रविवार, 22 अप्रैल 2012

जीवन की नश्वरता के बारे में सोचना स्वास्थयवर्धक

जीवन की नश्वरता के बारे में सोचना स्वास्थयवर्धक

जीवन की नश्वरता के बारे में सोचना स्वास्थयवर्धक 

माली आवत देख कर कलियाँ करें पुकार ,

फूली फूली चुन लई काल(कल्ल) हमारी बार .

कागा सब तन खाइयो ,चुन चुन खइयो मांस 
दो नैना मत खाइयो ,पीव (पिया) मिलन की आस .

 मौत का चिंतन स्वास्थ्य चेतना को बढाता है .हमें हमारी प्राथमिकताओं का पुनर -आकलन ,पुनर -निर्धारण करने का मौक़ा देता है .हम अपने लक्ष्य और जीवन में हासिल के प्रति सचेत हो जाते हैं .मूल्य बोध की समीक्षा करने लगते हैं .

आये हैं सो जायेंगे ,राजा रंक फ़कीर 
एक सिंघासन चढ़ी चले ,एक बंधे जंजीर .

कभी कभार किसी की मैयत में शरीक होना ,शमशान का रुख करना ,या  यूं ही किसी कब्रगाह का रुख करना  सोच के घोड़ों को नै दिशा देता है .

प्राणी खाली हाथ आया है रे ,
बंदे खाली हाथ जाएगा .

किसी का भला करने की सोचने लगते हैं हम .दार्शनिक हो उठते हैं .

बालक जब पैदा होता है उसकी मुठ्ठी बंद होती है .मुठ्ठी में कैद होती है उसकी तकदीर और जब  शरीर छोड़ता है ,खाली हाथ जाता है .

कफ़न में जेब नहीं होती .

ये तमाम बातें मौत का चिंतन करना हमें कुछ अच्छा करने के लिए उकसाता है .

दुनिया में आया है तो फूल खिलाये जा ,आंसू किसी के लेके खुशियाँ लुटाये जा .

छोटी सी ज़िन्दगी है हंसके गुज़ार दे ,अपनी बिगाड़ के भी और की संवार दे ....

हाल में संपन्न कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों के पुनर -मूलांकन विश्लेषण से यही ध्वनी निकलती है मृत्यु का बिना सचेत रहे भी चिंतन करना  परहित के लिए उकसाता है .

परहित सरस धर्म नहीं भाई !

मौत का एक दिन मुऐयन है ,नींद क्यों रात भर नहीं आती -ग़ालिब साहब कहा करते थे .

पूर्व में संपन्न शोध के नतीजे ठीक इसके उलट थे .समझा जाता था ,मृत्यु का चिंतन विनाशक सिद्ध होता है 

,विध्वंस को प्रेरित करता है .लालच को जन्म देता है .पूर्वाग्रह ग्रस्त करता है व्यक्ति पर इसका उलटा असर होता है .

हानि पहुंचाता है व्यक्ति चेतना को मौत का विचार .

लेकिन अब ऐसा नहीं समझा जाता .

राम राम भाई राम राम भाई राम राम भाई !

डिप्रेशन के रोगनिदान (शिनाख्त ,निशान देही) के लिए रक्त परीक्षण(ब्लड टेस्ट )

डिप्रेशन के रोगनिदान (शिनाख्त ,निशान देही) के लिए रक्त परीक्षण(ब्लड टेस्ट )
रिसर्चरों ने अवसाद की शिनाख्त के लिए एक ब्लड टेस्ट विकसित करने की दिशा में एक डग और भर लिया है .पता लगाया जा सकेगा खून की जांच से कि  व्यक्ति अवसाद से पहले से ही ग्रस्त चला आ रहा है या नहीं .
अमरीका की नोर्थ वेस्ट्रन यूनिवर्सिटी के माहिरों की एक टीम ने आदमी के खून में  ११ ऐसे नए रसायनों (केमिकल मार्कर्स )की पहचान कर ली है जिनका सम्बन्ध मनो -विकारों से जुड़ता है .
राम राम भाई राम राम भाई राम राम भाई !

