शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

क्या है सइनटून और सइंटोनिक्स (Scientoon and Scientoonics )विज्ञानटून और विज्ञानटूनिकी ?

क्या है सइनटून और सइंटोनिक्स (Scientoon and Scientoonics )विज्ञानटून 

और विज्ञानटूनिकी ?

एक आम आदमी की जुबान  में  कहें तो इसका अर्थ होगा -कार्टून बोलता है और विज्ञानटून और तेज़ी और फुर्ती के साथ न सिर्फ बोलता है ,मनोरंजन भी करता है विज्ञान -विनोद भी कह सकते हैं आप इसे। भौतिक विज्ञानों की बुनियादी बातों को रसमय एवं विनोदपूवर्ण बनाकर हमारे दिमाग में बिठा देता है 'विज्ञान -टून' . ललित कलाओं और विज्ञान का यह अद्भुत संगम है जिसमें अपने हुनर के हिसाब से विज्ञानकॉर्टून  -कार कम्प्यूटर ग्रॅफिक्स के अलावा कम्प्यूटर एनिमेशन को भी आज़माता है। 

आश्चर्य नहीं दुनियाभर के मदरसे  शिक्षण की इस अभिनव विधा को अपना रहें हैं और श्रीवास्तव साहब को ग्लोग ट्रॉटर (ग्लोबी घुमन्तु )कहा जाने लगा है।  
कार्टून विज्ञान प्रौद्योगिकी (कार्टूनिकी )से दुनिया का परिचय तब हुआ जब 

इसके अन्वेषक और पितामह रहें हैं प्रदीप कुमार श्रीवास्तव(पूर्व उप - निदेशक एवं मुख्य वरिष्ठ विज्ञानी केंद्रीय औषध अनुसंधान संस्थान ,लखनऊ )राष्ट्रीय विश्वविद्यालय सिंगापुर के तत्वावधान में अपना एक विस्तार भाषण प्रस्तुत कर रहे थे। यह आपका पहला भाषण था और आपके ही शब्दों में एक नीरस विषय से ताल्लुक रखता था :"विकाशशील देशों में दवाओं का विकास एवं भेषज उद्योग,दशा और दिशा। "प्रबंधकों ने आपको बतलाया आपको अपनी प्रस्तुति के लिए दस मिनिट दिए जाते हैं। 

यही वह इनकी ज़िंदगी  का विधायक क्षण था जिसमें कार्टून इनके सशक्त मददगार बनकर आये। आपकी रचनात्मकता को जैसे उस वक्फे में पंख लग गए थे। सम्मोहित सभा आपको न सिर्फ ४५ मिनिट तक मंत्रमुग्ध होकर सुनती रह गई आपके भाषण को रजत पुरूस्कार से नवाज़ा गया। मौक़ा था सन १९८८। 






सन्दर्भ -सामिग्री :http://scientoon.com/index.php/awards.html

(2 )https://bettersciencejournalism.wordpress.com/2010/06/03/the-scientoon-man-learn-science-through-cartoons/


  

मूस बिलाई एक संग, कहो कैसे रह जाय , अचरज एक देखो हो संतों, हस्ती सिंह ही खाय।

कबीर इस बारहवीं रमैनी में माया -मोह, मन का राग रंग सबको  त्यागने की बात प्रतीकात्मक  ढ़ंग से कहते हैं। देखिये कुछ बानगियाँ :

माटी के कोट पसान को  ताला,

सोइ एक बन सोइ रखवाला। 

शब्दार्थ :पसान (पाषाण ),कोट (किला )

कबीर कहते हैं यह शरीर तो वैसे ही जड़ है जड़ तत्वों का जमा जोड़ है हवा पानी  मिट्टी, आकाश और आग का ही तो  इकठ्ठ है।इस पर जड़ पाषाण का ताला मत जड़। अपनी विवेक बुद्धि को पहचान अन्वेषण कर हित , अहित का। यह जड़ बुद्धि ही माया है। इस अविद्या ,माया के राग रंग रूप से तू मुक्त हो।  

सो बन देखत जीव  डिराना,

ब्राह्मण वैष्णव एक ही जाना।

बन (माया का जंगल ),ब्रह्मण - वैष्णव(कर्म कांड के धंधे बाज़ )

यह माया का जंगल माया का कुनबा तूने ही रचा है। यह तो जाना ही जाना है यह शरीर भी जाना ही जाना है बुढ़ापे से रोग से छीजना ही छीजना है। इससे क्यों भयभीत होता है यह तेरा निज स्वरूप नहीं है तेरा निज स्वरूप न कहीं  जाता है न कहीं से आता है तेरे ही साथ रहता है। लेकिन उस पर माया रुपी जंगल हावी रहता है। 

ज्यों किसान किसानी करिहि ,

उपजे खेत बीज नहीं परिहि।  

ये जो संतों की  भीड़ अनेक मत -मतांतरों के धर्म गुरुओं की खेती हो रही है इसमें तत्व की कोई बात नहीं बतलाता यह सब निरर्थक है उस खेती का क्या फायदा जिसमें फसल तो उगे लेकिन खेत में डंठल - डंठल  ही उगें। बीज न पनपे दाना न पनपे पौध में।ज्ञात हो इस दौर में धर्म का जितना प्रचार प्रसार इन कथित धर्म गुरुओं ने किया है उतना पिछले दस हज़ार सालों में नहीं हुआ था। फिर भी हासिल क्या है वही ढाक  के तीन पात। तत्व की बात कोई बतलाता ही नहीं है सारा फल खुद ही भोगना चाहता है।  

छार देव नर  झेलिक झेला ,

बूड़े दोउ  गुरु और चेला।

झेलिक झेला (धक्का पेल असत्य की तत्व  रहित ज्ञान की )

और कबीर जल्दी से ये भी कह देते हैं ये सारे ज्ञान की धका - पेल करने वाले ,पाखंडी गुरु खुद तो डुबेंगे ही अपने शिष्यों को भी संग ले डूबेंगे। 

तीसर  बूड़े  पारध भाई ,

जिन बन ढाहे  दावा(दवा ) लगाई।

बूड़े (डूब गए ); पारध (बहेलिया ,शिकारी ,पांखण्डी गुरु घंटाल );दवा (दावानल )

वह भी शिकारी की तरह नष्ट हो जाएंगे जो शिकार करने के लिए पहले तो सारे जंगल को आग के हवाले कर देते हैं फिर किसी एक रणनीतिक जगह पर खड़े जंगल के निरीह पशुओं का  शिकार करते हैं। ये सारे पाखंडी साधना के फल का स्वमेव  ही उपभोग करने वाले भी उसी दावानल का शिकार हो जाएंगे।  

भूख -भूख कूकर मर गयो , 

काज न एक  सियार  से  भयो। 

कूकर (वाचिक ग्यानी ,कपिल सिब्बल ,मनीष तिवारी ,दिग्विजय सिंह जैसे कथित ग्यानी )

कबीर आज के वाचिक ज्ञानियों साधू संतों ,'रामपालों 'की तुलना कूकरों से करते हैं कहते हैं ये तमाम लोग खुद कुत्ताए हुए हैं कुत्तों की तरह भोंकते रहते हैं बात बे बात वितंडा रचते हैं और उसी में खुद भी फंस जाते है। सारी  बातें इनकी निरर्थक हैं। ये वैसे ही  भौंकते  रहते हैं जैसे इन दिनों कांग्रेस के प्रवक्ता जो सुप्रीम कोर्ट के उकील जैसा बतलाये जाते हैं और एक परिवार की जूठन की भी जूठन होकर रह गए हैं। 

मूस बिलाई एक संग, कहो कैसे रह जाय ,

अचरज  एक देखो हो   संतों, हस्ती  सिंह ही खाय। 

मूस (मूषक ); बिलाई (बिल्ली );हस्ती (हाथी )

कबीर यहां कहते हैं माया और ज्ञान ,माया और साधना ,माया और वैराग्य साथ साथ कैसे रह सकते हैं अर्थात नहीं रह सकते। जैसे चूहा और बिल्ली साथ साथ नहीं रह सकते। माया रुपी बिल्ली चूहा बने जीव का भक्षण कर रही है। हे संतों मैंने एक बड़ा कौतुक पैदा करने वाली बात देखी है जिस शेर के दहाड़ने से हाथी डर  के भाग खड़ा होता है वह हाथी ही शेर का शिकार करके उसे खा रहा है। 

