मंगलवार, 25 सितंबर 2012

आधे सच का आधा झूठ

आधे सच का आधा झूठ 

ईस्ट इंडिया कम्पनी की नै अवतार सरकार की दलाली करने वाले हिन्दुस्तान में बहुत से लोग हैं .ये आज भी वही कर रहे हैं जो तब करते थे .ये "आधा सच" बोलतें हैं ,आधा लिखतें हैं .ज़ाहिर है वह खुद ही यह  मान के चल रहें हैं कि जो कुछ वह लिख रहें हैं ,कह रहें हैं उसमें आधा झूठ है .लेकिन मेरे दोस्त आधा झूठ भी बहुत खतरनाक होता है .

भाई साहब जो यह कहता है मैं ने आधा खाया है वह यह मानता है वह आधा भूखा है .वह आधा सच नहीं बोलते पूरा झूठ बोलते हैं .क्या वह यह कहना चाहतें हैं सरकार अन्ना की रिश्तेदार है इसलिए वह अन्ना को कुछ नहीं कहना चाहती .केजरीवाल की रिश्तेदार है इसलिए वह खुला घूम रहें हैं .

दोस्त जो सारी संविधानिक संस्थाओं के अस्त्रों का इस्तेमाल अपने विरोधियों पर करना जानतें हैं और चाहतें भी हैं श्री मान आधा सच आप यह कहना चाहतें हैं वह और उनकी परम -विश्वसनीय सी बी आई मूर्ख है .वह यह नहीं जानती  कि अन्ना और उनकी मण्डली के लोग भ्रष्ट हैं .

जो एक एक विरोधी  पर उपग्रही नजर रखती है श्रीमान आधा सच उस सरकार के मुखिया को पत्र लिख कर क्यों नहीं पूछते -श्री मन यह कैसे हो गया "राजा" अन्दर अन्ना और उसके संतरी  बाहर .ये अगर राष्ट्रीय समस्याएं हैं तो आप देरी क्यों कर रहें हैं पत्र लिखने में .

जिन्हें जूते पड़ने चाहिए उन्हें खडाऊ नहीं मिलने चाहिए - मिस्टर आधा सच को सरकार   लिखना चाहिए रालेगन सिद्धि के लोग कोयले से भी ज्यादा काले हैं .उनसे गुजारिश है कृपया इस नादाँ सरकार को रास्ता दिखाएँ .और सरकार में सम्मानीय स्थान पायें .

Monday, 24 September 2012

अन्ना को दो करोड़ देने की हुई थी पेशकश !

जी अन्ना !  मैंने भी दो करोड़ ही कहा

अन्ना को दो करोड़ रूपये देने की पेशकश अरविंद केजरीवाल ने की थी, लेकिन अन्ना ने ये पैसे लेने से इनकार कर दिया। आज की ये सबसे बड़ी खबर है। लेकिन इस खबर को न्यूज चैनलों ने अपनी  हेडलाइंस में शामिल नहीं किया। दो एक  चैनल ने इस खबर को दिखाया  भी, तो बस कोरम पूरा करने के लिए, मतलब इसे अंडरप्ले कर दिया। हालांकि अब इस पर  कुमार विश्वास की ओर से सफाई आई है कि ये रकम अन्ना को घूस की पेशकश नहीं थी, बल्कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई शुरू की गई है, उसे संचालित करने के लिए जनता ने चंदा दिया था। चूंकि इस पैसे को लेकर केजरीवाल  पर  तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे थे, लिहाजा  इंडिया अगेस्ट करप्सन के खाते से इस रकम का चेक अन्ना को देने के लिेए रालेगन सिद्धि भेजा गया था। बताया  जा रहा है कि केजरीवाल चाहते थे कि इस रकम की देख रेख अन्ना करें, लेकिन अन्ना ने चेक लेने से इनकार कर दिया और कहाकि ये सब काम आप लोग ही करें।

हंसी आ रही है ना। कितनी बड़ी-बड़ी बातें ये लोग किया करते थे। देश में ऐसा माहौल बना दिया था कि जैसे इस टीम के साथ जो लोग नहीं है, वो सभी भ्रष्ट हैं। देश में एक मात्र ईमानदार ये लोग ही हैं  या फिर ये जिन्हें  सर्टिफिकेट दें वो ईमानदार है। अगर आपने मेरे लेख को  पढ़े हैं तो आपको ध्यान होगा कि मैं एक बात पर बार बार जोर  दिया करता हूं। मेरा पक्का विश्वास है कि बेईमानी की बुनियाद पर ईमानदारी की इमारत नहीं खड़ी की जा सकती। और आंदोलन की शुरुआत से ही टीम के भीतर से जो खबरे बाहर आ रहीं थी, उसमें पैसे की हेरा फेरी को लेकर तरह तरह की चर्चा होने लगी थी। हो सकता है कि हमारी और आपकी सोच में अंतर हो, लेकिन मैं आज भी इसी मत का हूं कि जिसे आप सब आंदोलन कहते हैं, मेरा मानना है कि ये शुरू से आंदोलन के रुप में खड़ा ही नहीं हो पाया। दरअसल ये इलेक्ट्रानिक मीडिया का तमाशा भर रहा।