शहरी जीवनशैली  भारतीयों के दिल को नुकसान पहुंचा रही है .एक तो धमनियां जनमना महीन लेकर पैदा होतें हैं भारतीय दूसरे दिल के लिए आनुवंशिक जोखिम खानपान में फल और तरकारियों से बढती दूरी कसरत का अभाव तथा चिकनाई सनी खुराक दिल की सेहत को बद से बदतर बना रही है . दिल की बीमारियों के लिए जोखिम का वजन ऐसे में बढ़ता ही जा रहा है .यही लब्बोलुआब है एक अध्ययन का .
दुबई  में संपन्न World Congress of Cardiology के तत्वावधान में यह अध्ययन ज़ारी किया गया है जिसमे बताया गया है आज पांच में से चार भारतीयों की दैनिकी आम जन -जीवन से व्यायाम नदारद है .आधे भारतीय चिकनाई से ज्यादा (High fat diet)सनी खुराक ले रहें हैं .
इन्डियन   हार्ट   वाच  (Indian Heart Watch,IHW) ने  11 शहरों  के  6000 औरत  और  मर्दों के दिल की बीमारियों से ताल्लुक रखने वाले जोखिम तत्वों ,रिस्क फेक्टर्स  का जायजा लिया है .तमाम रिस्क फेक्टर्स का मूल्यांकन किया है .
पता चला दिल की बीमारियों के लिए जोखिम का वजन आज भारतीयों में समृद्ध विकसित दुनिया के देशों के बरक्स ज्यादा बढ़ा हुआ है .भारतीय दिल के लिए सौ जोखों मुह बाए खड़े हैं .
अमरीका और पश्चिमी योरोप के देशों के बरक्स यहाँ दिल का हाल बेहाल है .
इंडियन हार्ट वाच ने जीवन शैली में पसरी तीन बातों पर ख़ास गौर किया है -
(१)फिजिकल एक्टिविटी (दैनिक सक्रियता ,कसरत आदि )
(२)खुराक 
(३)धूम्रपान 
अलावा इसके मोटापा जैसे जैविक कारकों ,मधुमेह ,उच्च रक्त चाप आदि को भी आकलन विश्लेषण में लिया गया है .
पता चला भारत के छोटे नगरों कस्बों में भी धूम्रपान ज़ोरों पर है पहले से कहीं ज्यादा लोग इस दुर-व्यसन की लपेट में हैं .
सन्दर्भ -सामिग्री : Indian Heart Watch ('06-10)
Surveysize:6000 men and women from 11 cities 
Female
Physically inactive      83%  ,   High fat diet       48%   Low fruit intake  57%  Smoked 0.5% ,Overweight 45%, High blood pressure 30%  ,High cholesterol 25%
Male 
Physically inactive        79% ,High fat diet 51%  ,Low fruit intake 50%,  Smoked  12%, Overweight 41%,  High blood pressure 33% ,  High cholesterol 25%
We have weaker hearts than Americans :Study/THE TIMES OF INDIA,MUMBAI ,APRIL 21,2012 ,FRONT PAGE
      
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जानिये अपने स्पर्म की सेहत का हाल

जानिये अपने स्पर्म की सेहत का हाल 
Sperm Patrol 
Taking care of your family jewels will ensure that when the right time comes , you don't fire blanks/MUMBAI MIRROR APRIL 20,2012,P25

चलिए पहले जानते   हैं स्पर्म (शुक्र )है क्या ?
पुरुष के प्रजनन अंगों(खासकर अन्डकोशों में ) में बनने  वाला कोशाणु (जो स्त्री के अंडे से मिलकर शिशु को जन्म देता है ) शुक्राणु कहाता है . यह वह तरल है जिसमें मौजूद रहता है वीर्य ,शुक्र .शुक्र में होतें हैं शुक्राणु .

SPERM:Sperm is the contracted form of spermatozoa(spermatozoon)
Sperm is a cell that is produced by the sex organs of a male and that can combine with a female egg to produce young .
The  whitish  liquid that is produced by the sex organs that contain these cells is also called the semen.
Spermatozoon is a male reproductive cell (gamete).It has an oval head with a nucleus ,a short neck and a tail by which it moves to find and fertilize an ovum( a female egg, a female reproductive cell). 
एक   अनुमान  के  अनुसार भारत में १५% दम्पति संतान हीन हैं .पुरुष भी होतें हैं बांझ . संतानहीनता के लिए इस १५ % के  आधे यानी साढ़े साथ   फीसद बांझपन के लिए मर्द उत्तरदाई हैं .  
औरतों की बायलोजिकल क्लोक की अकसर बात की जाती है .आवधिक चक्र होते हैं महिलाओं की फर्टिलिटी /सन्तान उत्पत्ति क्षमता  के .
मर्दों  में चालीस  की उम्र  के पार स्पर्म के ड़ी.  एन . ए. टूटने  लगते हैं विखंडित होने लगतें हैं .इस फ्रेगमेंटेशन के फलस्वरूप स्पर्म के गर्भाधान कराने ,औरत को गर्भवती बनाने के मौके छीजने लगते हैं .
आजकल तीस के पार भी मर्दों में स्पर्म की सेहत को लेकर समस्याएं आने लगतीं हैं .

केरियर परिवार नियोजन को पीछे धकिया देता है . 

विश्व्स्वास्थ्य संगठन के मानक निर्देशों के अनुसार दो मिलीलीटर सिमेन वोल्यूम में स्पर्म की तादाद (स्पर्म काउंट )दो करोड़ (२० मिलियन ) होनी चाहिए .अब से १०-२० साल पहले तक यही मानक ४-५ करोड़ प्रति दो मिलीलीटर रखा गया था .यही मानक था स्पर्म हेल्थ का .

