फ़िब्रोइद्स पेशीय गांठें हैं ,मस्कुलर ट्यूमर्स हैं जो गर्भाशय या बच्चे दानी (यूट्रस )की दीवार में पैदा हो जातें हैं .इन्हें लियो -मायोमा या फिर मायोमा भी कह दिया जाता है ।
अकसर ये कैंसर कारी या संक्राम्य न होकर बिनाइन (नॉन -कैंसर्स ही होतें हैं ).एक अकेली गांठ के रूप में भी ये उग आतें हैं और पूरी फसल के तौर पर भी ,यानी एक से ज्यादा संख्या में भी ।
जहां तक इनके आकार का सवाल है एपिल सीड से लेकर ग्रेप फ्रूट (हमारे यहाँ चकोतरा होता है इतने आकार का )तक इनका कलेवर हो सकता है .असामान्य ही होतें हैं ऐसे मामले जब इनका आकार जटा -धारी नारियल जितना भी हो जाता है .
मायोमा भी पेशीय ऊतकों केएक बिनाइन यानी निरापद (उदासीन जिसका दीर्घावधि में सेहत पर कोई गलत असर न पड़े )ट्यूमर (गांठ )को कहतें हैं ।
(ज़ारी ...).
बुधवार, 18 मई 2011
सुरों की शाम .
बेहतरीन थी वह सुरों की शाम ,स्वर -संध्या ."बोलीवुड म्युज़िक कंसर्ट "के नाम थी ये शाम .आयोजन गीतमाला फाउन-डेशन ऑफ़ मिशिगन ,मिशिगन फिलहारमोनिक तथा केंटन कमीशन फॉर कल्चर ,आर्ट्स ,एंड हेरिटेज का साझा प्रयास था .
कार्यक्रम संचालन गीतमाला ,मिशिगन के संस्थापक श्री नरेंद्र सेठ ने किया .इन्हें गर्व से वोईस ऑफ़ मिशिगन कहा जाता है .भारतीय कलाओं और संस्कृति के संरक्षण श्रीवर्धन को समर्पित है यह शख्शियत ।
मुख्य गायिका थीं -रुजुता जोशी .गायक मंडल में थे -जय अन्तानी ,श्री कान्त बालाजी ,अमोल खानापुरकर तथा गेस्ट गायक डॉ .यश शाह जिन्हें मिशगन में सिंगिंग डॉ .कहा जाता है ।
कार्यक्रम का आगाज़ रुजुता जोशी ने "गीता श्लोक "से किया ।
इसके बाद कोई एक घंटा तक लोकप्रिय कर्ण -प्रिय संगीत की वर्षा होती रही ,कभी नारी कंठ बनके कभी पुरुष जुगल बंदी के रूप में और कभी दोगाना बनके ,द्वेट बनके ।जुगल बंदी चलती रही अपनी ताल अपनी लय अपने रंग के साथ .
मध्यांतर से पूर्व "तू मुस्कुरा "(फिल्म युवराज ),"तेरी ओर ..."(सिंह इज किंग ).धूम ताना (ॐ शान्ति ),ये ज़िन्दगी उसी की है (अनारकली ),तुम जो आये ज़िन्दगी में (वंस अपोन ए टाइम इन मुंबई ),भजन "मनमोहना ...."(जोधा अकबर ),गुलाबी आँखें जो तेरी देखीं ...(दी ट्रेन ),ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगें ...(शोले ),दीवानगी दीवानगी .....दीवांगी दीवांगी ....(ॐ शान्ति ॐ )गीतों ने अपना अलग समां बांधा .यहाँ सम्मिलित स्वर थे पार्श्व संगीत के जिनकी गहराई में अमरीकी फिलहारमोनिक के वाद्य संगीत के माहिर वायलिन ,वायोला ,गिटार वादक ,ओक्तोपाड्स,बॉस गिटार ,सेलो के माहिर ,की बोर्ड्स के धुरंधर पूरी तरह उतर गए थे ।
एक अलग अनुभव था यह भारत की धरती से दूर एक और भारत की निर्मिती .एक बेहतरीन संश्लेषण गोरे और कालों ,गंदुमियों का .तेरा मेरा का कोई भेद नहीं ।
चैरी हिल ,केंटन (मिशिगन )का "दी विलेज थेटर "अपनी पूरी आभा और कलात्मक वास्तु कला की निधि मुक्त कंठ से लुटा रहा था .कार्यकर्म से पूर्व हल्का नाश्ता था .ड्रिंक्स थीं (पैसा दो ड्रिंक्स लो ).मध्यांतर था दस मिनिट का जिसे खींचकर मनमानी से संगीत प्रेमियों ने ५ मिनिट आगे बढा लिया था ।
हम भारतीय कहते नहीं अघाते -गंगा जमुनी है हमारी भारतीय संस्कृति ,सर्व ग्राही ,सर्व -समावेशी भी .यहाँ आकर देखो मिश्रित स्वर क्या होतें हैं कैसे कोई कलाकार कला को पूरा समर्पित होता है .गोरों का भाव सरणी और संगीत के सुरों के उसी धरातल पर पहुँच कर संगत करना ख़ास कर अनारकली के गीत -ये ज़िन्दगी उसी की है ...साथ में रुजुता जोशी का सदा बहार स्वर भाव -सर्वोवर में डुबो गया .मेरे ढोलना का शाश्त्रीय संगीत आधारित गीत अपना नाद सौन्दर्य लिए हुए था ,संगत को नै परवाज़ दी थी गोरों ने .
मध्यान्तर के बाद संगीत का आकर्षण और भी बढ़ गया था .प्रस्तुति में थे -
मैं अगर कहूं .....(ॐ शान्ति ॐ ),ये कहाँ आ गए हम (सिलसिला ),तेरे मस्त मस्त दो नैन (दबंग ),मेरे ढोलना ...(भूल भुलैयां ),दिल की नजर से (अनाड़ी का दोगाना जिसे डॉ यश शाह और रुजुताजोशी ने प्रस्तुत किया ),आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे (ब्रह्म चारी ),तथा समापन गीत था -जय !हो !(स्लम दोग मिलियानेअर )।
ज्यादती होगी यदि तबला वादक ,पर्काशन वाद्यों पर अपनी छाप छोड़ते वादकों का ज़िक्र न किया जाए .सह गायक गायिकाओं का ज़िक्र न किया जाए और संचालक की तारीफ़ न की जाए जिसने बारहा उस दौर के संगीत की विशेषताओं का बराबर उल्लेख किया जिस दौर से वह गीत संगीत लिया गया था ।
दो घंटा बीता नहीं ठहर गया था फूलों की खुशबू सा ,रिलेक्शेशन थिरेपी की पार्श्व संगीत सा ,किसी हिप्नोटिस्ट के सम्मोहन सा .
