बुधवार, 15 अगस्त 2018

जीवन का विज्ञान 'आयुर्विज्ञान 'एक विहंगम दृष्टि (विहंगावलोकन ,सरसरी तौर पर )Ayurveda a Birds Eye View

जीवन का विज्ञान 'आयुर्विज्ञान 'एक विहंगम दृष्टि' (विहंगावलोकन ,सरसरी नज़र   )Ayurveda a Birds Eye View

आयुर्वेद का उल्लेख वैदिक ग्रंथों (वेदों )में भी मिलता है। यह चिकित्सा की सबसे प्राचीन पद्धति समझी गई है जो लगातार प्रचलन में रही है। पूरे  व्यक्ति की काया और उसके चित का समाधान प्रस्तुत करती है यह चिकित्सा प्रणाली । हमारी काया और हमारे मन को आरोग्य प्रदान करने वाली समेकित चिकित्सा प्रणाली (holistic health care system )है आयुर्वेद जो महज लक्षणों का इलाज़ नहीं करती पूरे प्रतिरक्षा  तंत्र को चुस्तदुरुस्त रखने का प्रयास करती है। 

यहां रोग की तह तक पहुंचकर उसके बुनियाद कारणों की पड़ताल की जाती है। 

आचार्य चरक यहां औषध शास्त्र (भेषज चिकित्सा )के पितामह कहलाते हैं। इनका कार्यकाल (600 before common era ,BCE)ठहरता है। 'चरक संहिता 'भेषज शास्त्र पर लिखा इनका प्रामाणिक ग्रंथ समझा गया है। 

यहां तकरीबन एक लाख औषधीय पादपों ,जड़ी बूंटियों से तैयार होने वाली दवाओं की विस्तार से चर्चा आपको मिलेगी। इन दवाओं के गुणदोषों पर विमर्श मिलेगा। गुणधर्म और लक्षण भी बतलाये गए हैं इन जड़ी बूंटियों से तैयार दवाओं के। 
महर्षि चरक अपने इस ग्रंथ में मानवीय शरीरक्रिया विज्ञान (anatomy ),भ्रूण विज्ञान (embryology ),भेषज विज्ञान (pharmacology ),रक्त संचरण प्रणाली ,मधुमेह (diabetes )जैसे जीवन शैलीरोग ,तपेदिक और हृदय रोगों की चर्चा करते हैं। 

यहां नीतिपरक आचार विहार दवा और पथ्य ,हमारे अन्न पानी का (खुराक )का हमारे मन चित और काया पर पड़ने वाले असर का आकलन मिलता है। 

आचार्य सुश्रुत को आधुनिक शल्य का पितामह (father of surgery )कहा गया है। उनका ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता ' बहुश्रुत और बहुचर्चित रहा है। इनका कार्यकाल भी 600 BCE बतलाया गया है। 

तकरीबन दो हज़ार छ: सौ बरस पहले आप यहां प्लास्टिक सर्जरी को विस्तार से बतलाते हैं। १२५ किस्म के शल्य उपकरणों का ज़िक्र आया है 'सुश्रुत संहिता' में।३०० किस्म के शल्य कर्मों का विस्तार से उल्लेख मिलता है इस ग्रंथ में। इनमें ४२ अलग अलग पद्धतियों को (surgical processes )अपनाया गया है .1120 बीमारियों का ज़िक्र आया है। 

अतिरिक्त हुनर और साहसपूर्ण कौशल से ताल्लुक रखती है प्लास्टिक सर्जरी की यह विधा। इसे rhinoplasty को समर्पित किया गया। 

'जन्मना विरूपित अंगों से पैदा संतानों के नाक -कान आदि अंग इस प्रणाली के तहत दुरुस्त करके सामान्य कर दिये जाते थे। उल्लेख है के नए अंग भी ज़रूरत के हिसाब से तैयार कर लिए जाते थे। '

ऐसा कहना रहा है मान्यवर Sir W.Hunter (British Surgeon.1718-1783 )का ।  

आयुर्वेद को मोटे तौर पर दो शाखाओं में रखा गया था :

(१ )आत्रेय सम्प्रदाय :काया चिकित्सकों का स्कूल था यह  

(२ )धन्वंतरि सम्प्रदाय (Dhanvantari Samradaya ):शल्य के माहिरों से ताल्लुक रखता था। 

इंटरनल मेडिसिन के तहत 

(१ )शल्य (surgery )और प्रजनन (fertility )

(2 )बालरोगों का विज्ञान (pediatrics ):यहां आगे आयुर्वेद के आठ अंग हैं आयुषविज्ञान ज़रा या बुढ़ाते जाने का विज्ञान (Gerontology )तक 

(3 )विषविज्ञान (toxicology ),नेत्रविज्ञान (opthalmology )