यहां आध्यात्मिक रूपक का इस्तेमाल कबीर करते हैं। 'माया -हाथी' जीव का 'मन' है जो स्वयं जीव को भटका कर कल्पना भ्रान्ति पैदा करके उसको भटका रहा है। जबकि 'मन' का स्वामी स्वयं 'जीव' है। वह अपने निज स्वरूप को निजत्व आँज कर मन को अपना गुलाम बना सकता है। 

कबीर ने साखी (दोहे ),शबद (गुरुग्रंथ साहब में इन्हें सलोक कहा गया है )और रमैनी लिखीं हैं। 

रमैनी कथात्मक है जिनमें कथा भी है सामाजिक विद्रूप भी है और आध्यात्मिक रूपक के मार्फ़त व्यंजना  के माध्यम से कबीर ने अपनी बात कही है। कबीर के समय भी अनेक मत मतान्तरों का बोलबाला था कबीर स्वयं साधू संतों से घिरे रहते थे इसलिए अपनी बात व्यंजना में  कहते थे-

कांकर पाथर जोरि कर मस्जिद लइ  बनाय ....;

 पाहुन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़ .....,

कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर ,

पाछे पाछे हरि फिरै कहत कबीर कबीर। 

कबीर हज काबे हउ जाइ था ,आगै मिलिआ खुदाइ ,

सांई मुझ सिउ लरि परिआ, तुझै किनहिं किंहि फुरमाई गाइ। 

कबीर कर्म -कांडी ब्राह्मणों और वैष्णवों को समान रूप से लताड़ते हैं। 

  कबीर साहब कहते हैं माया से बचो।अविद्या से माया से मन के रागात्मक संबंधों से बचो अपने स्वरूप को पहचानों। कल्पना भ्रान्ति पैदा करके भरमाने वाले स्वयं घोषित भगवानों से बचो।

सन्दर्भ -सामिग्री :
(१ )https://www.youtube.com/watch?v=EhoBDC5eUjQ

(२ )https://www.youtube.com/watch?v=CC2ZW-Ppd5

(३ )डॉ.   वागेश मेहता नन्द लाल के साथ विमर्श।  

मूस बिलाई एक संग, कहो कैसे रह जाय , अचरज एक देखो हो संतों, हस्ती सिंह ही खाय।

कबीर इस बारहवीं रमैनी में माया मोह मन का राग रंग इसको त्यागने की बात प्रतीकात्मक  ढ़ंग से कहते हैं। देखिये कुछ बानगियाँ :

माटी के कोट पसान को  ताला,

सोइ एक बन सोइ रखवाला। 

सो बन देखत जीव  डिराना,

ब्राह्मण वैष्णव एक ही जाना। 

ज्यों किसान किसानी करिहैंहि ,

उपजे खेत बीज नहीं परिहैंहि।  

छार देव नर  झेलिक झेला ,

बूड़े दोउ  गुरु और चेला।

तीसर  बूड़े  पारध भाई ,

जिन बन ढाहे  दावा लगाई। 

भूख -भूख कूकर मर गयो , 

काज न एक  सियार  से  भयो। 

मूस बिलाई एक संग, कहो कैसे रह जाय ,

अचरज  एक देखो हो   संतों, हस्ती  सिंह ही खाय। 

कबीर साहब कहते हैं माया से बचो।

कबीर इस बारहवीं रमैनी में माया -मोह, मन का राग रंग सबको  त्यागने की बात प्रतीकात्मक  ढ़ंग से कहते हैं। देखिये कुछ बानगियाँ :

माटी के कोट पसान को  ताला,

सोइ एक बन सोइ रखवाला। 

शब्दार्थ :पसान (पाषाण ),कोट (किला )

कबीर कहते हैं यह शरीर तो वैसे ही जड़ है जड़ तत्वों का जमा जोड़ है हवा पानी  मिट्टी, आकाश और आग का ही तो  इकठ्ठ है।इस पर जड़ पाषाण का ताला मत जड़। अपनी विवेक बुद्धि को पहचान अन्वेषण कर हित , अहित का। यह जड़ बुद्धि ही माया है। इस अविद्या ,माया के राग रंग रूप से तू मुक्त हो।  

सो बन देखत जीव  डिराना,

ब्राह्मण वैष्णव एक ही जाना।

बन (माया का जंगल ),ब्रह्मण - वैष्णव(कर्म कांड के धंधे बाज़ )

यह माया का जंगल माया का कुनबा तूने ही रचा है। यह तो जाना ही जाना है यह शरीर भी जाना ही जाना है बुढ़ापे से रोग से छीजना ही छीजना है। इससे क्यों भयभीत होता है यह तेरा निज स्वरूप नहीं है तेरा निज स्वरूप न कहीं  जाता है न कहीं से आता है तेरे ही साथ रहता है। लेकिन उस पर माया रुपी जंगल हावी रहता है। 

ज्यों किसान किसानी करिहि ,

उपजे खेत बीज नहीं परिहि।  

ये जो संतों की  भीड़ अनेक मत -मतांतरों के धर्म गुरुओं की खेती हो रही है इसमें तत्व की कोई बात नहीं बतलाता यह सब निरर्थक है उस खेती का क्या फायदा जिसमें फसल तो उगे लेकिन खेत में डंठल - डंठल  ही उगें। बीज न पनपे दाना न पनपे पौध में।ज्ञात हो इस दौर में धर्म का जितना प्रचार प्रसार इन कथित धर्म गुरुओं ने किया है उतना पिछले दस हज़ार सालों में नहीं हुआ था। फिर भी हासिल क्या है वही ढाक  के तीन पात। तत्व की बात कोई बतलाता ही नहीं है सारा फल खुद ही भोगना चाहता है।  

छार देव नर  झेलिक झेला ,

बूड़े दोउ  गुरु और चेला।

झेलिक झेला (धक्का पेल असत्य की तत्व  रहित ज्ञान की )

और कबीर जल्दी से ये भी कह देते हैं ये सारे ज्ञान की धका - पेल करने वाले ,पाखंडी गुरु खुद तो डुबेंगे ही अपने शिष्यों को भी संग ले डूबेंगे। 

तीसर  बूड़े  पारध भाई ,

जिन बन ढाहे  दावा(दवा ) लगाई।

बूड़े (डूब गए ); पारध (बहेलिया ,शिकारी ,पांखण्डी गुरु घंटाल );दवा (दावानल )

वह भी शिकारी की तरह नष्ट हो जाएंगे जो शिकार करने के लिए पहले तो सारे जंगल को आग के हवाले कर देते हैं फिर किसी एक रणनीतिक जगह पर खड़े जंगल के निरीह पशुओं का  शिकार करते हैं। ये सारे पाखंडी साधना के फल का स्वमेव  ही उपभोग करने वाले भी उसी दावानल का शिकार हो जाएंगे।  

भूख -भूख कूकर मर गयो , 

काज न एक  सियार  से  भयो। 

कूकर (वाचिक ग्यानी ,कपिल सिब्बल ,मनीष तिवारी ,दिग्विजय सिंह जैसे कथित ग्यानी )

कबीर आज के वाचिक ज्ञानियों साधू संतों ,'रामपालों 'की तुलना कूकरों से करते हैं कहते हैं ये तमाम लोग खुद कुत्ताए हुए हैं कुत्तों की तरह भोंकते रहते हैं बात बे बात वितंडा रचते हैं और उसी में खुद भी फंस जाते है। सारी  बातें इनकी निरर्थक हैं। ये वैसे ही  भौंकते  रहते हैं जैसे इन दिनों कांग्रेस के प्रवक्ता जो सुप्रीम कोर्ट के उकील जैसा बतलाये जाते हैं और एक परिवार की जूठन की भी जूठन होकर रह गए हैं। 

मूस बिलाई एक संग, कहो कैसे रह जाय ,

अचरज  एक देखो हो   संतों, हस्ती  सिंह ही खाय। 

मूस (मूषक ); बिलाई (बिल्ली );हस्ती (हाथी )

