सोमवार, 29 मई 2017

मुसाफिर तो मुसाफिर है ,उसका घर नहीं होता ,.....

ग़ज़ल :मुसाफिर .


मुसाफिर तो मुसाफिर है ,उसका घर नहीं होता ,
यूं सारे घर उसी के हैं ,वह बे -घर नहीं होता ,
ये दुनिया खुद मुसाफिर है ,सफर कोई घर नहीं होता ,
सफर तो आना जाना है ,सफर कमतर नहीं होता ।
मुसाफिर अपनी मस्ती में ,किसी से कम नहीं होता ,
गिला उसको नहीं होता उसे कोई गम नहीं होता ।
मुसाफिर का भले ही अपना कोई घर नहीं होता ,
मुसाफिर सबका होता है ,उसे कोई डर नहीं होता ।
गो अपने घर में अटका आदमी ,बदतर नहीं होता ,
सफर में चलने वाले से ,मगर बेहतर नहीं होता ।
सहभाव :डॉ .नन्द लाल मेहता "वागीश "

3 टिप्‍पणियां:

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

https://www.youtube.com/watch?v=-TxOu_yUC2o

बर्बाद -ए -चमन को करने को .....

उनके (सोनिया मायनो )के घर में तो ऐसा बहुत कुछ था जो कांग्रेस का नामोनिशान मिटाने के लिए काफी था। सब जानते हैं और पहचानते हैं उस माणिक लाल को फिर मणिशंकर जैसों को खामखां क्यों हुर्रियत से मिलने जम्मू काश्मीर भेजा गया।

हमारा मानना है माननीय मरहूँम केपीएस गिल साहब को सच्ची श्रन्धांजलि होगी पाकिस्तान प्रेम से आप्लावित लोगों को बाकायदा खबरदार करके घाटी में से चुन चुन के दहशदगर्दों का सफाया किया जाए।

पुण्य दिवसों पर लोग अपना आचरण सुधारते हैं ,वे इंतहा पसंदगी में रमज़ान के महीने में भी मशगूल हैं। भले सदियों से कहे जा रहे हैं -खुद आ ,खुद आ ...लेकिन खुदा न आया है न आया है ,कैसी जन्नते ,कैसी हूरें दोज़ख भी नसीब न होगा इस्लाम और कुरआन की मनमानी व्याख्या करने वाले पैरोकारों को।

'बर्बाद -ए -चमन को ...' श्रृंखला जारी रहेगी।

गर दिलोदिमाग में गर्द - औ गुबार होगा ,

दिल पाक -ओ -साफ़ न होगा ,

फिर रोज़ा रखने से भी क्या होगा।

फानूस बनके जिसकी हिफाज़त हवा करे ,

वो शम्मा क्या बुझेगी ,जिसे रोशन खुदा करे।

फानूस _झाड़ फानूस ,लेम्प शेड डेकोरेटिव।

जैश्रीकृष्णा जयश्रीराम ,जयहिंद की सेना प्रणाम।

विशेष :

कत्ले मासूम करो और माव-ए - जफ़ा रहते हो ,
क्या इसी दीन को तुम दीन -ए -खुदा कहते हो।

मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा चाहे ,

के दाना ख़ाक में मिलके गुल -ए -गुलज़ार होता है।

मर्तबा -इज़्ज़त

अगर ये मज़हबी आदमी का दीन (धर्म ,मज़हब )है तो फिर शैतान का क्या होगा।

बीज जमीन में बो देने के बाद अपनी हस्ती मिटाके ही पल्लवित होता ,रोज़ा भी तभी क़ुबूल होता है मासूमियत का खून करने से कुछ नहीं होता। कैसा मुल्क है आतंक की खेती करे सो करे ,कौम का कैशोर्य ही ,टीनेज ही खा गया। बच्चों के हाथ में बम -बन्दूक ,मियाँ रोज़ा (रोजआ खुदा )कैसे क़ुबूल होगा।

Harshita Vinay ने कहा…

मुसाफिर का कहाँ कोई ठिकाना होता है।

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

रागु धनासरी महला १

गगनमै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती।

धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती || (१ ) ||

कैसी आरती होइ | भवखंडना तेरी आरती।अनहता सबद वाजंत भेरी || १ || रहाउ ||

सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही।

सहस पद विमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही || २ ||

सभ महि जोति जोति है सोइ | तिस दै चान िण सभ महि चानणु होइ।

गुरसाखी जोति परगटु होइ | जो तिसु भावै सु आरती होइ | | ३ ||

हरि चरण कवल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा |

क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नाइ वासा || ४|| ३ ||

ऐसा समझा जाता है यह आरती गुरुनानक देव जी ने जगन्नाथ के मंदिर में पंडों के बाहरी कर्मकांडों (रिचुअल्स )पे सारा जोर देखते हुए उन्हें चेताने के लिए मंदिर के बाहर आकर गाई।

व्याख्या (भाव सार ) :

हे प्रभु ,तुम्हारे पूजन के लिए गगन के थाल में चंद्र और सूर्य के दो दीप जले हैं और समूचा तारामंडल मानो थाल में मोती जड़े हैं। स्वयं मलयगिरि (चंदन -वन- परबत )के चंदन की गंध धूप की सुगन्धि है ,पवन चँवर झुला रहा है ,तथा सृष्टि की समूची वनस्पति ही ,हे परमात्मा तुम्हारी आराधना के पुष्प हैं। तुम्हारी यह प्राकृतिक आरती नित्य और अति मनोहर है | हे भवखण्डन (आवागमन का नाश करने वाले )प्रभु ,यह तेरी मनमोहक आरती है | तुम्हारे सब जीवों के अंदर बज रहा अनहद (अनाहत )शब्द ही मंदिर की भेरी है। || १ || रहाउ ||

(जिस प्रभु की स्तुति में आरती गाई जा रही है ,वह सब जीवों के भीतर निवास करता है ,इसलिए हे परमेश्वर !)तुम्हारी असंख्य आँखें हैं (अर्थात सब जीव तुम्हारा ही रूप हैं ,इसलिए उनकी आँखें तुम्हारी ही तो हैं )किन्तु तुम्हारी कोई भी आँख नहीं। इसी प्रकार तुम्हारी सहस्रों शक्लें हैं ,किन्तु फिर भी तुम्हारी कोई भी शक्ल नहीं (अर्थात तुम निर्गुण निराकार हो )| तुम्हारे असंख्य विमल चरण हैं ,निर्गुण रूप में कोई चरण नहीं। सगुण रूप में प्रकट होने पर (इन सब जीवों के रूप में )तुम्हारी असंख्य नासिकाएं गंध लेती हैं ,अन्यथा निराकार रूप में तुम्हारी कोई नासिका नहीं। यह तुम्हारा विचित्र कौतुक है ,जिसे देख -देखकर मेरा मन मोहित हो रहा है || २ ||

सब जीवों में उस परमात्मा की ज्योति का ही आलोक है ,सब उसी से सिंचित हैं ; वह पावन परम आलोक गुरु की कृपा और शिक्षा (सीख ) से ही प्रकट होता है। उस परम ज्योति को जो भी स्वीकार्य होता है ,वही पूजा बन जाती है || ३ ||

हे परमात्मा ,तुम्हारे चरण कमलों के मकरंद का प्यार मुझे रात- दिन रहता है | गुरुनानक देव कहते हैं ,हे कृपानिधि ,मुझ पपीहे (चातक )को अपनी कृपा की स्वाति -बूँद प्रदान कर ,जिससे में परमात्मा के नाम ही में लीन हो जाऊँ || ४ || ३ ||