एस्ट्रो -बाय -लोजी यानी खगोल -जीवविज्ञान से आप क्या समझतें हैं ?
खगोल विज्ञान की ही एक शाखा को जिसके तहत अंतरिक्षके भौमेतर भागों (एक्स्ट्रा -तेर्रिस्त्रियल पार्ट्स ) में जीवन की संभावनाओं ,रहवासों (हेबितेट्स )का पता लगाया जाता है खगोल जीवविज्ञान कहा जाता है .अलावा इसके यह एक व्यापक अनुशाशन है जिसके अंतर्गत बाहरी अन्तरिक्ष के भौमिक जीवन पर पड़ने वाले संभावित असर का भी पता लगाया जाता है .प्रोजेक्ट "सेती "यानी सर्च फॉर एक्स्ट्रा -टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस इसी के तहत आता है .खगोल ,भौतिकी ,जैव ,भू -भौतिकी के माहिरों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस बात का हामी हैं ,पृथ्वी के अलावा अन्य नक्षत्र मंडलों नक्षत्र परिवारों में भी जीवन मुमकिन है .आदिनांक यह हमारी बूझ ,पकड से बाहर है यह दीगर बात है ।
जीवन के सृष्टि में उद्भव और होने ,विभाजन की कथा है ,खगोल -जैविकी .अपने होने का अहसास करा देते हैं ,जब ग़ज़ल कोई ज़माने को सुना देते हैं ।
अंतर -अनुशासन अध्धय्यन की एक बेहतरीन मिसाल है -खगोल जीवविज्ञान जिसके अंतर्गत तमाम भौतिक विज्ञानों का बेरोक टोक प्रवेश और समावेश है .चाहे फिर वह भौतिकी (फिजिक्स )हो या रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री )खगोलविज्ञान हो या जीवविज्ञान ,पारिस्थितिकी (इकोलोजी )या ग्रहों का अध्धयन (प्लेनेटरी साइंस ),भूगोल हो या भूविज्ञान (जीयोलोजी ).लक्ष्य सबका एक ही है -भौमेतर जीवन का पता लगाना .क्या सृष्टि में हम पृथ्वी वासी अकेले हैं ?या और भी अति विकसित सभ्यताओं का अस्तित्व है ?क्या जीवन का स्वरूप इतर ग्रहों पर भिन्न है ?विज्ञानियों का एक बड़ा तबका इस बात का हिमायती है पृथ्वी पर जीवन धूमकेतुओं से आया .अन्तरिक्ष में छिपे हैं जीवन के सूत्र .
रविवार, 7 मार्च 2010
शनिवार, 6 मार्च 2010
छोटे गृह ही डायना-सौर के विनाश का कारण बने .....
मंगल और बृहस्पति ग्रहों के बीच में छोटे ग्रहों की एक पूरी पट्टी है जो सूर्य की परिक्रमा कर रहें हैं .समझा जाता है यहीं कहीं से एक एस्टेरोइड (लघु ग्रह) निकल कर पृथ्वी की और गुरूत्व की डोर से बंधा चला आया .और एक बड़े भूभाग से रीढ़ धारी जीवों का सफाया हो गया .इनमे डायना -सौर भी शामिल थे ।
गत दशकों में डायना -सौरों के विनाश को लेकर अनेक कयास लगाए गए हैं .कई सिद्धांत चर्चित रहें हैं .अब लगता है साइंसदानों की एक आलमी टोली इनके विनाश को लेकर एक मत है ।
४१ विज्ञानियों की एक टोली ने गत दो दशकों की इस दिशा में की गई शोध का जायजा लिया है .विज्ञानी अब एक राय हैं ,अब से तकरीबन ६.५ करोड़ बरस पहले पृथ्वी के आधे से ज्यादा जीवों का सफाया हो गया था (के टी एक्सटिंक्शन यानी क्रीतेशस-तर्शरी एक्सटिंक्शन ).विज्ञानी एक और इस विनाश के लिए किसी लघु ग्रह के पृथ्वी से आ टकराने और दुसरी ओरडेकन ट्रेप (इंडिया )में ज्वालामुखी विस्फोटों को जो तकरीबन १५ लाख बरसों तक फटतेफूटते रहे .सुलगते रहे ।