(4 )मनोरोग विज्ञान (psychiatry )

की चर्चा भी यहां आयी है। 

यहां प्रकृति (स्वभाव )के  अनुरूप टेलर मेड वैयक्तिक चिकित्सा का प्रावधान है। (personalized treatment )है। 

बुनियादी पांच शारीरिक तत्वों का जमा जोड़ है व्यक्ति विशेष ,किसी में कोई किसी में कोई अन्य पांच तत्वों का प्राधान्य है। 

त्रि -दोष (bio-forces )वात  ,पित्त और कफ ,सात धातुओं (dhatus )

तीन प्रकार के मल (three waste products of the body )इनमें शामिल किये गए हैं। 

आरोग्य की कुंजी (Secrets of good health )

दोषों ,धातुओं ,और मलों में समुचित संतुलन ,ओज (ojas )तथा एक दम  से मुस्तैद चुस्त दुरुस्त कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रिय (oragns of action and organs of knowledge ) सेहत की कुंजी हैं। इनमें संतुलन गड़बड़ाया काया और मन रोग की ओर चल दिए । 

पंच कर्म (detoxification ):इसके तहत मालिश ,हर्बल सोना बाथ ,विशेष खुराक तथा हल्का उपवास आएगा। 

Influence in the rest of the world 

Ayurveda influenced medicinal sciences in Egypt ,Greece ,Rome ,Tibet ,China ,Russia and Japan via visiting students and translations .

Ancient physicians Avicenna and Rzi Sempion quoted Ayurveda .

आयुर्वेद वर्तमान स्थिति :

दुनियाभर में इन दिनों आयुर्वेद अपनाया जा रहा है। भारत में आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय खुलते चले गए हैं हमारे देखते ही देखते। आज तकरीबन १०,००० से भी ज्यादा स्नातक अपना पाठ्यक्रम संपन्न करके चिकित्सा क्षेत्र में दाखिल हो रहे हैं साल दर  साल। 

नव्ज़ की पड़ताल के बाद रोग निदान आज भी प्रचलन में है। गए ज़माने की बात नहीं है ये। आज भी लिफाफा देखके मज़मून भांपने नव्ज़ देखके मरीज़ का अंदरूनी हाल टोह लेने वाले आयुर्वेदाचार्य हमारे बीच में हैं। 

सन्दर्भ -सामिग्री :

@Hindu Swayamsevak Sangh ,USA 

http://www.hssus.org

Ayurveda the science of life 

प्रस्तुति :वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा ,५१ ,१३१ ,अपलैंड व्यू ,कैन्टन, मिशिगन -४८ १८८ ). 

००१  ७३४ ४४६ ५४ ५१ 






सोमवार, 13 अगस्त 2018

यहां गांधारी कृष्ण को भी शाप दे सकती है

हिंदुत्व में परमात्मा की शक्ति का प्राकट्य अनेकरूपा नारी है। दिव्य माँ के रूप में हिंदुत्व में ही नारी आराध्य देवीरूप में  है 

विद्या ,ज्ञान-विज्ञान , ललित एवं संगीत अभिनय आदि कलाओं की देवी यहां सरस्वती हैं। सांगीतिक प्रस्तुतियों के पहले दीप प्रज्जवलित किया जाता है माँ सरस्वती का आवाहन करने के लिए। 

लक्ष्मी तमाम वैभव और सम्पदा ,धन की दात्री है। आराध्या है सनातन धर्मी भारतधर्मी समाज की।
दुर्गा और काली दुष्ट संहारक हैं। 

अथर्व वेद की ऋचाओं का आरम्भ देवी उपासना से होता है :

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता (मनुस्मृति )

अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है देवगण विराजते हैं वहां। 

तैत्तिरीय उपनिषद में आया है :

मातृदेवो भव 

Let your mother be God to you 

माँ हमारे लिए परमात्मा की तरह  आराध्या है 

मनुस्मृति का उद्घोष है :

A family whose women live in sorrow perishes .The family whose women are happy always prospers .A household whose unhappy women members curse perishes completely -Manusmriti 

यहां गांधारी कृष्ण को भी शाप दे सकती है। 

किसी राष्ट्र के नागर बोध का निर्णय इस बात से होता है वहां महिलाओं का सम्मान कितना होता है -पूर्वराष्ट्रपति अवुल पाक़िर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम साहब 

ऋग्वेद के ४०७ साधू संतों में से २१ महिला संत हैं।ऋषिका  गार्गी ,उभया  भारती बहुचर्चित नाम रहे हैं। 

आदिशंकराचार्य एवं मंडन मिश्र के बीच खंडन मंडन शास्त्रार्थ के दौरान उभया भारती  यहां एक सदस्यीय  निर्णायक मंडल हैं। 