कार्यक्रम संचालन गीतमाला ,मिशिगन के संस्थापक श्री नरेंद्र सेठ ने किया .इन्हें गर्व से वोईस ऑफ़ मिशिगन कहा जाता है .भारतीय कलाओं और संस्कृति के संरक्षण श्रीवर्धन को समर्पित है यह शख्शियत ।
मुख्य गायिका थीं -रुजुता जोशी .गायक मंडल में थे -जय अन्तानी ,श्री कान्त बालाजी ,अमोल खानापुरकर तथा गेस्ट गायक डॉ .यश शाह जिन्हें मिशगन में सिंगिंग डॉ .कहा जाता है ।
कार्यक्रम का आगाज़ रुजुता जोशी ने "गीता श्लोक "से किया ।
इसके बाद कोई एक घंटा तक लोकप्रिय कर्ण -प्रिय संगीत की वर्षा होती रही ,कभी नारी कंठ बनके कभी पुरुष जुगल बंदी के रूप में और कभी दोगाना बनके ,द्वेट बनके ।जुगल बंदी चलती रही अपनी ताल अपनी लय अपने रंग के साथ .
मध्यांतर से पूर्व "तू मुस्कुरा "(फिल्म युवराज ),"तेरी ओर ..."(सिंह इज किंग ).धूम ताना (ॐ शान्ति ),ये ज़िन्दगी उसी की है (अनारकली ),तुम जो आये ज़िन्दगी में (वंस अपोन ए टाइम इन मुंबई ),भजन "मनमोहना ...."(जोधा अकबर ),गुलाबी आँखें जो तेरी देखीं ...(दी ट्रेन ),ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगें ...(शोले ),दीवानगी दीवानगी .....दीवांगी दीवांगी ....(ॐ शान्ति ॐ )गीतों ने अपना अलग समां बांधा .यहाँ सम्मिलित स्वर थे पार्श्व संगीत के जिनकी गहराई में अमरीकी फिलहारमोनिक के वाद्य संगीत के माहिर वायलिन ,वायोला ,गिटार वादक ,ओक्तोपाड्स,बॉस गिटार ,सेलो के माहिर ,की बोर्ड्स के धुरंधर पूरी तरह उतर गए थे ।
एक अलग अनुभव था यह भारत की धरती से दूर एक और भारत की निर्मिती .एक बेहतरीन संश्लेषण गोरे और कालों ,गंदुमियों का .तेरा मेरा का कोई भेद नहीं ।
चैरी हिल ,केंटन (मिशिगन )का "दी विलेज थेटर "अपनी पूरी आभा और कलात्मक वास्तु कला की निधि मुक्त कंठ से लुटा रहा था .कार्यकर्म से पूर्व हल्का नाश्ता था .ड्रिंक्स थीं (पैसा दो ड्रिंक्स लो ).मध्यांतर था दस मिनिट का जिसे खींचकर मनमानी से संगीत प्रेमियों ने ५ मिनिट आगे बढा लिया था ।
हम भारतीय कहते नहीं अघाते -गंगा जमुनी है हमारी भारतीय संस्कृति ,सर्व ग्राही ,सर्व -समावेशी भी .यहाँ आकर देखो मिश्रित स्वर क्या होतें हैं कैसे कोई कलाकार कला को पूरा समर्पित होता है .गोरों का भाव सरणी और संगीत के सुरों के उसी धरातल पर पहुँच कर संगत करना ख़ास कर अनारकली के गीत -ये ज़िन्दगी उसी की है ...साथ में रुजुता जोशी का सदा बहार स्वर भाव -सर्वोवर में डुबो गया .मेरे ढोलना का शाश्त्रीय संगीत आधारित गीत अपना नाद सौन्दर्य लिए हुए था ,संगत को नै परवाज़ दी थी गोरों ने .
मध्यान्तर के बाद संगीत का आकर्षण और भी बढ़ गया था .प्रस्तुति में थे -
मैं अगर कहूं .....(ॐ शान्ति ॐ ),ये कहाँ आ गए हम (सिलसिला ),तेरे मस्त मस्त दो नैन (दबंग ),मेरे ढोलना ...(भूल भुलैयां ),दिल की नजर से (अनाड़ी का दोगाना जिसे डॉ यश शाह और रुजुताजोशी ने प्रस्तुत किया ),आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे (ब्रह्म चारी ),तथा समापन गीत था -जय !हो !(स्लम दोग मिलियानेअर )।
ज्यादती होगी यदि तबला वादक ,पर्काशन वाद्यों पर अपनी छाप छोड़ते वादकों का ज़िक्र न किया जाए .सह गायक गायिकाओं का ज़िक्र न किया जाए और संचालक की तारीफ़ न की जाए जिसने बारहा उस दौर के संगीत की विशेषताओं का बराबर उल्लेख किया जिस दौर से वह गीत संगीत लिया गया था ।
दो घंटा बीता नहीं ठहर गया था फूलों की खुशबू सा ,रिलेक्शेशन थिरेपी की पार्श्व संगीत सा ,किसी हिप्नोटिस्ट के सम्मोहन सा .
दे मीन बिजनेस .
अमित थे मेरे साथ .कल कनाडा के वीजा कार्यालय सुबह सवेरे पहुंचना था वीजा के लिए .फटोग्रेफ्स तो मेरे पास थे "टू बाई टू के "लेकिन उनमे चेहरे का आकार यहाँ वीजा नियमों के अनुरूप न था .लिहाजा हम लोग "सी वी एसफार्मेसी" में चले आये थे .यहाँ फार्मेसी चौबीसों घंटा खुली रहती है तथा सौंदर्यप्रशाधन से लेकर , वाइन तक यहाँ उपलब्ध है ग्रोसरी में दूध से लेकर नमक भी है .फतोग्रेफ़ के लिए भी सुविधा है .
हमने फतोग्रेफ़ खिंचवाते वक्त अटेंडेंट को बतला दिया था -चेहरा ,कुलमिलाकर हेड का अनुपात ज्यादा होना चाहिए लिहाजा उसने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी तथा कंप्यूटर को इस आशय का सोफ्ट वेयर भी दे दिया था लेकिन इस काम में कुल मिलाकर आधा घंटा लग जाना था जो उसने हमें बतला दिया था ।
हम वक्त काट रहेथे और इसी क्रम में "मेक्स और आर्मां"रेस्तरा के बार सेक्शन में आ बैठे थे .नगर था केंटन (मिशिगन राज्य ).
सोचा एक एक ड्रिंक्स ले ली जाए तब तक फतोग्रेफ़तैयार हो जायेंगे .