कुछ मीडिया के विद्वान इस आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई बता रहे थे। मैं बहुत हैरान था कि आखिर ऐसा क्या है इस आंदोलन में कि इसे आजादी की दूसरी लड़ाई कहा जाए। कुछ ने तो इस आंदोलन की तुलना जे पी आंदोलन से भी की। जब इसकी तुलना जेपी आंदोलन से होने लगी तो फिर सवाल खड़ा हुआ कि मीडिया इस आंदोलन को क्यों इतना बड़ा बना रही है ? मेरा आज भी मानना है कि जेपी आंदोलन व्यवस्था के खिलाफ एक  संपूर्ण आंदोलन था। ये आंदोलन विदेशी पैसों से खड़ा किया जा रहा था, जिसमें कदम कदम पर पैसे बहाए जा रहे थे। लोगों को पूड़ी सब्जी हलुवा खिलाकर किसी तरह रोका जा रहा था। दिल्ली वालों के लिए शाम का पिकनिक स्पाट बन हुआ था रामलीला मैदान। मीडिया भी इस भीड़ में अपनी टीआरपी तलाश रही थी।

खैर ये बातें मैं आपको पहले भी बता चुका हूं। मैं आज की घटना पर वापस लौटता हूं। अच्छा चलिए आपसे ही एक सवाल पूछता हूं। जब आपको पता चला कि केजरीवाल दो करोड  रुपये का चेक लेकर रालेगन सिद्धि गए और अन्ना को इसे देने का प्रयास किया। ये सुनकर आपके मन में पहली प्रतिक्रिया क्या हुई ? मैं बताता हूं, आप भी मेरी तरह हैरान हुए होंगे कि आखिर ये सब क्या हो रहा है। लेकिन मैं जो बातें अब कहने जा रहा हूं उस पर जरा ध्यान दीजिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की अगुवाई में आंदोलन चल रहा हो, देश भर में लोग मैं अन्ना हूं की टोपी पहन रहे हों और उन्हें ही दो करोड़ रुपये की पेशकश की जाए और ये पेशकश कोई सामान्य आदमी नहीं खुद अरविंद कर रहे हों तो आप इसका मतलब आसानी से निकाल सकते हैं। मतलब ये कि अरविंद कितने दबाव में होगें कि उन्होंने अन्ना को पैसे देने का फैसला कर लिया। ये जानते हुए कि अन्ना पैसे स्वीकार नहीं कर सकते। उनके कई उदाहरण सामने है, जहां उन्हें पुरस्कार में लाखों रुपये मिले तो उन्होंने उसे गांव के विकास कार्यों में लगा दिया या फिर जरूरतमंदों को दान कर दिया। वैसे ये भी  कहा जा रहा है कि अरविंद  ने ये जानबूझ कर किया, क्योंकि वो जानते ही थे कि अन्ना पैसे लेगें नहीं, लेकिन पेशकश कर दिए जाने से उन्हें लगेगा कि अगर उनके मन में गडबड़ी करने की मंशा होती तो ये पेशकश भला क्यों करते ?

बहरहाल अब धीरे धीरे एक एक चेहरे नकाब उतरने वाला है। ये बात अब लगभग साबित हो गई है कि इस टीम के भीतर पैसे को लेकर विवाद शुरू से रहा है। टीम के भीतर जिसने भी अरविंद पर उंगली  उठाई, उसे यहां से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन किरन बेदी से अनबन अरविंद केजरीवाल को भारी पड़ गई। दरअसल अरविंद अपनी सारी बातें अन्ना से मनवा लिया करते थे। इसकी एक मुख्य वजह अन्ना के करीबी यानि पीए सुरेश पढारे हैं। ये कहने की बात है कि सुरेश अन्ना के पीए थे, सच्चाई ये है कि वो अन्ना की हर छोटी बड़ी जानकारी अरविंद को दिया करते थे। अरविंद भी पढारे को इन सबके लिए  अलग से खुश रखते थे। कहा जा रहा है कि सुरेश इस पक्ष में नहीं था कि अन्ना अभी अरविंद का साथ छोड़े, वो  चाहते थे कि अन्ना यहीं बनें रहें।

जानकार बताते हैं कि सुरेश ने अपनी राय भी अन्ना को बता दी थी, लेकिन अन्ना ने सुरेश को डांट दिया था कि तुम इस मामले में ज्यादा आगे आगे मत बोला करो। अरविंद की जरूरत से ज्यादा पैरवी करने को लेकर अन्ना सुरेश से पहले ही नाराज चल रहे थे। इस बीच अन्ना और रामदेव की मुलाकात जिसके बारे में गिने चुने लोगों को जानकारी थी, वो मीडिया तक कैसे पहुंची ? इसे लेकर भी सुरेश की भूमिका पर उंगली उठ रही है। हालाकि सच ये है कि इस बार अन्ना के साथ सुरेश यहां नहीं आए थे,लेकिन उनकी  सभी से बातचीत है, इसलिए अन्ना का मुवमेंट उन्हें आसानी से पता रहता है। बताते हैं कि अन्ना को शक है कि सुरेश ने ही ये जानकारी अरविंद को दी और अरविंद ने ये जानकारी  मीडिया से शेयर की। बहरहाल सुरेश की गतिविधियां पूरी तरह संदिग्ध थीं, यही वजह है कि अन्ना ने सुरेश पढारे की अपने यहां से छुट्टी कर दी।

सुरेश पढारे के बारे में भी आपको बताता चलूं। दरअसल सुरेश पहले ठेकेदारी करता था। गांव के स्कूल का काम  सुरेश ही कर रहा था, लेकिन वो रेत के गोरखधंधे में फंस गया। इस पर ग्रामसभा की बैठक में सुरेश के खिलाफ प्रस्ताव पास हो गया और उससे सभी काम छीन लिए गए। चूंकि ग्राम सभा जो फैसला करती है, उसे नीचा दिखाने की अन्ना कोशिश करते हैं। यही वजह है कि सुरेश के खिलाफ जब ग्राम सभा ने प्रस्ताव पास कर  दिया तो अन्ना ने उसे अपने से जोड़ लिया। हालाकि प्रस्ताव पास होने के दौरान खुद अन्ना भी वहां मौजूद थे। सुरेश को साथ  रखने  के कारण गांव में अन्ना पर भी उंगली उठती रही है।   
    