चौदहवीं शती  की संत गंगा देवी यहां संस्कृत महा-काव्य 'मधुराविजयम' ग्रंथ की रचना करतीं हैं। ऋग्वेद की सुलभःशाखा (सुलभा शाखा )ऋषिका सुलभा के नाम पर आई है। 

उड़ीसा का 'लिंगराज' भव्य देवालय महिला शिक्षिकाओं को भित्ति चित्रों में उकेरे हुए हैं जहां छात्र छात्राओं  को सह -अध्ययन रत दिखलाया गया है।पूजा पाठ ,श्रुति पाठ शिक्षण में महिलाओं की बराबर की भागेदारी रही आई है सनातन हिंदुत्व परम्परा में। औरत किसी भी मायने में दोयम दर्ज़े पर नहीं रही है। 

'यश दधाति यशोदा  : ' यहां कृष्ण की माता हैं। कुंती पांडवों की। सीता सावित्री पार्वती द्रौपदी बहुश्रुत नाम हैं। 

मीराबाई ,कारैक्कॉल अम्मैयार ,अक्का महादेवी ,मुक्ता और जनाबाई बहुश्रुत रहीं हैं। लल्लेश्वरी काश्मीरी गौरव की कवियत्री और शिव भक्त रहीं हैं। 

In modern Times Ma Sharada ,Mata Amritanandmayi ,Ma Anandmayi ,Karunamayi ,Mother Mira Aditi ,Sister Nivedita ,Mata Nirmala Devi ,Didi Ritambhara Devi ,Ma Anand Murti and many others are well known .

सबको गणना में ले पाना मेरी अल्प  बुद्धि का परिचयाक है। 

https://www.youtube.com/watch?v=JCA9wLU8S_0

hiv Shaktiya Aa Gai | BK Audio Song | BK Meditation Audio Song | Brahma Kumaris

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Published on May 22, 2018

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

हिंदुत्व में ईश्वर सम्बन्धी अवधारणा :एकं सत् विप्रा : बहुधा वदन्ति (There is one ultimate reality (God ),known by many names -Rig Veda

हिंदुत्व में ईश्वर सम्बन्धी अवधारणा :एकं सत् विप्रा : बहुधा वदन्ति (There is one ultimate reality (God ),known by many names -Rig Veda 

बतलाते हुए आगे बढ़ें -हिंदुत्व एक जीवन शैली का नाम है। सनातन धर्मी भारत धर्मी समाज के तमाम लोग हिन्दू कहाते हैं। 

ईश्वर की अवधारणा में यहां पूर्ण प्रजातंत्र है। त्रिदेव की अवधारणा के तहत एक ही परमात्मा तीन रूपों में अलग अलग कर्मों का नैमित्तिक कारण माना गया है यही है त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश की अवधारणा।  

तैतीस कोटि (कोटि यानी प्रकार )देव हैं यहां। कुलजमा जोड़ ३३। देव का अर्थ गॉड नहीं है। यह अनुवाद की सीमा है। देव का पर्याय परमात्मा नहीं है देव ही है। जैसे  रिलिजन का रिलिजन ,धर्म का धर्म ही  पर्याय है। कोटि का गलत अर्थ करोड़ कर दिया गया है। संस्कृत भाषा का मूल शब्द है कोटि जिसके एकाधिक अर्थ हैं। तैतीस कोटि देवता यहीं से चलन में आया है तैतीस तरह को तैतीस करोड़ कर दिया गया एक अनुवाद के तहत।  

One God fulfilling three different roles is often depicted as three in one .

One Supreme Reality :Ishwara ,Bhagwan ,Sat-Chit-Anand (absolute existence ,absolute consciousness and or knowledge and absolute bliss or God .

एक ही पारब्रह्म या ब्रह्म है इसे चाहे ईश्वर कहो ,या भगवान या फिर सच्चिदानंद (सत् -चित -आनंद ). 
The one Supreme absolute as Brahman (a cosmic consciousness )who is both immanent and transcendent .

एक ब्रह्म या पारब्रह्म है ,एक ही चैतन्य सारी सृष्टि में परिव्याप्त है जो ज्ञानातीत ,इन्द्रियातीत है। मन बुद्धि चित्त के संज्ञान में नहीं आएगा वह ब्रह्म ध्यानातीत है। अनुभव अनुभूति का विषय ज़रूर हो सकता है ब्रह्म उनके जो समाधिस्थ हैं जिनका मन अ -मन हो गया है अडोल हो गया है ,जिन्होनें अपने निज स्वरूप को अनुभूत कर लिया है उनके लिए फिर एक ब्रह्म ही है दूसरा कोई है ही नहीं। 