अमित भाई ने ऑर्डर दिया -"टू आडर्स ब्ल्यू मून "ड्राफ्ट बीयर का ।
शायद कैग खाली होने की कगार पर पहुँच रहा था ,बीयर टैप से बीयर कम झाग ज्यादा आ रहा था .बार बाला (बार टेंडर )को हमने थोड़ा सा परेशां देखकर अपना ऑर्डर संशोधित करके दो "लबेटब्ल्यू "कर दिया ।
ये क्या उसने बीयर के दोनों ग्लास जिनमे से एक पूरा तथा दूसरा आधा भरा था सीधे सिंक के हवाले कर दिए ।
मैंने अपने देश में कई ऐसे नजारे शादी ब्याह में भी देखें हैं बीयर या व्हिस्की की बोतल टूट गईं और जाया न जाए यही सोच कर कई लोग बाकी बची को इस बिखरने के दौरान ही औक लगाके पी जातें हैं ।
यहाँ नज़ारा भिन्न था .बार में भी सिर्फ तीन बालाएं ही थी ,नाईट बार था ।
तीनों व्यावसायिक तरीके से अपने काम में व्यस्त थीं .गोरे तसल्ली से बैठे खा रहे थे ड्रिंक्स के साथ .कहीं कोई हल चल नहीं एक शाइस्तगी चारों तरफ एक करीना दिखलाई दे रहाथा ,खाने पीने के तौर तरीकों में ,कहीं कोई शोर भी नहीं ,सुकून संसिक्त मौन सा कुछ था वहां ।
मैं यही सोच रहा था -यहाँ बफे भी लेते हैं तो हर बार नै प्लेट ,जूठी प्लेट सर्विस टेबिल तक ले जाने का रिवाज़ नहीं है .जितना मर्जी खाओ ,फैंको या केरी होम कर लो ,लेफ्ट ओवर ।
यहाँ सिर्फ भाव हैं ,किसी चीज़ का अभाव नहीं .बस आदमी कम दिखलाई देतें हैं जो हैं भी वह तेज़ रफ़्तार कारों में बैठे हैं या स्टोर्स में दिखलाई देतें हैं .जिम ,स्टोर्सआदि की चेन्स तमाम रात काम करतीं हैं ।
भारत में बार -बालाओं पर अब निषेध ज़ारी है .मुंबई में अब उन्हें कई और धंधे करने पड़ रहें हैं ड्रीम नगरी अब शिव सेना के हवाले है .बेंगलोर में पब पर भी वेलेन्ताइन्स दिवस पर कब हंगामा हो जाए इसका कोई निश्चय नहीं ।
शाखा मृग कब कहाँ से निकल आयें इसका कोई निश्चय नहीं .यह दूसरा लोक है ,है इसी धरती पर .यहाँ हर कोई अलग अंदाज़ लिए है ज़िन्दगी का -दे मीन बिजनेस .कोई कहीं बाउंसर नहीं कोई लफंदरबाजी नहीं .
(ज़ारी ...).
हमने फतोग्रेफ़ खिंचवाते वक्त अटेंडेंट को बतला दिया था -चेहरा ,कुलमिलाकर हेड का अनुपात ज्यादा होना चाहिए लिहाजा उसने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी तथा कंप्यूटर को इस आशय का सोफ्ट वेयर भी दे दिया था लेकिन इस काम में कुल मिलाकर आधा घंटा लग जाना था जो उसने हमें बतला दिया था ।
हम वक्त काट रहेथे और इसी क्रम में "मेक्स और आर्मां"रेस्तरा के बार सेक्शन में आ बैठे थे .नगर था केंटन (मिशिगन राज्य ).
सोचा एक एक ड्रिंक्स ले ली जाए तब तक फतोग्रेफ़तैयार हो जायेंगे .
अमित भाई ने ऑर्डर दिया -"टू आडर्स ब्ल्यू मून "ड्राफ्ट बीयर का ।
शायद कैग खाली होने की कगार पर पहुँच रहा था ,बीयर टैप से बीयर कम झाग ज्यादा आ रहा था .बार बाला (बार टेंडर )को हमने थोड़ा सा परेशां देखकर अपना ऑर्डर संशोधित करके दो "लबेटब्ल्यू "कर दिया ।
ये क्या उसने बीयर के दोनों ग्लास जिनमे से एक पूरा तथा दूसरा आधा भरा था सीधे सिंक के हवाले कर दिए ।
मैंने अपने देश में कई ऐसे नजारे शादी ब्याह में भी देखें हैं बीयर या व्हिस्की की बोतल टूट गईं और जाया न जाए यही सोच कर कई लोग बाकी बची को इस बिखरने के दौरान ही औक लगाके पी जातें हैं ।
यहाँ नज़ारा भिन्न था .बार में भी सिर्फ तीन बालाएं ही थी ,नाईट बार था ।
तीनों व्यावसायिक तरीके से अपने काम में व्यस्त थीं .गोरे तसल्ली से बैठे खा रहे थे ड्रिंक्स के साथ .कहीं कोई हल चल नहीं एक शाइस्तगी चारों तरफ एक करीना दिखलाई दे रहाथा ,खाने पीने के तौर तरीकों में ,कहीं कोई शोर भी नहीं ,सुकून संसिक्त मौन सा कुछ था वहां ।
मैं यही सोच रहा था -यहाँ बफे भी लेते हैं तो हर बार नै प्लेट ,जूठी प्लेट सर्विस टेबिल तक ले जाने का रिवाज़ नहीं है .जितना मर्जी खाओ ,फैंको या केरी होम कर लो ,लेफ्ट ओवर ।
यहाँ सिर्फ भाव हैं ,किसी चीज़ का अभाव नहीं .बस आदमी कम दिखलाई देतें हैं जो हैं भी वह तेज़ रफ़्तार कारों में बैठे हैं या स्टोर्स में दिखलाई देतें हैं .जिम ,स्टोर्सआदि की चेन्स तमाम रात काम करतीं हैं ।
भारत में बार -बालाओं पर अब निषेध ज़ारी है .मुंबई में अब उन्हें कई और धंधे करने पड़ रहें हैं ड्रीम नगरी अब शिव सेना के हवाले है .बेंगलोर में पब पर भी वेलेन्ताइन्स दिवस पर कब हंगामा हो जाए इसका कोई निश्चय नहीं ।
शाखा मृग कब कहाँ से निकल आयें इसका कोई निश्चय नहीं .यह दूसरा लोक है ,है इसी धरती पर .यहाँ हर कोई अलग अंदाज़ लिए है ज़िन्दगी का -दे मीन बिजनेस .कोई कहीं बाउंसर नहीं कोई लफंदरबाजी नहीं .