इसी तरह अन्ना के गांव में एक भ्रष्ट्राचार विरोधी जन आंदोलन न्यास नामक संस्था है। इसकी अगुवाई अन्ना ही करते हैं। कहा जा रहा है कि अगर ईमानदारी से इस संगठन की जांच हो जाए,तो यहां काम करने वाले तमाम लोगों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। आरोप तो यहां तक लगाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार का एक खास अड्डा है ये दफ्तर। यहां एक साहब हैं, उनके पास बहुत थोड़ी से जमीन है, उनकी मासिक पगार भी महज पांच हजार है, लेकिन उनका रहन सहन देखिए तो आप हैरान हो जाएगे। हाथ में 70 हजार रुपये के मोबाइल पर लगातार वो उंगली फेरते रहते हैं। हालत ये है कि इस आफिस के बारे में खुद रालेगनसिद्दि के लोग तरह तरह की टिप्पणी करते रहते हैं। अब अन्ना के आंदोलन का नया पता यही दफ्तर है।

खैर आप बस इंतजार कीजिए हर वो  बात जल्दी ही सामने आ जाएगी, जो मैं आपको पहले ही बताता रहा हूं। अन्ना प्रधानमंत्री पर उंगली उठाते हैं कि ये कैसे प्रधानमंत्री हैं  कि इनके नीचे सब  चोरी करने में लगे रहते हैं और उन्हें खबर तक नहीं होती। अब तो  प्रधानमंत्री  भी ये दावा कर सकते हैं कि अन्ना जी आपकी टीम में भी राजा, कलमाणी, जायसवाल, व्यापारी सब तो हैं। आप कैसे अपनी टीम को ईमानदारी का सर्टिफिकेट बांटते फिर रहे हैं। बहरहाल अभी दो करोड़ रुपये का मामला ठंडा नहीं  पड़ा है। सब  अरविंद  से इस मामले में सफाई चाहते हैं, अब सफाई देने के लिए अरविंद अपने साथियों से सलाह मशविरा कर रहे हैं। बहरहाल वो सफाई  भले दे दें, लेकिन अब जनता में वो भरोसा हासिल करना आसान नहीं है।    


लो कर लो बात! जब सारी दुनिया ये चर्चा कर रही है कि पैसे पेड़ पे नहीं लगते ,अगला अन्ना के कुरते की लम्बाई नाप रहा है यह बौना आदमी इतना लम्बा कुर्ता क्यों पहनता है यह राष्ट्रीय अपव्यय है .जाँ च होनी चाहिए जिस कमरे में रहता है वह वास्तव में दस बाई बारह का है या अन्ना झूठ बोलता है .यही है भाई साहब आधा सच .सारी दुनिया कोयले की बात करती है यह साहब अन्ना के गाँव वासियों को तिहाड़ की काबलियत का बतला रहें हैं यानी कलमाड़ी और कलि मुई /कनी मोई (रिहा है अब )के पास बिठला रहें हैं .

इसे बोलतें हैं राष्ट्री मुद्दों से ध्यान भटकाना .कोंग्रेस को दिग्विजय की छुट्टी करके आधा सच वालों को अपना वक्र मुखिया बना चाहिए .बोले तो प्रवक्ता .जै श्री आधा सच ,पूरा बोले तो हो जाए गर्क .

ये टिप्पणियों पे मोडरेशन लगाने वाले आधा ही सच बोलतें हैं आधा ही दुनिया को दिखातें हैं .


Monday, 24 September 2012
अन्ना को दो करोड़ देने की हुई थी पेशकश !पर एक प्रतिक्रिया .
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  1. मैं तो सच में आपको एक पढ़ा लिखा सीरियस ब्लागर समझता था।
    इसलिए कई बार मैने आपकी बातों का जवाब भी देने की कोशिश की।
    सोचा आपकी संगत गलत है, हो जाता है ऐसा, क्योंकि मुझे उम्मीद थी
    शायद कुछ बात आपकी समझ में आज जाए।
    लेकिन आप तो कुछ संगठनों के लिए काम करते हैं और वहां फुल टाईमर
    यानि वेतन भोगी हैं। यही अनाप शनाप लिखना ही आपको काम के तौर
    सौंपा गया है। एक बात की मैं दाद देता हूं कि आप ये जाने के बगैर की
    आपको लोग पढ़ते भी हैं या नहीं, कहां कहां जाकर कुछ भी लिखते रहते हैं।
    खैर कोई बात नहीं, ये बीमारी ही ऐसी है। वैसे अब आप में सुधार कभी संभव ही
    नहीं है। सुधार के जो बीज आदमी में होते है, उसके सारे सेल आपके मर
    चुके हैं। माफ कीजिएगा पूंछ को सीधा करना मेरे बस की बात नहीं है।
    अब तो ईश्वर ही आपकी कुछ मदद कर सके तो कर सके

दी इनविजिबिल सायलेंट किलर

अमरीका में यह सप्ताह Mitochondrial disease  के बारे में जन चेतना फैलाने के लिए है .यह बीमारी अमरीका

के गले की फांस  बनी हुई है जो Mitochondrail DNA को ही असर ग्रस्त कर देती है .नतीजा होता है कोशाओं

का    ग्रिड फेलियोर  पढ़िए दो किश्तों को समेट कर लिखा गया यह पूरा आलेख -

दी इनविजिबिल सायलेंट किलर



   

क्या है Mitochondrial disease(माई -टो-कोंड्रियल  डिजीज )? 

