रविवार, 24 नवंबर 2013

नए शोध के आलोक में पुरानी मान्यताएं :मिथ या यथार्थ (दूसरी क़िस्त )

नए शोध के आलोक  में पुरानी मान्यताएं :मिथ या यथार्थ (दूसरी क़िस्त )


(१)पंद्रह मिनिट धूप खाइये ,धूप  में बिताइए  रोजाना

स्वस्थ मुक्तावली और अस्थियों के लिए ही नहीं विटामिन D  हमारे रोग निरोधी तंत्र के सुचारु संचालन और तंदरुस्ती के बाबत भी बदलनी शुरू कर दी है।

VERDICT :Sound advice .Get early morning sun for 15-20 minutes on a daily basis to replenish your vitamin -D reserves.

जी हाँ यथार्थ है यह अवधारणा आज भी उतनी ही मान्य है मिथ नहीं बनी है। आजकल सर्दी जुकाम का मौसम है पंद्रह  मिनिट धूप में ज़रूर बैठिये फायदा होगा भागेगा कॉमन कोल्ड का वायरस। 

(2)YOU NEED TO EXERCISE FOR 30 MINUTES ,FIVE TIMES A WEEK

आलमी स्तर  पर भी आप देखिये अनेक देशों के स्वास्थ्य विभाग हफ्ते में १५० मिनिट व्यायाम करने की सलाह देते हैं। यानी ३० मिनिट के पांच सत्र प्रति सप्ताह। आम जुबां में बोले तो हफ्ते में पांच बार आधा घंटा और कुछ नहीं बनता तो सैर को ही निकलिये ज़नाब।

But Dr Michael Mosley ,the man behind the 5:2 diet ,thinks this advice is confusing ,can be hard to achieve and that the more important message of "just getting up and moving around is often as possible " is largely ignored .This despite research showing ,Mosley says ,that the real 'silent killer 'is sitting in a chair for too  many hours each day .He is a fan of high intensity training (HIT), WHICH CAN MEAN JUST FEW MINUTES OF HIGH ENERGY ACTIVITIES , A FEW TIMES A WEEK AND NOT SITTING STILL FOR LONG PERIODS .

Fitness expert ,Danny Saunders agrees that making your daily routine naturally more active is what really counts when it comes to maintaing a healthy weight long term .Never underestimate the power of a short workout -just 15 minutes of moderate exercise each day can add three years to your life .

VERDICT :  सब कुछ दिग्भ्रमित करने वाला लगता है न ?

हमने अक्सर कहा है "राम राम" भाई पर-परमात्मा ने हमारा शरीर एक जगह बैठे बैठे हुकुम बजाने या फिर  बैठे बैठे ही काम करते रहने के लिए नहीं बनाया है। हर बीस मिनिट के बाद सीट छोड़कर इधर उधर बे -इरादा टहलिये। कुर्सी से चिपकना बेहद खतरनाक है सेहत के लिए।

अपनी बात आपको बतलाएं -जब यूनिवर्सिटी कालिज रोहतक में पढ़ाते थे ,हमारा भौतकी विभाग पहली मंजिल पर था और स्टाफ रूम भू -तल पर था ,उसी के साथ संलग्न बाथ रूम था। हर मरतबा इस सुविधा के उपभोग के लिए नीचे  आते थे कॉलिज के लम्बे लम्बे बरामदे पार करके। हालाकि रेस्ट रूम ऊपर भी थे। शेष समय में बैठे बैठे पढ़ना या क्लास लेना खड़े खड़े।लेकिन ऊपर नीचे भी खूब आते जाते थे।   

9 टिप्‍पणियां:

Kuldeep Thakur ने कहा…

आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 25/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
सूचनार्थ।

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ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही उपयोगी जानकारी, आभार.

रामराम.

आशीष भाई ने कहा…

आदरणीय , आपके सुंदर लेख से प्रभावित , टिप्पणियों का मन करता हैं , ये तो प्रेम की बात है सर , टिप्पणियाँ तो केवल एक बहाना हैं , जिसका उद्देश्य केवल अपनो को मनाना हैं , ( कारण - सबमें उसी का अंश हैं। ) धन्यवाद।
॥ जै श्री हरि: ॥

आशीष भाई ने कहा…

आदरणीय , बहुत महत्वपूर्ण जानकारी , धन्यवाद
॥ जै श्री हरि: ॥

Digamber Naswa ने कहा…

कुर्सी से चिपकना खतरनाक ... कहीं नेता गज़ल न समझ में ... हा हा ...
बाकी विटामिल डी तो जरूरी है ही सबके लिए ... नहीं तो टांगों, बदन में दर्द शुरू हो जाता है ... भुगता है मैंने ... राम राम जी ...

Vikesh Badola ने कहा…

हिलना-डुलना जरुरी हो गया है। आधुनिक एसी कक्ष लोगों को बीमार बना रहे हैं। पढ़ने-लिखने को भी काश कार्यालय या घरों में सब जगह ऐसे स्‍थान हों जहां धूप,प्राकृतिक रोशनी, हवा इत्‍यादि बराबर आए तो क्‍या बात है! लेकिन पूंजीगत शोषण इन बातों का ध्‍यान नहीं रखता। उसे आदमी से ज्‍यादा उन मशीनों की चिंता है जिन्‍हें आदमी चलाता है।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

ये बातें हमें सच में स्वस्थ रख सकती हैं ..... इनसे जुड़ना ज़रूरी है ....

रविकर ने कहा…

बढ़िया है आदरणीय-
आभार -

Anita ने कहा…

अंतिम साँस तक सजग रहना है तो व्यायाम को जीवन में प्रमुखता देनी ही होगी...