(ज़ारी ...).
स्ट्रोक :पारिभाषिक शब्दावली .(ज़ारी ...).
(५१)इन्फारक्ट :ऊतकों का एक क्षेत्र (इलाका ,एरिया ऑफ़ टिश्यु )जो या तो मृतहो चुका है या होरहा है ,जिसकी वजह इस क्षेत्र को होने वाली रक्तापूर्ति का आकस्मिक तौर पर ठ़प हो जाना है किसी धमनी में कहीं से खून का थक्का आकर फंस जाने के कारण ।
(५२ )इन्फार्क्शन:वास्तव में इन -फार्क्ट का ,ऐसे क्षेत्र का बननाजहां रक्त आपूर्ति ठप हो चुकी है ,इन -फार्क्शन कहलाता है ।
ए सदन लोस ऑफ़ ब्लड सप्लाई टु ए टिश्यु कौजिंग दी फोरमेशन ऑफ़ एन इन्फार्क इज इन्फार्क्शन ।
अकसर आप अस्पताली पर्ची पर आजकल लिखा देख सकतें हैं "एम्.आई "जिसका मतलब होता है -मायो -कार्डिएक इन्फार्क्शन .यानी हृद पेशी के एक भाग की मौत /का बेकार हो जाना जिसकी वजह मेजर हार्ट अटेक बनता है .
(५३).इस्कीमिया :ऊतकों तक रक्त आपूर्ति का निलंबित हो जाना जिसकी वजह अकसर किसी रक्त वाहिका का अवरुद्ध होना (प्लाक स्टेनोसिस )या इसमें कहीं से खून का थक्का आ फंसना बनता है .
(५४)इस्कीमिक कास्केड :ए सीरीज ऑफ़ इवेंट्स लास्टिंग फॉर सेवरल आवर्स टु सेवरल फोलोइंग इनिशियल स्कीमिया देट रिज़ल्ट्स इन एक्स्टेंसिव सेल डेथ एंड टिश्यु डेमेज बियोंड दी एरियाऑफ़ टिश्यु ओरिजिनली अफेक्तिद बाई दी इनिशियल लेक ऑफ़ ब्लड फ्लो ।
स्कीमियाका के बाद की ,ऊतकों को रक्त आपूर्ति बंद हो जाने के बाद की यह ऐसी तबाही है जो कितने ही घंटों से लेकर कितने ही दिनों तक भी चलती रह सकती है ,जिसकी परिणिति व्यापकतौर पर कोशाओं और ऊतकों की तबाही बनती है ।
(५५).स्कीमिक पेनाम्ब्रा :क्षति ग्रस्त कोशाओं का ऐसा इलाका जो अभी आपनी आखिरी साँसे गिन रहा है ,यह इलाका टुकड़ोंमें यहाँ वहां फैली मृत कोशाओं के गिर्द ही होता है .यही है स्कीमिक पेनाम्ब्रा .
(ज़ारी ...)।
इस मर्तबा का शैर सुनिए :
""तिफली" के रोने का भेद खुला है "बादे मर्ग,"
"आगाज़" में ही रोये थे "अंजाम "के लिए ।
भावार्थ :तिफली कहतें हैं जीव आत्मा को ,नवजात को जो पैदा होते ही रोता है ,लेकिन वह क्यों रोता है इसका भान खुद उसे मृत्यु के पलों में ही हो पाता है ,यानी मौत की पीड़ा को उसने पैदा होते ही भांप लिया था ,समझा अब जाके है वह इस भेद को .ये जो जीवनहै इसका हश्र (अंजाम )यही होना था ।
आगाज़ :जीवन की शुरुआत
अंजाम :हश्र .
बादे मर्ग :मौत के बाद
तिफली :जीव आत्मा ।
(समाप्त )
(५२ )इन्फार्क्शन:वास्तव में इन -फार्क्ट का ,ऐसे क्षेत्र का बननाजहां रक्त आपूर्ति ठप हो चुकी है ,इन -फार्क्शन कहलाता है ।
ए सदन लोस ऑफ़ ब्लड सप्लाई टु ए टिश्यु कौजिंग दी फोरमेशन ऑफ़ एन इन्फार्क इज इन्फार्क्शन ।
अकसर आप अस्पताली पर्ची पर आजकल लिखा देख सकतें हैं "एम्.आई "जिसका मतलब होता है -मायो -कार्डिएक इन्फार्क्शन .यानी हृद पेशी के एक भाग की मौत /का बेकार हो जाना जिसकी वजह मेजर हार्ट अटेक बनता है .
(५३).इस्कीमिया :ऊतकों तक रक्त आपूर्ति का निलंबित हो जाना जिसकी वजह अकसर किसी रक्त वाहिका का अवरुद्ध होना (प्लाक स्टेनोसिस )या इसमें कहीं से खून का थक्का आ फंसना बनता है .
(५४)इस्कीमिक कास्केड :ए सीरीज ऑफ़ इवेंट्स लास्टिंग फॉर सेवरल आवर्स टु सेवरल फोलोइंग इनिशियल स्कीमिया देट रिज़ल्ट्स इन एक्स्टेंसिव सेल डेथ एंड टिश्यु डेमेज बियोंड दी एरियाऑफ़ टिश्यु ओरिजिनली अफेक्तिद बाई दी इनिशियल लेक ऑफ़ ब्लड फ्लो ।
स्कीमियाका के बाद की ,ऊतकों को रक्त आपूर्ति बंद हो जाने के बाद की यह ऐसी तबाही है जो कितने ही घंटों से लेकर कितने ही दिनों तक भी चलती रह सकती है ,जिसकी परिणिति व्यापकतौर पर कोशाओं और ऊतकों की तबाही बनती है ।
(५५).स्कीमिक पेनाम्ब्रा :क्षति ग्रस्त कोशाओं का ऐसा इलाका जो अभी आपनी आखिरी साँसे गिन रहा है ,यह इलाका टुकड़ोंमें यहाँ वहां फैली मृत कोशाओं के गिर्द ही होता है .यही है स्कीमिक पेनाम्ब्रा .
(ज़ारी ...)।
इस मर्तबा का शैर सुनिए :
""तिफली" के रोने का भेद खुला है "बादे मर्ग,"
"आगाज़" में ही रोये थे "अंजाम "के लिए ।
भावार्थ :तिफली कहतें हैं जीव आत्मा को ,नवजात को जो पैदा होते ही रोता है ,लेकिन वह क्यों रोता है इसका भान खुद उसे मृत्यु के पलों में ही हो पाता है ,यानी मौत की पीड़ा को उसने पैदा होते ही भांप लिया था ,समझा अब जाके है वह इस भेद को .ये जो जीवनहै इसका हश्र (अंजाम )यही होना था ।
आगाज़ :जीवन की शुरुआत
अंजाम :हश्र .