पांच जुलाई २०११ 

हमारी ज़िन्दगी का यह एक दुखदाई विधायक दिन बन गया यही वह मनहूस दिन था जब मुझे और मेरे पति को बतलाया गया ,आपके बेटे को एक अदृश्य बीमारी अन्दर अन्दर खा  रही है .
कुछ भी तो समझ न आया ये अचानक हुआ क्या ?मेरी तो गर्भावस्था की अवधि भी ठीक ठाक गुजरी थी .दो साल पहले गर्भ धारण किया जब मैं कितनी खुश थी .फिर ये अचानक क्या हुआ क्यों हुआ ?कैसे हुआ ?सवालों का हुजूम मुझे मथे जा रहा था .

इस कमबख्त बीमारी से वाकिफ भी तो बहुत कम लोग हैं .चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे कहा जाता है Mitochondrial disease(MD).

जानना समझना पडा है क्या यह Mitochondria? उससे पहले यह भी कि कोशिकाओं का वह महल जिससे ईंट -दर- ईंट हमारा शरीर बना है उसकी एक एक ईंट बोले तो एकल इकाई जीवन की कोशिका का खुद में मतलब क्या है ?क्या है इसके अन्दर बाहर ?

पता चला जीवन की वह इकाई जिसे हम सेल (कोशिका या कोशा )कहतें हैं  यह  हमारा लघुतम सजीव अंश है इसके केंद्र में एक न्यूक्लियस (केन्द्रक )है जिसे एक द्रव" साइटों -प्लेज्म "घेरे हुए है .और ये सारा तामझाम शरीर रुपी इस रसोई का  एक झिल्ली नुमा कमरे में बंद है .

इसी साइटोंप्लेज्म के अन्दर मौजूद रहतें गोलक या छड -नुमा (दंड की शक्ल के )कुछ पिंड जिन्हें कहा जाता है Mitochondrion .यह पावर हाउस है जो कोशा की ९०% तक ऊर्जा की ज़रुरत पूरी करता है चंद रासायनिक कैंचियों या एंजाइम्स (किन्वकों )की मदद से .यहीं पर खाद्य के अपचयन से ऊर्जा पैदा होती है .खाद्य ऑक्सीजन की मौजूदगी में जलता है .

साइटोंप्लेज्म कहतें ही हैं  कोशिका द्रव्य को .यदि कोशा का केन्द्रक  निकाल दें तो साइटोंप्लेज्म बच जाएगा .

एंजाइम को कैंची इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह एक प्रकार का ऐसा पदार्थ है जो रासायनिक परिवर्तन (खाद्य के अपचयन ) के घटित होने में सहायता करता है परन्तु स्वयं परिवर्तित नहीं होता .

यदि किसी भी वजह से Mitochondria  अपना काम ठीक से नहीं करता कोशा के अन्दर ऊर्जा का टोटा हो जाता है .क्षतिग्रस्त होके कोशा नष्ट होने लगती है .कोशा का यह महल ढह भी सकता है .

अब यदि यही प्रक्रिया सारे शरीर में चल पड़े तो एक एक करके सभी अंग असर ग्रस्त होने लगते हैं .इसे बालकों का कैंसर कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी बहु बिध प्रगटन होता है इस खतरनाक रोग M.D.का 

कुछ में यह बीमारी वंशानुगत कारण लिए रहती है तो कुछ में पर्यावरणी .यानी माई -टो-कोंड्रिया जन्मजात दोष लिए भी हो सकता हैऔर या फिर  हमारे गंधाते हवा मिटटी पानी से भी अन्य पर्यावरणी घटकों से भी असर ग्रस्त हो सकता है .  . 
(ज़ारी )

क्या है Mitochondrial disease(माई -टो-कोंड्रियल  डिजीज )? किस्तों में प्रस्तुत किया जाएगा यह आलेख ताकि इसे मैं खुद भी ठीक से बूझ सकूं .शुक्रिया .

पुनश्च :


क्या है Mitochondrial disease(माई -टो-कोंड्रियल डिजीज )?(दूसरी किश्त )



अमरीका  को  सांसत  में डालने वाली इस बीमारी की गिरिफ्त में वहां प्रत्येक तीस सेकिंड के अन्दर एक नौनिहाल इसकी गिरिफ्त में आ रहा है .United Mitochondrail Disease Foundation के अनुसार दस साला होते होते इन बालकों में इस सायलेंट किलर के लक्षणों का प्रगटीकरण होने लगेगा .

भले यह बीमारी नौनिहालों को निशाने पे लेती हो अब इसका प्रगटीकरण बालिगों में भी आम हो चला है .

समझा जाता है ,यह बीमारी हमारे दिल ,दिमाग,यकृत (लीवर ),कंकालीय (अस्थि पंजर )पेशियों की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करने लगती है .हमारे गुर्दे ,श्वसनी तंत्र यहाँ तक के स्रावी तंत्र (एंडो-क्राइन सिस्टम )के कोशिकाओं को भी नहीं छोडती है नष्ट कर डालती है .(सोचने वाली बात है इसके बाद शरीर में बचता ही क्या है ?).

लक्षण 

पेशीय कमजोरी के अलावा इस बीमारी में खासकर वोलंटरी मसल एक्टिविटी असर ग्रस्त होती है .ज़ाहिर है इसका अंग संचालन पर भी बुरा असर पड़ता है .(loss of motor control ).

उदर और आंत सम्बन्धी (गैस्ट्रो -इंटेस -टी - नल   डिस -ऑर्डर )  विकार ,निगलने सटकने में दिक्कत जैसी परेशानियां सामने आ सकतीं हैं .अवमंदित बढ़वार के अलावा दिल से जुडी तकलीफें ,यकृत से जुडी तकलीफें सिर उठाने लगतीं हैं ,मधुमेह के अलावा श्वसन सम्बन्धी जटिलताएं , सीश्ज़र्स (खासकर मष्तिष्क को लगने वाला झटका ,),बीनाई (विजन )और श्रवण सम्बन्धी समस्याएं सामने आतीं हैं ,बढ़वार देरी से होना ,रोग संक्रमण प्रवणता (आसानी से रोग संक्रमण लग जाना ) इस बीमारी के अन्य लक्षण हैं .