हिंदुत्व की अवधारणा के अंतर्गत ईश्वर कालरहित है। कालातीत है। निराकार है लेकिन कोई भी आकार धारण कर सकता है सब आकार उसी के हैं और कोई एक विशेष आकार उसका नहीं है। 

बहुरूप उसका प्राकट्य हो सकता है। अनेक रूपों में वह प्रकट हो सकता है। अमूर्त से मूर्त हो सकता है। मूर्त से फिर अमूर्त। वह सर्व का ज्ञाता है सबमें व्याप्त है। 

पंडित उसे अनेक नामों से पुकारते हैं -शिव ,विष्णु ,माँ दुर्गा (दुर्गे ,पार्वती आदि )

Cosmic power is feminine Shakti 

when the Divine Being takes form ,it assumes both male and female attributes .The ultimate reality as a female is called as Shakti ,power or energy .

अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा यही है। 

हिंदुत्व के अंतर्गत ईश्वर सम्बन्धी एकाधिक अवधारणाएं प्रचलित हैं :

सगुण ,निर्गुण 

साकार ,निराकार ,

भक्त जन सगुण साकार को आराधने में आनंद का अनुभव करते हैं तो कुछ पंडितजन सगुण  निराकार स्वरूप परमात्मा को अपना आराध्य बनाते हैं कुछ अन्य निर्गुण निराकार की आराधना करते हैं। अलबत्ता है वह सभी के लिए सर्व -व्यापी सर्वमंगलकारी है । 

कवि पीपा की ये उक्ति हिंदुत्व के तहत  ईश्वर  की अवधारणा यूं प्रस्तुत करती है :

सगुण मीठो खाँड़ सो निर्गुण कड़वो नीम ,

जाको गुरू जो परस दे ,  ताहि प्रेम सो जीम। 

सिख पंथ के अंतर्गत एक ही ब्रह्म की एकहु ओंकार की निर्गुण निराकार रूप में मान्यता है। श्री गुरुग्रंथ साहब ही गुरु हैं। 

ईसाइयत के तहत ओल्ड टेस्टामेंट (पुराना नियम या मूल बाइबिल ) भी एक ही ईश्वर को मान्यता देती है ,न्यू टेस्टामेंट (नया नियम ,बाइबिल का संशोधित रूप )फ़ादर ,सन और होली स्पिरिट (ट्रिनिटी )की बात करता  है लेकिन तीनों का सार रूप परमेश्वर वहां भी एक ही है एक के ही ये तीन रूप हैं। अल्लाह भी एक ही है कुरआन के अनुसार। 

यहूदी भी एक ही परमेश्वर की बात  करते हैं। 

A relationship with God in hinduism :

There are three principle thoughts about relationship of individual divinity (Atman )with God (Brahman ):

Advait(अद्वैत )

(२ )Dvaita(द्वैत )

(3 )Vishishtadvait (विशिष्टाद्वैत )

Atman is defined as the ultimate reality (God )appearing as our essential Self .

इस विचार के अंतर्गत आत्मा या आत्मन को परमात्मा का ही दिव्यांश समझा जाता है। 

One school of Hindu thought ,says that both the Atman and Brahman are the same (Advait -Aham Brahmasmi 

अद्वैत वाद के तहत आत्मा ही ब्रह्म है दोनों का एकत्व है दूसरे किसी का अस्तित्व ही नहीं है। 

(अहं ब्रह्मास्मि। अहम् ब्रह्म अस्मि )

मेरा निजस्वरूप ब्रह्म ही है। 

Some believe they  differ as the fire and the spark of the fire ,Ocean and a drop of the Ocean ,Gold and a particle of Gold ,Sun and a ray of light .

Many devotees perceive  relationship with God as personal relationship like mother ,father ,sibling ,friend ,spouce (Sufivaad treats God as beloved wife ). 

हिंदुत्व के तहत विभिन्न अवतारों  की अवधारणा 

A finite manifestation in earthly form of the infinite consciousness is called an Avatara.Ram and Krishna are the most famous Avataras.There are many more .

परित्राणाय  साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम ,

धर्मसंस्थापनार्थय सम्भवामि युगे युगे। 

साधुओं के कल्याण,परित्राण  और दुष्टों के विनाश के लिए अधर्म के नाश और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए मैं बार बार आता हूँ।

तैतीस प्रकार के देवता 

(तैतीस करोड़ नहीं वरन सिर्फ  तैतीस प्रकार के देवी -देवता  )

इनमें १२ आदित्य ,११ रूद्र ,८ वसु ,२ अश्वनी कुमार (इंद्र और दक्ष ) हैं।कुलयोग हुआ ३३ 

द्वादश आदित्यों में बारह राशि चिन्ह (Zodiac Signs )

एकादश रुद्रों में पांच प्राण ,पांच उप -प्राण और एक महेश्वर (महा -प्राण )

