मंगलवार, 28 अगस्त 2012

Hip ,Sacroiliac Leg Problems

Hip ,Sacroiliac Leg Problems(हिन्दुस्तानी जबान में भी आ रहा है यह मह्त्वपूर्ण आलेख ,विषय की गभीरता और थोड़ी सी 

क्लिष्टता को देख कर लगा पहले एक बेकग्राउंडर आधारीय  आलेख अंग्रेजी में दिया जाए ताकी विषय की एक झलक तो मिल जाए वायदा है समझाया जाएगा यह आलेख हिंदी में ,अभी इस श्रृंखला के तीन -चार आलेख और आने हैं ,अब तक जो इस अभिनव विषय पर आप लोगों का रेस्पोंस मिला है उससे हौसला बढ़ा है ).

Hip ,Sacroiliac Leg Problems









































सोमवार, 27 अगस्त 2012

अतिशय रीढ़ वक्रता (Scoliosis) का भी समाधान है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली में


एक दिशा ओर को रीढ़ का अतिरिक्त झुकाव बोले तो Scoliosis 

कई  मर्तबा हमारी रीढ़ साइडवेज़  ज़रुरत से ज्यादा वक्रता लिए रहती है चिकित्सा शब्दावली में इसे ही कहा जाता है -Scoliosis .

24 हड्डियों (अस्थियों )की बनी होती है हमारी रीढ़ (स्पाइन )जिन्हें vertebrae कहा जाता है .रीढ़ की हड्डी की गुर्री का एक अंश है ये vertebra जिसे   कशेरुका भी कहा जाता है .रीढ़ वाले प्राणियों को कहा जाता है कशेरुकी जीव (vertebrate ). 

ये कशेरुका एक के ऊपर एक रखी होतीं हैं .रीढ़ को सामने से पीछे की ओर देखने पर वह सीधी (ऋजु रेखीय )ही दिखलाई देती है .

बेशक रीढ़ एक दम से सीधी नहीं होतीं हैं और  ऐसा होना एक  दम से सामान्य बात है.नोर्मल ही समझा जाता है .लेकिन जब यही रीढ़ आढ़ी तिरछी टेढ़ी मेढ़ी ज़रुरत से ज्यादा होती है  तब  यह असामान्य बात है ,एक रोगात्मक स्थिति भी हो सकती है यह जिसका आपको ज़रा भी भान (इल्म )नहीं है .

  

When the spine curves excessively it can be abnormal and it is called scoliosis (Greek for "crooked "). 

क्या वजह बनती है इस असामान्य रीढ़ अति -वक्रता  (scoliosis)की ?

रीढ़ अति - वक्रता के ज्यादातर मामलों में वजह  नामालूम ही बनी रहती है .देखने में रीढ़ की तमाम अस्थियाँ (vertebrae),रीढ़ संरचना (बनावट ) -डिस्क ,तमाम अश्थी  बंध(लिगामेंट्स ) ) ,कंडरा
(मांस पेशी को हड्डी से जोड़ने वाली नसें टेंडन )और तमाम पेशियाँ एक दम से सामान्य लग सकतीं हैं .

बाकी मामलों में रीढ़अति - वक्रता की वजह ट्यूमर (कैंसर गांठ या अर्बुद ,रोगात्मक शरीर में ऊतकों की असामान्य वृद्धि यानी  रसौली), रोग संक्रमण ,सेरिब्रल पालसी (cerebral palsy ),मस्क्युलर डिसट्रोफी (muscular dystrophy),birth deformity (प्रसव से पैदा जन्म विरूपता ),डिस्क की समस्या भी हो सकती है .

रीढ़ अति -वक्रता को लेकर एक उलझाव यह भी बना रहा है कि क्यों कुछ मामलों में नामालूम सी वक्रता (minor spinal curves) बद  से बदतर हो जाती है जबकि ९०% मामलों में ऐसा कुछ भी नहीं होता है .

लेकिन आम धारणा के विपरीत पूअर पोश्चर स्कोलिओसिस की वजह नहीं हैं .यह भी भ्रांत धारणा है कि जो महिलाएं रीढ़अति - वक्रता से ग्रस्त होतीं हैं उन्हें  गर्भकाल पूरा करने में मुश्किल पेश आती है .     

दरहकीकत ज्यादार लोगों को न इस स्थिति का कोई इल्म होता है न ही इसके कोई दुष्प्रभाव सामने आतें हैं .सामन्य जीवन जीतें हैं ये लोग .किसी की मौत नहीं होती है स्कोलिओसिस से .

लेकिन अति उग्र मामलों में जब वक्रता ज़रुरत से ज्यादा होती है रीढ़ अति - वक्रता से ग्रस्त व्यक्ति को श्वसन सम्बन्धी   समस्या के अलावा दिल से जुडी तकलीफें भी घेर सकतीं हैं .

Unknown Controlling Factor

माहिरों के अनुसार ऐसा मालूम होता है , कि रीढ़ की अति वक्रता (अति वक्र रीढ़ )के लिए कुछ ऐसे घटक हैं ज़रूर जिनका हमें कोई इल्म नहीं हैं ,हमारे लिए फिलवक्त ये अबूझ ,अज्ञेय ,अन -अनुमेय ही बने हुएँ हैं .यही फेक्टर्स अच्छी खासी नोर्मल रीढ़ को अजीबोगरीब लहरदार आकृति दे देतें हैं .

लेकिन क्या कोई आनुवंशिक चीज़ें भी इसके लिए कुसूरवार ठहराई जा सकतीं हैं ?

कोई संवेगात्मक फेक्टर्स भी क्या रीढ़ की सामान्य आकृति को इस कदर  बिगाड़ सकतें हैं ?

क्या इसके लिए व्यक्ति विशेष का स्नायुविक तंत्र ही तो जिम्मेवार नहीं हैं ?

किस्सा गो ये है कि अब तक केवल एक ही राय है जिस पर सहमती है कि कोई एक राय नहीं है .

Bracing And Other treatments 

विरूपण  की ,बे -इंतिहा आकृति परिवर्तन की दुरुस्ती  के लिए रीढ़ को तार से बाँधना टेढ़े मेढ़े दांतों की दुरुस्ती की मानिंद तथा अन्य उपाय 

क्या ब्रेसिंग वास्तव में मददगार सिद्ध होती है ?आरम्भिक अध्ययनों से यह पता ज़रूर चला ,लहरिया या रीढ़ की यह अति वक्रता स्कोलिओसिस   ५०% मामलों में औसतन समाप्त हो जाती है लेकिन दीर्घावधि में यह लाभ जाता रहता है ,लॉन्ग टर्म फोलो अप से यह भी पता चला है .

विद्युत् उत्तेजन (इलेक्ट्रिकल स्तिम्युलेशन )भी अकसर निष्प्रभावी साबित हुआ है तथा प्लास्टर कास्ट भावात्मक रूप से ठेस पहुंचाने वाले सिद्ध  हैं .

Overtreatment ?