कबीर यहां कहते हैं माया और ज्ञान ,माया और साधना ,माया और वैराग्य साथ साथ कैसे रह सकते हैं अर्थात नहीं रह सकते। जैसे चूहा और बिल्ली साथ साथ नहीं रह सकते। माया रुपी बिल्ली चूहा बने जीव का भक्षण कर रही है। हे संतों मैंने एक बड़ा कौतुक पैदा करने वाली बात देखी है जिस शेर के दहाड़ने से हाथी डर  के भाग खड़ा होता है वह हाथी ही शेर का शिकार करके उसे खा रहा है। 

यहां आध्यात्मिक रूपक का इस्तेमाल कबीर करते हैं। 'माया -हाथी' जीव का 'मन' है जो स्वयं जीव को भटका कर कल्पना भ्रान्ति पैदा करके उसको भटका रहा है। जबकि 'मन' का स्वामी स्वयं 'जीव' है। वह अपने निज स्वरूप को निजत्व आँज कर मन को अपना गुलाम बना सकता है। 

कबीर ने साखी (दोहे ),शबद (गुरुग्रंथ साहब में इन्हें सलोक कहा गया है )और रमैनी लिखीं हैं। 

रमैनी कथात्मक है जिनमें कथा भी है सामाजिक विद्रूप भी है और आध्यात्मिक रूपक के मार्फ़त व्यंजना  के माध्यम से कबीर ने अपनी बात कही है। कबीर के समय भी अनेक मत मतान्तरों का बोलबाला था कबीर स्वयं साधू संतों से घिरे रहते थे इसलिए अपनी बात व्यंजना में  कहते थे-

कांकर पाथर जोरि कर मस्जिद लइ  बनाय ....;

 पाहुन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़ .....,

कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर ,

पाछे पाछे हरि फिरै कहत कबीर कबीर। 

कबीर हज काबे हउ जाइ था ,आगै मिलिआ खुदाइ ,

सांई मुझ सिउ लरि परिआ, तुझै किनहिं किंहि फुरमाई गाइ। 

कबीर कर्म -कांडी ब्राह्मणों और वैष्णवों को समान रूप से लताड़ते हैं। 

  कबीर साहब कहते हैं माया से बचो।अविद्या से माया से मन के रागात्मक संबंधों से बचो अपने स्वरूप को पहचानों। कल्पना भ्रान्ति पैदा करके भरमाने वाले स्वयं घोषित भगवानों से बचो।

सन्दर्भ -सामिग्री :
(१ )https://www.youtube.com/watch?v=EhoBDC5eUjQ

(२ )https://www.youtube.com/watch?v=CC2ZW-Ppd5


(३ )डॉ.   वागेश मेहता नन्द लाल के साथ विमर्श।  






गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

Turmerican Vegetarian Cuisine हल्दी राम ,हल्दी चाय जित देखूं तित हल्दी

'Turmerican Vegetarian Cuisine' 'हल्दी राम' ,'हल्दी -चाय' जित देखूं तित हल्दी 
जन्म से लेकर मृत्यु परंत हल्दी से हमारा रिश्ता रहा है। पूजा की थाली हो या दुल्हन का गोरा बदन हल्दी चढ़े तो खिले। कहीं पर किसी बिल से चींटियों की कतार निकलके पूरे घर में कश्मीरी अलगाव -वादियों की तरह फैलने लगे ,हल्दी पूर दीजिए बिल के गिर्द चींटियां भाग खड़ी होंगी।इसीलिए शव के गिर्द शव के निपटान से पूर्व एक हल्दी की रेख पूर दी जाती है। 
आँवा हल्दी अनेक रोगों में काम आती है। बचपन में जब गुम चोट लग जाती थी ,हल्दी की पुल्टिस बनाके चोट पर आहिस्ता से बाँध दी जाती थी। इन्फ्लेमेशन गायब। सूजन गायब। 
आश्चर्य नहीं ग्रीन टी के बाद आप हल्दी चाय को भी आज़माएँ और पाएं अरे साहब इसके तो कहने ही क्या बहुगुणी है हल्दी चाय। 

इसमें मौजूद हैं जैव सक्रिय यौगिक (polphenolic compund )करक्यूमिन (curcumin).इसी की हल्दी में मौजूदगी की वजह से भारतीय पाक शैली 'इंडियन किसीने '(Indian cuisine )के अलावा 'टर्मेरिक करक्यूमिन 'कैप्स्युल्स भी बाज़ार में बिक रहें हैं। 

अलावा इस यौगिक के हल्दी में मौजूद वाष्पशील चिकनाइयां (तेल ),पोटेशियम ,ओमेगा -३ फैटी एसिड्स ,लिनोलेनिक एसिड्स ,अनेक प्रोटीनें और सुपाच्य कार्बोहाइड्रेट्स और खाद्य रेशे हल्दी को एक सुपर फ़ूड का दर्ज़ा दिलवा देते हैं।

 गुण ही गुण हैं सगुण सलौनी हल्दी में -एंटी -इंफ्लेमेटरी ,एनलजेसिक ,एंटी -माइक्रोबियल ,थर्मोजिनिक  होने के अलावा इसमें उन तमाम खनिजों और विटामिनों का डेरा है जिन्हें एन्टीऑक्ससिडेंट कहा जाता है। 

यही आपकी सच्ची माशूका है आपकी देह को संभालेगी चंगा रखेगी और मोटापा भी चढ़ने न देगी। कहेगी भाई मेरी कुछ तो लाज रखो -थोड़ा घूमा फिरो भी। बैठे ठाले ,तौंद निकाले। अमित शाह की तरह सक्रिय रहो मोदी की तरह कर्मठ बस हल्दी से प्यार करो। 

भले पियो अरे दिन में दो दो बार पियो हल्दी वाली चाय पियो । फ़टाफ़ट तैयार एक कप पानी में थोड़ा सा अदरक डालिये उबलने दीजिये इसे थोड़ी देर ,अब एक चुटकी हल्दी पाउडर डालकर गैस चूल्हा जो भी है वहां से बर्तन को हटा लीजिये। तुरता छान लीजिये ठंडा होने दीजिए जल्दी क्या है कमरे के ताप पर आने दीजिये इस पेय को -हल्दी चाय को। 
न गैस बनेगी न डकारें आएंगी । पाचन चक्की ठीक से चलेगी जनाब ! शौक से रहिये इस माशूका के साथ। 
आपका लिवर तैयार करता है पित्त हल्दी चाय का सेवन इसकी उचित मात्रा बने इसको तय करेगा। पाचक रस है यह पित्त वसाओं के पाचन में मदद करता है। बेहतरीन एमल्सि-फाइंग  एजेंट है।
आपके खून में तैरती  शक्कर को रेगुलेट करती है हल्दी चाय। इन्सुलिन हारमोन सही काम करे इसे पुख्ता करती है।दर्द हारी होने के अलावा यह रोग पूर्व की अनेक स्थितियों से यथा खून में घुली जरूरत से ज्यादा चर्बी ,खून में तैरती अतिरिक्त शक्कर ,पेट को चर्बी का गोदाम होने से रोकती है। इन तमाम लक्षणों को ही मेटाबोलिक सिंड्रोम कह दिया जाता है।   
  


सरगुन की कर सेवा ,निर्गुण का कर ज्ञान। सरगुन निर्गण ते परे तहाँ हमारा ध्यान।

सरगुन की कर सेवा ,निर्गुण का कर ज्ञान। 

सरगुन निर्गण ते (से )परे तहाँ हमारा ध्यान।

कबीर कहते हैं हे मनुष्य तेरे बाहर सरगुन(सगुण ) है भीतर निर्गुण है। सब प्राणी सरगुन भगवान् है। चेतना का दीपक अंदर जल रहा है वह निर्गुण है। नर नारायण रूप है इसे देह मत समझ देह तो मिट्टी का खोल है।