Leigh's Disease - Facts and Information


हमारा बेटा एक ऐसे अपचयन सम्बन्धी विकार से ग्रस्त हो गया है जो नर्वस सिस्टम को असर 

ग्रस्त करता है .चिकित्सा शब्दावली में  


स्थिति को कहतें हैं न्यूरो -मेटा -बोलिक डिसऑर्डर Leigh's Disease.


इसे वंशानुगत विकार कहा गया है .यह एक दिनानुदिन बढ़ते जाने वाला विकार है जो तीन माह 

की उम्र से लेकर दो साला शिशुओं को ही 


अपना निशाना बनाता है .बिरले ही इक्का दुक्का मामलों में यह रोग किशोरों और वयस्कों को 

भी अपनी लपेट में लेता देखा गया है .


आनुवंशिक आधार 

  
समझा जाता है यह रोग Maitochondrail DNA में होने वाले उत्परिवर्तनों (म्यूटेशन ) का 

नतीजा होता है .एक एंजाइम की कमीबेशी 


भी इसकी वजह बन सकती है .यह एंजाइम है :Pyruvate dehydrogenase.



बहत तेज़ी और जल्दी  ही प्रगटन होता है इस बीमारी के लक्षणों का 

चूसने चाटने ,चुस्की लेके पीने में ,स्तन पान करने में शिशु को दिक्कत आने लगती है .

मोटर स्किल्स (अंग संचालान ),हेड कंट्रोल में दिक्कत साफ़ दिखने लगती है .सिर सम्भाल के 

सीधा नहीं बैठ पाता है ऐसे में शिशु .

लगातार रोते रहना ,भूख न लगना ,जी मिचलाना ,मिचली आना ,चिड -चिडाहट और सीश्ज़र 

जैसे लक्षण भी आ जुड़तें हैं .

रोग के बढ़ते जाने के साथ साथ पेशीय ताकत कम होने लगती है ,आम कमजोरी और लेक्टिक 

एसिडोसिस के एपिसोड देखने को मिल 


सकतें हैं .


लेक्टिक एसिडोसिस गुर्दे और श्वसन तंत्र के काम में अड़चन पैदा करती है .


लेक्टिक एसिडोसिस 


इस कंडीशन में लेक्टिक अम्ल खून में जितना तेजी से बढ़ता है उसी हिसाब से उसकी निकासी 

नहीं हो पाती .और लेक्टिक एसिड तब 


बनता है जब शरीर में  ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है . 



दरअसल Leigh's disease में जो Mitochondrial DNA में उत्परिवर्तन आ जातें हैं वो 


mitochondrain के उन ऊर्जा स्रोतों को 


प्रभावित  करने लगतें हैं जो दिमागी कोशिकाओं का संचालान करतें हैं इसीलिए अंग संचालन 

असर ग्रस्त हो जाता है असरग्रस्त शिशु का .      



मुख्य कार्य है क्या Mitochondrion ?


ग्लूकोज़ और फेटि एसिड्स  में मौजूद ऊर्जा को एक ख़ास पदार्थ  'Adenosine triphosphate,' or 

ATP.में  तबदील करना इसका एहम काम है .ATP में 


निहित ऊर्जा ही कोशाओं के अपचयन सम्बन्धी प्रकार्य को चाल्ये रखती है .  

Mitochondrial DNA में होने वाले उत्परिवर्तन कुछ एहम कोशाओं में ऊर्जा का एक दम से तोड़ा (कमी )पैदा कर देतें हैं 

जिसका प्रभाव हमारे स्नायुविक तंत्र (नर्वस सिस्टम 


)पर पड़ता है .इसी वजह से मोटर फंक्शनिंग छीजती चली जाती है वक्त के साथ .,जैसे जैसे बीमारी बढती है ठीक वैसे ही .


IT'S NATIONAL MITOCHONDRIAL DISEASE AWARENESS WEEK IN USA.












सोमवार, 24 सितंबर 2012

क्या है Mitochondrial disease(माई -टो-कोंड्रियल डिजीज )?

       

क्या है Mitochondrial disease(माई -टो-कोंड्रियल  डिजीज )? 

पांच जुलाई २०११ 

हमारी ज़िन्दगी का यह एक दुखदाई विधायक दिन बन गया यही वह मनहूस दिन था जब मुझे और मेरे पति को बतलाया गया ,आपके बेटे को एक अदृश्य बीमारी अन्दर अन्दर खा  रही है .
कुछ भी तो समझ न आया ये अचानक हुआ क्या ?मेरी तो गर्भावस्था की अवधि भी ठीक ठाक गुजरी थी .दो साल पहले गर्भ धारण किया जब मैं कितनी खुश थी .फिर ये अचानक क्या हुआ क्यों हुआ ?कैसे हुआ ?सवालों का हुजूम मुझे मथे जा रहा था .

इस कमबख्त बीमारी से वाकिफ भी तो बहुत कम लोग हैं .चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे कहा जाता है Mitochondrial disease(MD).

जानना समझना पडा है क्या यह Mitochondria? उससे पहले यह भी कि कोशिकाओं का वह महल जिससे ईंट -दर- ईंट हमारा शरीर बना है उसकी एक एक ईंट बोले तो एकल इकाई जीवन की कोशिका का खुद में मतलब क्या है ?क्या है इसके अन्दर बाहर ?