According to Robert Mendelsohn ,MD : "Scoliosis is not serious unless the curvature of the spine is severe ,but it is overtreated almost as often as it is overdiagonosed .If your  child is diagnosed as a victim of scoliosis ,don't accept surgical procedures or even bracing without first exploring all of the less radical treatment alternatives.

"Epidemiological studies on scoliosis are so scanty that we know next to nothing .There are  no prospective controlled studies  regarding the effects of orthotic treatment on the natural history of idiopathic scoliosis ......Is anything actually prevented or is progression merely delayed until a later period of time ?The answers are simply not known .

यहाँ ओर्थोटिक का मतलब अश्थियों की विकृति  की दुरुस्ती में इस्तेमाल होने वाली युक्तियों यथा ब्रेसिज़ का अध्ययन करने वाला विज्ञान .चिकित्सा इंजिनीयरिंग की एक विधा है यह शाखा .ईडीयो-पैथ -इक का मतलब एक ऐसा विकार या बीमारी होता है जिसकी वजह मालूम नहीं होती .

Neurological Disturbance

क्या संकेत मिल रहें हैं अभिनव शोध से ?

रीढ़ अति वक्रता से ताल्लुक रखने वाले अभिनव शोध कार्य  से पता चलता है कि इस स्थिति की एक वजह स्नायुविक तंत्र के उस भाग में गडबडी या विक्षोभ का होना बन सकता है जो पोश्चर(व्यक्ति की खड़ा होने ,बैठने ,लेटने की मुद्रा ) को नियंत्रित करता है ,संतुलन को बनाए रखता है और जिसका सम्बन्ध पोजिशनिंग से बना रहता है .  

क्या किया जाता है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा के तहत ?

काइरो -प्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली एकल रोगों का इलाज़ नहीं है और न ही अति -रीढ़ वक्रता का होता है .इसका मकसद vertebral subluxation complex की दुरुस्ती होता है -यह एक ऐसी कायिक स्थिति होती है जो स्नायुविक प्रणाली के समुचित काम करने के ढंग को  असरग्रस्त करती है .Subluxation is partial dislocation of bones that leaves them misaligned but still in some contact with each other .आम भाषा में कहें तो रीढ़ की हड्डियों का परस्पर विरूपण ,विचलन या विक्षोभ है ,संरेखण या सीध  खो देना है .  काया पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है .स्कोलिओसिस का संभावित रिश्ता स्नायुविक दोषों से ताल्लुक रखे हो सकता है जैसा की नै रिसर्च अब इशारा कर रही है .यही इशारा काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा को पुनर्बलित करता है ,सुदृढ़ करता है ,नया विश्वास पैदा करता है इसके प्रभावी होने में .

Fred Barge ,DC,in Idiopathic Scoliosis : Identifiable causes ,Detection and Correction ,gives 22 examples of cases of adolescent idiopathic scoliosis with significant improvement with chiropractic .One report of 100 chiropractic patients revealed 84%improved .In 6.8 % the correction was total ; in 35.6 % there was significant correction ; in 41.2%there was a small correction ,while 16.4% showed no change or worsening of curves.

Case Studies

अध्ययनों  के झरोखे से 

एकल मामलों की यहाँ भरमार है .

एक दस साला लड़की की रीढ़ में ४८ डिग्री का झुकाव था .सीवीयर स्कोलोसिस ऑफ़ ४८ डिग्रीज़ का माला था यह .काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा के दस समायोजन (एडजस्टमेंट सत्र )लेने के बाद उसकी रीढ़ वक्रता घटकर १२ डिग्रीज़ पर आ गई .अब वह मज़े से है रोगों का मुकाबला करने की पहले से कहीं बेहतर स्थिति में है बकौल उसकी माँ अब वह एक खुशहाल बालक है .

दूसरा मामला एक नौ साला बच्चे का है जो जन्म से ही अति -रीढ़ वक्रता लिए आया था .ईडियोपैथ -इक स्कोलिओसिस का मामला था यह .रुक रुक कर इस बालक को कमर दर्द होता था .इसे काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा के लिए लाया गया था .पहले ही समायोजन के बाद इसका पोश्चर सुधरने लगा .पांच महीने की कायरोप्रेक्टिक चिकित्सा (आवधिक समायोजन)के बाद इसकी  स्कोलिओसिस में ८८%घटाव आया . 

एकल मामले सभी उम्र के लोगों से ताल्लुक रखतें हैं यहाँ सिर्फ बच्चों  के दो मामलों को हवाला दिया गया है .

आपको पुन :स्मरण करवा दें केवल एक काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा व्यवस्था से ताल्लुक रखने वाला चिकित्सक (काइरोप्रेक्टर )ही रीढ़ में पैदा विरूपण को दूर कर सकता है .रीढ़ की गड़बड़ियां (vertebral subluxations ) असामान्यताएँ केवल रीढ़ को ही नहीं हमारी पूरी काया को असर ग्रस्त करतीं हैं . 

स्कोलिओसिस से पीड़ित व्यक्ति को काइरोप्रेक्टिक देखभाल के लिए आगे आना चाहिए .

subluxations से मुक्त काया ही कायिक असामान्यताओं ,तमाम तरह की बीमारियों का बेहतर ढंग से मुकाबला कर सकती है .चाहे फिर वह स्कोलिओसिस (रीढ़ वक्रता )ही क्यों न हो . 

अतिशय रीढ़ वक्रता (Scoliosis) का भी समाधान है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली में  

रविवार, 26 अगस्त 2012

एक दिशा ओर को रीढ़ का अतिरिक्त झुकाव बोले तो Scoliosis

एक दिशा ओर को रीढ़ का अतिरिक्त झुकाव बोले तो Scoliosis 

कई  मर्तबा हमारी रीढ़ साइडवेज़  ज़रुरत से ज्यादा वक्रता लिए रहती है चिकित्सा शब्दावली में इसे ही कहा जाता है -Scoliosis .

24 हड्डियों (अस्थियों )की बनी होती है हमारी रीढ़ (स्पाइन )जिन्हें vertebrae कहा जाता है .रीढ़ की हड्डी की गुर्री का एक अंश है ये vertebra जिसे   कशेरुका भी कहा जाता है .रीढ़ वाले प्राणियों को कहा जाता है कशेरुकी जीव (vertebrate ). 

ये कशेरुका एक के ऊपर एक रखी होतीं हैं .रीढ़ को सामने से पीछे की ओर देखने पर वह सीधी (ऋजु रेखीय )ही दिखलाई देती है .

बेशक रीढ़ एक दम से सीधी नहीं होतीं हैं और  ऐसा होना एक  दम से सामान्य बात है.नोर्मल ही समझा जाता है .लेकिन जब यही रीढ़ आढ़ी तिरछी टेढ़ी मेढ़ी ज़रुरत से ज्यादा होती है  तब  यह असामान्य बात है ,एक रोगात्मक स्थिति भी हो सकती है यह जिसका आपको ज़रा भी भान (इल्म )नहीं है .