कबीर जेते  आत्मा  ,तेते शालिग्राम।

कबीर कहते हैं अर्थात जितने भी प्राणी है सब भगवान हैं  

कबीर कहते हैं सगुन की सेवा करो निर्गुण का ज्ञान प्राप्त करो लेकिन हमारा ध्यान दोनों से परे होना चाहिए सरगुन श्रेष्ठ है या निर्गुण इस फ़िज़ूल बात में नहीं उलझना है। 
सारा सृजन मनुष्य करता है ज्ञान विज्ञान का रचयिता वह स्वयं  है। देवताओं को उसने ही बनाया है वेदों की प्रत्येक ऋचा के साथ उसके ऋषि का नाम है छंद का नाम है। किताब ,किसी भी धार्मिक किताब (कतैब )का रचयिता भगवान नहीं है सारे देवता मनुष्य ने बनाये हैं उसी की कल्पना से उद्भूत हुए हैं यह ज्ञान है। इसे ही समझना है। 

आज जो देवी देवता पूजे जाते हैं वह वैदिक नहीं हैं। राम ,कृष्ण ,गणेश आदिक इनका कहीं उल्लेख नहीं है वैदिक साहित्य में।जिनका उल्लेख है उन्हें आज पूजा नहीं जाता। 
देवताओं का सृजन और परिवर्तन होता रहता है दशहरे पर अब दुर्गा ज्यादा पूजीं जातीं हैं राम से कहीं ज्यादा। भारत में अयोध्या में हनुमान ज्यादा पूजे जाते हैं । जो ज्यादा लाभ देगा उसकी अधिक पूजा होगी। 

ये सारे देवता मनुष्य ने बनाये हैं। उसी की सृजना है कल्पना है। पंथ और पंथ का ईश्वर भी अलग अलग है उनमें भी शाखा प्रशाखाएं हैं इनका सबका रचयिता कौन है ?मनुष्य ही है। 

सबसे ज्यादा भगवान् चरितार्थ होता है प्राणियों में अगर मिट्टी की पिंडी में भगवान् दिखता है और शून्य में दिखता है तो मनुष्य में तो और भी ज्यादा  दिखना चाहिए। 
वेदों के पुरुष सूक्त में उस विराट पुरुष (सरगुन भगवान )का ज़िक्र आता है जिसके हज़ारों नेत्र  और हाथ -पैर, सिर ग्रीवा आदिक  हैं।पूरे भूमंडल में प्राणी हैं इसका अर्थ यह है। सबके सब सरगुन भगवान् हैं। 

उपासना होगी हृदय में जिसके दस अंगुल  ऊपर वह विराट पुरुष ,जीव (परमात्म तत्व ,आत्मा आदिक )बैठा है।   

एक -एक व्यक्ति यहां व्यष्टि है उसी से समष्टि है। सभी प्राणियों का समूह समष्टि है। सभी प्राणियों का समूह परमात्मा है इसीलिए पंच परमेश्वर कहा जाता है। पांच इकठ्ठे हो गए मानों परमेश्वर  हो गए।सभी प्राणियों का समूह ही सरगुन भगवान् कहलाता है  कबीर के यहां।सरगुन की सेवा करो।निर्गुण का ज्ञान प्राप्त करो।  

सबकी पृथ्वी के समस्त प्राणियों की तो कोई भी  सेवा नहीं कर सकता है मनुष्य चाहे कितना ही ताकतवर हो धनवान हो लेकिन नुक्सान करना आदमी छोड़ दे तो सब की सेवा हो गई।यहां भावना प्रधान बात है। यहां तो हम एक दूसरे को धोखा देने में लगे हुए हैं एक दूसरे का नुक्सान करने में लगे हुए हैं।एक दूसरे को नौंचने खसोटने में लगे हुए हैं। तीन -तीन घंटा पूजा करने वाले जब दुकान पर बैठेंगे तो जो असली सरगुन भगवान आया है दूकान पर उसे  चूना लगाएंगे।उसको धोखा देंगे वैसे वह  सरगुन भक्त कहलाते हैं। 

आफिस में बैठे हैं बिना घूस लिए काम नहीं करेंगे। कहने को भगवान् के भक्त हैं। सर्वत्र भगवान् को मानते हैं सब जगह मानते हैं। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान मानते हैं। घूस लेते हैं तो किस से छिपाते हैं ?किस से डरते हैं ?

मनुष्य से छिपाते हैं तो विश्वास  नहीं है जबानी जमा खर्च ज्यादा है। असली भगवान् यह प्राणी है प्राणी मात्र पर करुणा मनुज से प्रेम होना चाहिए और भेद रहित प्रेम होना चाहिए। वर्ण भावना ,क्षेत्र की भावना ,जाति भावना छोड़कर के व्यापक प्रेम होना चाहिए। और अन्य प्राणियों के,सभी  प्राणियों के प्रति  करुणा ,ये सब भगवद स्वरूप हैं। 

ये उदार भाव जब होगा तो आदमी घूस किस से  लेगा।जिस से घूस ले रहा है वह भगवान है। लेकिन हम बहुत चतुर हैं ऐसा भगवान् ढूंढते हैं जो खाता नहीं हैं और जो असली भगवान् है दरिद्रनारायण है ,उसकी खुराक छीन ते हैं। ये हमारी भक्ति है। लेकिन परस्पर प्रेम व्यवहार नहीं है सद्भावना नहीं है। सुबह नींद खुले परिवार के सब सदस्य सरगुन भगवान् हैं।ऐसा ख्याल रहे ,ऐसा ही देखें।  ऐसे में घृणा किस से होगी ?परिवार में सुख शान्ति होगी। 

लेकिन आदमी हर दम प्रति-क्रिया में रिएक्शन में जलता है। किसी ने कुछ कह दिया है तो भटक रहा है जबकि हमारे मन में मलाल नहीं होना चाहिए। प्रेम इसे ही कहते हैं जिसने कहा है वह अपने कहे का किये का (दुःख) फल भोगेगा। 
अपने मन को संभालना है। 

सब खो जाता है किसी का कुछ रहता नहीं है ,कल किसी ने कुछ कह दिया था ,चालीस साल पहले किसी ने कुछ कह दिया था आज उसका क्या मूल्य है ?

यह लोक अंध भूत है। बहुत थोड़े लोग हैं जो मौत को देखते हैं। सारे ऐश्वर्य को शून्य में जो देखता है वही गौतम बुद्ध की तरह देखता है। हमारे पूर्वजों  का ,माता पिता का ऐश्वर्य शून्य हो गया। हमारे गुरुजनों का  ऐश्वर्य शून्य हो गया। 

कार्य -कारण की निरंतर व्यवस्था है प्रकृति में। मकान ,दूकान वस्त्र ये जो भी चीज़ें हैं ये थोड़े ही दिन में बदलकर कुछ की कुछ हो जाएंगी।यहां संसार में सब  मिट्टी है और मिट्टी में परिवर्तन है। बस मिट्टी -मिट्टी ही चारों तरफ है। आप चेतन आत्मा है ज्ञान स्वरूप हैं। आपके चारों तरफ मिट्टी है शरीर मिट्टी है शरीर के ऊपर पड़ा हुआ कपड़ा मिट्टी  है।उपयोग इसका है जब तक मिट्टी मिट्टी है।जीव शरीर से निकल गया फिर सब मिट्टी है।  

जितने क्षण के लिए हम अपने चित्त में  मैल लाएंगे ,उतना ही वह गंदा होगा। देरी नहीं लगेगी।मन को हर दम संभालना चाहिए। काम क्रोध मोह से बचाये रहना चाहिए हर दम। जो बन सके सेवा करे सरगुन की। जितने प्राणी दिखाई देते हैं सबके सब  भगवान् भगवती हैं।

'मानस' का विराट स्वरूप राम के लिए है 'गीता' का कृष्ण के लिए ये दोनों सांप्रदायिक हैं। जबकि ऋग्वेद का विराट स्वरूप समष्टि के लिए है ,सबके लिए है। एक एक व्यक्ति समष्टि के हाथ पैर सिर ग्रीवा हैं। समष्टि कौन है ?समाज है। समाज भगवान् है।ये ही हज़ारों ग्रीवा सिर पैर हाथ की बात है हज़ारों लाक्षणिक है। समष्टि विराट स्वरूप के हज़ारों हाथ पैर सिर और ग्रीवा हैं। यही सरगुन भगवान् है ऋग्वेद का विराट स्वरूप (विराट पुरुष ). 