आठ (अष्ट )वसुओं में एक जलतत्व 'आप:'तरल रूप में 

दूसरा "पृथ्वी" तत्व ठोस रूप ,तीसरा 'अनिल' यानी  वायुतत्व गैसीय रूप  'चउथा 'अनल' (अग्नि तत्व )ऊर्जा रूप ,पांचवां 'ध्रुव' (अचल अडोल  सितारा रुप), (अंतरिक्ष या निर्वात रूप में )या फिर  अन-उत्परिवर्तनीय रूप (Fixity ) अयनमास   (Ayanmas )
छटा सोम (चंद्र ),सातवां प्रत्युषा (पौ फटने की (Recurring Dawn )बारम्बारता ,पुनरावृति );

Pratusha also represents :

(1)The Sun  causing the night and day i.e the source of light behind the dawn and 

(2 )Lagna The ascendant or the point or the point in the eastern horizon as representing the self and is equated to the dawn.

आठवाँ वसु है प्रभाष i.e Prabhasa – splendorous lights of the stars that are grouped into 27/28 Nakshetra (Constellations).


अश्वनी देवों  के रूप में इंद्र और दक्ष की गणना की जाती है। 

सोमवार, 6 अगस्त 2018

Sacred Scriptures (Part III,HINDI )

स्मृति ग्रंथों के अंतर्गत ही रखा जाएगा -

(१ )वेदांग 
(२ )उपवेद 
(३)दर्शन (षड्दर्शन )
(४ )न्याय शास्त्र (धर्म शास्त्र )
(५ )इतिहास को 

वेदांगों के तहत व्याकरण (संस्कृत भाषा का ग्रैमर ),ज्योतिष विज्ञान ,निरुक्त (इनमें शब्दावली ,शब्दकोश ,शब्दों के उद्गम का शास्त्र ,शब्द व्युत्पत्ति  शास्त्र ,आदि  आएंगे ),शिक्षा (वैदिक मन्त्रों का उच्चारण ,आरोह अवरोह,उच्चारण कौशल  ),छंद (लय -ताल, मीटर यानी मात्राओं का हिसाब किताब ),कल्प सूत्र आदि आएंगे। 
उपवेदों में शिल्प  यानी यांत्रिकी ,घर बनाने की कला ,वास्तु कला आदि धनुर्वेद (धनुष विद्या ,आयुद्ध आदि ,युद्ध कला ),गंधर्व वेद (यानी संगीत शास्त्र ),आयुर्वेद के अंतर्गत (शरीर क्रिया विज्ञान एवं औषधि शास्त्र आदि )आएंगे।

शिल्प की चर्चा अथर्व वेद ,धनुर्वेद की यजुर्वेद तथा गंधर्व वेद की चर्चा सामवेद में की गई है। आयुर्वेद को विस्तार से ऋग्वेद और अथर्व वेदों ने समझाया है। 

दर्शन के अंतर्गत ईश्वर के अस्तित्व को न मानने वाले नास्तिकवाद  ,भोगविलास को जीवन का अंतिम लक्ष्य मानने वाले चार्वाक दर्शन या  जीवन शैली यानी उधार लेकर भी घी  पीयो , क़र्ज़ मत लौटाओ को समझाया गया है। 
ईश्वर में आस्था रखने वाले आस्तिकवाद की भी चर्चा आती है। 

षड्दर्शनों में -

वैशेषिका ,न्याय,सांख्य ,योग विज्ञान ,पूर्व मीमांसा तथा उत्तर मीमांसा (वेदांत )की चर्चा की गई है। 
कन्नड़ (कणाद )ऋषि वैशेषिका के अंतर्गत माया की निरर्थकता ,तर्कविज्ञान आदि की व्याख्या करते हैं। 

गौतम ऋषि न्याय शास्त्र में सृष्टि के क्रमिक उद्भव एवं  विकास ,ईश्वर के तार्किक अस्तित्व की खोज करते हैं। कपिल मुनि का सांख्य शास्त्र भौतिक एवं मानसिक  व्याधि ,आदिभौतिक एवं आत्मिक सुखदुख के निवारण एवं मोक्ष की बात करता है। 
पतंजलि योग के तहत अष्टांग योग एवं ध्यान और समाधि द्वारा संन्यास की प्राप्ति की बात करते हैं । 
पूर्व मीमांसा में जैमिनी वेदों के सनातन  अस्तित्व की बात करते हैं। उत्तर मीमांसा में आत्मा ,सृष्टि और माया तीनों के दिव्य स्वरूप की चर्चा है। 
धर्म शास्त्र के अंतर्गत अठारह स्मृतियाँ आतीं हैं :