शहरी रहवास से असर ग्रस्त जीवन शैली ,शहरी खान- पान  , हमारी हवा और हमारे पीने नहाने  के पानी का गन्धाना ,संदूषित  होते चले जाना ,दूध में तरह तरह की मिलावट  का पैर पसारते चले जाना स्पर्म की सेहत को छलनी   करता  चला  गया है गुजिस्ता सालों में .
क्या मतलब है स्पर्म की सेहत से ?

 माहिरों के अनुसार तीन चार बातें एहम रहतीं हैं जिन पर गौर किया जाता है शुक्र की  सेहत का आकलन करते वक्त.

(१)स्पर्म काउंट (शुक्र तादाद /प्रति इजेक्युलेट )
( २ )मोटिलिटी (गति अथवा गत्यात्मकता ,मूवमेंट )
(३) आकृति विज्ञान (शुक्र का आकार और बनावट /बुनावट )
(४ )टोटल वोल्यूम ऑफ़ इजेक्युलेट (प्रति स्खलन वीर्य का आयतन )

आपकी जीवन शैली से जुडी है शुक्र के स्वास्थ्य की नव्ज़ 

यदि आप गर्म माहौल में काम करते हैं (इंजन में कोयला झोंकने का काम ,भट्टी पर देर तक बैठके काम करना जैसे हलवाईगिरी ,या फिर आपका विषाक्त पदार्थों से सने माहौल में काम करना मसलन किसी रासायनिक कारखाने में काम करने की मजबूरी ) तब आपका स्पर्म काउंट गिर सकता है .
देर तक "सौना बाथ" लेना ,स्टीम बाथ लेना ,40 सेल्सियस  तापमान  वाले  वाटर टब में आधा घंटा से ज्यादा समय बिताना भी स्पर्म काउंट को कम कर  देता है .लैप टॉप गोद में रखके काम करना दूसरी वजह है इसमें कमी दर्ज़ होने की . 
देर तक साइकिल चलाना स्क्रोतम(अन्डकोशों ) के तापमान को बढ़ा सकता है जबकी इसका तापमान शेष शरीर से थोड़ा कम ही रहना होना चाहिए .ढीले ढाले अंडर वीयर ही पहनिए .जैसे बोक्सर पहनते हैं वही बढिया .बने भी सूती कपडे के होने चाहिए . देर तक एक जगह बैठके काम करना भी ठीक नहीं है स्क्रोतम की सेहत के लिए .
देर तक मोटर साइकिल का सफर भी मुफीद नहीं है (संदीप जाट गौर करें रास्ते में ब्रेक लेते रहें ).ड्राइवरी भी,
कंडक्टर का देर तक बोनट पे बैठ के सफर करना ड्राइवर से बतियाते चलना वैसे भी ठीक नहीं है .

सीरम अनेलेसिस टेस्ट करवाएं 

समय समय पर रोगनैदानिक जांच केन्द्रों पर/ निजी लेब्स में यह जांच करवाएं . अपने शुक्र की सेहत का हाल जानते चलें .कितने मर्द हैं आप .आप अपनी बीवी से क्या सचमुच प्यार करतें हैं ?

माहिरों के अनुसार स्पर्म बेंक से ९०-९५ % दाताओं को कई वजहों से वापस लौटा दिया जाता है .

(१) उम्र बीस से तीस साल होने के अलवा दाता (डोनर )का बुद्धि कोशांक भी ठीक ठाक होना चाहिए .बेचुलर होना ज़रूरी रहता है .पढ़ा लिखा होना भी .
(२)बीडी ,सिगरेट, शराब ,पान मसाला ,गुटका ,खैनी ,नशीली दवा का सेवन करने वालों को दूर ही रखा जाता है स्पर्म बेंकों से .
इन बातों के अलावा स्पर्म की गुणवता पर भी गौर किया जाता है .अकसर मैथुन करते रहने से स्पर्म भी रिन्यू होता है ताजगी लेता रहता है .पुराने की जगह नया शुक्र लेता रहता है .हालाकि बहुत ज्यादा मैथुनी होना भी ठीक नहीं स्पर्म काउंट कम रह जाता है .स्पर्म की गुणवता के लिए एक दो दिन के अंतराल के बाद ही सेक्स किया जाना चाहिए .ऐसे  में स्पर्म की सघनता और घनत्व (डेंसिटी )भी बरकरार रहती है .यही कहना है माहिरों का .