ये उदार विराट स्वरूप का वर्णन है और वैज्ञानिक है। भगवान् के विराट स्वरूप के चक्कर में मत पड़ो । प्राणियों के विराट स्वरूप विराटत्व को देखो। यही कबीर की वाणी है। 
नर नारायण रूप है तू जन जाने ते   
सरगुन भगवान् की सेवा प्राणियों के प्रति सद्भाव है। 

दूसरी बात निर्गुण का कर ध्यान।निर्गुण भीतर है सबके अंदर ज्ञान की ज्योति जलती है। हमारी ममता होनी चाहिए आत्मा में स्व : स्वरूप में लेकिन हमने अपनी ममता बना ली देह में। अपने आप को पहचाने। ये मैं मैं एक दिन छूट जाएगा। 
जागृत में भावात्मक अनुभव होता है सपने में आभासात्मक अनुभव होता है भावात्मक नहीं। सुसुप्ति में अभावात्मक अनुभव होता है। कुछ नहीं है ,कुछ नहीं जानता व्यक्ति सुसुप्ति में ,कुछ नहीं जानना भी जानना है लेकिन उसी  कुछ नहीं का बोध होता है सुसुप्ति में। जिसे होता है वह तीनों अवस्थाओं में मौजूद रहता है।तीनों अवस्था में जीव दृष्टा है। जानता है ज्ञाता है। ये आत्मा सब समय ज्ञाता है। वह अपना स्वरूप है। 
एक दिन देह नहीं रहेगी। आप रहेंगे। इस अनुभव में नहीं रहेंगे। और उस दिन की सब को  याद रहनी चाहिए ,याद करनी चाहिए। हम घर बना लिए और यहीं रम गए लेकिन एक दिन अचानक यहां से उठ के चले जाना है। इस चीज़ को समझने की जरुरत है।जो बोल रहा है चेतन मात्र है वही निर्गुण तत्व है। इसका ज्ञान होना चाहिए। 

सत ,रज, तम ये तीन गुण हैं। ये देह के साथ हैं। इसलिए देहधारी को सगुण भगवान् कहना चाहिए। शुद्ध आत्मा में सत ,रज ,तम  नहीं हैं।जिसमें गुण नहीं हैं , वह आत्मा गुणातीत है।ये समझना चाहिए ,मैं चेतन आत्मा हूँ। सबका द्रष्टा ,साक्षी ,और नित्य। अपनी अमरता का बोध तो हमें  इसी जीवन में होता है। अगर भौतिक पदार्थों का जोड़ ही 'मैं ' होता तो बचपन ,कैशोर्य ,जवानी ,प्रौढ़ावस्था की बातें भूल गया होता। विज्ञान मानता है के सात बरस में शरीर की सारी कोशिकाएं बदल जातीं हैं।सारी चमड़ी ,त्वक बदल जाती है।  सत्तर बरस मेरी उम्र है इसका मतलब यह हुआ सात  बार मेरा शरीर मेरी चमड़ी ,तमाम कोशिकाएं पूरा बदल चुकीं हैं। लेकिन 'मैं' वही हूँ।

(अयं आत्मा ब्रह्म ). 

सारे संस्कारों को याद रखने वाला आत्मा शुद्ध ,बुद्ध, निर्मल है। वही आप हैं। इस ज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। 

"निर्गुण का  कर ज्ञान " यही निर्गुण का ज्ञान है (सरगुन की कर सेवा )
शोक ,मोह ,भय किस से है देह भाव लेकर।हम पत्नी हैं हम पति हैं,पिता हैं ,पुत्र हैं ,माता हैं ,नाना हैं  आदिक व्यवहार में ये सब हैं और व्यवहार में इसका आदर और मर्यादा होना चाहिए।लेकिन अंततया कोई किसी का नहीं है। न किसी का मामा है न काका है न दादा  है।ये दैहिक भाव है। उपाधि भेद से है। उपाधि नाम सम्बन्ध। उपाधि के भेद में पड़ने से स्वयं छिन्न भिन्न हम बने हुए हैं। सारी उपाधियों को हटा दो तो केवल निज स्वरूप रह जाएगा । देह नाम रूप में हमारी बुद्धि है। आत्मा में बुद्धि नहीं है। इसलिए हर दम खिन्न रहते हैं । 
बाल पक गए दांत उखड़ रहे हैं पीड़ित हो रहे हैं। ये तो बदलना है। पानी की धारा पर बैठ कर यदि कोई चाहे हम स्थिर रहेंगे तो भोला है। ये सारा संसार समुद्र है। समुद्र तो फिर भी छोटा है संसार तो बहुत बड़ा है उस में समुन्द्र की तरह हाहाकार है आंदोलन हैं लहरें हैं सुख की दुःख की। यहां इस समुद्र में कणों  का प्रवाह निरंतर चलता है।और उनका जोड़ सब कुछ नश्वर है। आत्मा साक्षी शुद्ध ,बुद्ध निर्मल है अपने मन को संसार से जितना हटाओगे उतना सुखी होवोगे। निर्गुण का ज्ञान करो। दिल लगाना कहीं दुनिया की चीज़ों में एक मज़ाक है अपने साथ जो हम करते हैं। क्योंकि दुनिया की कोई वस्तु स्थिर नहीं है।
बचपन से आज तक कितने प्राणी पदार्थ मिले वह सब कहाँ गए। आज जो हैं वह कहाँ रहेंगे। इसलिए निर्गुण का ज्ञान करो। आप गुणातीत आत्मा हैं। 

गुणातीत चेतन तत्व हैं। ज्ञानस्वरूप हैं। जीव शब्द मौलिक है। जैसे मनुष्य मौलिक है।उसी को रूह आत्मा खुदा गॉड सब कुछ कहा गया है।  
कबीर साहब उस ब्रह्म को नहीं मानते जो जगत स्वरूप है। उस जगत को मानते हैं जो जगत से अलग है शुद्ध ,ज्ञानस्वरूप। ब्रह्म स्वरूप बहुत आदरणीय शब्द है। ब्रह्म  का अर्थ ही होता है बड़ा। बड़ा कौन है जीव आत्मा। जीव आत्मा व्यापक है। व्यापक है , विभु है ,शक्तिशाली है ,महिमापरक शब्द है।यहां बड़े से अभिप्राय उसकी महिमा से है। 
महिमापरक शब्दों को सिद्धांत मान लेने से सिद्धांत गड़बड़ हो जाता है। आत्मा एक नहीं है अनेक हैं। एक दूसरे से सर्वथा अलग हैं।और जड़ से भी  अलग हैं।इसीलिए अलग अलग कर्मफल भोग है।  अयुगपत प्रवृत्ति है मनुष्यों  की इसीलिए अलग अलग जन्म हैं अलग अलग व्यवहार है। अलग अलग प्रवृत्तियां हैं। तीनों गुणों का विपर्य है कोई सतो गुनी है कोई तमो गुनी है कोई रजो गुनी है। पुरुष बहुत हैं एक नहीं। पुरुष  का अर्थ कबीर के यहां  होता है चेतन।
स्त्री का शरीर पुरुष का शरीर यह तो मिट्टी  का लौंदा है चेतन तत्व 'पुर- उष'  दोनों में है।सब पुरुष हैं पुरुष यानी चेतन आत्मा हैं। 

शरीर रुपी पुर में शयन करने से आत्मा को पुरुष कहते हैं। ये जीव बहुत सिद्ध है। अगर जड़ चेतन में एक ही आत्मा है एक ही  आत्मा  सब में व्याप्त है तो कौन किसको उपदेश कर रहा है ?एक का बंध दूसरी आत्मा का बंध नहीं एक का मोक्ष दूसरी आत्मा का मोक्ष नहीं है सब आत्माएं अलग अलग हैं सबके अलग अलग कर्म फल भोग है। न ये अंश है न अंशी है। अंश कहते हैं टुकड़ा को। 