"(पूरबी ओर पश्चिमी घाटों के बीच का त्रीकोनीय पठार डेकन कहलाता है .क्रीतेशिअस पीरियड में खडिया नुमा (चाक जैसी )चट्टाने बनी .६.५ -१४.४ करोड़ बरस पहले का यह भूगर्भ काल है जिसका सम्बन्ध मेसोज़िक काल के अंत से शुरू हुआ माना जाता है ।)
विज्ञान पत्रिका 'साइंस "में प्रकाशित इस (चर्चित )अध्धय्यन के अनुसार अब से कोई ६.५ करोड़ साल पहले मेक्सिको के "चिच्क्सुलुब"स्थान पर कोई १५ किलोमीटर चौड़ा एल अलघु ग्रह आ गिरा था .इसी के साथ व्यापक स्तर पर आगजनी ,भूकंप ,भूस्खलन जैसी आपदाओं ने हार्बर वेव्स (सूनामीज़ ) को ट्रिग्गर प्रदान किया ।
टक्कर के फलस्वरूप पूरी पृथ्वी को अँधेरे की चादर ने ढांप लिया .नागा साकी पर गिराए गए एटमी बम से एक अरब गुना ज्यादा विस्फोटक ऊर्जा इस लघु ग्रह के पृथ्वी के आ टकराने से पैदा हो गई थी .एक एटमी जाड़े ने पृथ्वी को लील सा लिया था .फलस्वरूप कितनी ही जिव प्रजातियाँ समाप्त हो गईं .डायना -सौर भी उनमे से एक प्रजाति थी ।
साइंसदानों ने यह तमाम निष्कर्ष जीवाश्मों के विश्लेषण अध्धययन ,भू -रसायन विदों ,जलवायु का मोडिल तैयार करने वाले माहिरों ,भू -भौतिकी -विदों ,अवसाद अध्धय्यन के माहिरों (सेदिमेंतोलोजिस्ट्स )के गत बीस वर्षों के शोधों का जायजा लेने के बाद निकालें हैं ।
सन्दर्भ सामिग्री :इट्स ओफ़िशिअल :एस्तेरोइद्स किल्ड दाई -नोज़ (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,
गत दशकों में डायना -सौरों के विनाश को लेकर अनेक कयास लगाए गए हैं .कई सिद्धांत चर्चित रहें हैं .अब लगता है साइंसदानों की एक आलमी टोली इनके विनाश को लेकर एक मत है ।
४१ विज्ञानियों की एक टोली ने गत दो दशकों की इस दिशा में की गई शोध का जायजा लिया है .विज्ञानी अब एक राय हैं ,अब से तकरीबन ६.५ करोड़ बरस पहले पृथ्वी के आधे से ज्यादा जीवों का सफाया हो गया था (के टी एक्सटिंक्शन यानी क्रीतेशस-तर्शरी एक्सटिंक्शन ).विज्ञानी एक और इस विनाश के लिए किसी लघु ग्रह के पृथ्वी से आ टकराने और दुसरी ओरडेकन ट्रेप (इंडिया )में ज्वालामुखी विस्फोटों को जो तकरीबन १५ लाख बरसों तक फटतेफूटते रहे .सुलगते रहे ।
"(पूरबी ओर पश्चिमी घाटों के बीच का त्रीकोनीय पठार डेकन कहलाता है .क्रीतेशिअस पीरियड में खडिया नुमा (चाक जैसी )चट्टाने बनी .६.५ -१४.४ करोड़ बरस पहले का यह भूगर्भ काल है जिसका सम्बन्ध मेसोज़िक काल के अंत से शुरू हुआ माना जाता है ।)
विज्ञान पत्रिका 'साइंस "में प्रकाशित इस (चर्चित )अध्धय्यन के अनुसार अब से कोई ६.५ करोड़ साल पहले मेक्सिको के "चिच्क्सुलुब"स्थान पर कोई १५ किलोमीटर चौड़ा एल अलघु ग्रह आ गिरा था .इसी के साथ व्यापक स्तर पर आगजनी ,भूकंप ,भूस्खलन जैसी आपदाओं ने हार्बर वेव्स (सूनामीज़ ) को ट्रिग्गर प्रदान किया ।