बादे मर्ग :मौत के बाद
तिफली :जीव आत्मा ।
(समाप्त )
स्ट्रोक :पारिभाषिक शब्दावली .(ज़ारी ...).
(४२ )लिपो -प्रोटीन :कोलेस्ट्रोल के छोटे छोटे ग्लोबनुमा कण जिनपर प्रोटीन की एक परत चढ़ी रहती है .हमारा यकृत करता है इनका संशाधन ।
(४३)लो -डेंसिटी -लिपो -प्रोटीन :इसे बेड कोलेस्ट्रोल या अमित्र कोलेस्ट्रोल भी कहा जाता है .लिपिड और प्रोटीन का यौगिक है यह जो कुल कोलेस्ट्रोल का बहुलांश हमारे रक्त में लिए प्रवाहित होता है ,इसकी अतिरिक्त मात्रा का ही यह धमनियों की भीतरी दीवारों पर अड्डा बना लेता है .एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रति १०० सी सी खून में (एक डेसी-लीटर में )इसकी मात्रा १३० मिलीग्राम %से ज्यादा नहीं होनी चाहिए ,यह जितना कम रहे उतना ही अच्छा और एच डी एल ३५ से जितना ज्यादा ऊपर रहे (लेकिन ६० से ऊपर नहीं )उतना ही दिल के लिए ,दिमाग के लिए अच्छा रहता है .कसरत नियमित करने ,सैर करते रहने से अमित्र कोलेस्ट्रोल (एल डी एल )मित्र कोलेस्ट्रोल (हाई डेंसिटी लिपो -प्रोटीन )में तबदील हो जाता है .
(४४)मेग्नेटिक रेजोनेंस एंजियो -ग्रेफ़ी :इस रोग निदानिक इमेजिंग तरकीब के तहत पहले एक कंट्रास्ट डाई का इंजेक्शन ब्लड वेसिल में (शिरा )में लगाया जाता है ,अब इसमें प्रवाहित खून की मात्रा का जायजा लिया जाता है ,चुम्बकीय अनुनाद के द्वारा .इसका स्तेमाल दिमागी धमनियों की स्टेनोसिस (अवरोध या संक्रेपन )का पता लगाने के लिए किया जाता है .धमनी की भीतरी दीवार में कोलेस्ट्रोल प्लाक (कचरा चिकनाई )जमा होने से वह संकरी पड़ जाती है पूरा खून नहीं उठा पाती ,यही स्टेनोसिस है ,यानी नेरो -इंग ऑफ़ दी आर्टरी .
(४५)मेग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग स्केन:छवि अंकन की इस तरकीब में चुम्बकीय क्षेत्रों की सहायता से ऊतकों के जलीय अंश में आने वाले सूक्ष्म बदलावों को आंका जाता है ।
(४६)माइतो -कोंड्रिया:इसे कोशिका का पावर हाउस भी कहाजाता है .यह कोशिका का एक विशेषीकृत हिस्सा होता है मसलन केन्द्रक (नाभिक या क्रोड़,न्यूक्लियस )माइतो -कोंड्रियाँ,जिसका अपना एक ख़ास काम (प्रकार्य या फंक्शन )होता है .इसीलिए इन्हें कोशिका ऊर्जा पैदा करने वाले लिटिल ओर्गेंस (या ओर्गेनाल्स )कहा जाता है .
(४७)मिट्रल एन्युलर केल्सिफिकेशन :यह दिल के मिट्रल वाल्व की बीमारी है .
(४८)मिट्रल वाल्व स्टेनोसिस :इस रोग में दिल के मिट्रल वाल्व के गिर्द प्लाक जैसा कचरा जमा हो जाता है .नतीज़न इसकी स्टेनोसिस हो जाती है ,अवरोध आने लगता है इसके प्रकार्य में ।
मिट्रल वाल्व :चार कमरों वाले दिल के ऊपरी और निचले (दोनों बाएं ओर के )या फिर दिल के बाएं ओरके ही एट्रियम और वेंत्रिकिल के बीच एक ही और खुलने वाला एक वाल्व होता है जिसे मिट्रल वाल्व कहा जाता है ।
इसी के संकरे पड़ जाने का रोग है मिट्रल वाल्व स्टेनोसिस ।
(४९)न्यूरो -प्रो -टेक -टिव एजेंट्स :स्ट्रोक से पैदा होने वाली
सेकेंडरी इंजरी से न्यूरो -प्रो -टेक -टिव एजेंट्स ही बचातें हैं .प्रा -मेरी इनजरी तो स्ट्रोक पड़ते पड़ते या उसके फ़ौरन बाद हो जाती उसके बाद जो नुकसानी उठानी पडती है वही है द्वितीयक नुकसानी सेकेंडरी डेमेज ।
(५०)ऑक्सीजन फ्री रेडिकल्स :टोक्सिक केमिकल्स रिलीज्ड ड्यूरिंग दी प्रोसेस ऑफ़ सेल्युलर रेस्पिरेशन एंड रिलीज्ड इन एक्सेसिव आमाउन्ट्स ड्यूरिंग नेक्रोसिस ऑफ़ ए सेल .यहाँ नेक्रोसइस का मतलब कोशा की मौत है और रेस्पिरेशन का मतलब ऑक्सीजन का विभाजन वह सम्पूर्ण भौतिक और रासायनिक प्रक्रिया जिसके तहत ऑक्सीजन शरीर की हर कोशिका और ऊतक तक पहुंचाई जाती है तथा कार्बन -डाय -ऑक्साइड और जल की निकासी की जाती है ।
(ज़ारी ...)।
इस मर्तबा का शैर पढ़िए :
इन अंधेरों के शहर में आदमी ,जल रहा है झिलमिलाने के लिए
तौलतेंहैं लोग रिश्तों को यहाँ ,कुछ घटाने कुछ बढाने के लिए .(ग़ज़ल गो -श्री ज्ञान चंद मर्मज्ञ ,ब्लॉग :शब्द साधक मंच .).