पता चला जीवन की वह इकाई जिसे हम सेल (कोशिका या कोशा )कहतें हैं  यह  हमारा लघुतम सजीव अंश है इसके केंद्र में एक न्यूक्लियस (केन्द्रक )है जिसे एक द्रव" साइटों -प्लेज्म "घेरे हुए है .और ये सारा तामझाम शरीर रुपी इस रसोई का  एक झिल्ली नुमा कमरे में बंद है .

इसी साइटोंप्लेज्म के अन्दर मौजूद रहतें गोलक या छड -नुमा (दंड की शक्ल के )कुछ पिंड जिन्हें कहा जाता है Mitochondrion .यह पावर हाउस है जो कोशा की ९०% तक ऊर्जा की ज़रुरत पूरी करता है चंद रासायनिक कैंचियों या एंजाइम्स (किन्वकों )की मदद से .यहीं पर खाद्य के अपचयन से ऊर्जा पैदा होती है .खाद्य ऑक्सीजन की मौजूदगी में जलता है .

साइटोंप्लेज्म कहतें ही हैं  कोशिका द्रव्य को .यदि कोशा का केन्द्रक  निकाल दें तो साइटोंप्लेज्म बच जाएगा .

एंजाइम को कैंची इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह एक प्रकार का ऐसा पदार्थ है जो रासायनिक परिवर्तन (खाद्य के अपचयन ) के घटित होने में सहायता करता है परन्तु स्वयं परिवर्तित नहीं होता .

यदि किसी भी वजह से Mitochondria  अपना काम ठीक से नहीं करता कोशा के अन्दर ऊर्जा का टोटा हो जाता है .क्षतिग्रस्त होके कोशा नष्ट होने लगती है .कोशा का यह महल ढह भी सकता है .

अब यदि यही प्रक्रिया सारे शरीर में चल पड़े तो एक एक करके सभी अंग असर ग्रस्त होने लगते हैं .इसे बालकों का कैंसर कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी बहु बिध प्रगटन होता है इस खतरनाक रोग M.D.का 

कुछ में यह बीमारी वंशानुगत कारण लिए रहती है तो कुछ में पर्यावरणी .यानी माई -टो-कोंड्रिया जन्मजात दोष लिए भी हो सकता हैऔर या फिर  हमारे गंधाते हवा मिटटी पानी से भी अन्य पर्यावरणी घटकों से भी असर ग्रस्त हो सकता है .  . 
(ज़ारी )

क्या है Mitochondrial disease(माई -टो-कोंड्रियल  डिजीज )? किस्तों में प्रस्तुत किया जाएगा यह आलेख ताकि इसे मैं खुद भी ठीक से बूझ सकूं .शुक्रिया .

पुनश्च :


क्या है Mitochondrial disease(माई -टो-कोंड्रियल डिजीज )?(दूसरी किश्त )



अमरीका  को  सांसत  में डालने वाली इस बीमारी की गिरिफ्त में वहां प्रत्येक तीस सेकिंड के अन्दर एक नौनिहाल इसकी गिरिफ्त में आ रहा है .United Mitochondrail Disease Foundation के अनुसार दस साला होते होते इन बालकों में इस सायलेंट किलर के लक्षणों का प्रगटीकरण होने लगेगा .

भले यह बीमारी नौनिहालों को निशाने पे लेती हो अब इसका प्रगटीकरण बालिगों में भी आम हो चला है .

समझा जाता है ,यह बीमारी हमारे दिल ,दिमाग,यकृत (लीवर ),कंकालीय (अस्थि पंजर )पेशियों की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करने लगती है .हमारे गुर्दे ,श्वसनी तंत्र यहाँ तक के स्रावी तंत्र (एंडो-क्राइन सिस्टम )के कोशिकाओं को भी नहीं छोडती है नष्ट कर डालती है .(सोचने वाली बात है इसके बाद शरीर में बचता ही क्या है ?).

लक्षण 

पेशीय कमजोरी के अलावा इस बीमारी में खासकर वोलंटरी मसल एक्टिविटी असर ग्रस्त होती है .ज़ाहिर है इसका अंग संचालन पर भी बुरा असर पड़ता है .(loss of motor control ).

उदर और आंत सम्बन्धी (गैस्ट्रो -इंटेस -टी - नल   डिस -ऑर्डर )  विकार ,निगलने सटकने में दिक्कत जैसी परेशानियां सामने आ सकतीं हैं .अवमंदित बढ़वार के अलावा दिल से जुडी तकलीफें ,यकृत से जुडी तकलीफें सिर उठाने लगतीं हैं ,मधुमेह के अलावा श्वसन सम्बन्धी जटिलताएं , सीश्ज़र्स (खासकर मष्तिष्क को लगने वाला झटका ,),बीनाई (विजन )और श्रवण सम्बन्धी समस्याएं सामने आतीं हैं ,बढ़वार देरी से होना ,रोग संक्रमण प्रवणता (आसानी से रोग संक्रमण लग जाना ) इस बीमारी के अन्य लक्षण हैं .


Leigh's Disease - Facts and Information


हमारा बेटा एक ऐसे अपचयन सम्बन्धी विकार से ग्रस्त हो गया है जो नर्वस सिस्टम को असर ग्रस्त करता है .चिकित्सा शब्दावली में  


स्थिति को कहतें हैं न्यूरो -मेटा -बोलिक डिसऑर्डर Leigh's Disease.


इसे वंशानुगत विकार कहा गया है .यह एक दिनानुदिन बढ़ते जाने वाला विकार है जो तीन माह की उम्र से लेकर दो साला शिशुओं को ही 


अपना निशाना बनाता है .बिरले ही इक्का दुक्का मामलों में यह रोग किशोरों और वयस्कों को भी अपनी लपेट में लेता देखा गया है .