यानी यहां पाराशर स्मृति ,मनुस्मृति , याज्ञवलक्य  स्मृति ,उपस्मृतियाँ आदि आतीं हैं।
वाल्मीकि रामायण तथा वेदव्यास कृत महाभारत को इतिहास के अंतर्गत रखा जाएगा। 
श्रीमद्भागवद्गीता प्रमुख स्मृति ग्रंथ है कहीं कहीं किसी ने इसे भी इतिहास के तहत रखा है। 

धर्म शास्त्र के तहत तिरुक्कुरल (तमिल शैवों )के व्यवहार आचार और नीतिशास्त्र की चर्चा है। नीति शास्त्र का निर्धारण चाणक्य ,विदुर एवं शुक्र करते हैं। 
कौटिल्य शास्त्र अर्थ राजनीति और क़ानून की व्याख्या करता है। 

पाराशर स्मृति को कलियुग के अनुकूल मनुस्मृति को अन्य युगों के लिए याग्वल्क्य स्मृति को अन्य युगों के अनुरूप और अनुकूल माना गया है.बृहस्पति ,दक्ष ,गौतम ,यम, अंगिरा ,शततापा , संवर्त ,योगीश्वर ,प्रचेता ,उष्ण (उशना ),शंख ,लिख़िता ,अत्रि ,विष्णु एवं हरि स्मृतियों की भी चर्चा की गई है। 

उपस्मृतियों में नारद ,पुलहा ,गर्ग ,पुलस्त्य ,शौनक,गरातू , ,बौधायन  ,विश्वामित्र और अन्य उपस्मृतियाँ आतीं हैं। 
कुछ और मान्य ग्रंथों में इन सबके बाद  आने वाले ग्रंथों को रखा जा सकता है जिनमें निम्न का नाम लिया जा सकता है :
(१ )पाराशर :माधवाचार्य 
(२ )अणुभाष्य :वल्लभाचार्य 
(३ )कृष्ण चेतना (चैतन्य या कृष्ण भावना ):चैतन्य 
(४ ) शिक्षापत्री :स्वामीनारायण 
(५ )सत्यार्थ प्रकाश :स्वामी दयानन्द सरस्वती 

धार्मिक आध्यात्मिक ग्रंथ इसके अलावा और भी हैं जो हमारी  अल्प  बुद्धि के दायरे में नहीं आ पाए हैं। उसके लिए क्षमा प्रार्थी मैं रहूँगा मेरा आधा अधूरा पुरुषार्थ (प्रयत्न )रहेगा। 

(ज़ारी) 



Sacred Scriptures (Part ll ,Hindi )

स्मृति ग्रंथ ?स्मृति ग्रंथों में श्रीमद्भागवद्गीता को अग्रणी ग्रंथ माना गया है। स्मृति ग्रंथ शाश्वत सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का साधन हैं।इन अर्थों में  भागवद्गीता जीवन का विज्ञान है जिसमें कृष्ण  देह और देह के संबंधों में मोहग्रस्त हुए अर्जुन को जो  अपने क्षात्र(क्षत्रिय ) धर्म से विमुख हो जाता है  उसके निजस्वरूप (आत्म स्वरूप )का बोध कराते हैं यह कहते हुए के यह 'आत्मन' न तो किसी को मारता ही है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।

बौद्ध धर्म के तहत धम्मपद तथा तृप्तिका (तृप्तिकाओं ) को स्मृति ग्रंथ के अंतर्गत ही रखा जाएगा। यही स्थिति जैन धर्म में 'कल्पसूत्र' की तथा सिक्ख धर्म  में 'श्री गुरुग्रंथ साहब' और श्री गुरुगोविंद सिंह कृत 'दशम  ग्रंथ'की है। दोनों ही स्मृति ग्रंथ हैं। 
पुराण भी स्मृति ग्रंथ के अंतर्गत आएंगे। इनमें वेद की प्रमुख शिक्षाओं एवं सिद्धांतों को रोचक कथाओं और मिथकों के माध्यम से समझाया गया है।यहां  महापुरुषों के चरित्रों के बखान  का भी ध्येय यही रहा है।
'उप -पुराण' भी यही काम करते हैं जो संख्या में कुछ के मुताबिक़ अठारह तथा  कुछ और अन्यों  के मुताबिक़ ४६ बतलाये गए हैं। 

आगम ग्रंथ भी स्मृति ग्रंथ हैं जिनमें चर्चा है :
(१ )'शाक्त' (शक्ति के उपासक )
(२ )'शैव' (शिव भक्त )
(३ )'वैष्णव' (विष्णु भक्त वैष्णव कहाये हैं )तथा 
(४ )'जैन' की 

(ज़ारी )
   

Sacred Scriptures of Sanatan Dharma (HINDI )

हमारे पावन ग्रंथों को दो भागों में रखा जा सकता है :