स्पर्म की गुणवता में सुधार के लिए 

जिंक बहुल खाद्यों यथा केला ,बादाम ,शेल फिश ,खाद्य शंख मीन ,(ओईस -टर  )आदि का सेवन टेस्ता- स्टेरान संश्लेषण को बढाता है .स्पर्म काउंट ,मोटि- लिटी तथा स्पर्म वोल्यूम  प्रति इजेक्युलेट  भी बढाता है .पोषण विज्ञान के माहिरों के नुसार विटामिन ए  बहुल खाद्य (गाज़र ,दूध ,चीज़ ,अंडा ),विटामिन सी युक्त खाद्य (संतरे ,स्ट्राबेरीज़ ,ब्रोक्कोली ),तथा विटामिन ई (मूंगफली ,पालक ,बादाम ,चीनिया/पहाड़ी  बादाम ,पिंघल फल ) शुक्र के स्वास्थ्य को आदर्श बनाते हैं .
सेलीनियम का जिन चीज़ों में डेरा है ,मसलन लहसुन ,लाइकोपीन   युक्त अमरुद ,टमाटर तथा तरबूज आदि   स्पर्म की ओक्सी -डेतिव नुकसानी (Oxidative damage) को नियंत्रित  रखते हैं ,कम करते हैं .

  
   
 
     
 
  

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

जानकारी :लेटेन्ट ऑटो -इम्यून डायबिटीज़ इन एडल्ट्स

जानकारी :लेटेन्ट ऑटो -इम्यून डायबिटीज़ इन एडल्ट्स
(Autoimmune diabetes in adults ,LADA)
डायबिटीज़ के कुछ डायागनोजड (रोग निदान से पुष्ट ) मामले वास्तव में लाडा(LADA) के हो  सकते  हैं  . 
कुछ लोग पतले  दुबले छरहरे हो सकतें हैं ,पचास से नीचे की भी ज़रूरी नहीं है इनके परिवार में भी डायबिटीज़ टाइप २  का  पूर्व वृत्तांत रहा आया हो ,तौल भी इनका कद काठी के अनुरूप हो सकता है ,एक्टिव भी हो सकतें हैं ये लोग लेकिन इनके शरीर में कुछ ख़ास एंटीबॉडीज की मौजूदगी एक ऑटोइम्यून रेस्पोंस की इत्तला दे सकती है .
दो से ज्यादा टाइप्स हैं डायबिटीज़ की :
लाडा एक ऐसी चिकित्सा शब्दावली है जिसका इस्तेमाल बालिगों में स्लो -मूविंग -टाइप-१ डायबिटीज़ के लिए किया जाता है .पूर्व में टाइप -१ का सम्बन्ध बालकों से ही जोड़ा जाता था इसीलिए इसे जुवेनाइल डायबिटीज़ भी कह दिया जाता था .
लेकिन इधर जब बालकों में टाइप -२ भी दिखलाई    दिया तब   रिसर्चरों  का माथा  ठनका  .पता चला टाइप -२ सिर्फ बालिगों तक और टाइप -१ सिर्फ बालकों तक सीमित नहीं हैं .टाइप -२ बालकों को और टाइप -१ बालिगों को भी हो सकता है .
बालिगों  में एक सब साईट मौजूद है जिनमें रोग निदान के बाद टाइप -१ डायबिटीज़ की पुष्टि हुई है .
अपनी डायबिटीज़ टाइप -२ को संदेह से देखिये कहीं यह लाडा तो नहीं यदि -
(१)यदि आपकी उम्र पचास से कम है .
(२)कद काठी के अनुरूप आपका तौल मान्य सीमाओं में है . आप खासे सक्रीय भी रहतें हैं अपनी दैनिकी में .