आनुवंशिक आधार 

  
समझा जाता है यह रोग Maitochondrail DNA में होने वाले उत्परिवर्तनों (म्यूटेशन ) का नतीजा होता है .एक एंजाइम की कमीबेशी 


भी इसकी वजह बन सकती है .यह एंजाइम है :Pyruvate dehydrogenase.


बहत तेज़ी और जल्दी  ही प्रगटन होता है इस बीमारी के लक्षणों का 

चूसने चाटने ,चुस्की लेके पीने में ,स्तन पान करने में शिशु को दिक्कत आने लगती है .

मोटर स्किल्स (अंग संचालान ),हेड कंट्रोल में दिक्कत साफ़ दिखने लगती है .सिर सम्भाल के सीधा नहीं बैठ पाता है ऐसे में शिशु .

लगातार रोते रहना ,भूख न लगना ,जी मिचलाना ,मिचली आना ,चिड -चिडाहट और सीश्ज़र जैसे लक्षण भी आ जुड़तें हैं .

रोग के बढ़ते जाने के साथ साथ पेशीय ताकत कम होने लगती है ,आम कमजोरी और लेक्टिक एसिडोसिस के एपिसोड देखने को मिल 


सकतें हैं .


लेक्टिक एसिडोसिस गुर्दे और श्वसन तंत्र के काम में अड़चन पैदा करती है .


लेक्टिक एसिडोसिस 


इस कंडीशन में लेक्टिक अम्ल खून में जितना तेजी से बढ़ता है उसी हिसाब से उसकी निकासी 

नहीं हो पाती .और लेक्टिक एसिड तब 


बनता है जब शरीर में  ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है . 



दरअसल Leigh's disease में जो Mitochondrial DNA में उत्परिवर्तन आ जातें हैं वो 


mitochondrain के उन ऊर्जा स्रोतों को 


प्रभावित  करने लगतें हैं जो दिमागी कोशिकाओं का संचालान करतें हैं इसीलिए अंग संचालन 

असर ग्रस्त हो जाता है असरग्रस्त शिशु का .      



मुख्य कार्य है क्या Mitochondrion ?


ग्लूकोज़ और फेटि एसिड्स  में मौजूद ऊर्जा को एक ख़ास पदार्थ  'Adenosine triphosphate,' or 

ATP.में  तबदील करना इसका एहम काम है .ATP में 


निहित ऊर्जा ही कोशाओं के अपचयन सम्बन्धी प्रकार्य को चाल्ये रखती है .  

Mitochondrial DNA में होने वाले उत्परिवर्तन कुछ एहम कोशाओं में ऊर्जा का एक दम से तोड़ा (कमी )पैदा कर देतें हैं 

जिसका प्रभाव हमारे स्नायुविक तंत्र (नर्वस सिस्टम 


)पर पड़ता है .इसी वजह से मोटर फंक्शनिंग छीजती चली जाती है वक्त के साथ .,जैसे जैसे बीमारी बढती है ठीक वैसे ही .


IT'S NATIONAL MITOCHONDRIAL DISEASE AWARENESS WEEK IN USA.


























The invisible disease that's killing our son





(CNN)
 -- On July 5, 2011, my husband and I were told that our 2-year-old son has an invisible killer living inside his body.
Just a few short years ago, I was happily pregnant. Now, suddenly: Why? What? When? All these questions came with so few answers about a disease that few know about or understand.
That invisible killer is called mitochondrial disease. Our son's specific mutation is called Leigh's Disease.
We're one of the lucky ones. It took us only a year to get a diagnosis -- a year filled with anesthesia, a CAT scan, a muscle biopsy, a lumbar puncture, an MRI, an echocardiogram, an EKG, specialists and so on. Most families spend years attempting to find a diagnosis because of the complexities of DNA sequencing.
This silent killer is attacking our nation's children at an appalling rate. According to the United Mitochondrial Disease Foundation, every 30 minutes a child is born who will develop a mitochondrial disease by age 10.
As a first-time mom, I had no idea that I should have been scared of mitochondria. All I knew was some fuzzy science from high school biology about mitochondria being the powerhouse cells of our body.
Mitochondria are responsible for creating more than 90% of the energy needed by the body to sustain life and support growth. When they fail, less and less energy is generated within the cell. Cell injury and even cell death follow.
If this process is repeated throughout the body, whole systems begin to fail, and that person's life is severely compromised. The disease primarily affects children, but adult onset is becoming more common.
We were told that diseases of the mitochondria appear to primarily damage cells of the brain, heart, liver, skeletal muscles, kidney and the endocrine and respiratory systems. (Excuse me, but what's left?)
Symptoms may include loss of motor control, muscle weakness and pain, gastrointestinal disorders and swallowing difficulties, poor growth, cardiac disease, liver disease, diabetes, respiratory complications, seizures, visual or hearing problems, lactic acidosis, developmental delays and susceptibility to infection.
Mitochondrial disease is similar to cancer in the way it presents itself -- it can manifest in many forms.
Our son currently presents classic Leigh's symptoms: He has four brain lesions near the deep cerebellum. As his body is attacked with viral infections, fever or even as he gets overheated, he is at risk for additional brain damage that ultimately will result in system failures.
My husband and I were told on July 5, 2011, that our son will die an early death. There are no treatments; there is no cure. We left the doctor's office with instructions to start the "mito cocktail" of supplements, continue with therapy and keep him from getting sick.
We also left the doctor's office with a huge, gaping hole in our hearts. Within a matter of seconds, this huge piece was ripped out and we still haven't quite figured out how to put it back together. Our hearts are bigger now -- we can accept more and give more -- but I don't think the hole will ever mend.
It's National Mitochondrial Disease Awareness week. For us, every day we're deeply aware -- our son is lucky.
Our doctor says he has a mild case of what will one day kill him. We get to hear him say, "I love you" and watch him laugh with friends. So many other "mito" kids can't even roll over, swallow their food or see their favorite "Veggie Tales" character on TV.
There are a lot of days I don't feel so lucky. But then this tow-headed goofball comes barreling at me wanting to give me a bear hug (complete with sound effects) and it snaps me out of my sadness.
My son is my hero. He pushes us to keep going. He is the one enduring endless blood draws, hospital stays and experimental drugs.
There is no cure, but there is hope. Recently, Edison Pharmaceuticals received orphan status for the drug EPI-743. We're one of 128 people in the world who somehow managed to get a spot in their research program.
Essentially, the drug is supposed to help Will's mitochondria function better, giving him increased energy and a chance at a better quality of life.
I often find myself feeling guilty that we're on it when there are so many others who should be. Likely, by the time the Food and Drug Administration approves it, many of these children will perish. It's not a cure, but it is a sign of hope.
You might be wondering how you can help. The first thing I would suggest is to get informed. Organizations like the United Mitochondrial Disease Foundation or websites like Mitoaction.orgare good starting places.
Second, get involved. Find your local UMDF chapter and join one of the Energy for Life walks.
And lastly, you probably know someone whose child suffers from asilent or chronic disease -- autism, diabetes, multiple sclerosis, mitochondrial disease or cancer. We all just want to be "normal." A hug, a kind note of support or just a friendly smile at the grocery store goes a long way.