टक्कर के फलस्वरूप पूरी पृथ्वी को अँधेरे की चादर ने ढांप लिया .नागा साकी पर गिराए गए एटमी बम से एक अरब गुना ज्यादा विस्फोटक ऊर्जा इस लघु ग्रह के पृथ्वी के आ टकराने से पैदा हो गई थी .एक एटमी जाड़े ने पृथ्वी को लील सा लिया था .फलस्वरूप कितनी ही जिव प्रजातियाँ समाप्त हो गईं .डायना -सौर भी उनमे से एक प्रजाति थी ।
साइंसदानों ने यह तमाम निष्कर्ष जीवाश्मों के विश्लेषण अध्धययन ,भू -रसायन विदों ,जलवायु का मोडिल तैयार करने वाले माहिरों ,भू -भौतिकी -विदों ,अवसाद अध्धय्यन के माहिरों (सेदिमेंतोलोजिस्ट्स )के गत बीस वर्षों के शोधों का जायजा लेने के बाद निकालें हैं ।
सन्दर्भ सामिग्री :इट्स ओफ़िशिअल :एस्तेरोइद्स किल्ड दाई -नोज़ (टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन टेस्ट कितना निरापद ...
महिलाओं के लिए रूटीन मेमोग्रेम्स (स्तन कैंसर पता लगाने के लिए )तथा पेप स्मियर टेस्ट (सर्विक्स कैंसर यानी गर्भाशय गर्दन कैंसर की शिनाख्त के लिए ) की मानिंद अब मर्दों के लिए एक उम्र के बाद रूटीन प्रोस्टेट कैंसर टेस्ट (प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन टेस्ट )अब संदेह के घेरे में आ गया है .कुछ साइंसदान जिनका सम्बन्ध अमरीकी कैंसर सोसायटी से है एक कट ऑफ़ उम्र के बाद ऐसी जांच को ज़रूरी नहीं मानते क्योंकि यह निरापद नहीं है .गैर ज़रूरी शल्य चिकित्सा के दायरे में ला सकती है जांच कारवाने वाले व्यक्ति को जिनके परिणाम स्वरूप व्यक्ति इन्फेक्शन (अनेक तरह के संक्रमण ),रक्त स्राव (ब्लीडिंग )यहाँ तक की उम्र भर के लिए नपुंसकता (इम्पोतेंसी )की चपेट में भी आ सकता है .बेशक "प्रोस्टेट स्पेसिफिक कैंसर के लिए रक्त जांच ")डिजिटल रेक्टल इग्जामिनेशन की तरह आरंभिक अवस्था में ही कैंसर का पता लगा सकती है लेकिन यह सर्वथा निरापद नहीं है ।
अलबत्ता "अमरीकी मूत्र विज्ञानी का संघ /अमरीकन युरोलोजिकल असोशियेशन ") एक उम्र के बाद ऐसी जांच पर सवाल नहीं उठा रही है ।
दोनों एक बात से सहमत प्रतीत होतें हैं ,जांच से पूर्व इसके गुण -दोषों की ,संभावित जोखिम की चर्चा मरीज़ के साथ ज़रूर की जानी चाहिए .कहीं ऐसा ना हो "मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की /चौबे जी चले थे छब्बे जी बन्ने ,लौटे दुबेजी बनके "।
सच यह भी है
अलबत्ता "अमरीकी मूत्र विज्ञानी का संघ /अमरीकन युरोलोजिकल असोशियेशन ") एक उम्र के बाद ऐसी जांच पर सवाल नहीं उठा रही है ।
दोनों एक बात से सहमत प्रतीत होतें हैं ,जांच से पूर्व इसके गुण -दोषों की ,संभावित जोखिम की चर्चा मरीज़ के साथ ज़रूर की जानी चाहिए .कहीं ऐसा ना हो "मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की /चौबे जी चले थे छब्बे जी बन्ने ,लौटे दुबेजी बनके "।
सच यह भी है
वजन घटाने के लिए आदर्श खुराख का राज़ छुपा है हमारी आनुवंशिक बुनावट में ...