(३)आपके परिवार ऑटोइम्यून डिजीज का पूर्ववृत्तांत है यथा थायरोइड से सम्बन्धी समस्याएं ,र्युमेटोइड आर्थ -राइटिस  आदि .
(४)आपके परिवार में डायबिटीज़ -२ का इतिहास  नहीं रहा है .  
(५)आपको इंसुलिन शोट्स ही लेने पडतें हैं क्योंकि अन्य उपचार (ओरल -एंटी -डायबेटिक -मेडिकेशन ) आप पर काम नहीं कर रहें हैं .इन अन्य उपचारों को लेते रहने पर भी आपकी ब्लड सुगर में उछाला आता रहता है .
लाडा को अकसर  टाइप -२ मान   समझ   लिया    जाता है .रोगनिदान में गलती रह जाती है . 
आम  तौर  पर डायबिटीज़ के ज्यादातर  मामले टाइप -२ के ही होतें  हैं .
अमरीकी  सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन(CDC) के अनुसार अमरीका में जिन लोगों को डायबिटीज़ है उनमे से ९०-९५ फीसद मामले टाइप -२ के ही हैं . उच्च रक्त शर्करा वाले ज्यादातर बालिग़ इसी बहुलांश(बहुसंख्यक वर्ग ) का हिस्सा हैं .  
लेकिन जो लोग लाडा से ग्रस्त हैं वे इस टाइप -२ प्रोफाइल में फिट नहीं होते .
लाडा की चपेट  में होने  रहने का संदेह क्लीनिकली  उन  लोगों पर किया जाता है जो छरहरे हैं पचास से कम उम्र के हैं और जिनके  परिवार में टाइप -२ डायबिटीज़ का इतिहास भी नहीं है . लेकिन उपचार टाइप -२ डायबिटीज़ का LE रहें हैं .लेकिन सभी  स्वास्थ्य  देख रेख मुहैया करवाने वाले कर्मी  इन संदेहों  को तूल  नहीं देते  .नतीजा  होता  है अशुद्ध  रोग निदान ,गलत  रोग निदान ,इनेक्युरेट  डायगनोसिस  ,मिस  -डायगनोसिस .
कैसे उपचार किया जाता है लाडा का ?
LADA is treated like type 1 and   type 2
लाडा एक ऑटोइम्यून डिजीज है जिसमे शरीर अपने पराये का  भेद भूलकर बीटा कोशिकाओं को नष्ट करने लगता  है .अग्नाशय (Pancreas)में इंसुलिन यही बीटा कोशायें तैयार करतीं हैं .
लेकिन   टाइप   -1 के मरीजों की तरह  लाडा के मरीजों को रोग निदान के शुरूआती चरण में अकसर इंसुलिन की ज़रुरत नहीं पड़ती है .टाइप १ के बरक्स यहाँ रोग धीरे धीरे बढ़ता है .इम्यून प्रक्रिया टाइप  १ की तरह क्षिप्र नहीं होती है .लाडा के मरीजों में कुछ इंसुलिन रेजिस्टेंस तो दिखलाई दे सकता है लेकिन इनके अग्नाशय में बीटा सेल्स दिखलाई देती रह सकतीं हैं .टाइप २ की तरह इनका इलाज़ भी ओरल एंटी -डायबेटिक पिल्स के साथ शुरू किया जा सकता है . लेकिन धीरे धीरे इनकी एंटीबॉडी सेल्स और बीटा कोशाओं को नष्ट करने लगतीं हैं .ऐसे में इंसुलिन का स्तर डावांडोल होजाता है और इंसुलिन चिकित्सा ज़रूरी  हो जाती  है .
कहानी यही ख़त्म नहीं होती 
Misdiagnosis is not the end of the world
  आखिरकार (अंतत :)लाडा के मरीजों का इंसुलिन बनना बंद हो जाता है .हनी - मून  पीरियड  समाप्त  हो जाता है .यह  वह  अवधि  है जब  रक्त  शर्करा  इंसुलिन चिकित्सा के बिना  भी काबू  में आजाती  है .यह एक साल  या  और भी लम्बी  हो सकती   है .  
इंसुलिन चिकित्सा पर आने से पहले मरीज़ को तीन साल तक भी एंटी -ओरल -डायबेटिक पिल्स दी जाती रह सकतीं हैं .माहिरों के अनुसार उनके पास बिला शक ऐसे मरीज़ भी आते हैं जो लाडो से ग्रस्त रहते हुए भी इंसुलिन बना रहे होतें हैं .यह इंसुलिन बनाते रहने की अवधि अनेक (कितने ही )साल की   हो सकती है .लेकिन हनीमून  पीरियड बीत जाने के बाद खुराक कसरत और गैर -इंसुलिन चिकित्सा के चलते भी रक्त शर्करा में उछाला आता रहता है यह नियंत्रित नहीं हो पाती है .