'ईश्वर अंश जीव अविनाशी 'आपने सुना ही होगा।
इसका मतलब तो कबीर के अनुसार यह हो जाएगा -जीव भी नाशवान और ईश्वर भी नाशवान है क्योंकि जो टुकड़ा है वह तो नष्ट हो जाता है। विकारी पदार्थ अंश ,अंशी बनते हैं। विकारी का मतलब परिवर्तनशील। जो कणों  का समूह हो इलेक्ट्रॉन प्रोटोन न्यूट्रॉन का  इकठ्ठ हो,गतिशील हो। एक अखंड निर्विकार में अंश ,अंशी नहीं होता है। विकार में ही अंश ,अंशी का भेद होता है। 
इसीलिए 'ईश्वर अंश जीव अविनाशी'- यह काल्पनिक बात है।तथ्य नहीं है। जीव किसी का अंश नहीं है। जीव तो अविनाशी है और यदि अविनाशी है तो अंश कैसा। और अंश है तो अविनाशी कैसा। दुनिया में एक भी उदाहरण नहीं है जो अंश हो और अविनाशी  भी हो।
आत्मा नित्य है न तो वह बनता है न बिगड़ता है न किसी से कुछ होता है वह अंश नहीं है। 
व्यापक व्यापक की कल्पना बेकार है जड़ चेतन अभिन्नत्व की कल्पना बेकार है। समुद्र और तरंग एक है ब्रह्म और जगत एक है ये मानेंगे तो पूरा भौतिक वाद हो जाता है। जगत अलग है ब्रह्म अलग है। ब्रह्म आप हैं स्वयं (अहं  ब्रह्मास्मि ). तत् त्वं असि। अयं आत्मा ब्रह्म।  प्रज्ञानं ब्रह्म।
कबीर ऐसा नहीं मानते हैं ,जड़ और चेतन में एक ही तत्व व्यापक है। कबीर के अनुसार जड़ जड़ है चेतन चेतन। 
जीव जीव ब्रह्म है परमात्मा है वह आपका स्वरूप ही है निजत्व है अंतर् ज्योति है बाहर कुछ नहीं है।  लेकिन हम भूल गए हैं। हमारे मन की गांठें कोम्प्लेक्सीज़ हमे  पीड़ित करते हैं। मन की गांठों को तोड़ दें। आप परमात्म स्वरूप हैं शुद्ध स्वरूप हैं ज्ञान स्वरूप है। तो इसलिए इस निर्गुण तत्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। सत्संगियों के ,संतों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो निर्गुणका। 
'सरगुन निर्गुण ते परे ,तहाँ हमारा ध्यान '  
कुछ न सोचना ही अंतिम ध्यान है। 
योग :चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। स्मरणों के  खंड शांत हो जाएं।शून्य हो जाना शांत होना है। शून्य से अभिप्राय प्रपंच शून्य से है। जो अपना सब कुछ विसर्जन देखते है वह शून्य देखता है तब शिव का उदघाटन होता है। 

इन्द्रियाँ और ज्ञान जहां दोनों शांत हो जाते हैं वह भूमा की दशा अंतिम दशा है जब देखना ,सुनना ,औरों का बंद हो जाए। जब आदमी अपने को समेट  ले।
जीवन मुक्त पुरुष को कुछ पाना शेष नहीं रह जाता है। उसकी कोई इच्छा नहीं रहती वह मृत्यु को देख लेता है। मृत्यु का दिन रिज़ल्ट का दिन है जीवन भर की कमाई का लेखा जोखा मृत्यु के समय काम आएगा। 

सगुन निर्गुण से ऊपर उठ जाना शून्य हो जाना है। शून्य को जानना शून्य हो जाना है। आत्मा जीव स्वयं शून्य नहीं है शून्य का दृष्टा है ज्ञाता है। शून्य का साक्षी है। 
मोह छोड़ो मुक्त हो जाओ। मुक्ति किसी की बपौती नहीं है। स्वर्ग और मोक्ष पंथ की चीज़ नहीं हैं व्यक्तिक हैं। 
देह में रहते रहते निर्विकल्प को जांचे। सेवा साधना स्वाध्याय से चित्त शुद्ध होगा। 
ये जगत सरगुन भगवान् है इसकी सेवा करो। निर्मल हो जाओ। किसी का यहां क्या है? सब तो यहीं छोड़ देते हैं इसका निरंतर चिंतन करो। सेवा स्वाध्याय और साधना करो इससे चित्त शुद्ध होगा। ज्ञान की दशा जान ना और बात है। निर्गुण अपना आत्मा है उसका विवेक द्वारा ध्यान करो। ध्यान के समय न सेवा है न ध्यान। 
सन्दर्भ -सामिग्री :

बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

प्रथम सृष्टि में किसका प्रादुर्भाव हुआ। जिसने बनाया कहाँ बैठ के बनाया -कबीर पूछते हैं ,जो स्वयं जगत को नित्य मानते हैं

प्रथम सृष्टि में किसका प्रादुर्भाव हुआ। जिसने बनाया कहाँ बैठ के बनाया -कबीर पूछते हैं ,जो स्वयं जगत को नित्य मानते हैं। 

दुनिया नहीं थी तब एक भगवान् था इस पर कबीर कहते हैं ऐसा देखने वाला किस मकान में था। दुनिया कब नहीं थी ?सृष्टि होती  क्या है ,पहले यह सोच लेना है। रचना द्रव्य  में होती है ,और द्रव्य स्वयं होता है। 

'न्याय -वैशेषिक 'और 'सांख्य' दोनों जड़ ,चेतन को नित्य मानते हैं।और इसी प्रकार पदार्थ विज्ञानी भी पदार्थों को नित्य मानते हैं। और वास्तविकता यही है। जो सत्ता हमारे सामने है , मिट्टी ,पानी, आग, हवा सब ,हाइड्रोजन , फ़ास्फ़रोस ,रेडियम इत्यादिक वो द्रव्य का समूह संसार सामने है। और उनमें गति है द्रव्य में गति स्वत : निहित है। स्वभाव सिद्ध निहित है। द्रव्य नित्य तो गति नित्य। और द्रव्य गति से जगत का प्रवाह नित्य। तो उसमें शुरू क्या हुआ ?

विज्ञानी मानते हैं ,ईथर नाम का एक सूक्ष्म द्रव्य था। तो उसमें कभी क्रिया हुई तो सृष्टि बनी अरबों  वर्ष पूर्व। तो उसके पहले क्यों क्रिया नहीं हुई ?ईथर में क्रिया स्वभाव गत है या बाहर से प्रक्षेपित ,प्रक्षिप्त  ?अगर बाहर से क्रिया डाली है तो किसने डाली। अमुक समय ही डाली फिर नहीं डाली। और अगर ईथर में स्वभावगत ही क्रिया है तो सब समय होनी चाहिए किसी  ख़ास समय नहीं।इसीलिए ये न समीक्षा करने से ऐसी -ऐसी बातें उदय होतीं हैं। 

भौतिक द्रव्य नित्य है।और भौतिक द्रव्य में उसकी गति नित्य है। इसलिए ये जगत का प्रवाह नित्य है। ये जगत कहीं से आरम्भ नहीं हुआ है और कहीं इसका अंत नहीं हो जाएगा। ऐसे ही चला है सदा बीज -वृक्ष ,मुर्गी -अंडा  ,कर्म -देह ,इसका प्रवाह सदा हैं। 

इसलिए कबीर प्रश्न करते हैं बताओ पहले क्या हुआ सृष्टि में ?और दूसरी बात ये बताओ ,किस स्थान पर बैठकर और किसने जगत बनाया ?