क्या है "जीनोताइप"?एक व्यक्ति की एक विशिष्ठ आनुवंशिक प्रकृति (जेनेटिक नेचर )होती है .अलबत्ता ऐसे बहुत से लोग होतें हैं जिनकी भौतिक प्रकृति जुदा लेकिन आनुवंशिक बुनावट यकसां हो .जेनेटिक मेक अप को ही जीनो टाईप कहा जाता है ।
इसका मतलब यह हुआएक जेनेटिक परिक्षण करके व्यक्ति विशेष के लियें ,समूह विशेष के लिए जिनकी आनुवंशिक प्रकृति एक जैसी है वजन को प्रभावित करने वाली वेट का विनियमन करने वाली सही तरीके से घटाने वाली आदर्श खुराख का राज़ हमारी आनुवंशिक रचाव में छिपा है ।
ज़रूरी नहीं है सब के लिए कम चिकनाई सना ,कम कार्बोहाद्रेती (कम खुराखी शक्कर )वाला भोजन असर कारी हो .हो सकता है आनुवंशिक बनावट एक संतुलित खुराख मांग रही हो .यही कहना है "इंटर ल्युकिन जेनेटिक्स इंक "का ।
मोटापे से ग्रस्त १४० महिलाओं पर संपन्न एक अध्धययन ने बतलाया है जिन्हें उनकी आनुवंशिक बनावट के अनुरूप भोजन दिया गया उनका वजन असरदार तरीके से ज्यादा कम हुआ बनिस्पत उनके जिनकी खुराख उनके जेनेटिक मेक के अनुरूप नहीं रहती है ।
स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी केलिफोर्निया के अनुसार दवाओं के बनिस्पत यह नुस्खा (आनुवंशिक बनावट के अनुसार खुराख )दवाओं के बरक्स ज्यादा कारगर सिद्ध हुआ है .आपने मेसाच्युसेट्स आधारित "इंटर -ल्युकिन टेस्ट "अध्धय्यन में भाग लिया था .यह अध्धय्यन तीन जीवन इकाइयों(जींस ) में होने वाले संभावित "म्यूटेशन "यानी उत्परिवर्तन पर आधारित है जिनके नाम हैं -ऍफ़ ए बी पी २ ,पी पी ए आर जी तथा ए डी आर बी २ ।
बकौल" इंटर ल्युकिन जेनेटिक्स इंक "तकरीबन ३९ फीसद गोरे अमरीकियों को लो फेट जीनो ता -इप खुराख माफिक आती है जबकि ४५ फीसद की आनुवंशिक संरचना लो प्रोसेस्ड कार्बो हाई -द्रेट्स खुराख के ज्यादा अनुरूप है .जबकि १६ फीसद ऐसे लोगों का है जिन्हें वजन घटाने के लिए एक संतुलित खुराख ज्यादा माफिक आयेगी .