एंटीबॉडीज बहुत ज्यदा तादाद में बीटा कोशाओं को नष्ट कर डालतीं हैं ऐसे में एक ही उपाय रह जाता है -इंसुलिन ,इंसुलिन और इंसुलिन .
शुरू में ही सही रोग निदान हो जाए लाडो का तो बहुत सारी मुश्किलातें हल हो जाएँ .सही रोग निदान बेशक  भ्रम  और हताशा   से बचाए   रह सकता है .लेकिन ऐसा  न हो पाने  पर भी महत्वपूर्ण  बात  है ब्लड  ग्लूकोज़  पर नियंत्रण  बनाए   रहना  .कुशल प्रबंधन ज़रूरी है डायबिटीज़ का इंसुलिन से भले मरीज़ को लाडा हो न हो .ज़रूरी होने पर इंसुलिन चिकित्सा शुरू करने में संकोच नहीं होना चाहिए .
दुनिया समाप्त नहीं हुई है गलत रोग निदान से 
Misdiagnosis is not the end of the world
लाडा से ग्रस्त logon को गलत रोग निदान से हनीमून पीरियड बीतने के बाद हताशा घेर सकती है अपनी स्थिति के बारे में भ्रम पैदा हो सकता है .वह सोच सकते हैं आखिर डायबिटीज़ कम्युनिटी में उनका स्थान क्या है ,कहाँ है ? कई ओं लाइन फोरम की शरण में चले आते हैं ताकि लाडा के बारे में और अधिक जान सकें लाडा कम्युनिटी के साथ अपने संवेगों को सांझा कर सकें .
Misdiagnosis :
  People with LADA usually see a spike in glucose levels ,despite their efforts to control them with diet ,exercise ,and non -insulin medications.
अब  करें तो करें क्या ?
यदि आपको संदेह है की आप लाडा से ग्रस्त हो गएँ हैं तब -
(१)C-peptide टेस्ट  कराएं  ,पता  चल  जाएगा  आपका  अग्नाशय  कितना  इंसुलिन  बना  रहा     है   .  
(२)GAD antibody test :गेड एंटीबॉडी टेस्ट करवाएं .नतीजा पोजिटिव आने का मतलब होगा आपके शरीर में ऐसी  कोशायें मौजूद हैं जो आपके इम्यून सिस्टम (रोग रोधी  - तंत्र  ,रोगप्रतिरक्षा  प्रणाली  )को ही निशाने  पे ले रहीं  हैं . 
(३)ऐसे स्रावीतंत्र के  माहिर (Endocrinologist)के पास पहुँचिये जो लादा का भी माहिर हो .
(४) ऐसा न हो पाने के स्थिति  में  अपने रक्त शर्करा के स्तरों   और Hg A1C रिपोर्टों पर नजर रखिये .लक्ष्य पूरे न हो पाने  की स्थिति  में उपचार बदल दीजिये .
लादा से जुड़े अनेक सवाल अभी अन -उत्तरित हैं :
क्या  इसे  टाईप   १.५  डायबिटीज़  कहा जा सकता है ?
या फिर यह ठीक टाईप  १ ही है ?कुछ माहिरों के अनुसार इसे टाईप १.५  कहना इसलिए समीचीन नहीं है क्योंकि यह एक ऑटो -इम्यून डिजीज है .टाईप २ से इसकी नजदीकी बस इतनी ही है की इसका शुरूआती इलाज़ टाईप २ की तरह ही शुरू होता है .गैर इंसुलिन चिकित्सा से शुरू होता है .कुछ इससे  इत्तेफाक  न रखते  हुए  इसे टाईप २ के ही ज्यादा  नज़दीक  मानते   हैं .इनका तर्क है रिसर्च  ही लाडा  को टाईप १ से अलग रख रही  है .
टाईप १ जींस टाईप २ डायबिटीज़ के जींस से अलग हैं .
जो जीन लाडा में एहम भूमिका में है वह टाईप २ डायबिटीज़ जीन ही है .
दूसरी अनिश्चयता इसके (लाडा )के मरीजों की % को लेकर है .कुछ माहिर इसे कुल ९०-९५ %टाईप २ मरीजों  का ५% ,कुछ अन्य कुल मधुमेहियों का १०% बतला रहें हैं .रिसर्चरों के लिए असली समस्या इसका अंडर -डायगनोज्द बने रहना है .क्लिनिकल ट्रायल्स के लिए इनकी पापयुलेशन कहाँ से लाई जाए .असली समस्या यह है .
 