  

When the spine curves excessively it can be abnormal and it is called scoliosis (Greek for "crooked "). 

क्या वजह बनती है इस असामान्य रीढ़ अति -वक्रता  (scoliosis)की ?

रीढ़ अति - वक्रता के ज्यादातर मामलों में वजह  नामालूम ही बनी रहती है .देखने में रीढ़ की तमाम अस्थियाँ (vertebrae),रीढ़ संरचना (बनावट ) -डिस्क ,तमाम अश्थी  बंध(लिगामेंट्स ) ) ,कंडरा
(मांस पेशी को हड्डी से जोड़ने वाली नसें टेंडन )और तमाम पेशियाँ एक दम से सामान्य लग सकतीं हैं .

बाकी मामलों में रीढ़अति - वक्रता की वजह ट्यूमर (कैंसर गांठ या अर्बुद ,रोगात्मक शरीर में ऊतकों की असामान्य वृद्धि यानी  रसौली), रोग संक्रमण ,सेरिब्रल पालसी (cerebral palsy ),मस्क्युलर डिसट्रोफी (muscular dystrophy),birth deformity (प्रसव से पैदा जन्म विरूपता ),डिस्क की समस्या भी हो सकती है .

रीढ़ अति -वक्रता को लेकर एक उलझाव यह भी बना रहा है कि क्यों कुछ मामलों में नामालूम सी वक्रता (minor spinal curves) बद  से बदतर हो जाती है जबकि ९०% मामलों में ऐसा कुछ भी नहीं होता है .

लेकिन आम धारणा के विपरीत पूअर पोश्चर स्कोलिओसिस की वजह नहीं हैं .यह भी भ्रांत धारणा है कि जो महिलाएं रीढ़अति - वक्रता से ग्रस्त होतीं हैं उन्हें  गर्भकाल पूरा करने में मुश्किल पेश आती है .     

दरहकीकत ज्यादार लोगों को न इस स्थिति का कोई इल्म होता है न ही इसके कोई दुष्प्रभाव सामने आतें हैं .सामन्य जीवन जीतें हैं ये लोग .किसी की मौत नहीं होती है स्कोलिओसिस से .

लेकिन अति उग्र मामलों में जब वक्रता ज़रुरत से ज्यादा होती है रीढ़ अति - वक्रता से ग्रस्त व्यक्ति को श्वसन सम्बन्धी   समस्या के अलावा दिल से जुडी तकलीफें भी घेर सकतीं हैं .

Unknown Controlling Factor

माहिरों के अनुसार ऐसा मालूम होता है , कि रीढ़ की अति वक्रता (अति वक्र रीढ़ )के लिए कुछ ऐसे घटक हैं ज़रूर जिनका हमें कोई इल्म नहीं हैं ,हमारे लिए फिलवक्त ये अबूझ ,अज्ञेय ,अन -अनुमेय ही बने हुएँ हैं .यही फेक्टर्स अच्छी खासी नोर्मल रीढ़ को अजीबोगरीब लहरदार आकृति दे देतें हैं .

लेकिन क्या कोई आनुवंशिक चीज़ें भी इसके लिए कुसूरवार ठहराई जा सकतीं हैं ?

कोई संवेगात्मक फेक्टर्स भी क्या रीढ़ की सामान्य आकृति को इस कदर  बिगाड़ सकतें हैं ?

क्या इसके लिए व्यक्ति विशेष का स्नायुविक तंत्र ही तो जिम्मेवार नहीं हैं ?

किस्सा गो ये है कि अब तक केवल एक ही राय है जिस पर सहमती है कि कोई एक राय नहीं है .

Bracing And Other treatments 

विरूपण  की ,बे -इंतिहा आकृति परिवर्तन की दुरुस्ती  के लिए रीढ़ को तार से बाँधना टेढ़े मेढ़े दांतों की दुरुस्ती की मानिंद तथा अन्य उपाय 

क्या ब्रेसिंग वास्तव में मददगार सिद्ध होती है ?आरम्भिक अध्ययनों से यह पता ज़रूर चला ,लहरिया या रीढ़ की यह अति वक्रता स्कोलिओसिस   ५०% मामलों में औसतन समाप्त हो जाती है लेकिन दीर्घावधि में यह लाभ जाता रहता है ,लॉन्ग टर्म फोलो अप से यह भी पता चला है .

विद्युत् उत्तेजन (इलेक्ट्रिकल स्तिम्युलेशन )भी अकसर निष्प्रभावी साबित हुआ है तथा प्लास्टर कास्ट भावात्मक रूप से ठेस पहुंचाने वाले सिद्ध  हैं .

Overtreatment ?

According to Robert Mendelsohn ,MD : "Scoliosis is not serious unless the curvature of the spine is severe ,but it is overtreated almost as often as it is overdiagonosed .If your  child is diagnosed as a victim of scoliosis ,don't accept surgical procedures or even bracing without first exploring all of the less radical treatment alternatives.

"Epidemiological studies on scoliosis are so scanty that we know next to nothing .There are  no prospective controlled studies  regarding the effects of orthotic treatment on the natural history of idiopathic scoliosis ......Is anything actually prevented or is progression merely delayed until a later period of time ?The answers are simply not known .

यहाँ ओर्थोटिक का मतलब अश्थियों की विकृति  की दुरुस्ती में इस्तेमाल होने वाली युक्तियों यथा ब्रेसिज़ का अध्ययन करने वाला विज्ञान .चिकित्सा इंजिनीयरिंग की एक विधा है यह शाखा .ईडीयो-पैथ -इक का मतलब एक ऐसा विकार या बीमारी होता है जिसकी वजह मालूम नहीं होती .

Neurological Disturbance

क्या संकेत मिल रहें हैं अभिनव शोध से ?

रीढ़ अति वक्रता से ताल्लुक रखने वाले अभिनव शोध कार्य  से पता चलता है कि इस स्थिति की एक वजह स्नायुविक तंत्र के उस भाग में गडबडी या विक्षोभ का होना बन सकता है जो पोश्चर(व्यक्ति की खड़ा होने ,बैठने ,लेटने की मुद्रा ) को नियंत्रित करता है ,संतुलन को बनाए रखता है और जिसका सम्बन्ध पोजिशनिंग से बना रहता है .  

क्या किया जाता है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा के तहत ?

काइरो -प्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली एकल रोगों का इलाज़ नहीं है और न ही अति -रीढ़ वक्रता का होता है .इसका मकसद vertebral subluxation complex की दुरुस्ती होता है -यह एक ऐसी कायिक स्थिति होती है जो स्नायुविक प्रणाली के समुचित काम करने के ढंग को  असरग्रस्त करती है .Subluxation is partial dislocation of bones that leaves them misaligned but still in some contact with each other .आम भाषा में कहें तो रीढ़ की हड्डियों का परस्पर विरूपण ,विचलन या विक्षोभ है ,संरेखण या सीध  खो देना है .  काया पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है .स्कोलिओसिस का संभावित रिश्ता स्नायुविक दोषों से ताल्लुक रखे हो सकता है जैसा की नै रिसर्च अब इशारा कर रही है .यही इशारा काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा को पुनर्बलित करता है ,सुदृढ़ करता है ,नया विश्वास पैदा करता है इसके प्रभावी होने में .

