करते हैं वह कर्म ही कहलाता है .यहाँ तक की एक कौने में बैठकर सांस लेना भी एक कर्म है .कर्म ही हमारा पोता मेल लिखते हैं .

साधारण कर्म "कर्म ",निम्न विचार से प्रेरित कर्म" विकर्म" तथा वह दिव्यकर्म जिसका आगे फल भोग नहीं है ,"अकर्म" कहलाता है .कर्म की नींव हमारे विचार रखते हैं .

karma:action -an act ,deed ,work ,occupation ,function.

(२ २ )कर्म योग :अपने आत्म स्वरूप (ज्योतिबिंदु रूप )में बने रहकर परमात्मा ज्योतिर्लिन्गम की याद में रहते हुए हर काम करना .ही कर्म योग है .

karma yoga :performing action in soul consciousness and in remembrance of God.

(२ ३ )मुक्ति :मुक्ति का मतलब है  कैद या नियंत्रण  से मुक्ति .आज़ादी .अधिकार सम्पन्नता .लेकिन यह मुक्ति शरीर की कैद से अस्थाई मुक्ति ज़रूर है .जब तक आत्मा आवाज़ की दुनिया से परे परमधाम में शांत अवस्था में पड़ी है तभी तक मुक्त है सृष्टि चक्र में अपनी पारी आने पर पार्ट बजाने उसे शरीर में फिर से आना ही पड़ेगा .अ -नादि काल से यही सिलसिला चल रहा है चलता रहेगा इससे मुक्ति किसी को भी नहीं है . 

liberation :freedom ,emancipation .Release of the soul from the body ,and the experience of souls in the incorporeal world in a state of complete silence and peace .

(२ ४ )जीवन मुक्ति :गृहस्थ (भौतिक जगत )में रहते सुख दुःख में दृष्टा भाव बनाए रहना .याद में रहते सब कर्म करते जाना ट्रस्टी बनकर .कर्म योगी जीवन मुक्ति की स्थिति में रहता है .सम्भाल सबकी करता है मोह किसी से नहीं .जीते जी शरीर से मर जाना (नष्टोमोहा की स्थिति )है जीवन मुक्ति .

liberation -in -life :to live a life of freedom .To be free from all bondages that cause pain and sorrow and to live a life of peace and happiness in the physical world .

(२ ५ )मधुबन :मधु का शाब्दिक  अर्थ 
है शहद और वन कहते हैं वनप्रांतर को .शाब्दिक अर्थ हो गया मधुबन का :शहद का वन .यह भारत में ब्रह्माकुमारिस का मुख्यालय है जो आबू परबत (माउंट आबू ,राजस्थान )पर बसा हुआ  है .इसे आबू तीर्थ भी कहा जाता है .राज योगी राज योगिनियों का आवास है यह .

Madhuban :Madhu is the Hindi word for honey ,and ban is the Hindi word for forest ;literally ,the forest of honey .Madhuban is a spiritual pilgrimage place located in Mt .Abu ,Rajasthan ,India .

ॐ शान्ति 

(ज़ारी )

साथ में पढ़िए पहली पोस्ट का हिंदी में भावानुवाद :

भगवान उवाच :मैं नहीं करता हूँ यह सब 

लोग मेरे बारे में कहतें हैं -भगवान सृष्टि के कण कण में है .कहते रहतें हैं मैं कुत्ते बिल्लियों में भी हूँ कच्छ (कच्छप )और मच्छ (मगरमच्छ )में भी .भक्ति मार्गी मेरे २ ४ अवतार बतलाते हैं .(मत्स्य अवतार ,वराह अवतार ,.....).

कई प्राणिप्रजातियों में घसीट के ले गए हैं मुझे भगत लोग .धूल -धन्काड़ ,कीट पतंग ,यहाँ तक के बिष्टा में भी फिर तो मैं ही हूँ .भगवान पूछते हैं :क्या यह मेरा जीवन वृत्त है ?अपने आप को भी भगवान बतलाते हैं .कंकड़ पत्थर में भी भगवान बतलाते हैं .ईश्वर को पूरी तरह खो चुके हैं ये लोग .घोर अन्धकार की स्थिति है यह .इसीलिए कलियुग को रौरव नर्क कहा गया है .