डिप्रेशन के रोगनिदान (शिनाख्त ,निशान देही) के लिए रक्त परीक्षण(ब्लड टेस्ट )

डिप्रेशन के रोगनिदान (शिनाख्त ,निशान देही) के लिए रक्त परीक्षण(ब्लड टेस्ट )
रिसर्चरों ने अवसाद की शिनाख्त के लिए एक ब्लड टेस्ट विकसित करने की दिशा में एक डग और भर लिया है .पता लगाया जा सकेगा खून की जांच से कि  व्यक्ति अवसाद से पहले से ही ग्रस्त चला आ रहा है या नहीं .
अमरीका की नोर्थ वेस्ट्रन यूनिवर्सिटी के माहिरों की एक टीम ने आदमी के खून में  ११ ऐसे नए रसायनों (केमिकल मार्कर्स )की पहचान कर ली है जिनका सम्बन्ध मनो -विकारों से जुड़ता है .

दिल की सेहत के लिए अच्छा है आशावादी बने रहना .

दिल की सेहत के लिए अच्छा है आशावादी बने रहना .
Be optimistic , cut heart attack risk/THE TIMES OF INDIA,BANGALORE ,APRIL 19,2012,P13
हारवर्ड स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ ने २०० अध्ययनों का पुनर -आकलन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि जीवन में आशावादी होना दिल के लिए अच्छा है .
खुशमिजाज़ खुश -बदन लोग अपने लिए दिल और दिमाग के दौरों (हार्ट एंड ब्रेन अटेक) के खतरे के वजन को कम कर लेते हैं . आम तौर पर इनका स्वास्थ्य भी बढ़िया रहता है .
भले चंगे होने का एहसास (सब ठीक ठाक है भाई सब ठीक ठाक है ,ओ भैया आल इज वेळ ) हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रोल के बढ़ने के खतरे को कम किये रहता है .मेरे साथ साथ सब ठीक ठाक है "मास्टर की" है .
सूचना के एक बड़े आगार एक व्यापक मेडिकल डाटा बेस से अध्ययनों को खंगाला गया .मनोवैज्ञानिक तौर पर मन से चंगा होने और हृदय तथा रक्त संचरण सम्बन्धी रोगों के परस्पर अंतर -सम्बन्ध  की पड़ताल की गई .(जैसा मन वैसा तन ).
पता चला जीवन में आशावाद ,संतोष (संतोषी प्रवृत्ति का होना ),ख़ुशी का एहसास ,खुश रहना दिल के लिए जोखिम तथा सर्क्युलेतरी दिजीज़िज़ के खतरे को कम कर सकता है .भले आपकी उम्र कुछ भी हो ,आर्थिक सामाजिक पृष्ठ भूमि कैसी भी रही आई हो , आपका तौल (वजन ) कुछ भी रहा हो ,आप धूम्र पान करते हों न करते हों ,जीवन के प्रति आशावादी सकारात्मक नज़रिया आपको लाभ मुहैया करवाता है लाभ भी ऐसे जिनका सम्बन्ध आपकी सेहत से है .  

पानी पीकर दाखिल होइए परीक्षा भवन में .

पानी पीकर दाखिल होइए परीक्षा भवन में .
Drink water before exam ,improve your grades/THE TIMES OF INDIA ,BANGALORE,APRIL 19,2012P13.
रिसर्चरों के अनुसार सिर्फ एक ग्लास पानी का सेवन परीक्षा में आपके प्रदर्शन आपके ग्रेड को १०% तक सुधार सकता है बरक्स उनके जो ऐसा नहीं करते हैं .परीक्षा से ठीक पहले चाय या कोफी, कोला पेय आदि  पीना भी उतना ही लाभ दिलवा सकता है .एक नवीन अध्ययन की यही ध्वनी है .
समझा जाता है पानी का इस्तेमाल दिमागी कोशिकाओं (न्युरोंस )के बीच संवाद को सहज बना देता है सूचना का प्रवाह रफ़्तार पकड़ लेता है कोशा दर कोशा ,न्यूरोन टू न्यूरोन .
एक तरह से जल सींचित होने के बाद न्युरोनों की  चार्जिंग हो जाती है .पानी पीने से चित्त शांत हो जाता है .नसें शांत हो जाती है .जबकी परीक्षा के दौरान प्यास के मारों का ध्यान भंग होने लगता है .संचित सूचना उनकी स्मृति में ठीक से नहीं आपाती .
अध्ययन में सैंकड़ों छात्रों का जायजा लिया गया .देखा गया कौन परीक्षा भवन में ड्रिंक्स ले जाता है कौन नहीं .और इसका इनके ग्रेड पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी परखा गया .इनके पर्दर्शन की तुलना उन छात्रों से की गई जो परीक्षा भवन में ड्रिंक्स लेकर नहीं गए थे . 
ड्रिंक्स ले जाने वाले छात्रों का प्रदर्शन औसतन ५% बेहतर दर्ज़ किया गया .

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

कोणार्क सम्पूर्ण चिकित्सा तंत्र -- भाग दो


कोणार्क  सम्पूर्ण  चिकित्सा  तंत्र           
                         
--   भाग दो –


ब्रांड्स  अकादमी  कर्नाटक  द्वारा प्रदत्त Best Holistic Centre In Bangalore के Service Excellence  Award, 2011 से सम्मानित कोणार्क सम्पूर्ण चिकित्सा तंत्र ( KSCT - CURE FOR INCURABLES ) के खोजकर्ता व निदेशक शेखर जेमिनी से एक लम्बी बातचीत पर आधारित रिपोर्ताज :


KSCT किन अर्थों में सर्वथा नवीन मौलिक, सुरक्षित, निरापद एवं रोगों का समूल नाश करने वाली पद्धति है ?

KSCT के अनुसार शरीर में उत्पन्न व्याधि के तीन प्रमुख कारण / प्रकार इस प्रकार हैं :

( १ )       अनुवांशिक / खानदानी (GENETIC /HEREDITARY)
( २ )     बाहरी संक्रमण
( ३ )      जीवन शैली