कबीर ने अनेक बातें पूर्व पक्ष की कहीं और कहके फिर उनकी समीक्षा की।और अन्य शास्त्रों में भी ये बातें आती हैं ,पूर्व पक्ष ,उत्तर पक्ष। 

लोग ये मानते हैं ,ब्रह्मा ,विष्णु ,शंकर किसी आद्या माया (आद्या शक्ति )से पैदा हुए, किसी नारी से पैदा हुए।प्रथम जीव ने अपनी उक्ति से भक्ति की। उक्ति कहते हैं कहा हुआ। लेकिन यहां उक्ति का अर्थ है अंदाज़ ,अनुमान ,कयास, कल्पना ,तरकीब ,तज़वीज़।

जीव ने रूप गढ़ा देवताओं  का और गढ़ के उसने भक्ति की। जीव अपने स्वरूप को न समझ कर बाहर कल्पना करता है। वेदों में सारे देवी -देवताओं की कल्पना इसीलिए हैं। 

ऋषियों के मस्तिष्क देवताओं की सृष्टि करने के लिए अजीब कारखाने थे -सर्व -पल्ली राधाकृष्णन ।

यानी वैदिक ऋषियों ने कल्पना से अनेक देवी -देवताओं की सृष्टि की , फिर अंत में इन सबको मिलाकर एक ब्रह्म स्थापित किया। लेकिन ये सब कल्पना  करने वाला कौन है ?जीव ?जीव ही स्थापन करता है और स्थापन करने वाला जीव स्थापित चीज़ में भूल जाता है अपने आप को।अपनी तरफ नहीं लौटता है।  

उसके बाद पवन ,पानी ,हवा और छाया बने ऐसी कल्पना की गई। अमर कोष में छाया अग्नि को कहा गया है।और बहुत विस्तार से माया प्रकट हुई। 

 प्रगटे अंड पिंड  ब्रह्मंडा  ,पृथ्वी प्रगट भई नौखण्डा। 

प्रगटे सिद्ध साधक सन्यासी। ई सब लाग रहे अबिनाशी। 

जो साधना में चल रहा हो उसे साधक  कहते हैं सिद्ध कहते हैं जो परिपक्व हो गया हो। सन्यासी का अर्थ है सर्वथा त्यागी। 
ये सब अविनाशी के भजन में लगे रहे। 

यहां कबीर कटाक्ष करते हैं अविनाशी परमात्मा को जीव से अलग कहीं और मानकर लगे रहे लोग उसके भजन में। 

प्रगटे सुर, नर ,मुनि झारी , ते  के खोज परे सब हारी।
झारी माने निखालिश शुद्ध (खालसा )        

भाव अर्थ यह है ,उस अविनाशी परमात्मा  के खोज में सब हार  थक के बैठ गए।
खोज करके बाहर की चीज़ वह मिलती है जो इन्द्रिय बोध में आये। आँख से देखने में आये ,कान से सुन ने में आये ,नाक  से  सूंघने में आये।  चाम(चमड़ी , त्वक ,त्वचा ) से छूने में आये।जीभ (रसना )से चखने में आये। तो ऐसी चीज़ मिल सकती है और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के बोध में न आये और मन में भी न आये तो कैसे मिलेगा। 

उपनिषद में भी आया है :जिसका मत है उसका विमत है। जो यह कहता है मैं ब्रह्म को नहीं जानता हूँ वह जानता है और जो ये कहता है मैं ब्रह्म को जानता हूँ वह जानता ही नहीं है। क्योंकि ब्रह्म जाना नहीं जा सकता है वह इन्द्रिय मन वाणी से परे है। जब परे है तो उसको जाना ही नहीं जा सकता है। 

जहां इतनी निराशा है ,जाना ही नहीं जा सकता है कबीर कहते हैं जीव का उसके पीछे पड़ना एक सनक के सिवाय क्या है ? 

अब लौट करके देखा जाए तो अपना (जीव का )स्वरूप भी इन पाँचों ज्ञानेन्द्रिय और मन  से परे है।यानी जो जीव है जो आत्मा है वह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों और मन से परे हैं। लेकिन वह आत्मा इन छहों से काम लेता है इन को  प्रेरता है। प्रेरक है। ये आत्मा स्वयं तुम ही हो। इसमें दोष नहीं। इसको पाना कहाँ है यह तो तुम ही हो। 

यह जीव अपनी इन्द्रियों और मन द्वारा बाहर फ़ैल -फ़ैल कर भटक गया है। इसे बस लौट आना है।अब इसका काम यही है ,पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से जो दृश्य मान है उसका मोह छोड़े। मन से जितनी मान्यताएं हैं उनका मोह छोड़े। 

प्रकृति ने इन्द्रियों को बहिर्मुख बनाया है। इसलिए हम बाहर देखते हैं अंतरात्मा को नहीं देखते। कोई विवेकवान पुरुष अपनी इन्द्रियों को समेटकर अपनी अंतरात्मा को देखता है (बोले तो अनुभव करता है ,अंतर्बोध से ),और वह अमरता  पाता  है। 

लौटें बाहर से तो स्वयं स्वरूप हैं पाना कुछ नहीं है। इसलिए कबीर ये व्यंग्य कर देते हैं :

खोज परे सब हारी 

उसकी खोज में सब हार थक के बैठ गए हैं। मुसलमान कहते हैं वह बे -चून ,बे -नमून है।  हिन्दु  कहते हैं निराकार है।मन वाणी से परे है। अनिर्वचनीय है। ब्रह्म वादियों ने तो माया को भी अनिर्वचनीय कहा और ब्रह्म को भी अनिर्वचनीय कहा। ब्रह्म और माया दोनों का निर्वचन नहीं हो सकता है कहा नहीं जा सकता है। 

मन बुद्ध वाणी परे बतावें ,पुनि ते दर्शन को ललचावें।

पारखी  संतों ने कहा जब मन वाणी से परे है तो क्या उसका दर्शन पाओगे उसकी प्राप्ति  के चक्कर में क्यों पड़े हो क्यों अपने में नहीं लौटते हो । तुम अपने आप को शुद्ध करो। 

जीव शिव सब प्रगटे ,वह ठाकुर सब दास 

वह ठाकुर बन गए जिसकी कल्पना हुई और जीव दास बन गया जिसने कल्पना की। यानी घड़ा कुम्हार से बड़ा बन गया। कितनी दयनीय दशा है ज्ञान की। हमारे उपनिषद के ऋषि ऐसे नहीं थे उपनिषद के ऋषि ज्ञान की चर्चा करते थे। शास्त्रों के ऋषि भी ऐसा नहीं करते थे।किसी मूर्ती के आगे नाक नहीं रगड़ते थे। 

ये तो बीच में बड़ी गड़बड़ी आई। 

वे(ऋषि मुनि ) भी ज्ञान की चर्चा करते थे। ये शुद्ध आत्मा ही परमात्मा है। जीव से ही शिव प्रगटे। वह ठाकुर बन गए और जीव दास बन गया।  

हम ने ही मूर्ती बनाई और हम ही उसके आगे नाक रगड़ते हैं उस से मोक्ष मांगते हैं।कैसी विडंबना है।दो हज़ार बरसों से भारत में ज्ञान का इतना पतन हुआ है उपनिषदों को पढ़िए। आप उपनिषद सौरभ पढ़िये जिसमें ग्यारह उपनिषद रखके बता दिया गया है ,जिसने समझ लिया ये आत्मा ही पुरुष है। (इस शरीर रूप पुर का वासी है ). ये आत्मा यही परमतत्व है। जिसने यह जान लिया वह शरीर के अहंकार को चढ़ाकर बाहर क्यों भटकेगा। तो आत्मा पर बारम्बार जोर है। 

वृहद् आरण्यक उपनिषद में तो  यह लिखा है ,जो यह मानता है देव अलग है और मैं अलग हूँ वह देवताओं का पशु है। वैसे देवता नहीं चाहते हैं ,यह मनुष्य समझ ले ,मैं ही ब्रह्म हूँ। ऋषि वामदेव ने कहा मैं ही ब्रह्म हूँ और वह मुक्त हो गए। तो ब्रह्म  श्रेष्ठ को कहते जो रामत्व है शिवत्व है परमतत्व है वह मैं (जीव ) ही हूँ। जो ईश्वरत्व है वह तुम्हारे अपने अंदर  में ही चरितार्थ होगा। रोने गिड़गिड़ाने से कहीं कुछ मिलने वाला नहीं। इसलिए न तो भोग की इच्छा करो न देवी देवताओं की इच्छा करो। सत कर्तव्य करो तुम्हारे अपने शुभ कर्मों से तुम्हारा कल्याण है। जीवन में पवित्र आचरण से रहो। और अपने आत्मा को समझो। और मन की सारी  भ्रांतियों को तोड़कर के फेंक दो। आकाश में कोई देवी देवता तैरता नहीं है। कोई मिट्टी का देवी देवता तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकता।जगत नित्य है इसे किसी ने बनाया नहीं है। 