Fred Barge ,DC,in Idiopathic Scoliosis : Identifiable causes ,Detection and Correction ,gives 22 examples of cases of adolescent idiopathic scoliosis with significant improvement with chiropractic .One report of 100 chiropractic patients revealed 84%improved .In 6.8 % the correction was total ; in 35.6 % there was significant correction ; in 41.2%there was a small correction ,while 16.4% showed no change or worsening of curves.

Case Studies

अध्ययनों  के झरोखे से 

एकल मामलों की यहाँ भरमार है .

एक दस साला लड़की की रीढ़ में ४८ डिग्री का झुकाव था .सीवीयर स्कोलोसिस ऑफ़ ४८ डिग्रीज़ का माला था यह .काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा के दस समायोजन (एडजस्टमेंट सत्र )लेने के बाद उसकी रीढ़ वक्रता घटकर १२ डिग्रीज़ पर आ गई .अब वह मज़े से है रोगों का मुकाबला करने की पहले से कहीं बेहतर स्थिति में है बकौल उसकी माँ अब वह एक खुशहाल बालक है .

दूसरा मामला एक नौ साला बच्चे का है जो जन्म से ही अति -रीढ़ वक्रता लिए आया था .ईडियोपैथ -इक स्कोलिओसिस का मामला था यह .रुक रुक कर इस बालक को कमर दर्द होता था .इसे काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा के लिए लाया गया था .पहले ही समायोजन के बाद इसका पोश्चर सुधरने लगा .पांच महीने की कायरोप्रेक्टिक चिकित्सा (आवधिक समायोजन)के बाद इसकी  स्कोलिओसिस में ८८%घटाव आया . 

एकल मामले सभी उम्र के लोगों से ताल्लुक रखतें हैं यहाँ सिर्फ बच्चों  के दो मामलों को हवाला दिया गया है .

आपको पुन :स्मरण करवा दें केवल एक काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा व्यवस्था से ताल्लुक रखने वाला चिकित्सक (काइरोप्रेक्टर )ही रीढ़ में पैदा विरूपण को दूर कर सकता है .रीढ़ की गड़बड़ियां (vertebral subluxations ) असामान्यताएँ केवल रीढ़ को ही नहीं हमारी पूरी काया को असर ग्रस्त करतीं हैं . 

स्कोलिओसिस से पीड़ित व्यक्ति को काइरोप्रेक्टिक देखभाल के लिए आगे आना चाहिए .

subluxations से मुक्त काया ही कायिक असामान्यताओं ,तमाम तरह की बीमारियों का बेहतर ढंग से मुकाबला कर सकती है .चाहे फिर वह स्कोलिओसिस (रीढ़ वक्रता )ही क्यों न हो . 

शनिवार, 25 अगस्त 2012

काइरोप्रेक्टिक में भी है समाधान साइटिका का ,दर्दे -ए -टांग का

गृधसी नाड़ी और टांगों का दर्द (Sciatica & Leg Pain)

सुष्मना  ,पिंगला और इड़ा हमारे शरीर की तीन प्रधान नाड़ियाँ है लेकिन नसों का एक पूरा नेटवर्क है हमारी काया में इनमें से सबसे लम्बी नस को हम नाड़ी कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहें हैं .यही सबसे लम्बी और बड़ी (दीर्घतमा ) नस (नाड़ी )है :गृधसी या सियाटिका .हमारी कमर  के निचले भाग में पांच छोटी छोटी नसों के संधि स्थल से इसका आगाज़ होता है और इसका अंजाम पैर के अगूंठों पर जाके होता है .यानी नितम्ब के,हिप्स के , जहां जोड़ हैं वहां से चलती है यह और वाया हमारे श्रोणी क्षेत्र (Pelvis),जांघ (जंघा ) के  पिछले  हिस्से ,से होते हुए घुटनों पिंडलियों से होती अगूंठों तक जाती है यह अकेली नस ,तंत्रिका या नाड़ी(माफ़ कीजिए इसे नाड़ी कहने की छूट आपसे ले चुका हूँ ).

क्या है   गृधसी की रोगात्मक स्थिति ?

What Is Siatica ?

इस दीर्घतमा नाड़ी की सोजिश एक ऐसी रोगात्मक स्थिति पैदा करती है जिसका हश्र होता है बेहद की असह पीड़ा में .दर्द की लहर नाड़ी के शुरु से आखिरी छोर  तक लपलपाती आगे तक जाती  .लेकिन यह लहर कमर की तरफ भी ऐसे ही  जा सकती है .आयुर्वेद के हिसाब से यह "वात नाड़ी" है जो "वात तत्व" के बढ़ जाने पर सूज कर सक्रीय हो जाती है .शरीर में वात बढ़ने से  गृधसी रोग होता है .योग चूडामणि में भी दस बड़ी नाड़ियों का ज़िक्र है .७२,००० छोटी छोटी रेखाओं सी फैली नसों का भी  ज़िक्र है .जिनमें दस बड़ी नाड़ी यहाँ बतलाई गईं हैं .

इस असह पीड़ा के अलावा सुइयों की चुभन ,जलन और शरीर के इन हिस्सों की चमड़ी में एक चुभन के अलावा झुनझुनी भी चढ़ सकती है कील की चुभन भी पैदा होती है .लग सकता है इन हिस्सों में कीड़े मकोड़े रेंग रहें हैं ,छूने पर दर्द कर सकता है ये हिस्सा ,एक दम से संवेदनशील हो जाता है .इसके ठीक   विपरीत टांग सुन्न भी हो सकती है .सुन्ना सा लग सकता है टांग में (पिंडलियों और एडी के बीच का हिस्सा सुन्न भी पड़ सकता है ).

मामला तब और भी जटिल हो जाता है और इस मर्ज़ के लक्षण कुछ और  उग्र जब कुछ लोगों में यह दर्द टांगों के अगले भाग को या पार्श्व को भी अपनी चपेट में लेने लगता है ,नितम्बों में भी होने लगता है  जबकि अकसर यह टांगों  या जंघा के पिछले हिस्से तक ही सीमित रहता है .

कुछ में यह दर्द दोनों टांगों में आजाता है इसे तब कहतें हैं -दुतरफा  गृधसी(bilateral sciatica).

Like A Knife 

बेशक तीर क्या तलवार की माफिक काटता है यह पैन .लेकिन इसकी किस्म सर्वथा यकसां नहीं रहती .लपलपाता स्पन्द सा होने के बाद यह शमित भी हो जाता है .घंटों क्या दिनों नहीं लौटेगा .और कभी चाक़ू की नोंक सा काटेगा असरग्रस्त  हिस्से को . बहुत ही कष्ट प्रद और गंभीर ,उग्र अवस्था में इसमें प्रतिवर्ती क्रिया (रिफ्लेक्सिज़ ) भी क्षीण होने लगती है ,ऐसा होने पर आप एकाएक हरकत में नहीं आ पाते .