(४३)लो -डेंसिटी -लिपो -प्रोटीन :इसे बेड कोलेस्ट्रोल या अमित्र कोलेस्ट्रोल भी कहा जाता है .लिपिड और प्रोटीन का यौगिक है यह जो कुल कोलेस्ट्रोल का बहुलांश हमारे रक्त में लिए प्रवाहित होता है ,इसकी अतिरिक्त मात्रा का ही यह धमनियों की भीतरी दीवारों पर अड्डा बना लेता है .एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रति १०० सी सी खून में (एक डेसी-लीटर में )इसकी मात्रा १३० मिलीग्राम %से ज्यादा नहीं होनी चाहिए ,यह जितना कम रहे उतना ही अच्छा और एच डी एल ३५ से जितना ज्यादा ऊपर रहे (लेकिन ६० से ऊपर नहीं )उतना ही दिल के लिए ,दिमाग के लिए अच्छा रहता है .कसरत नियमित करने ,सैर करते रहने से अमित्र कोलेस्ट्रोल (एल डी एल )मित्र कोलेस्ट्रोल (हाई डेंसिटी लिपो -प्रोटीन )में तबदील हो जाता है .
(४४)मेग्नेटिक रेजोनेंस एंजियो -ग्रेफ़ी :इस रोग निदानिक इमेजिंग तरकीब के तहत पहले एक कंट्रास्ट डाई का इंजेक्शन ब्लड वेसिल में (शिरा )में लगाया जाता है ,अब इसमें प्रवाहित खून की मात्रा का जायजा लिया जाता है ,चुम्बकीय अनुनाद के द्वारा .इसका स्तेमाल दिमागी धमनियों की स्टेनोसिस (अवरोध या संक्रेपन )का पता लगाने के लिए किया जाता है .धमनी की भीतरी दीवार में कोलेस्ट्रोल प्लाक (कचरा चिकनाई )जमा होने से वह संकरी पड़ जाती है पूरा खून नहीं उठा पाती ,यही स्टेनोसिस है ,यानी नेरो -इंग ऑफ़ दी आर्टरी .
(४५)मेग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग स्केन:छवि अंकन की इस तरकीब में चुम्बकीय क्षेत्रों की सहायता से ऊतकों के जलीय अंश में आने वाले सूक्ष्म बदलावों को आंका जाता है ।
(४६)माइतो -कोंड्रिया:इसे कोशिका का पावर हाउस भी कहाजाता है .यह कोशिका का एक विशेषीकृत हिस्सा होता है मसलन केन्द्रक (नाभिक या क्रोड़,न्यूक्लियस )माइतो -कोंड्रियाँ,जिसका अपना एक ख़ास काम (प्रकार्य या फंक्शन )होता है .इसीलिए इन्हें कोशिका ऊर्जा पैदा करने वाले लिटिल ओर्गेंस (या ओर्गेनाल्स )कहा जाता है .
(४७)मिट्रल एन्युलर केल्सिफिकेशन :यह दिल के मिट्रल वाल्व की बीमारी है .
(४८)मिट्रल वाल्व स्टेनोसिस :इस रोग में दिल के मिट्रल वाल्व के गिर्द प्लाक जैसा कचरा जमा हो जाता है .नतीज़न इसकी स्टेनोसिस हो जाती है ,अवरोध आने लगता है इसके प्रकार्य में ।
मिट्रल वाल्व :चार कमरों वाले दिल के ऊपरी और निचले (दोनों बाएं ओर के )या फिर दिल के बाएं ओरके ही एट्रियम और वेंत्रिकिल के बीच एक ही और खुलने वाला एक वाल्व होता है जिसे मिट्रल वाल्व कहा जाता है ।
इसी के संकरे पड़ जाने का रोग है मिट्रल वाल्व स्टेनोसिस ।
(४९)न्यूरो -प्रो -टेक -टिव एजेंट्स :स्ट्रोक से पैदा होने वाली
सेकेंडरी इंजरी से न्यूरो -प्रो -टेक -टिव एजेंट्स ही बचातें हैं .प्रा -मेरी इनजरी तो स्ट्रोक पड़ते पड़ते या उसके फ़ौरन बाद हो जाती उसके बाद जो नुकसानी उठानी पडती है वही है द्वितीयक नुकसानी सेकेंडरी डेमेज ।
(५०)ऑक्सीजन फ्री रेडिकल्स :टोक्सिक केमिकल्स रिलीज्ड ड्यूरिंग दी प्रोसेस ऑफ़ सेल्युलर रेस्पिरेशन एंड रिलीज्ड इन एक्सेसिव आमाउन्ट्स ड्यूरिंग नेक्रोसिस ऑफ़ ए सेल .यहाँ नेक्रोसइस का मतलब कोशा की मौत है और रेस्पिरेशन का मतलब ऑक्सीजन का विभाजन वह सम्पूर्ण भौतिक और रासायनिक प्रक्रिया जिसके तहत ऑक्सीजन शरीर की हर कोशिका और ऊतक तक पहुंचाई जाती है तथा कार्बन -डाय -ऑक्साइड और जल की निकासी की जाती है ।
(ज़ारी ...)।
इस मर्तबा का शैर पढ़िए :
इन अंधेरों के शहर में आदमी ,जल रहा है झिलमिलाने के लिए
तौलतेंहैं लोग रिश्तों को यहाँ ,कुछ घटाने कुछ बढाने के लिए .(ग़ज़ल गो -श्री ज्ञान चंद मर्मज्ञ ,ब्लॉग :शब्द साधक मंच .).
मंगलवार, 17 मई 2011
स्ट्रोक :पारिभाषिक शब्द कोष .
(३६)प्लाक :धमनी की अन्दर की दीवारों पर बैठा पसरा जमा हुआ कोलेस्ट्रोल और लिपिड जो स्टेनोसिस (धमनी अवरोध )तथा आथि - -रो -स्केल -रो -सिस (धमनी का अन्दर से लोच खोके कठोर और खुरदरा होकर ,भंगुर हो जाना ).की वजह बनता है .
(३७)प्लेटलेट :खून में मौजूद कोशीय संरचनाएं (डिस्क के आकार वाली )जिनका खून के थक्के बनाने में बड़ा हाथ होता है ।
(३८ )प्लास टिसिती:स्ट्रोक या किसी चोट के बाद पैदा कमी बेशी किसी देफिशित के अनुरूप होने ,ढलने की हमारे दिमाग की कूवत प्लास -टिसिती है ।
(३९)प्रिवी -लेंस :एक आबादी में किसी समय पर किसी बीमारी के कुल मामलों की संख्या, का पाया जाना, प्रिवी -लेंस है ।
(४०)री -कोम्बी -नेन्ट टिश्यु प्लाज़मी -नोजन एक्टि -वेटर (आरटी -पी ए ):यह एक जीन इंजीनियरिंग द्वारा पैदा किया गया एक ऐसा "थ्रोम्बो -लितिक "पदार्थ है जो थक्का रोधी है .और उस कुदरती पदार्थ जैसा ही है जैसा हमारा शरीरखुद से ही तैयार करलेता है .यह एक थ्रोम्बो -लितिक थिरेपी का हिस्सा बनता है ।
(४१)स्माल वेसिल डिजीज :यह एक मष्तिष्क रक्त वाहिकीय (सेरी-ब्रो -वेस्क्युअलर डिजीज )विकार है जिसमें दिमाग की छोटी धमनियां अवरुद्ध होकर स्टेनोसिस की वजह बनती हैं .