(१) श्रुति ग्रन्थ और 

(२ )स्मृति ग्रंथ 

श्रुतिग्रंथ शाश्वत सिद्धातों  का बखान करते हैं।स्मृतिग्रंथ इन सिद्धांतों के व्यावहारिक बर्ताव की बात करते हैं। 

वेदों को श्रुति (ग्रंथ) भी कहा गया है क्योंकि इनका प्रसार श्रवण के द्वारा हुआ है। 
वेदों को  कर्म काण्ड और ज्ञान काण्ड के तहत रखा जा सकता है। 

(१ )संहिता और 

(२ )ब्राह्मण ग्रंथों में कर्म काण्ड का   खुलासा  है।

ज्ञान काण्ड को 

(१ ) आरण्यक ग्रंथ और 

(२ )उपनिषद विस्तार से समझाते हैं।  

वेदों को सब सनातन धर्म के ग्रंथों का मूल माना गया है।इनका इहलाम,प्राकट्य ,प्रसव (Revelation ) ,साधना रत ऋषि मुनियों के हृदय  में हुआ। ऋषि कृष्ण द्वैपायन को इस शाश्वत विस्तार पाते ज्ञान को क्रमबद्ध  कर संयोजित और विभाजित करने का नेक काम सौंपा गया। क्योंकि अब इसविस्तृत ज्ञान को  श्रुति परम्परा के तहत समेटना मुश्किल हो चला था। 

इसलिए इन्हें व्यास (विभाजन करता ) कहा गया जो समास का विलोम है। 
चार भागों में समेटा गया   यह वृहद् ज्ञान  :

(१ )रिग वेद जो सामन्य ज्ञान की चर्चा करता है 
(२ ) यजुर्वेद इस ज्ञान को व्यवहार में लाना सिखाता है इसीलिए इसे नालिज  आफ एक्शन (Knowledge of Action )भी कहा गया  है। 
(३ )सामवेद उपासना की पद्धतियां बखान करता है 
(४ )अथर्व वेद विज्ञान का विस्तृतज्ञान  (वि )ज्ञान है। 

उपनिषद का ऋषि कहता है प्रश्न करो। भारतीय मेधा को सारा ज्ञान प्रश्न की मथानी से मथे जाने के बाद ही मिला है।प्रश्न की गुणवत्ता ने ही ज्ञान की गुणवत्ता को सुनिश्चित और स्थापित किया है।आरण्यक और उपनिषद यही काम करते हैं।  अरण्य में साधना करने वालों के लिए हैं आरण्यक। 
२२० उपनिषद की जानकारी श्रुति (गुरु शिष्य परम्परा )के तहत आई है इनमें से १०८ उपनिषद प्रकाशित हैं। 
ग्यारह उपनिषदों की व्याख्या आदिशंकराचार्य ने की है जो शंकर भाष्य कहलाई है। इनमें प्रमुख हैं :

ऐतरेय (ऋग्वेद के तहत ),कठोपनिषद (यजुर्वेद के तहत ),ईशावास्योपनिषद  (ईशोपनिषद )यजुर्वेद के तहत ,छान्दोग्य (सामवेद के अंतर्गत )केनोपनिषद (सामवेद के अंतर्गत ) माण्डूक्य (अथर्वेद ),कौषीतकि (ऋग्वेद )के अंग रूप में ,तैतरीय (यजुर्वेद की शाखा के तहत ),वृहदारण्यक (यजुर्वेदीय उपनिषद ),प्रश्न (प्रश्नोपनिषद )यजुर्वेद तथा मुण्डक (अथर्वेद )की एक शाखा के रूप में जाना गया है।

 ज़ाहिर है हरेक वेद या फिर उसकी आगे की गई शाखाओं के तहत उससे सम्बद्ध कोई न कोई  उपनिषद रहा आया है। 

ऐतरेय उपनिषद हमारे निजस्वरूप (आत्मन )की चर्चा करता है। कठोपनिषद में मृत्यु  के देवता यम और नचिकेता के बीच संवाद हैं । ईशा उपनिषद ब्रह्म और उसकी अनुभूति कैसे हो इस पर रौशनी डालता है। ब्रह्म  वैयक्तिक अनुभव अनुभूति का विषय है इसे ओब्जेक्टिफाई नहीं किया जा सकता। 
छन्दोग्य उपनिषद यज्ञ (fire sacrifice )और उपासना की अन्य पद्धतियों पर प्रकाश डालता है। केन में भी इन्हीं का विस्तार है। माण्डूक्य उपनिषद निराकार परमात्मा (ब्रह्म) की चर्चा करता है। कौषीतकि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का क्या होता है ,प्राण और मोक्ष प्राप्ति की चर्चा करता है। तैतरीय परमात्मा रचित सृष्टि को खोलकर समझाता है। 
वृहदारण्यक स्व :(self )की तमाम अवधारणों को नकारता है। 

It negates all conceptions of self .