पिंडली की पेशियों का भी अप विकास हो सकता है .कमज़ोर पड़ सकती है यह पेशी .अच्छी नींद सियाटिका से ग्रस्त लोगों में एक खाब बनके रह जाती है .

चलना फिरना ,झुकना मुड़ना दिक्कत का काम हो जाता है बैठना ,उठना भी मुहाल हो जाता है .सबसे ज्यादा अक्षमता का एहसास उन लोगों को होता है जो कमर के निचले  दर्द के साथ सियाटिका से भी परेशान रहतें हैं .सब दर्दों का दादा होता है यह दर्द .

गृदधी समस्या की वजूहातें (Causes Of Sciatica):-

अनेक  वजूहातें  होती  हैं इस समस्या की .

(१)रीढ़ का सही सलामत न होना अस्वाभाविक रोग पैदा करने वाली स्थिति में होना ,साथ में डिस्क का बहि:सरण  बाहर की ओर निकलने की कोशिश करता होना ,यही बहि :सरण इस सबसे बड़ी नाड़ी के लिए दाह उत्पादक साबित होता है प्रदाह कारक और विक्षोभ पैदा करता है ,उत्तेजित कर देता है सियाटिका को .बस लपलपाने लगती है सियाटिका .

(२)दुर्घटना और चोटील होने पर यहाँ तक, प्रसव भी इसके उत्तेजन और इर्रिटेशन की वजह बन जाता है .कारण होता है रीढ़ के संरेखण में बिखराव आना ,मिसएलाइनमेंट आजाना रीढ़ में .

(३) मधुमेह के बहुत आगे बढ़ चुके मामलों में भी यहाँ तक की आर्थ -राइटिस  ,कब्जी और ट्यूमर्स भी इसकी वजह बनते देखे गएँ हैं .

(४ )कुछ विटामिनों की कमीबेशी भी .

क्या समाधान है अंग्रेजी चिकित्सा व्यवस्था एलोपैथी के पास सियाटिका का ?

आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था भी जैसा कि हर मामले में होता है यहाँ भी सियाटिका के लक्षणों का इलाज़ करती है .इस एवज दर्द नाशियों के अलावा मसल रिलेक्सर्स का भी इस्तेमाल किया जाता है विकलांग चिकित्सा सम्बन्धी युक्तियों यानी अस्थियों या मांसपेशियों की क्षति और रोगों की चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली युक्तियों को भी आजमाया जाता है यथा ट्रेक्शन और फिजिकल चिकित्सा .

ट्रेक्शन या अंग -कर्षण टूटी हुई हड्डी को जोड़ने का एक ढंग है जिसमें विशेष उपकरणों से हड्डी को धीमे -धीमे खींचकर अपनी  जगह ज़माया जाता है .

अकसर दर्द  नाशियों से काबू नहीं ही आता है यह लपलपाता फड़कता दर्द सियाटिका इसलिए संभावना यही रहती है कि ऐसे मरीजों पर ओपीओइड्स  आजमाए जाएं .

ओपीओइड्स अपने असर में मार्फीन जैसे ही होतें हैं वैसे इन पदार्थों में (ओपीओइड्स में ) ओपियम मौजूद रहता है जो दिमाग में कुदरती तौर पर पैदा होता है .

Opium is a brownish gummy extract from the unripe seed pods of the opium poppy that contains several highly addictive narcotic alkaloid substances , e.g .morphine  and codeine .It is something that has a stupefying ,numbing ,or sleep inducing effect .

आराम आता है ,आ सकता है ,तब जब दर्द नाशी सीधे सीधे सुइयों के जरिये नर्व रूट्स तक पहुंचाए जाते हैं .यहाँ इन पर निर्भरता पैदा होने का जोखिम तो पैदा हो  ही जाता है .अति उग्र और पेचीला मामलों में   - 

ओर्थ्रपीडइक सर्जरी भी करनी पड़ती है .हालाकि बरसों तक सियाटिका से आजिज़ आचुके लोगों को मुकम्मल आराम करना ,बेड रेस्ट भी बतलाया जाता  है लेकिन कहीं से भी पुष्ट नहीं हुआ है कि यह कारगर रहता है कमर के निचले हिस्से में दर्द और सियाटिका के मामलों में .

क्या किया जाता है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा के तहत ?

काइरोप्रेक्टिक केयर से सियाटिका के अनेक  मामलों में जादुई असर होते देखा गया है .सियाटिका और टांग में दर्द से तंग आये लोगों ने इसे ट्रेक्शन और दर्द नाशियों  से बेहतर और कारगर  उपाय बतलाया है .अकसर इस चिकित्सा व्यवस्था को लेने के बाद कितनों को ही सर्जरी की ज़रुरत नहीं पड़ी है .

एक अध्ययन नोर्वे में किया गया था जिसमें  सभी ४४ कर्मी ऐसे थे जिन्हें सियाटिका के उग्र रूप लेने पर अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था .यहाँ मौजूद काइरोप्रेक्टर ने इन्हें रीढ़ समायोजन ,मुनासिब स्पाइनल एडजस्टमेंट मुहैया करवाया इनमें  से ९१% औसतन २१.१ दिन के बाद ही काम पर लौट गए .आंशिक तौर पर नहीं परिपूर्ण रोजाना का पूरा निर्धारित काम ये करने  लगे ,शेष भी अंश कालिक समय के लिए काम पे चले गए .

अध्ययन में औसतन हरेक मरीज़ ७२ दिनों के लिए सामान्य नहीं रह  पाया था  , अक्षम पाया गया इस अवधि के लिए .जबकि काइरोप्रेक्टिक केयर से  काम पे लौटने का समय सिर्फ २१ दिन ही घटके रह गया था .ज़ाहिर है यह अवधि भी ७०% कमतर हुई थी .

एक नियंत्रित अध्ययन (कंट्रोल्ड स्टडी )में चार रणनीतियां अपनाई गईं .

(१) रीढ़ की देखभाल (स्पाइनल केयर )

(२)अंग कर्षण 

(३)और (४)में दो तरह के इंजेक्शन आजमाए गए 

स्पाइनल केयर लेने वाले समूह को अधिकतम स्वास्थ्य लाभ पहुंचा .अंग कर्षण समूह के तो बहुत सारे लोगों को सर्जरी की नौबत आ गई ,करवानी पड़ी .

एक और अध्ययन में २०-६५ साला ऐसे बीस मरीजों को शामिल किया गया जिनकी टांग में कमर के निचले हिस्से से सम्बद्ध दर्द था .इन्हें तीन वर्गों में रखा गया जिन्हें ,मेडिकल केयर ,काइरोप्रेक्टिक केयर ,या फिर स्टीरोइड्स  के इंजेक्शन दिए गए .