 बकौल उनके हरेक चीज़ फिर तो भगवान है .सबके सब परम पिता हैं .जबकि आत्मा तो घड़ी घड़ी जन्म ले तमोप्रधान हो जाती है .मेरा तो कोई जन्म होता ही नहीं है .मैं तो हूँ ही अजन्मा . 

लोगों का ऐसा विशवास है भगवान सब कुछ कर सकता है .ऐसा कुछ भी नहीं है जो मैं (भगवान )न कर सकूँ .मेरे बारे में कह देते हैं :मैं मृत व्यक्ति को भी जिला सकता हूँ .

भगवान कहते हैं :मीठे बच्चे मैं न तो रोगी को रोगमुक्त कर सकता हूँ न ही उसके संभावित शल्य कर्म को मुल्तवी कर सकता हूँ .सभी आत्माओं को कर्म फल तो भोगना ही पड़ता है .बेशक किए का दंड भोगती हैं आत्माएं लेकिन सजा देने वाला मैं नहीं हूँ .

फिर भी मनुष्य आत्माएं मुझ पर ही दोष मढ़ती हैं .एक तरफ वह मुझे ही सुख और दुःख देने वाला बतलाते हैं दूसरी तरफ मेरा ही आवाहन करते हैं -मैं आकर उन्हें सुख शान्ति प्रदान करूँ .

बच्चे मैं तो हूँ दुःख हरता ,सुख करता ,मैं किसी का दिल भला कैसे दुखा सकता हूँ .ये तमाम हिंसा और अनाचार दुनिया में मेरी वजह से नहीं हैं .

प्राकृत आपदाएं भी यहाँ अनेक होतीं हैं .इन्हें ईश्वरीय आपदाएं नहीं कहा गया है .सुनामी ,सागरीय ज्वार से होने वाली तबाही के लिए मुझे उत्तरदाई कैसे ठहराया जा सकता है .इस समय समस्त प्राकृतिक तत्व ही कुपित हैं .बेहद के प्रदूषण से तमो प्रधान बन गए हैं .लोग कहते हैं मेरी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता .क्या परमात्मा पत्तों पर बैठ उन्हें कभी हिलाएगा ?

प्रकृति के अपने कायदे क़ानून है .अपना विधान है .कुछ कहते हैं मैं अंतरयामी हूँ सबके दिल की जान लेता हूँ .लोगों के विचार पढ़ लेता हूँ .मैं किसी के दिल की बात नहीं जानता हूँ .और अनेक होंगें जो थाट रीडिंग का करिश्मा करने के लिए पढ़ाई करते हैं .मैं यह सब नहीं करता हूँ .

मैं तो तुम्हें पढ़ाता  हूँ इस ईश्वरीय मदरसे में .सबको निरपेक्ष भाव लिए देखता हूँ .तुम यहाँ ईश्वरीय पढ़ाई पढ़ने  आते हो .रूह रिहान करते वक्त तुम खुद ही अपने दिल की कह देते हो .

ॐ शान्ति 




24 Incarnations of Lord Vishnu

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8 टिप्‍पणियां:

Rahul... ने कहा…

कर्म ही हमारा भाग्य लिखते हैं .जीवन निर्वाह के लिए हम जो भी करते हैं वह कर्म ही कहलाता है .यहाँ तक की एक कौने में बैठकर सांस लेना भी एक कर्म है ....
बेहद-बेहद..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सुन्दर परिभाषायें..एन्ट्रॉपी तो दनादन बढ़ रही है...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गहरा शोध ... पर निचोड़ कर्म पे ही आके ठहरता है ... जब तक बोध है प्राकृति और सब कुछ भी है ... नहीं तो कुछ भी नहीं ...
राम राम जी ...

Anita (अनिता) ने कहा…

सोचने लायक बातें....
`सादर!!!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सारगर्भित ...... सुंदर ढंग से समझाया ...

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुन्दर परिभाषायें !

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुन्दर परिभाषायें !

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

आपके आलेख पढ पढकर लगता है मन की गुत्थियां सुलझने लगी हैं, बहुत आभार.

रामराम.