(CNN)
 -- On July 5, 2011, my husband and I were told that our 2-year-old son has an invisible killer living inside his body.
Just a few short years ago, I was happily pregnant. Now, suddenly: Why? What? When? All these questions came with so few answers about a disease that few know about or understand.
That invisible killer is called mitochondrial disease. Our son's specific mutation is called Leigh's Disease.
We're one of the lucky ones. It took us only a year to get a diagnosis -- a year filled with anesthesia, a CAT scan, a muscle biopsy, a lumbar puncture, an MRI, an echocardiogram, an EKG, specialists and so on. Most families spend years attempting to find a diagnosis because of the complexities of DNA sequencing.
This silent killer is attacking our nation's children at an appalling rate. According to the United Mitochondrial Disease Foundation, every 30 minutes a child is born who will develop a mitochondrial disease by age 10.
As a first-time mom, I had no idea that I should have been scared of mitochondria. All I knew was some fuzzy science from high school biology about mitochondria being the powerhouse cells of our body.
Mitochondria are responsible for creating more than 90% of the energy needed by the body to sustain life and support growth. When they fail, less and less energy is generated within the cell. Cell injury and even cell death follow.
If this process is repeated throughout the body, whole systems begin to fail, and that person's life is severely compromised. The disease primarily affects children, but adult onset is becoming more common.
We were told that diseases of the mitochondria appear to primarily damage cells of the brain, heart, liver, skeletal muscles, kidney and the endocrine and respiratory systems. (Excuse me, but what's left?)
Symptoms may include loss of motor control, muscle weakness and pain, gastrointestinal disorders and swallowing difficulties, poor growth, cardiac disease, liver disease, diabetes, respiratory complications, seizures, visual or hearing problems, lactic acidosis, developmental delays and susceptibility to infection.
Mitochondrial disease is similar to cancer in the way it presents itself -- it can manifest in many forms.
Our son currently presents classic Leigh's symptoms: He has four brain lesions near the deep cerebellum. As his body is attacked with viral infections, fever or even as he gets overheated, he is at risk for additional brain damage that ultimately will result in system failures.
My husband and I were told on July 5, 2011, that our son will die an early death. There are no treatments; there is no cure. We left the doctor's office with instructions to start the "mito cocktail" of supplements, continue with therapy and keep him from getting sick.
We also left the doctor's office with a huge, gaping hole in our hearts. Within a matter of seconds, this huge piece was ripped out and we still haven't quite figured out how to put it back together. Our hearts are bigger now -- we can accept more and give more -- but I don't think the hole will ever mend.
It's National Mitochondrial Disease Awareness week. For us, every day we're deeply aware -- our son is lucky.
Our doctor says he has a mild case of what will one day kill him. We get to hear him say, "I love you" and watch him laugh with friends. So many other "mito" kids can't even roll over, swallow their food or see their favorite "Veggie Tales" character on TV.
There are a lot of days I don't feel so lucky. But then this tow-headed goofball comes barreling at me wanting to give me a bear hug (complete with sound effects) and it snaps me out of my sadness.
My son is my hero. He pushes us to keep going. He is the one enduring endless blood draws, hospital stays and experimental drugs.
There is no cure, but there is hope. Recently, Edison Pharmaceuticals received orphan status for the drug EPI-743. We're one of 128 people in the world who somehow managed to get a spot in their research program.
Essentially, the drug is supposed to help Will's mitochondria function better, giving him increased energy and a chance at a better quality of life.
I often find myself feeling guilty that we're on it when there are so many others who should be. Likely, by the time the Food and Drug Administration approves it, many of these children will perish. It's not a cure, but it is a sign of hope.
You might be wondering how you can help. The first thing I would suggest is to get informed. Organizations like the United Mitochondrial Disease Foundation or websites like Mitoaction.orgare good starting places.
Second, get involved. Find your local UMDF chapter and join one of the Energy for Life walks.
And lastly, you probably know someone whose child suffers from asilent or chronic disease -- autism, diabetes, multiple sclerosis, mitochondrial disease or cancer. We all just want to be "normal." A hug, a kind note of support or just a friendly smile at the grocery store goes a long way.