१२ सप्ताह की देखभाल के बाद जो लाभ काइरोप्रेक्टिक वर्ग के लोगों को मिला था उससे ज़रा सा भी ज्यादा  अन्य दो वर्गों के लोगों को नहीं मिला .जबकि काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा में कोई दवा तो दी ही नहीं जाती है ,बिना दवाओं के होता है यह इलाज़ .

काइरोप्रेक्टिक देखभाल का लाभ सबसे ज्यादा उन मरीजों को मिलते देखा गया है जो तकलीफ शुरु होते ही काइरोप्रेक्टिक केयर लेने की पहल करते हैं .दुर्भाग्य यह है इधर बाकी सब कुछ आजमाने के बाद ही लोगबाग आतें हैं .

फिर भी शानदार नतीजे मिलते देखे जातें हैं इस चिकित्सा देखभाल के तहत आने वालों में .

एक और अध्ययन में ऐसे ३,१३६ मरीजों को शामिल किया गया जो लोवर बेक पैन और सियाटिका पैन की गिरिफ्त में  थे और पूर्व में फिजियो थिरेपी और ड्रग थिरेपी आजमा चुके थे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ था .

इन सभी को काइरोप्रेक्टिक देख भाल के तहत रखा गया .

दो साल के बाद इनकी पुन : जांच और अध्ययन के बाद पता चला ५०.४% को शानदार तरीके से आराम पहुंचा था ,लपलपाते दर्द के दौरे लौट के नहीं आये ,३४.४ %के मामलों  में रिलेप्सिज़ देखने में आये ,लेकिन आगे और देखभाल मिलने के बाद इन्हें भी और फायदा पहुंचा जबकि १५.२ % के मामले में कोई उल्लेख्य सुधार नहीं आया .

 Neurogenic Claudication 

टांगों  में  दर्द की  एक वजह स्पाइनल नर्व (रीढ़ तंत्रिका )को पहुचने वाली क्षति भी बनती है ,यदि क्षति उस तंत्रिका को उठानी पड़ी हो जो टांगों तक जाती है . चिकित्सा शब्दावली में इसी स्थिति को कहा जाता है neurogenic claudication .

यहाँ न्यूरोजेनिक का अर्थ  है  जिसने तंत्रिका ऊतक से उत्तेजन प्राप्त किया हो या जो नर्वस सिस्टम  से पैदा हुआ हो .जबकि क्लौडीकेसन का अर्थ है लंगडा के चलना ऐसी लंगडाहट जिसकी वजह टांगों की पेशी  को होने वाली रक्तापूर्ति की कमी बनी हो .

ज़ाहिर है इस स्थिति में मरीज़ देर तक चल नहीं सकता और उसे बीच बीच में थोड़ा सा ही चल लेने के बाद ही रुकना पड़ता है .

इसके लक्षणों में दर्द के अलावा तंत्रिका संवेदन (जलन और तंत्रिका उत्तेजन )बनता है   जो चलने के  फ़ौरन बाद शुरु होता है और आराम करने पर चला भी जाता है .मांसपेशी में ऐसे में ऐंठन भी हो सकती है ,दर्द और सुन्नी भी ,पिंडलियों में थकान होगी ,पैर ,जंघा ,और नितम्बों में भी यह थकान फैलेगी .बेशक इस समस्या का एक समाधान शल्य चिकित्सा है लेकिन इससे पहले एक मर्तबा रीढ़ की देखभाल करने वाले काइरोप्रेक्टर के पास भी जाना चाहिए .फिर चाहे आप जाएँ आधुनिक चिकित्सा की शरण में .

सारांश 

सभी सियाटिका से तंग आये लोगों को काइरोप्रेक्टर के पास जांच के लिए जाना चाहिए .ताकि यह जाना जा सके कहीं इसकी वजह स्पाइनल subluxations (रीढ़ में आया विरूपण तो नहीं बन रहा है ).subluxation ही रीढ़ में विरूपण पैदा करता है रीढ़ की हड्डियों के परस्पर संरेखण में विचलन (विक्षोभ )पैदा करता है .डिस्क और तंत्रिका पर दवाब बनाता है .सारी काया को स्ट्रेस में ले आता है .
 जो भी वजह रही हो आपके मामले में सियाटिका की रीढ़ समायोजन से ,स्पाइनल एडजस्टमेंट से सब कुछ सुधर जाता है .तंत्रिकाओं से दवाब हट  जाता है .रीढ़ का खोया हुआ संतुलन बरकरार हो जाता है .हमारी काया की तमाम पेशियाँ ,ग्रंथियां और ऊतक फिर से काम करने लगते हैं संतुलित तरीके से . आखिरकार सियाटिका से भी राहत मिल जाती है .घबराइये नहीं . 
मैं यहाँ हूँ राम राम भाई पर एक क्लिक की गलती से प्रकाशित हो गया था ,सहेजना था ,मुझे ...

काइरोप्रेक्टिक में भी है समाधान साइटिका का ,दर्दे -ए -टांग का 
    

गृधसी नाड़ी और टांगों का दर्द (Sciatica & Leg Pain)

Science Bloggers' Association of IndiaपरVirendra Kumar Sharma - 6 मिनट पहले
अगर आपको 'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन' का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।गृधसी नाड़ी और टांगों का दर्द (Sciatica & Leg Pain) सुष्मना ,पिंगला और इड़ा... [[ This is a content summary only. Visit my website for full links, other content, and more! ]]

आखिरकार सियाटिका से भी राहत मिल जाती है .घबराइये नहीं .

गृधसी नाड़ी और टांगों का दर्द (Sciatica & Leg Pain)

सुष्मना  ,पिंगला और इड़ा हमारे शरीर की तीन प्रधान नाड़ियाँ है लेकिन नसों का एक पूरा नेटवर्क है हमारी काया में इनमें से सबसे लम्बी नस को हम नाड़ी कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहें हैं .यही सबसे लम्बी और बड़ी (दीर्घतमा ) नस (नाड़ी )है :गृधसी या सियाटिका .हमारी कमर  के निचले भाग में पांच छोटी छोटी नसों के संधि स्थल से इसका आगाज़ होता है और इसका अंजाम पैर के अगूंठों पर जाके होता है .यानी नितम्ब के,हिप्स के , जहां जोड़ हैं वहां से चलती है यह और वाया हमारे श्रोणी क्षेत्र (Pelvis),जांघ (जंघा ) के  पिछले  हिस्से ,से होते हुए घुटनों पिंडलियों से होती अगूंठों तक जाती है यह अकेली नस ,तंत्रिका या नाड़ी(माफ़ कीजिए इसे नाड़ी कहने की छूट आपसे ले चुका हूँ ).

क्या है   गृधसी की रोगात्मक स्थिति ?

What Is Siatica ?