is
इसका मतलब यह हुआएक जेनेटिक परिक्षण करके व्यक्ति विशेष के लियें ,समूह विशेष के लिए जिनकी आनुवंशिक प्रकृति एक जैसी है वजन को प्रभावित करने वाली वेट का विनियमन करने वाली सही तरीके से घटाने वाली आदर्श खुराख का राज़ हमारी आनुवंशिक रचाव में छिपा है ।
ज़रूरी नहीं है सब के लिए कम चिकनाई सना ,कम कार्बोहाद्रेती (कम खुराखी शक्कर )वाला भोजन असर कारी हो .हो सकता है आनुवंशिक बनावट एक संतुलित खुराख मांग रही हो .यही कहना है "इंटर ल्युकिन जेनेटिक्स इंक "का ।
मोटापे से ग्रस्त १४० महिलाओं पर संपन्न एक अध्धययन ने बतलाया है जिन्हें उनकी आनुवंशिक बनावट के अनुरूप भोजन दिया गया उनका वजन असरदार तरीके से ज्यादा कम हुआ बनिस्पत उनके जिनकी खुराख उनके जेनेटिक मेक के अनुरूप नहीं रहती है ।
स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी केलिफोर्निया के अनुसार दवाओं के बनिस्पत यह नुस्खा (आनुवंशिक बनावट के अनुसार खुराख )दवाओं के बरक्स ज्यादा कारगर सिद्ध हुआ है .आपने मेसाच्युसेट्स आधारित "इंटर -ल्युकिन टेस्ट "अध्धय्यन में भाग लिया था .यह अध्धय्यन तीन जीवन इकाइयों(जींस ) में होने वाले संभावित "म्यूटेशन "यानी उत्परिवर्तन पर आधारित है जिनके नाम हैं -ऍफ़ ए बी पी २ ,पी पी ए आर जी तथा ए डी आर बी २ ।
बकौल" इंटर ल्युकिन जेनेटिक्स इंक "तकरीबन ३९ फीसद गोरे अमरीकियों को लो फेट जीनो ता -इप खुराख माफिक आती है जबकि ४५ फीसद की आनुवंशिक संरचना लो प्रोसेस्ड कार्बो हाई -द्रेट्स खुराख के ज्यादा अनुरूप है .जबकि १६ फीसद ऐसे लोगों का है जिन्हें वजन घटाने के लिए एक संतुलित खुराख ज्यादा माफिक आयेगी .
is
अंतड़ियों में छिपा है बीमारियों का राज़ .
तमाम तरह के रोगकारक पैथोजंस (रोग पैदा करने वाले जीवाणु ,विषाणु ,परजीवी आदि )हमारी अंतड़ियों में डेरा डाले पड़े रहतें हैं .साइंस दानों ने इनके जीवन खण्डों का पूरा खाका (जीन मेप ,जीन सीक्युएंस )तैयार कर लिया है .माहिरों का मानना है .यदि रोग पैदा करने वाले जीवाणु की शिनाख्त गट में कर ली जाए और फिर वहीँ उसका खात्मा भी कर दिया जाए तो रोग से भी पुख्ता तौर पर छुटकारा मिल सकता है ।
मानवीय पाचन तंत्र मुख गुहा से लेकर गुदा तक विस्तारित है इसी पाचन तंत्र (डाई-जेस्तिव सिस्टम )में हज़ारों हज़ार जीवाणुओं का प्राकृत आवास है .इनका संबंद्ध कुछ ख़ास बीमारियों से सीधे सीधे जोड़ा जा सकता है .यहाँ तक ,कैंसर पैदा करने वाले विषाणु की निशाँ देही कर कैंसर का भी पुख्ता इलाज़ किया जा सकता है ।
मधुमेह और मोटापे से निजात दिलवाई जा सकती है ।
यह तमाम तथ्य अंतर्राष्ट्रीय साइंसदानों की एक टोली ने हाल ही में प्रकाशित एक पर्चे में प्रस्तुत कियें हैं .विज्ञान पत्रिका "नेचर "के ताज़ा अंक में चीनी रिसर्चरों की एक टोली के अगुआ वांग जून ने बतलाया है ,अब तलक जीवाणुओं की एक हज़ार से भी ज्यादा प्रजातियों का हमारी अंतड़ियों में पता लगा या जा चुका है .इनमे से हरेक का जीन खाका भी तैयार कर लिया गया है .यह अपने प्रकार का पहला आनुवंशिक कैलेण्डर (जेनेटिक केतालोग है )।
इस एवज १२४ डेनमार्क वासियों तथा स्पेन निवासियों के स्टूल साम्पिल्स की विस्तृत जांच की गई थी .इस दरमियान ऐसी कई जीवन इकाइयों (जींस )की निशाँ देही की गई जिनका संबंद्ध मोटापे और क्रोहन्स दीजीज़ से जोड़ा जा सकता है .कैंसर ,ओबेसिटी जैसी सर्वव्यापी समस्या के लिए भी यही जींस कुसूर वार हैं .बेशक पाचन में इनकी विधाई भूमिका है यही कहना है वांग का .आप बेजिंग जीनोमिक्स के कार्य कारी निदेशक है ।
इन बेक्टीरिया पर काबू करने का मतलब है रोग की जड़ पर प्रहार .