 श्वेताश्वर उपनिषद जो युजुर्वेद की एक शाखा के तहत आया है सृष्टि के तमाम प्राकट्य के पीछे केवल ब्रह्म को ही देखता है। सृष्टि ब्रह्म (Brahman )का  ही विस्तार है। अव्यक्त का व्यक्त होना ही है। 

प्रश्नोपनिषद सृष्टि के मूलभूत कारण उसके प्रकार्य ,संचालन ,Functioning of the vital force of life को समझाता है। 

माण्डूक्य जानने योग्य परमज्ञान क्या है जिसे जानने के बाद फिर कुछ और जानना शेष नहीं रहता इसका खुलासा करता है। 

(ज़ारी )

विशेष : प्रकारांतर सृष्टि और ब्रह्म एक दूसरे  से अलग नहीं है यह जो कुछ भी है दृश्य या फिर अ -दृश्य यह ब्रह्म ही है। यही मूल स्वर है उपनिषदों का। 

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

What is Creation (जगत ,सृष्टि ,ब्रह्माण्ड ,कायनात )?

What is Creation (जगत ,सृष्टि ,ब्रह्माण्ड ,कायनात )?

Creation ,Jagat is infinite .Hindus (सनातन धर्मी ,भारत धर्मी समाज )believe that this universe we live in has always existed and will always continue to  exist . Unlike God ,who is subject to modification ,Nature (प्रकृति )is in a state of eternal and constant change .God is the cause for the existence of Prakriti (प्रकृति )just as He is the source of Atma's existence .Due to power of God alone ,Prakriti is undergoing a never -ending cycle of creation ,sustenance and dissolution .Creation ,when properly understood ,should be thought of as a projection of God Himself and not just his creation .

आदि गुरु शंकराचार्य ने कहा -ब्रह्म ही सत्य है जगत(प्रकृति ) मिथ्या है। यह जगत का मिथ्या होना साधारण अर्थों में नहीं है। जगत है दिखलाई  देता है हमारा उसके साथ लेन  देन है ट्रांजेक्शन है। वह व्यावहारिक सत्य है भले परम सत्य न सही क्योंकि निरंतर परिवर्तन शील है अस्थाई है। लेकिन वह है तो ,उसकी सत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता।जो निरंतर बदले वही माया है मेरा आपका हम सबका यह शरीर, हमारी देह माया ही तो है आपका रिफ्लेक्शन आपकी छवि आपकी काया निरंतर बदलती है आपकी देह का  होना एक अवधि है मात्र ६० -७० बरस। लेकिन आपका निजस्वरूप आत्मन (आत्मा )सनातन है।  

यही माया है जो अभी है अभी नहीं है। लेकिन माया ब्रह्म की शक्ति है। त्रिमूर्ति उसका रिफ्लेक्शन है। रचयिता के रूप में ब्रह्मा ,पालक रूप में विष्णु और संहारक रूप में शिव (शंकर )कार्यरत रहते हैं। ब्रह्म ही त्रिमूर्ति का मूर्त रूप है प्राकट्य है। सगुण रूप है। मनिफेस्टेशन है। 

शक्ति (feminine energy )ब्रह्मा का आधा अंश है,लक्ष्मी -सरस्वती -पार्वती रूपों में। 

 माया या प्रकृति ब्रह्म की शक्ति है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया है त्रिदेव इसी  माया में प्रतिबिंबित होता है।इसे ही बाइबिल में The Father ,The Son ,The Holy spirit कहा गया है। अल्लाह भी यही है वाहगुरु भी यही निर्गुण निराकार निर्विशेष ब्रह्म है। 

पूरी कायनात में इसकी व्याप्ति है। कायनात इसका सगुण  रूप है। 

सगुण मीठो खांड सो ,निर्गुण कड़वो नीम ,

जाको गुरु जो परस दे ताहि प्रेम सो जीम 

             ---------- महाकवि संत पीपा    

आप कहते हैं फलां मर गया ,शरीर छोड़ गया। मरता तो शरीर भी नहीं है -स्थूल पांच तत्वों से बनी देह ही सूक्ष्म तत्व रूप में तब्दील भर हो जाती है। स्थूल देह रूप पांच तत्वों  का यह विखंडन बार -बार होता रहता है। आकाश महाआकाश में ,वायु ,वायु में अग्नि ,अग्नि में जल ,जल में पृथ्वी अंश हमारी काया  का पृथ्वी में मिल जाता है सुपुर्दे ख़ाक हो जाता है। अग्नि में विसर्जित हो जाता है।वायु की नमी के हवाले हो जाता है जल तत्व। थोड़ी सी आद्रता (नमी )बढ़ जाती है।