इस दीर्घतमा नाड़ी की सोजिश एक ऐसी रोगात्मक स्थिति पैदा करती है जिसका हश्र होता है बेहद की असह पीड़ा में .दर्द की लहर नाड़ी के शुरु से आखिरी छोर  तक लपलपाती आगे तक जाती  .लेकिन यह लहर कमर की तरफ भी ऐसे ही  जा सकती है .आयुर्वेद के हिसाब से यह "वात नाड़ी" है जो "वात तत्व" के बढ़ जाने पर सूज कर सक्रीय हो जाती है .शरीर में वात बढ़ने से  गृधसी रोग होता है .योग चूडामणि में भी दस बड़ी नाड़ियों का ज़िक्र है .७२,००० छोटी छोटी रेखाओं सी फैली नसों का भी  ज़िक्र है .जिनमें दस बड़ी नाड़ी यहाँ बतलाई गईं हैं .

इस असह पीड़ा के अलावा सुइयों की चुभन ,जलन और शरीर के इन हिस्सों की चमड़ी में एक चुभन के अलावा झुनझुनी भी चढ़ सकती है कील की चुभन भी पैदा होती है .लग सकता है इन हिस्सों में कीड़े मकोड़े रेंग रहें हैं ,छूने पर दर्द कर सकता है ये हिस्सा ,एक दम से संवेदनशील हो जाता है .इसके ठीक   विपरीत टांग सुन्न भी हो सकती है .सुन्ना सा लग सकता है टांग में (पिंडलियों और एडी के बीच का हिस्सा सुन्न भी पड़ सकता है ).

मामला तब और भी जटिल हो जाता है और इस मर्ज़ के लक्षण कुछ और  उग्र जब कुछ लोगों में यह दर्द टांगों के अगले भाग को या पार्श्व को भी अपनी चपेट में लेने लगता है ,नितम्बों में भी होने लगता है  जबकि अकसर यह टांगों  या जंघा के पिछले हिस्से तक ही सीमित रहता है .

कुछ में यह दर्द दोनों टांगों में आजाता है इसे तब कहतें हैं -दुतरफा  गृधसी(bilateral sciatica).

Like A Knife 

बेशक तीर क्या तलवार की माफिक काटता है यह पैन .लेकिन इसकी किस्म सर्वथा यकसां नहीं रहती .लपलपाता स्पन्द सा होने के बाद यह शमित भी हो जाता है .घंटों क्या दिनों नहीं लौटेगा .और कभी चाक़ू की नोंक सा काटेगा असरग्रस्त  हिस्से को . बहुत ही कष्ट प्रद और गंभीर ,उग्र अवस्था में इसमें प्रतिवर्ती क्रिया (रिफ्लेक्सिज़ ) भी क्षीण होने लगती है ,ऐसा होने पर आप एकाएक हरकत में नहीं आ पाते .

पिंडली की पेशियों का भी अप विकास हो सकता है .कमज़ोर पड़ सकती है यह पेशी .अच्छी नींद सियाटिका से ग्रस्त लोगों में एक खाब बनके रह जाती है .

चलना फिरना ,झुकना मुड़ना दिक्कत का काम हो जाता है बैठना ,उठना भी मुहाल हो जाता है .सबसे ज्यादा अक्षमता का एहसास उन लोगों को होता है जो कमर के निचले  दर्द के साथ सियाटिका से भी परेशान रहतें हैं .सब दर्दों का दादा होता है यह दर्द .

गृदधी समस्या की वजूहातें (Causes Of Sciatica):-

अनेक  वजूहातें  होती  हैं इस समस्या की .

(१)रीढ़ का सही सलामत न होना अस्वाभाविक रोग पैदा करने वाली स्थिति में होना ,साथ में डिस्क का बहि:सरण  बाहर की ओर निकलने की कोशिश करता होना ,यही बहि :सरण इस सबसे बड़ी नाड़ी के लिए दाह उत्पादक साबित होता है प्रदाह कारक और विक्षोभ पैदा करता है ,उत्तेजित कर देता है सियाटिका को .बस लपलपाने लगती है सियाटिका .

(२)दुर्घटना और चोटील होने पर यहाँ तक, प्रसव भी इसके उत्तेजन और इर्रिटेशन की वजह बन जाता है .कारण होता है रीढ़ के संरेखण में बिखराव आना ,मिसएलाइनमेंट आजाना रीढ़ में .

(३) मधुमेह के बहुत आगे बढ़ चुके मामलों में भी यहाँ तक की आर्थ -राइटिस  ,कब्जी और ट्यूमर्स भी इसकी वजह बनते देखे गएँ हैं .

(४ )कुछ विटामिनों की कमीबेशी भी .

क्या समाधान है अंग्रेजी चिकित्सा व्यवस्था एलोपैथी के पास सियाटिका का ?

आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था भी जैसा कि हर मामले में होता है यहाँ भी सियाटिका के लक्षणों का इलाज़ करती है .इस एवज दर्द नाशियों के अलावा मसल रिलेक्सर्स का भी इस्तेमाल किया जाता है विकलांग चिकित्सा सम्बन्धी युक्तियों यानी अस्थियों या मांसपेशियों की क्षति और रोगों की चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली युक्तियों को भी आजमाया जाता है यथा ट्रेक्शन और फिजिकल चिकित्सा .

ट्रेक्शन या अंग -कर्षण टूटी हुई हड्डी को जोड़ने का एक ढंग है जिसमें विशेष उपकरणों से हड्डी को धीमे -धीमे खींचकर अपनी  जगह ज़माया जाता है .

अकसर दर्द  नाशियों से काबू नहीं ही आता है यह लपलपाता फड़कता दर्द सियाटिका इसलिए संभावना यही रहती है कि ऐसे मरीजों पर ओपीओइड्स  आजमाए जाएं .

ओपीओइड्स अपने असर में मार्फीन जैसे ही होतें हैं वैसे इन पदार्थों में (ओपीओइड्स में ) ओपियम मौजूद रहता है जो दिमाग में कुदरती तौर पर पैदा होता है .

Opium is a brownish gummy extract from the unripe seed pods of the opium poppy that contains several highly addictive narcotic alkaloid substances , e.g .morphine  and codeine .It is something that has a stupefying ,numbing ,or sleep inducing effect .

आराम आता है ,आ सकता है ,तब जब दर्द नाशी सीधे सीधे सुइयों के जरिये नर्व रूट्स तक पहुंचाए जाते हैं .यहाँ इन पर निर्भरता पैदा होने का जोखिम तो पैदा हो  ही जाता है .अति उग्र और पेचीला मामलों में   - 

ओर्थ्रपीडइक सर्जरी भी करनी पड़ती है .हालाकि बरसों तक सियाटिका से आजिज़ आचुके लोगों को मुकम्मल आराम करना ,बेड रेस्ट भी बतलाया जाता  है लेकिन कहीं से भी पुष्ट नहीं हुआ है कि यह कारगर रहता है कमर के निचले हिस्से में दर्द और सियाटिका के मामलों में .

क्या किया जाता है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा के तहत ?