मानवीय पाचन तंत्र मुख गुहा से लेकर गुदा तक विस्तारित है इसी पाचन तंत्र (डाई-जेस्तिव सिस्टम )में हज़ारों हज़ार जीवाणुओं का प्राकृत आवास है .इनका संबंद्ध कुछ ख़ास बीमारियों से सीधे सीधे जोड़ा जा सकता है .यहाँ तक ,कैंसर पैदा करने वाले विषाणु की निशाँ देही कर कैंसर का भी पुख्ता इलाज़ किया जा सकता है ।
मधुमेह और मोटापे से निजात दिलवाई जा सकती है ।
यह तमाम तथ्य अंतर्राष्ट्रीय साइंसदानों की एक टोली ने हाल ही में प्रकाशित एक पर्चे में प्रस्तुत कियें हैं .विज्ञान पत्रिका "नेचर "के ताज़ा अंक में चीनी रिसर्चरों की एक टोली के अगुआ वांग जून ने बतलाया है ,अब तलक जीवाणुओं की एक हज़ार से भी ज्यादा प्रजातियों का हमारी अंतड़ियों में पता लगा या जा चुका है .इनमे से हरेक का जीन खाका भी तैयार कर लिया गया है .यह अपने प्रकार का पहला आनुवंशिक कैलेण्डर (जेनेटिक केतालोग है )।
इस एवज १२४ डेनमार्क वासियों तथा स्पेन निवासियों के स्टूल साम्पिल्स की विस्तृत जांच की गई थी .इस दरमियान ऐसी कई जीवन इकाइयों (जींस )की निशाँ देही की गई जिनका संबंद्ध मोटापे और क्रोहन्स दीजीज़ से जोड़ा जा सकता है .कैंसर ,ओबेसिटी जैसी सर्वव्यापी समस्या के लिए भी यही जींस कुसूर वार हैं .बेशक पाचन में इनकी विधाई भूमिका है यही कहना है वांग का .आप बेजिंग जीनोमिक्स के कार्य कारी निदेशक है ।
इन बेक्टीरिया पर काबू करने का मतलब है रोग की जड़ पर प्रहार .
मंगलवार, 2 मार्च 2010
चाहता हूँ मैं भी मानव बम बन फट जाऊं ........
चाहता हूँ मैं भी -
मानव बम बन फट जाऊं ,
उड़ा दूं जामा -
या एक बार फिर तुम्हारे सपनों की बाबरी मस्जिद ।
लेकिन मैं ऐसा करूंगा नहीं -
मैं एक "हिन्दू "हूँ ।
दीगर है -
मेरे खून में हीमोग्लोबिन के साथ आर डी एक्स वैसे ही है -
जैसे माँ के दूध में डी डी टी -
रामू के खेत में बी टी बैंगन ।
मेरी सरकार कहती है -
"मैं सेक्युलर हूँ "
मानव बम बन फट जाऊं ,
उड़ा दूं जामा -
या एक बार फिर तुम्हारे सपनों की बाबरी मस्जिद ।
लेकिन मैं ऐसा करूंगा नहीं -
मैं एक "हिन्दू "हूँ ।
दीगर है -
मेरे खून में हीमोग्लोबिन के साथ आर डी एक्स वैसे ही है -
जैसे माँ के दूध में डी डी टी -
रामू के खेत में बी टी बैंगन ।
मेरी सरकार कहती है -
"मैं सेक्युलर हूँ "
सोमवार, 1 मार्च 2010
एक बिजली घर आपके पिछवाड़े (ब्लूम बॉक्स )...