स्टेनोसिस :किसी धमनी का अन्दर की दीवारों पर कचरा (फेटि प्लाक )जमा होने से संकरा हो जाना ,कम खून उठाना है कुल सप्लाई में से .धमनी के नाज़ुक हो जाने अन्दर से खुरदरी- भुरभरी हो जाने पर ब्लड प्रेशर के ज्यादा बढ़ने से ही धमनी फट सकती है . नतीजा होता है "हेमो -रेजिक स्ट्रोक ".
(ज़ारी ...)।
हमेशा की तरह इस बार का शैर :
मत कहो आकाश पर कोहरा घना है ,
यह किसी की व्यक्ति गत आलोचना है .
(३७)प्लेटलेट :खून में मौजूद कोशीय संरचनाएं (डिस्क के आकार वाली )जिनका खून के थक्के बनाने में बड़ा हाथ होता है ।
(३८ )प्लास टिसिती:स्ट्रोक या किसी चोट के बाद पैदा कमी बेशी किसी देफिशित के अनुरूप होने ,ढलने की हमारे दिमाग की कूवत प्लास -टिसिती है ।
(३९)प्रिवी -लेंस :एक आबादी में किसी समय पर किसी बीमारी के कुल मामलों की संख्या, का पाया जाना, प्रिवी -लेंस है ।
(४०)री -कोम्बी -नेन्ट टिश्यु प्लाज़मी -नोजन एक्टि -वेटर (आरटी -पी ए ):यह एक जीन इंजीनियरिंग द्वारा पैदा किया गया एक ऐसा "थ्रोम्बो -लितिक "पदार्थ है जो थक्का रोधी है .और उस कुदरती पदार्थ जैसा ही है जैसा हमारा शरीरखुद से ही तैयार करलेता है .यह एक थ्रोम्बो -लितिक थिरेपी का हिस्सा बनता है ।
(४१)स्माल वेसिल डिजीज :यह एक मष्तिष्क रक्त वाहिकीय (सेरी-ब्रो -वेस्क्युअलर डिजीज )विकार है जिसमें दिमाग की छोटी धमनियां अवरुद्ध होकर स्टेनोसिस की वजह बनती हैं .
स्टेनोसिस :किसी धमनी का अन्दर की दीवारों पर कचरा (फेटि प्लाक )जमा होने से संकरा हो जाना ,कम खून उठाना है कुल सप्लाई में से .धमनी के नाज़ुक हो जाने अन्दर से खुरदरी- भुरभरी हो जाने पर ब्लड प्रेशर के ज्यादा बढ़ने से ही धमनी फट सकती है . नतीजा होता है "हेमो -रेजिक स्ट्रोक ".
(ज़ारी ...)।
हमेशा की तरह इस बार का शैर :
मत कहो आकाश पर कोहरा घना है ,
यह किसी की व्यक्ति गत आलोचना है .
स्ट्रोक :पारिभाषिक शब्द प्रयोग .(ज़ारी ....).
(३६)फंक्शनल मेग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग :एक प्रकार की छायांकन तकनीकी है जो दिमाग के अन्दर अंदर बढ़ने वाले रक्त प्रवाह का पता लगाती है .इट मेज़र्स इन्क्रीज़िज़ इन ब्लड फ्लो विद इन दी ब्रेन ।
(३७)हेमी -परेसिस :स्ट्रोक के बाद शरीर के किसी एक पार्श्व में आने वाली आंगिक कमजोरी ।
(३८)ग्ल़िया:इसे न्यूरो -ग्ल़िया भी कहा जाता है .यह नर्वस सिस्टम (हमारे स्नायुविक तंत्र )की सहायक कोशायें हैं जो ब्लड -ब्रेन -बेरियर रचतीं हैं प्रमुख ,खासुल- ख़ास न्युरानों (दिमागी तंत्र की कोशाओं )को पुष्टिकर तत्व और ऑक्सीजन मुहैया करवातीं हैं तथा न्युरानों को रोग संक्रमण से बचाती हैं .विषाक्तता से भी तथा ट्रौमा से भी न्युरोंस का बचाव करतीं हैं नर्वस सिस्टम की ये सहायिकाएं ।
(३९)हेमी -प्लीजिया :शरीर के किसी एक पार्श्व के अंगों का पक्षाघात (फालिज ,लकवा )ग्रस्त हो जाना ।
(४०)हेमो -रेजिक स्ट्रोक :सडन ब्लीडिंग इनटू एंड अराउंड दी ब्रेन .दिमाग मेंभीतर भीतर यकायक रक्त स्राव होना ,सैलाब आ जाना खून का दिमाग के अंतराल -आकाश में .दिमाग के गिर्द .जिसे आम भाषा में कह देतें हैं दिमाग के अन्दर रक्त पहुचाने वाली किसीखून की नाली(आर्टरी या धमनी ) का दिमाग के अन्दर फट जाना ,दिमाग की कोई नस(ब्लड वेसिल ) फट जाना .
(४१ )हाई -डेंसिटी -लिपो -प्रोटीन (मित्र कोलेस्ट्रोल ):यह लिपिड और प्रोटीन का एक यौगिक है ,यह शरीर के कुल कोलेस्ट्रोल का थोड़ा सा हिस्सा रक्त में ले जाता है और आखिर कार इसे यकृत में लेजाके विसर्जित कर देता है ।
(४२ )होमीओ -स्टेसिस:कोशा में मौजूद तमाम तरह के तरल पदार्थों और रसायनों के संतुलन कीएक अवस्था को ,तमाम ऊतकों कुल मिलाके पूरे शरीर में तरल की साम्यावस्था को ,संतुलन को कहा जाता है होमीओ -स्टेसिस .
(४३).हाई -पर -टेंशन :या हाई -ब्लड -प्रेशर धमनियों में प्रवाहित रक्त से दीवारों पर पड़ने वाला ऐसा दाब है जिसका मान या तो १४०/९० हो या इससे भी ज्यादा ।
ऊपरी पाठ को सिस्टोलिक तथा निचले को डाय -स्टोलिक रक्त दाब कहा जाता है .इसे मिलीमीटर ऑफ़ मरकरी में अभी व्यक्त किया जाता है .यानी पारे के एक उर्ध्वाधर स्तम्भ की ऊंचाई जो मिलीमीटर में रहती है जब पारा सर्वाधिक ऊंचाई को और फिर निम्नतर मान को इस स्तम्भ पर जड़े एक पैमाने पर छूता है . एक काफ को बाजू से कसके बांधा जाता है और फिर एक रबर के बल्ब को दबाया जाता है जबतक ध्वनी कान में न सुनाई पड़े ।दो बार सुनाई देती है यह ध्वनी पहली अधिकतम दाब के वक्त दूसरी निम्नतम के .
