सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

ऐसी क्या मजबूरी है मायनो खिलौना बने रहने की ?

नौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज़ को चली  

भूपेंद्र सिंह हुड्डा  पहले तो हरयाणा में आग लगवाके जमालो बने तमाशा देखते रहे। वाड्रा से नजदीकी और हमदर्दी के लिए जाने जाने वाले शातिर हुड्डा पहले तो एंटोनियो मायनो उर्फ़ सोनिया गांधी और उनके मंदमति शहजादे की शह पर हरयाणा को सुलगवाते रहे अब अनशन पर बैठने का ढोंग रच रहे हैं।

क्या बरखा जब कृषि सुखाने 

जां बाज जाट कौम को पहले तो चूढ़ों चमारो के साथ मिलकर प्रदेश में गैर -जाटों की संपत्ति को लूटने और आग के हवाले करने के लिए ये प्रदेश के दिखाऊ रहनुमा उकसाते रहे अब अभिनय कर रहें हैं अजिटेशन वापस लेने और आरक्षण के दावानल को रोकने का। जबकि प्रदेश को बेहद की आर्थिक हानि उठानी पड़ी है। कौम के राष्ट्रवादी ज़ज़्बे को आंच लगी है।

एक स्वतंत्रता सैनानी के परिवार से ताल्लुक रखने वाले इस शख्श ने जिसे हरयाणा ने सिर आँखों पर बिठाए रखा अपने प्रांत और कौम की साख पे ही बट्टा लगा दिया।ऐसी क्या मजबूरी है मायनो खिलौना बने रहने की ? 

1 टिप्पणी:

Digamber Naswa ने कहा…

साजिश् है ये दूर की ... असल मकसद मोदी को हिलाना है ...