इनमें से  जब किसी  भी  कारण  से  शरीर में मौजूद प्राकृतिक रंग-संयोजन (spectrum) का अनुपात बदल जाता  है तो बीमारी आती है । सभी स्वस्थ जीव-धारियों में रंगों का ये संयोजन प्रकृति में मौजूद रंग-संयोजन का हू-ब-हू  प्रतिरूप है | यह रंग-संयोजन सभी जीवित पदार्थों से ये उत्सर्जित होता रहता है और उसे एक अलग शख्शियत, पहचान तथा वैशिष्ट्य प्रदान करता है | साथ ही, उसके वर्तमान स्वास्थ्य की अवस्था की भी आधारभूत प्रामाणिक जानकारी देता है | इस  वर्तमान स्वास्थ्य की अवस्था के रंग-संयोजन का अध्ययन करने के लिए बहुत सारे माध्यम हैं । उनमें BODY FLUIDS मसलन रक्त, मूत्र, वीर्य, अस्थि मज्जा, अश्रु, लार, पसीना इत्यादि सर्वाधिक व्यावहारिक और प्रामाणिक हैं । यूँ व्यक्ति विशेष के अँगूठे  का निशान व उसका छाया चित्र भी प्रिज्म (Prism)   के माध्यम  से  उसके रंग-संयोजन  की  कुछ  हद  तक  जानकारी  दे  सकते हैं ।

KSCT के द्वारा इसी रंग-संयोजन का आवश्यकतानुसार उपरोक्त माध्यमों से विषद अध्ययन किया जाता है तथा रोग के कारण प्रभावित, रोगी के शरीर की वर्तमान स्वास्थ्य दशा का पता लगाया जाता है । इसके  बाद उस  रोगी विशेष तथा उसके रोग विशेष की दवा का  फोर्म्युलेशन (सूत्रीकरण ) तैयार किया जाता  है और फिर अंतत: उस सूत्रीकरण से उस रोगी एवं रोग विशेष की अत्याधुनिक पद्धति से दवा का निष्पादन किया जाता है ।

क्योंकि KSCT दुनिया की ऐसी पहली व एकमात्र चिकित्सा पद्धति है जो दवाई का उत्पादन शत-प्रतिशत व्यक्ति विशेष के लिए करती है, जिसके कारण यह दवाई सर्वाधिक प्रभावी, सटीक और किसी भी पार्श्व  प्रभाव  से मुक्त रहती है । अर्थात KSCT का  एक  मात्र  दावा  यही  है   कि  उसकी दवा  किसी भी हानिकारक प्रतिक्रिया से मुक्त रहते हुए रोग को समूल नष्ट करने की दिशा में कार्य करती है |


 जिन बीमारियों का अब तक KSCT के  अंतर्गत सफलता पूर्वक उपचार हुआ है, उनमे से कुछ इस प्रकार हैं :

( १ )    Diabetes : Type 1 and 2
( २ )      HIV+ संक्रमण
( ३ )     All cancers - मुख्यत: सभी प्रकार  के Blood Cancers
( ४ )      Chronic renal failure ( Kidney failure, Nephritis )
( ५ )     Rheumatism ( Rheumatoid Arthritis )
( ६ )     SLE ( Systemic Lupus Erythematosus )
( ७ )     ILD ( Interstitial Lung Disease )
( ८ )     Almost all skin diseases ( सभी  चमड़ी रोग )
( ९ )      Hair Problem
( १० )    Endocrinological Problems ( स्रावी तंत्र से जुड़ी समस्याएँ)
( ११ )     Kidney, Gall Bladder and Liver Stones
( १२ )     Spondylitis
( १३)      Piles ( बवासीर )
( १४ )     Jaundice / Hepatitis
( १५ )    Erectile dysfunction ( लिंगोथ्थान  अभाव )  
( १६ )    Premature ejaculation and  Infertility
( १७ )    Asthma ( दमा )
( १८)      General allergies and  respiratory problems
( १९)      Parkinson’s disease
( २० )    Sciatica Pain
( २१ )     Varicose Veins
( २२ )    Oligospermia
( २३ )    Hydrocephalus
( २४ )    Multiple sclerosis
( २५ )    Seizure disorder ( Epilepsy )
( २६ )    Macular degeneration
( २७ )    Cataract
( २८ )    Glaucoma
( २९ )    Digestive Problems and Constipation


KSCT के अंतर्गत किसी भी  बीमारी  के इलाज़ की न्यूनतम एवं संभावित अधिकतम अवधि कितनी रहती है ?

साधारण तथा सामान्य बीमारियों यथा पाचन सम्बन्धी, कब्ज़, बालों का झड़ना, चमड़ी की एलर्जी इत्यादि की चिकित्सा के लिए न्यूनतम अवधि कम से कम ४ से  ६ महीने तक तथा जटिल रोगों की चिकित्सा के लिए न्यूनतम अवधि १ से २ वर्ष तक ।

संपर्क सूत्र :

KSCT - CURE FOR INCURABLES
NO.144, FIFTH CROSS, BHEL LAY OUT, AMBA BHAVANI ROAD,
(NEAR SAMBHRAM INSTITUTE OF TECHNOLOGY - VIA M.S.PALYA),
VIDYARANYAPURA POST 
BANGALORE-560-097


Phones : 8065701791, 9341260175, 8023648487

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Virendra Kumar Sharma ( Veerubhai )