देवों  के देव महादेव तुम हो     

अपने महादेवत्व को समझो। 

कबीर कहते हैं :ये जीव ने ही शिव की अपने से अलग कल्पना आकर डाली देवता की अलग कल्पना कर डाली। और वह ठाकुर बन गया और कल्पना  करने वाला दास बन गया। 

कबीर और जाने नहीं एक राम नाम की आस। 
जिसका नाम राम है उस आत्म -तत्व का ही हमें आशा भरोसा है। 
पूरा बीजक ग्रन्थ ज्ञान के आग का गोला है। सारे अंधविश्वासों को भस्म करने वाला और विवेक ज्ञान से ज्योतित है। कबीर का विवेक ही उनका गुरु था यद्यपि वैष्णव परम्परा के स्वामी रामानंद उनके गुरु थे। पूरे बीजक में १७० बार कबीर ने राम कहा है।यह स्वाभाविक भी है।  
राम निज नाम जानके छाडि दो वस्तु खोट 
राम नाम उनका निज का है जीव की संज्ञा है। परमतत्व है कबीर का राम। जीव भी यही राम है। 

हृदय वसे ते राम न जाना ,

दशरथ सुत ते लोक ही जाना ,

राम नाम का मर्म न आना। 

जो अपने स्वरूप को जानता है वही कृतार्थ होता है। 

सन्दर्भ -सामिग्री :

https://www.youtube.com/watch?v=1wDPKWbYQFk

सृष्टि विज्ञान क्या कहता है ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति (उद्भव एवं विकास )के बारे में :

(१ )बहुश्रुत महाविस्फोट सिद्धांत (Big bang theory ):एक आदिम  अणु (primeval atom ) में हुए विस्फोट से सृष्टि के उद्भव एवं विकास की कल्पना प्रस्तुत करता है। कहते हैं सृष्टि का ज्ञात -अज्ञात ,गोचर -अगोचर द्रव्य -पदार्थ ऊर्जा इसी में समाहित था। फिर भी इस आदिम अणु  का आकार शून्य था। घनत्व अनंत यानी इसे विरोधी गुणों का देवता मान लिया गया। कहा गया यह विस्फोट अब से तकरीबन १३. ६ अरब वर्ष पूर्व हुआ। और ऐसे विस्फोट एक अवधि के बाद होते ही रहते हैं। क्यों होते हैं ?

कहा गया ये सृष्टि एक अति सूक्ष्म पृष्ठीय विकिरण (microwave background radiation )से संसिक्त है जो उस विस्फोट का बचा खुचा अवशेष है जो इससे पहले हुआ होगा। 

इसमें एक विक्षोभ हुआ और आसपास से यह पृष्ठ भूमि विकिरण और पदार्थ ऊर्जा खींचने लगा आकार में वृद्धि के साथ और कालांतर में अपने ऊपर ही इतना दबखप गया यह आदिम अणु के इसकी एटमी भट्टी चालू हो गई।और यह एक विस्फोट के साथ फट गया। 

(२ )ब्रह्माण्ड की नित्यता का सिद्धांत (Steady state theory )के अनुसार यह सृष्टि एक साम्यावस्था बनाये रही है बनाये रहेगी।  नीहारिकाएं बनतीं हैं विनष्ट हो जाती है।इनकी राख से फिर और नीहारिकाएं पैदा हो जाती है। 

पुनरपि जन्मम पुनरपि मरणम ,

पुनरपि जठरे जननी शयनम।   

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

एकहि भाव सकल जग देखि

"जीव : ब्रह्में : परा " -जीव ही ब्रह्म है बाहर कोई अन्य ब्रह्म नहीं दूसरा कोई अन्य ब्रह्म नहीं जीव की सत्ता से अलग।
जीव अंतिम सत्यता है आभास ,प्रतिबिम्ब तुच्छ आदिक नहीं है परमसत्ता जीव ही है जीव ही राम है। बीजक में जीव शब्द बार- बार आया है जो हमारे ही निज स्वरूप का बोधक है आत्मस्वरूप है। बीजक जैसे छिपा हुआ धन बताता है गुप्त गूढ़ संकेतों  में ऐसे ही कबीर कहते हैं मेरे बीजक का हरेक शब्द जीव को उसकी अंतिम सत्यता बतलाता है।

एकहि भाव सकल जग देखि  ,बाहर परे सो होइ बिबेकी 

चारों और दसों दिशाओं में मोह माया का ही साम्राज्य फैला हुआ है। 

जो इससे (मोह माया से )बाहर आ जाए वही विवेकी है वह जो मोह छोड़े ,सूक्ष्म वासनाओं का भी परित्याग करे वेश -धारी साधुओं की तरह मोटा मोटा मोह माया का स्वरूप ही न छोड़े सूक्ष्म वासनाओं का भी नाश करे। आसक्ति छोड़े तब विवेकी है।

एकहि भाव सकल जग देखि 

ये मान लिया गया यह कहावत प्रचलन में आई सारे जगत में ब्रह्म व्याप्त है सब एक ही है। जड़ चेतन बकरी घास बिष्टा सब एक ही है। जड़ चेतन का विवेक ही घास चरने चला गया हो जैसे। प्रश्न यह है ,सब ब्रह्म ही है या कुछ माया भी है ?

जड़ और चेतन का विवेक न होना ही तो अविद्या है -कबीर 

माटी भी ब्रह्म है पानी भी ब्रह्म है गोबर भी ब्रह्म है पातर भी ब्रह्म है आत्मा भी ब्रह्म है। यह विवेक कैसे है। जड़ अलग है चेतन अलग है।

बाहर परे सो होइ विवेकी -बाहर को  जो परे करे,  अलग करे वह विवेकी है।  

अपने आप को सबसे अलगालो। विवश होकर के चल दो। अकेले इस संसार में आये हैं अकेले ही जाएंगे। इस संसार में जो कुछ मिलता है छूट जाता है।

विषय भोग के फंद  छुड़ाई 

तहाँ जाए जहां काट  कसाई। 

कुटिल गुरुओं का जंजाल आज भी है स्वरूप विवेक जहां मिट जाए हीन भावना जहां आ जाए ,तुम कर ही क्या सकते हो तुम तो अंश हो प्रतिबिम्ब हो जो कुछ करेगा ऊपर वाला ही करेगा तुम कर ही क्या सकते हो।ऐसे जो कहे बतलाये ऐसे ही गुरुओं को कबीर ने कसाई कहा है यह कसाईपन है महापाप है मानव मात्र समान है कोई ऊंच  नहीं कोई नींच  नहीं।

एकहि  पंडित सभै पढ़ाया  -तुम तुच्छ हो जो समर्थ है वह कहीं और है आत्म विवेक जगाया ही नहीं के तुम समर्थ हो आत्म विवेक जगाओ तुम सर्व -समर्थ हो। विवेकी बनो। भेड़िया धसान में मत फंसो हर जगह नीर क्षीर विवेक करो। 

सुमिरन करहिओ राम का  ,छोड़ो  दुःख की आस ,

सुख का जो चेहरा है उसमें दुःख भरा है सुख की आसा छोड़ो।

नाना प्रकार के अज्ञान में वासनाओं में तुम  पिस जाओगे अंतर्मुख होना अपनी आत्मा की ओर  लौटना राम है। बाहर 'काम' है अंदर 'राम' है। पांचों विषयों से मन को हटाकर अंतर्मुखी बनो। बेहरूनी काम कर लो लेकिन चित्त एकाग्र करने का अभ्यास करो। अंतर्मुखी होने का अभ्यास करो। स्वरूप ज्ञान के बिना सबका चित्त जलता है। तुम स्वयं महान हो तुच्छ नहीं हो अपने 'राम' स्वरूप को समझो अंतर्मुख ,उन्मुख होवो। वरना विषय वासनाओं में मन अटका रहेगा।

16 Ramaini-17(6.7.95)-ok, SADGURU ABHILASH SAHEB, BIJAK PRAVCHAN, KABIR PARAKH SANSTHAN, ALLAHABAD, ...

सन्दर्भ -सामिग्री :https://www.youtube.com/watch?v=mRpzF9xePA8

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