काइरोप्रेक्टिक केयर से सियाटिका के अनेक  मामलों में जादुई असर होते देखा गया है .सियाटिका और टांग में दर्द से तंग आये लोगों ने इसे ट्रेक्शन और दर्द नाशियों  से बेहतर और कारगर  उपाय बतलाया है .अकसर इस चिकित्सा व्यवस्था को लेने के बाद कितनों को ही सर्जरी की ज़रुरत नहीं पड़ी है .

एक अध्ययन नोर्वे में किया गया था जिसमें  सभी ४४ कर्मी ऐसे थे जिन्हें सियाटिका के उग्र रूप लेने पर अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था .यहाँ मौजूद काइरोप्रेक्टर ने इन्हें रीढ़ समायोजन ,मुनासिब स्पाइनल एडजस्टमेंट मुहैया करवाया इनमें  से ९१% औसतन २१.१ दिन के बाद ही काम पर लौट गए .आंशिक तौर पर नहीं परिपूर्ण रोजाना का पूरा निर्धारित काम ये करने  लगे ,शेष भी अंश कालिक समय के लिए काम पे चले गए .

अध्ययन में औसतन हरेक मरीज़ ७२ दिनों के लिए सामान्य नहीं रह  पाया था  , अक्षम पाया गया इस अवधि के लिए .जबकि काइरोप्रेक्टिक केयर से  काम पे लौटने का समय सिर्फ २१ दिन ही घटके रह गया था .ज़ाहिर है यह अवधि भी ७०% कमतर हुई थी .

एक नियंत्रित अध्ययन (कंट्रोल्ड स्टडी )में चार रणनीतियां अपनाई गईं .

(१) रीढ़ की देखभाल (स्पाइनल केयर )

(२)अंग कर्षण 

(३)और (४)में दो तरह के इंजेक्शन आजमाए गए 

स्पाइनल केयर लेने वाले समूह को अधिकतम स्वास्थ्य लाभ पहुंचा .अंग कर्षण समूह के तो बहुत सारे लोगों को सर्जरी की नौबत आ गई ,करवानी पड़ी .

एक और अध्ययन में २०-६५ साला ऐसे बीस मरीजों को शामिल किया गया जिनकी टांग में कमर के निचले हिस्से से सम्बद्ध दर्द था .इन्हें तीन वर्गों में रखा गया जिन्हें ,मेडिकल केयर ,काइरोप्रेक्टिक केयर ,या फिर स्टीरोइड्स  के इंजेक्शन दिए गए .

१२ सप्ताह की देखभाल के बाद जो लाभ काइरोप्रेक्टिक वर्ग के लोगों को मिला था उससे ज़रा सा भी ज्यादा  अन्य दो वर्गों के लोगों को नहीं मिला .जबकि काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा में कोई दवा तो दी ही नहीं जाती है ,बिना दवाओं के होता है यह इलाज़ .

काइरोप्रेक्टिक देखभाल का लाभ सबसे ज्यादा उन मरीजों को मिलते देखा गया है जो तकलीफ शुरु होते ही काइरोप्रेक्टिक केयर लेने की पहल करते हैं .दुर्भाग्य यह है इधर बाकी सब कुछ आजमाने के बाद ही लोगबाग आतें हैं .

फिर भी शानदार नतीजे मिलते देखे जातें हैं इस चिकित्सा देखभाल के तहत आने वालों में .

एक और अध्ययन में ऐसे ३,१३६ मरीजों को शामिल किया गया जो लोवर बेक पैन और सियाटिका पैन की गिरिफ्त में  थे और पूर्व में फिजियो थिरेपी और ड्रग थिरेपी आजमा चुके थे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ था .

इन सभी को काइरोप्रेक्टिक देख भाल के तहत रखा गया .

दो साल के बाद इनकी पुन : जांच और अध्ययन के बाद पता चला ५०.४% को शानदार तरीके से आराम पहुंचा था ,लपलपाते दर्द के दौरे लौट के नहीं आये ,३४.४ %के मामलों  में रिलेप्सिज़ देखने में आये ,लेकिन आगे और देखभाल मिलने के बाद इन्हें भी और फायदा पहुंचा जबकि १५.२ % के मामले में कोई उल्लेख्य सुधार नहीं आया .

 Neurogenic Claudication 

टांगों  में  दर्द की  एक वजह स्पाइनल नर्व (रीढ़ तंत्रिका )को पहुचने वाली क्षति भी बनती है ,यदि क्षति उस तंत्रिका को उठानी पड़ी हो जो टांगों तक जाती है . चिकित्सा शब्दावली में इसी स्थिति को कहा जाता है neurogenic claudication .

यहाँ न्यूरोजेनिक का अर्थ  है  जिसने तंत्रिका ऊतक से उत्तेजन प्राप्त किया हो या जो नर्वस सिस्टम  से पैदा हुआ हो .जबकि क्लौडीकेसन का अर्थ है लंगडा के चलना ऐसी लंगडाहट जिसकी वजह टांगों की पेशी  को होने वाली रक्तापूर्ति की कमी बनी हो .

ज़ाहिर है इस स्थिति में मरीज़ देर तक चल नहीं सकता और उसे बीच बीच में थोड़ा सा ही चल लेने के बाद ही रुकना पड़ता है .

इसके लक्षणों में दर्द के अलावा तंत्रिका संवेदन (जलन और तंत्रिका उत्तेजन )बनता है   जो चलने के  फ़ौरन बाद शुरु होता है और आराम करने पर चला भी जाता है .मांसपेशी में ऐसे में ऐंठन भी हो सकती है ,दर्द और सुन्नी भी ,पिंडलियों में थकान होगी ,पैर ,जंघा ,और नितम्बों में भी यह थकान फैलेगी .बेशक इस समस्या का एक समाधान शल्य चिकित्सा है लेकिन इससे पहले एक मर्तबा रीढ़ की देखभाल करने वाले काइरोप्रेक्टर के पास भी जाना चाहिए .फिर चाहे आप जाएँ आधुनिक चिकित्सा की शरण में .

सारांश 

सभी सियाटिका से तंग आये लोगों को काइरोप्रेक्टर के पास जांच के लिए जाना चाहिए .ताकि यह जाना जा सके कहीं इसकी वजह स्पाइनल subluxations (रीढ़ में आया विरूपण तो नहीं बन रहा है ).subluxation ही रीढ़ में विरूपण पैदा करता है रीढ़ की हड्डियों के परस्पर संरेखण में विचलन (विक्षोभ )पैदा करता है .डिस्क और तंत्रिका पर दवाब बनाता है .सारी काया को स्ट्रेस में ले आता है .
 जो भी वजह रही हो आपके मामले में सियाटिका की रीढ़ समायोजन से ,स्पाइनल एडजस्टमेंट से सब कुछ सुधर जाता है .तंत्रिकाओं से दवाब हट  जाता है .रीढ़ का खोया हुआ संतुलन बरकरार हो जाता है .हमारी काया की तमाम पेशियाँ ,ग्रंथियां और ऊतक फिर से काम करने लगते हैं संतुलित तरीके से . आखिरकार सियाटिका से भी राहत मिल जाती है .घबराइये नहीं .