पावर हाउस इन अ बॉक्स .अ वायर लेस पावर प्लांट ,ब्लूम एनर्जी आदि नामों से नवाज़ा जा रहा है "ब्लूम बॉक्स "को जिसे एक भारतीय मूल के अमरीकी साइंसदान के आर श्रीधर ने प्रस्तुत किया है .फिलवक्त ऐसे एक प्लांट पर आने वाला कुल खर्च ५-७लाख डॉलर बतलाया जारहा है जो १०० घरों की बिजली की ज़रूरीयात पूरी कर सकता है .आइन्दा पांच दस सालों में इसकी कीमत घटकर ३००० डॉलर रह जायेगी यही दावा है श्रीधर साहिब का .आप ब्लूम एनर्जी के चीफ एग्ज़िक्यूटर ऑफिसर हैं ।
" ब्लूम -बॉक्स" रेफ्रिजरेटर के आकार का एक बक्सा है जिसमे पाइल्स रखी हैं ढेरों जिन्हें रेत से तैयार किया गया है .पारंपरिक या फिर वैकल्पिक कोई भी एक ऊर्जा स्रोत और दाबित ओक्सिजन चाहिए इस बिजली घर के संचालन के लिए .जिसमे समायोजित सेल्फ कन्तेंद सेल्स एक सिरे से ओक्सिजन लेतीं हैं दुसरे से कोई भी उपलब्ध ईंधन .और बस बिजली तैयार .एक विद्युत् रासायनिक किर्या होती है ओक्सिजन और ईंधन के संयोग से .कोई दहन (कम्बश्चन )नहीं ,कोई कम्पन (वाइब्रेशन )नहीं ,कोई ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं .यानी एक स्वच्छ ऊर्जा स्रोत आपका अपना जिसे उठाकर कहीं भी ले जाया जा सकता है .एक उठाऊ बिजली घर ।
लेकिन इसके आलोचक इसे "जीरो एनर्जी एमिशन सोर्स "मानने को राज़ी नहीं है .अधिक से अधिक यह एक ग्रीन एनर्जी स्रोतों के लिए एक बूस्टर ,एक फ़िल्टर का काम कर सकता है, डरती स्रोतों के लिए .कुछ ना कुछ मात्रा में इससे भी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन विसर्जन होगा हमारे पर्यावरण में .
" ब्लूम -बॉक्स" रेफ्रिजरेटर के आकार का एक बक्सा है जिसमे पाइल्स रखी हैं ढेरों जिन्हें रेत से तैयार किया गया है .पारंपरिक या फिर वैकल्पिक कोई भी एक ऊर्जा स्रोत और दाबित ओक्सिजन चाहिए इस बिजली घर के संचालन के लिए .जिसमे समायोजित सेल्फ कन्तेंद सेल्स एक सिरे से ओक्सिजन लेतीं हैं दुसरे से कोई भी उपलब्ध ईंधन .और बस बिजली तैयार .एक विद्युत् रासायनिक किर्या होती है ओक्सिजन और ईंधन के संयोग से .कोई दहन (कम्बश्चन )नहीं ,कोई कम्पन (वाइब्रेशन )नहीं ,कोई ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं .यानी एक स्वच्छ ऊर्जा स्रोत आपका अपना जिसे उठाकर कहीं भी ले जाया जा सकता है .एक उठाऊ बिजली घर ।
लेकिन इसके आलोचक इसे "जीरो एनर्जी एमिशन सोर्स "मानने को राज़ी नहीं है .अधिक से अधिक यह एक ग्रीन एनर्जी स्रोतों के लिए एक बूस्टर ,एक फ़िल्टर का काम कर सकता है, डरती स्रोतों के लिए .कुछ ना कुछ मात्रा में इससे भी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन विसर्जन होगा हमारे पर्यावरण में .
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