इसे "स्फिग्मा -मैनो -मीटर "से नापा जाता है .आप सभी ने यह यंत्र देखा है .
सिस्टोलिक प्रेशर वेंत्रिकिल्स का सिक्डाव होता है ,अधिकतम दाब होता है यह ,आम भाषा में कहें तो यह दिल का सिकुड़ना है ,स्क्वीज़ होना है इस दरमियान खून धमनियों में भेजा जाता है यानी दिल से बाहर उलीचा जाता है .तथा डाय -स्टोलिक हृद -कक्षों (हार्ट चेम्बर्स )का लयात्मक फैलाव ,प्रसार जब ये रिलेक्स होके रक्त से भर जातें हैं .दिल आराम फरमाता है दो लुब डूब आवाजों के बीच के अंतराल में .
(ज़ारी....)।
इस मर्तबा का शैर सुनिए :
इन सफीलों में वो दरारें हैं ,
जिनमें बसकर नमी नहीं जाती ,
एक आदत सी हो गई है तू ,
और आदत कभीं नहीं जाती ।
ये जुबां हमसे सी नहीं जाती ,
ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती ।
मुझको ईसा बना दिया तुमने ,
अब शिकायत भी की नहीं जाती ।
मयकशों मय नहीं लेकिन ,
इतनी कडवी के पी नहीं जाती ।
ज़िन्दगी है के जी नहीं जाती .
(३७)हेमी -परेसिस :स्ट्रोक के बाद शरीर के किसी एक पार्श्व में आने वाली आंगिक कमजोरी ।
(३८)ग्ल़िया:इसे न्यूरो -ग्ल़िया भी कहा जाता है .यह नर्वस सिस्टम (हमारे स्नायुविक तंत्र )की सहायक कोशायें हैं जो ब्लड -ब्रेन -बेरियर रचतीं हैं प्रमुख ,खासुल- ख़ास न्युरानों (दिमागी तंत्र की कोशाओं )को पुष्टिकर तत्व और ऑक्सीजन मुहैया करवातीं हैं तथा न्युरानों को रोग संक्रमण से बचाती हैं .विषाक्तता से भी तथा ट्रौमा से भी न्युरोंस का बचाव करतीं हैं नर्वस सिस्टम की ये सहायिकाएं ।
(३९)हेमी -प्लीजिया :शरीर के किसी एक पार्श्व के अंगों का पक्षाघात (फालिज ,लकवा )ग्रस्त हो जाना ।
(४०)हेमो -रेजिक स्ट्रोक :सडन ब्लीडिंग इनटू एंड अराउंड दी ब्रेन .दिमाग मेंभीतर भीतर यकायक रक्त स्राव होना ,सैलाब आ जाना खून का दिमाग के अंतराल -आकाश में .दिमाग के गिर्द .जिसे आम भाषा में कह देतें हैं दिमाग के अन्दर रक्त पहुचाने वाली किसीखून की नाली(आर्टरी या धमनी ) का दिमाग के अन्दर फट जाना ,दिमाग की कोई नस(ब्लड वेसिल ) फट जाना .
(४१ )हाई -डेंसिटी -लिपो -प्रोटीन (मित्र कोलेस्ट्रोल ):यह लिपिड और प्रोटीन का एक यौगिक है ,यह शरीर के कुल कोलेस्ट्रोल का थोड़ा सा हिस्सा रक्त में ले जाता है और आखिर कार इसे यकृत में लेजाके विसर्जित कर देता है ।
(४२ )होमीओ -स्टेसिस:कोशा में मौजूद तमाम तरह के तरल पदार्थों और रसायनों के संतुलन कीएक अवस्था को ,तमाम ऊतकों कुल मिलाके पूरे शरीर में तरल की साम्यावस्था को ,संतुलन को कहा जाता है होमीओ -स्टेसिस .
(४३).हाई -पर -टेंशन :या हाई -ब्लड -प्रेशर धमनियों में प्रवाहित रक्त से दीवारों पर पड़ने वाला ऐसा दाब है जिसका मान या तो १४०/९० हो या इससे भी ज्यादा ।
ऊपरी पाठ को सिस्टोलिक तथा निचले को डाय -स्टोलिक रक्त दाब कहा जाता है .इसे मिलीमीटर ऑफ़ मरकरी में अभी व्यक्त किया जाता है .यानी पारे के एक उर्ध्वाधर स्तम्भ की ऊंचाई जो मिलीमीटर में रहती है जब पारा सर्वाधिक ऊंचाई को और फिर निम्नतर मान को इस स्तम्भ पर जड़े एक पैमाने पर छूता है . एक काफ को बाजू से कसके बांधा जाता है और फिर एक रबर के बल्ब को दबाया जाता है जबतक ध्वनी कान में न सुनाई पड़े ।दो बार सुनाई देती है यह ध्वनी पहली अधिकतम दाब के वक्त दूसरी निम्नतम के .
इसे "स्फिग्मा -मैनो -मीटर "से नापा जाता है .आप सभी ने यह यंत्र देखा है .
सिस्टोलिक प्रेशर वेंत्रिकिल्स का सिक्डाव होता है ,अधिकतम दाब होता है यह ,आम भाषा में कहें तो यह दिल का सिकुड़ना है ,स्क्वीज़ होना है इस दरमियान खून धमनियों में भेजा जाता है यानी दिल से बाहर उलीचा जाता है .तथा डाय -स्टोलिक हृद -कक्षों (हार्ट चेम्बर्स )का लयात्मक फैलाव ,प्रसार जब ये रिलेक्स होके रक्त से भर जातें हैं .दिल आराम फरमाता है दो लुब डूब आवाजों के बीच के अंतराल में .
(ज़ारी....)।
इस मर्तबा का शैर सुनिए :
इन सफीलों में वो दरारें हैं ,
जिनमें बसकर नमी नहीं जाती ,
एक आदत सी हो गई है तू ,
और आदत कभीं नहीं जाती ।
ये जुबां हमसे सी नहीं जाती ,
ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती ।
मुझको ईसा बना दिया तुमने ,
अब शिकायत भी की नहीं जाती ।
मयकशों मय नहीं लेकिन ,
इतनी कडवी के पी नहीं जाती ।
ज़िन्दगी है के जी नहीं जाती .
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